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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय बालकाण्ड ३९३
पत्नी पाषाणभूता हो गयी थी। राम के दर्शन से वह शापमुक्त होकर अपने पति गौतम के पास चली गयी। इन्हीं
प्रमाणों के आधार पर महाकवि कालिदास ने कहा है—
“प्रत्यपद्यत चिराय यत्पुनश्चारु गौतमवधूः शिलामयी।
स्वं वपुः स किल किल्बिषच्छिदां रामपादरजसामनुग्रहः ॥” ( रघुवं० ११।३४)।
अर्थात् शिलामयी गौतमवधू बहुत काल के अनन्तर जो पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त हो गयी, उसे
सकलकल्मषहारी राम पादरजों का ही अनुग्रह समझना चाहिये।
कथासरित्सागर, हनुमन्नाटक (३।१७), वह्निपुराण, गणेशपुराण, पद्मपुराण, आनन्दरामायण
( १।३।१६) भावार्थरामायण आदि भी प्रामाणिक ग्रन्थ हैं इनमें तथा अन्य रामकथाओं में अहल्या की शिलाभावप्राप्ति
वर्णित है।
शाप के कई रूप
महाभारत के अनुसार गौतमशाप के कारण इन्द्र की दाढ़ी हरी हो गयी तथा मुष्कवियोग हुआ। बाद में
मेष का वृषण धारण करना पड़ा। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार इन्द्र को शाप के ही कारण मेघनाद से
पराजित होना पड़ा तथा मनुष्यकृत तादृश व्यभिचारों का अर्धभाग इन्द्र को मिलने लगा और इन्द्रपद की अस्थिरता
हो गयी। वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार गौतम-शाप से ही इन्द्र नपुंसक हो गया। परवर्ती नहीं, किन्तु
प्राचीन ही आर्ष ग्रन्थों के अनुसार इन्द्र के शरीर में सहस्र भग प्रकट हुए जैसे ब्रह्मपुराण (८७।५९), स्कन्दपुराण
(नागरखण्ड अध्याय २०७), कथासरित्सागर (३।१७), पद्मपुराण (५।५१।२८) अध्यात्मरामायण (१।५।२६),
ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४६), आनन्दरामायण (१।३।१९) आदि। और इन्द्र के सहस्र भग ही
सहस्र नेत्र हो गये। उक्त विषयों में समन्वय करना ही उचित है, क्योंकि सभी प्रामाणिक ग्रन्थों पर निर्भर हैं।
ब्रह्मपुराण के अनुसार गौतमीस्नान से इन्द्र में यह परिवर्तन हुआ। ब्रह्मवैवर्त्त के अनुसार सहस्र वर्ष पर्यन्त सूर्य की
उपासना से यह परिवर्तन हुआ। किन्हीं प्रचलित कथाओं में राम के द्वारा शिवधनुर्भङ्ग की टङ्कार सुनकर इन्द्र के
सहस्र भग सहस्र नेत्र हो गये। अश्वमेधयज्ञ और देवी का वरदान भी उक्त परिवर्तन में हेतु हैं।
“तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे ततः पूता भविष्यासि।
स हि पावयितुं शक्तस्त्वया यद् दुष्कृतं कृतम्॥ (वा० रा० ७।३०।४३)
उत्तरकाण्ड तथा अन्य अनेक ग्रन्थों के अनुसार अहल्या निर्दोष नहीं थी—मुनिवेष में इन्द्र को जान कर
भी देवराज के कुतूहल से उसमें वैसी दुर्बुद्धि हो गयी—
“मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात् ॥” (वा० रा० १।४८।१९, )
बुल्के के अनुसार परवर्ती कथाओं में इस बात पर बल दिया गया है कि अहल्या ने इन्द्र को नहीं
पहचाना—जैसे ब्रह्मपुराण (अध्याय ८७) के वृत्तान्त में कहा गया है कि विवाह के पहले इन्द्र अहल्या में आसक्त
थे। वे गौतम की अनुपस्थिति में गौतम का रूप धारण कर अहल्या के पास आया करते थे—इत्यादि ठीक नहीं,
क्योंकि प्रामाणिक ग्रन्थों और ऋषियों के लिए यह कहना असङ्गत है कि उन्होंने वस्तुस्थिति के विपरीत किसी बात
पर बल दिया था। महाभारत, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्त्तपुराण आदि सभी प्राचीन ग्रन्थ हैं। सर्वज्ञकल्प महर्षि व्यास ही
इन ग्रन्थों के रचयिता हैं। अतः कल्पभेद के आधार पर विभिन्न वस्तुस्थिति के अनुसार उन्होंने वैसा ही लिखा भी है।
मुर्गे का रूप धारण कर मुर्गे की बोली बोल कर गौतम को भ्रम पैदा कर उनके स्नानार्थ गङ्गा जाने पर इन्द्रने गौतम-
वेष धारण कर अहल्या से छल किया।
५०

३९४ रामायणमीमांसा त्रयोदश
यह ठीक ही है कि अधिकांश ग्रन्थों में इन्द्र और अहल्या को ही गौतम का शाप मिला है, पर रामकियेन
आदि कुछ ग्रन्थों के अनुसार गौतम ने अपनी पुत्री को भी शाप दिया है। मुनि ने भार्या की भर्त्सना की और कहा
क्योंकि तुम अनवस्थित ( अव्यवस्थित, चञ्चल ) होकर पातिव्रत्य से विचलित हो गयी, अतः तुम्हारा रूप भी स्थिर
नहीं रहेगा—
तां तु भार्या विनिर्भर्त्स्य सोऽब्रवीत् सुमहातपाः ।
दुविनीते विनिध्वंस ममाश्रमसमीपतः ॥
रूपयौवनसम्पन्ना यस्मात्त्वमनवस्थिता ।
तस्माद्रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यसि ॥ (वा० रा० ७।३०।३६,३७)
यद्यपि अहल्या ने मुनि का प्रसाद करते हुए कहा कि मुझसे अज्ञानवशात् यह कार्य हो गया, कामकार से
मैंने ऐसा नहीं किया, परन्तु बालकाण्ड के वृत्तान्त से एकवाक्यता करके या तो यही समझना चाहिये कि उसने
प्रसादनार्थ ही वैसा कहा है, अथवा दोनों कथाओं को दो भिन्न कल्पों की मानकर यह मानना चाहिये कि किसी कल्प
में गौतम-पत्नी ने अज्ञानपूर्वक इन्द्रसंगम किया तो किसी कल्प के अनुसार ज्ञानपूर्वक वैसा दुष्कर्म किया था । ज्ञानपूर्वक
दुष्कृत पक्ष में ही शिला हो जाने का भी शाप समझना चाहिये । तुम राम का दर्शन करके पवित्र हो जाओगी ।
तुम्हारे दुष्कृत को मिटाकर तुम्हें पवित्र करने की शक्ति उन्हीं में है । तुम उन राम का आतिथ्यसत्कार करके पुनः
वरवर्णिनी होकर मेरे पास रह सकोगी । राम ही तुम्हें पवित्र कर सकते हैं । इन कथनों से ज्ञानपूर्वक ही दुष्कृत
प्रतीत होता है । महाभारत ( १२।२६६।४ ) के अनुसार गौतम और अहल्या के चिरकारी पुत्र था । उनकी पुत्री का
भी उल्लेख है, जिसका विवाह उत्तङ्क से हुआ था ( म० भा० १४।५६।२४ ) ।
गौतम जिनके पुत्र शरद्वान् जो सरकण्डे से उत्पन्न हुए थे उन्हें अहल्यापति गौतम से भिन्न ही समझना
चाहिये । वाल्मीकिरामायण तथा महावीरचरित आदि के अनुसार जनकपुरोहित शतानन्दजी गौतम और अहल्या के
पुत्र थे ।
रामकीर्ति के अनुसार अञ्जना, वाली और सुग्रीव भी अहल्या की सन्तान हैं । चिरकारी की माता अहल्या
की कथा कल्पान्तरीय कथा है । वाल्मीकिरामायण की कथा की अहल्या सदोष थी और उसके अनुसार गौतम ने इन्द्र
और अहल्या दोनों को ही शाप दिया था । उसी अहल्या का राम द्वारा उद्धार हुआ ।
उत्तरकाण्ड के अहल्या-वृत्तान्त की बालकाण्ड के वृत्तान्त के साथ एकवाक्यता ही समझनी चाहिये, क्योंकि
उत्तरकाण्ड की कथा के अनुसार इन्द्रजित् द्वारा इन्द्र के पराजित होने पर देवताओं के साथ प्रजापति ने जाकर
विविध वर प्रदान कर इन्द्र को मुक्त कराया । भ्रष्ट-तेजा चिन्तापरीतात्मा इन्द्र के प्रश्न करने पर प्रजापति ने अहल्या-
धर्षण का वृत्तान्त सुना कर यह बताया कि अहल्याधर्षण के कारण गौतम महर्षि के शाप से यह तुम्हारा पराभव
हुआ है—
“यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात् ।
तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि ॥” ( वा० रा० ७।३०।३२ )
यह व्यभिचार दोष मनुष्यों में भी उत्पन्न होगा और उसमें आधा पाप पापी को होगा और आधा तुम्हें
( इन्द्र को ) मिलेगा । तुम्हारा ऐन्द्र पद भी स्थिर नहीं रहेगा । कौशिक के शाप के कारण इन्द्र का मुष्क नष्ट हो
गया । फिर, मेष का वृषण धारण कर उन्हें मेषवृषण बनना पड़ा ।
अन्यत्र यह भी उल्लेख है कि गौतम ने इन्द्र के वृषण को छिन्न करके पृथिवी पर डाल दिया—

अध्याय बालकाण्ड ३९५
“इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ च्छिन्नं तु वृषणं पुरा।
ऋषिणा गौतमेनोर्व्या क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥” ( लि० पु० २९।२७ )
इससे ज्ञात होता है कि गौतम का कौशिक नाम भी था। अतएव इन्द्र का उनका रूप बनाकर
अहल्या के पास जाने के कारण कौशिक द्वारा इन्द्र के वृषणवियोग और मेषवृषण की कथा भी सङ्गत है।
इन्द्र कभी कौशिक (गाधि) रूप में उत्पन्न हुए थे, इसलिए भी इन्द्र कौशिकब्राह्मण नाम से प्रख्यात
थे और कौशिक (गौतम) का रूप धारण कर अहल्या के पास आये । इसलिए भी कौशिकब्राह्मणरूप से प्रख्यात थे,
यह “कौशिको हि स्मैनामुपनिन्ये” के सायण भाष्य से स्पष्ट है ।
मुद्गलवंशीय वध्यश्व या बृहदश्व या विन्ध्याश्व ही अहल्या के पिता हैं। कल्पभेद से भी समाधान
संभव है। अतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार साक्षात् ब्रह्मा द्वारा निर्मित अहल्या गौतम को प्रदान की
गयी। गौतम की ब्रह्मचर्यनिष्ठा और तपःसिद्धि से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गौतम को अहल्या का प्रदान किया ।
ब्रह्माण्डपुराण (अ० ७) के अनुसार अर्धप्रसूतां सुरभि (गौ) तथा शिवलिङ्ग की परिक्रमा के माहात्म्य के वर्णन के
प्रसंग से उसका रूपान्तर वर्णन भी असङ्गत नहीं है। एक इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में अनेक शुभ
कर्मों का उपयोग होता है। ब्रह्मचर्य व्रत से अथवा द्विमुखी गौ के परिक्रमण आदि अनेकों हेतुओं से ब्रह्मा की प्रसन्नता
हो सकती है । इसके अतिरिक्त अर्थवाद वचनों का तात्पर्य स्वार्थ में न होकर विधित्सित अर्थ की स्तुति में ही होता है।
पृथ्वी-परिक्रमा आदि की बात द्विमुखी गौ की परिक्रमा का अर्थवाद ही है।
बुल्के ने लिखा है—पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ में अहल्या को भूल से विश्वामित्र की पत्नी कहा गया है।
परन्तु इसका भी कुछ आधार भारत में मिलता है, जहाँ लिखा है— “अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गोतमात् हरितश्म-
श्रुतामिन्द्रः प्राप्तः”—अहल्या के धर्षण के कारण गौतम के शाप से इन्द्र हरितश्मश्रु हो गये थे । वहीं यह भी उल्लिखित
है— “कौशिकनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेषवृषणत्वं चावाप” ( म० भा० १२।३४२।२३ ) । अहल्या के पति का
नाम गौतम था यह प्रमाणसिद्धि ही है।
अहल्या की वंशावली के सम्बन्ध में हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के मतभेद का भी समन्वय कर लेना
चाहिए । श्रीमद्भागवतपुराण (९।२१।३४) के अनुसार अहल्या के पिता मुद्गल थे। इसका अर्थ है कि मुद्गलवंश
में अहल्या की उत्पत्ति हुई थी। अतएव हरिवंश ( १।३२।२८-३२ ) के अनुसार वध्यश्व मुद्गल से मोद्गल, उनसे
इन्द्रसेन और उनसे वध्यश्व और बध्यश्व से दिवोदास तथा अहल्या की उत्पत्ति हुई थी । विष्णुपुराण (४।१९।६१ )
के बृहदश्व तथा मत्स्यपुराण ( ५०।६० ) के विन्ध्याश्व को वध्यश्व से अभिन्न ही समझना चाहिए । वाल्मीकिरामायण
के बालकाण्ड के अनुसार ब्रह्मा ने सब प्राणियों के तथा सहस्रों सुन्दरियों के अङ्गों के सौन्दर्य को लेकर अहल्या का
निर्माण किया और उसमें कुरूपता का अत्यन्त अभाव था, इसी लिए उसका नाम अहल्या हुआ । अतः अहल्या ब्रह्मा
की पुत्री थी। वैसे तो सभी प्राणियों के रचयिता ब्रह्मा ही होते हैं, तथापि अहल्या को विशेषरूप से रचा गया,
इसी लिए उसे ब्रह्मा की पुत्री कहा जा सकता है, किन्तु मनुष्यलोक में वह मुद्गल-वंश में उत्पन्न हुई ।
इसी दृष्टि से "आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब ।
नव्यमायुः प्रसूतिर कृधी सहस्रसामृषिम् ।” ऋक्संहिता ( १।१०।११) में इन्द्र को कौशिक कहा
गया है। सायणानुसारी मन्त्रार्थ यह है—
इन्द्र, तू शीघ्र ही, नः अस्मान् प्रति, हमारे पास आओ। हे कौशिक कुशिकपुत्र इन्द्र, मन्दसानः प्रसन्न
हाकर सुतं सोम का पान करो। हे इन्द्र नव्य स्तुत्य कर्मानुष्ठान तत्पर प्रकृष्ट सुसुन्दर आयु बढ़ाओ । तदनन्तर मुझे

३९६ रामायणमीमांसा त्रयोदश
सहस्रों लाभों से युक्त ऋषि ( अतीन्द्रिय द्रष्टा ) कृषि बनाओ । यद्यपि विश्वामित्र कौशिक नाम से प्रसिद्ध हैं, तथापि
प्रामाणिक वचनों से इन्द्र का भी कौशिक होना सिद्ध है । अनुक्रमणिका के अनुसार यह वृत्तान्त प्रसिद्ध है कि इन्द्रतुल्य
पुत्र की इच्छा से कुशिक ने ब्रह्मचर्य तप किया । तब इन्द्र कुशिक के पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे—
“कुशिकस्त्वैषी रथिरिन्द्रतुल्यं पुत्रमिच्छन् ब्रह्मचर्यं चचार । तस्येन्द्र एव गाथी पुत्रो जज्ञे”—
अनु० ( ऋ० सं० ३।१ ) । पूर्वोक्त हरिवंश की कथा से इसकी संगति मिलती है। अतएव मन्त्रों की व्याख्या पुराणों
में की जाती है । वेद इतने गूढ़रहस्यमय हैं कि उनका अर्थ अटकलबाजी के आधार पर नहीं किया जा सकता । सर्वज्ञ-
कल्प महर्षि ही वेदार्थ निर्णय कर सकते हैं, अतः वाल्मीकि, व्यास, पराशर आदि महर्षियों ने ही पुराणेतिहासों के
द्वारा स्पष्ट अर्थ बतलाया है ।
गौरावस्कन्दी ( स्कन्दिर गतौ ) इन्द्र कहे जाते हैं। उक्त अर्थ षड्विंशब्राह्मण में स्पष्ट है । गौतमपत्नी
अहल्या के जार इन्द्र हैं—यह पुराणों में प्रसिद्ध है । कौशिकनामक ब्राह्मण के समीप में ब्राह्मणवेश से आकर इन्द्र ने
उनकी स्तुति की थी, इसलिए वे 'गौतमब्रुवाण' नाम से सम्बोधित होते हैं । वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार
विश्वामित्र सहस्र वर्ष पर्यन्त तप करने के व्रत के पूर्ण होने पर जब भोजन करने को प्रस्तुत हुए तभी द्विजाति के वेष
में आकर इन्द्र ने उनसे सिद्ध अन्न माँगा—
“स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम् ।
तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः ॥
भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम ।
इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत ।।” ( वा० रा० १।६५।४,५ )
हरिवंश के अनुसार आदित्य के समान तेजस्वी इन्द्र को तीनों लोकों एवं आदित्यों का राजा बनाया
गया । वज्री, कवची और जिष्णु, स्मृतियुक्त, द्युतिमान् इन्द्र अदिति से उत्पन्न हुए थे, अध्वर्युवों ने उनकी स्तुति
की । उत्पन्न होते ही उन्हें कुशयुक्त ब्राह्मणों ने धारण किया, अतः वे कौशिक कहलाये—
“जातमात्रोऽथ भगवान् सकुशैर्ब्राह्मणैधृतः ।
तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ॥” ( हरिवं० ३।३७।३ )
कुशिक-पुत्र गाधि के रूप में इन्द्र का जन्म होने से भी इन्द्र कौशिक कहलाये, यह भी पीछे कहा गया है ।
“त्रयाणामपि लोकानामादित्यानां च भारत ।
चकार शक्रं राजानमादित्यसमतेजसम् ॥
स वज्रो कवची जिष्णुरदित्यामभिजज्ञिवान् ।
स्मृतेः सहायो द्युतिमान् यथा सोऽध्वर्युभिः स्तुतः ॥” ( हरिवं० ३।३७।१,२ )
उस समय इन्द्र “मैं गौतम हूँ” ऐसा कहकर गौतमरूप से व्यवह्रियमाण होकर विचरते थे, इसलिए उन्हें
गौतमब्रुवाण कहा जाता है ।
इन्द्रागच्छ इत्यादि मन्त्र की व्याख्या शतपथ में भी की गयी है । उसमें कहा गया है—इन्द्र के जो चरण
( चरित्र ) हैं उन्हीं के द्वारा इन्द्र को प्रमुदित करना अभीष्ट है—
“यान्येवास्य चरणानि तैरैवैतमेतत्प्रसुमोदयिषति” ( श० ब्रा० ३।३४।१८ ) । तैत्तिरीय आरण्यक में भी
उपर्युक्त मन्त्र की व्याख्या की गयी है। उसका सायनानुसारी अर्थ यह है—हे परमेश्वर्ययुक्त इन्द्र, इस यज्ञकर्म में

आइये, हरी—हरि नामक दो घोड़े—जिसके हैं वह इन्द्र हरिवान् है। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के अभिमानी दोनों
देवता इन्द्र के अश्व बनकर रथवहन करते हैं, इसलिए इन्द्र हरिवान् हैं। सम्बोधन में नकार को रुत्व हो जाता
है, अतः वह हरिवः रूप से सम्बोधित होते हैं। मेधातिथि को मेषरूप धारण कर हरण करके स्वर्ग में ले जानेवाले
इन्द्र मेधातिथिसम्बन्धी मेषरूप से सम्बोधित होते हैं। इसी प्रकार वृषणश्व नामक ऋषि को मेनका नाम्नी दुहिता
की कामना करनेवाले इन्द्र वृषणश्वमेने रूप से सम्बोधित होते हैं। गौर मृगरूप से यज्ञ-भाग के मध्य में आकर सोम
पीनेवाले इन्द्र गौरवास्कन्दिन् रूप से सम्बोधित होते हैं। क्वचित् कुशिक गोत्रोत्पन्न होकर इन्द्र कौशिकब्राह्मण हुए
थे। इसी लिए उन्हें कौशिकब्राह्मण नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। कुशिक ने इन्द्रतुल्य पुत्र की प्राप्ति के
लिए तप किया था। कुशिक का उग्र तप देखकर त्रस्त होकर इन्द्र ने अपने आप को ही गाधि के रूप में प्रदान किया
था। इस प्रकार इन्द्र का नाम कौशिक हुआ है—
कुशिकस्तु तपस्तेते पुत्रमिन्द्रसमप्रभम् ।
लभेयमिति तं शक्रस्त्रासादभ्येत्य जज्ञिवान् ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे वै तं तु शक्रो ह्यपश्यत ।
अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरन्दरः ॥
समर्थः पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत् ।
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः ॥
स गाधिरभवत् राजा मघवान कौशिकः स्वयम् ।"
(हरि० पु० १।२७।१३-१५; १।३२।५१,५२)
उप एवं नि उपसर्गपूर्वक इण गतौ धातु से परोक्षार्थक लिट् लकार में उपन्येति रूप बना है, अर्थात् अहल्या
का उपगमन करके इन्द्र उसके भर्त्ता बने थे—
"कौशिको ह स्मैनामुपन्येति"
के अनुसार इन्द्र ही विश्वामित्र के रूप में गाधि से उत्पन्न हुए थे, अतः उपचार से इन्द्र को कौशिक-
ब्राह्मण भी कहा जाता है। गौतमब्रुवाण गौतमरूप से व्यवह्रियमाण होने के कारण इन्द्र को गौतमब्रुवाण नाम से
सम्बोधित किया जाता है। इस सम्बन्ध में आख्यायिका प्रसिद्ध है कि कभी देवता और असुर दोनों युद्ध के लिए
तत्पर हुए थे। गौतम दोनों पक्षों के मध्य में तप कर रहे थे। इन्द्र ने उनके पास जाकर कहा कि असुर लोग
आपको बाधित करेंगे, अतः आप हमारे चार ( गुप्तचर ) बन जाइये। परन्तु ऋषि ने कहा मैं चार नहीं बनूँगा ।
तब इन्द्र ने कहा यदि आपकी अनुमति हो तो आपके रूप से मैं स्पश ( चार ) हो जाऊँ । इस पर गौतम ने कहा यदि
आप चाहें तो ऐसा कर सकते हैं, अतः गौतमब्रुवाणरूप से सम्बोधित होते हैं। इन्द्र उस देवता का प्रत्यक्ष नाम है,
अतः इन्द्र नाम से उस देवता का आह्वान किया गया है ।
शुक्लकृष्णपक्षौ हरी अश्वौ स्तोऽस्य इति सम्बुद्धौ हरिवः । हरिवः आगच्छ- "मतुवसो रु संबुद्धौ छन्दसि"
( पा० सू० ८।३।१ ) के द्वारा हरिवन् के नकार को रु हो जाता है। गौरावास्कन्दिन्—गौर मृग होकर इन्द्र
सोमरस का पान करता है, इसी लिए इन्द्र को गौरावस्कन्दी कहा जाता है। अहल्यायै जार मित्र दुहिता—मैत्रेयी
के जार उपपति होने के कारण इन्द्र को अहल्यायै जार कह कर सम्बोधित किया जाता है ।
उपन्येति गौतमब्रुवाणेति देवासुरा हवै संयत्ता आसंस्तानन्तरेण—गौतमः शश्राम तमिन्द्र
उत्पेत्योवाचेह नो भवां स्पशंश्चरत्विति नाहमुत्सह इत्यथाहं भवतो रूपेण चराणीति यथा मन्यसे इति स
यत्तद्गौतमो वा ब्रुवाणश्चचार गौतमरूपेण वा तदेतदाह ।

३९८ रामायणमीमांसा त्रयोदश
पूर्वोक्त सुब्रह्मण्या, यद्यपि ब्राह्मणोक्त है तथापि वह साम-मन्त्र है, अतएव उद्गातृ-वर्ग का सुब्रह्मण्य ऋत्विक्
सुब्रह्मण्य का गान करता है। उद्गाता तीन बार सुब्रह्मण्यो३ँ सुब्रह्मण्यो३ = सुब्रह्मण्यो३म् का उच्चारण करता है।
सुब्रह्मण्या स्त्रीलिङ्ग है। इन्द्र देवता का ही सुब्रह्मण्यो३म् के द्वारा आह्वान किया जाता है। इन्द्रागच्छ, हरिव आगच्छ
मेधातिथेः मेषवृषणश्वस्य मेने, गौरावस्कन्दिन्नहल्यायै जार, कौशिकब्राह्मण, गौतमब्रुवाण इति (प्र० आ० १।१२।४)।
मेधातिथैर्मेष वृषणश्वस्य (१) मेने गौरावस्कन्दिन्नहल्यायै (२) जार कौशिकब्राह्मण गौतम-
ब्रुवाणैतावदेहे सुत्यामिति यावदहे स्यात् १। (ला० श्रौ० सू० कण्डिका ३।१)
आतिथ्या इष्टि समाप्त होने पर अध्वर्यु के सम्प्रैष के अनन्तर उद्गाता सुब्रह्मण्यो३म् इस मन्त्र का तीन
बार उच्चारण करके इन्द्रागच्छ इत्यादि निगद मन्त्र कहे । मेधातिथेः इत्यादि सुत्या का प्रयोग करता है। यह सब
षड्विंशब्राह्मण में प्रारम्भ में ही उक्त है। सुब्रह्मण्यो ३म्
इन्द्रागच्छेति यदाहेन्द्रागच्छेत्येतद्वा अस्य प्रत्यक्षं नाम तेनैवैनं तदाह्वयति हरिव आगच्छेति
पूर्वपक्षापरपक्षौ वा इन्द्रस्य हरी हीदं सर्वं हरति मेधातिथिं काणवायनं मेषो भूत्वा जहार वृषणश्वस्य मेन
इति । वृषणश्वस्य मेना मेनका नाम दुहिता हेन्द्रश्चकमे । गौरवास्कन्दिन्निति । गौरमृगो स्म भूत्वा स्कन्द-
धरण्यादाजानं पिबत्यहल्यायै जारेत्यहल्याया मैत्रेय्या जार आस कौशिकब्राह्मणेति ।
श्रीभगवानुवाच—
ततस्तां चारुसर्वाङ्गीं दृष्ट्वा मन्मथपीड़ितः ।
इन्द्र उवाच—
अलं प्रिये न वक्तव्यं हृच्छयो मे प्रजायते ।
कर्तव्यं चाप्यकर्तव्यं पत्युर्वचनसम्मतम् ॥२०॥
इत्युक्त्वा तां परिष्वज्य कृतस्तेन मनोरथः ।
एतस्मिन्नन्तरे विप्र मुने हृद्यं च कल्पितम् ॥२४॥
ततो ध्यानं समारम्भाजानाद् वृत्तं शचीपतेः ।
तूर्णमेव द्वारदेशे गत्वा च समुपस्थितः ॥२५॥
शक्री मुनिं तु संलक्ष्य चौतुदेहं विवेश ह।
गच्छतो वृषदंशस्य पढ़तौ प्रचचाल ह ॥२६॥
मुनिस्तत्रावदत्तं वै कस्त्वं मार्जाररूपधृक् ।
भयात्तस्य मुनेरग्रे शक्रः प्राञ्जलिरस्थितः ॥
मघवन्तं पुरी दृष्ट्वा चुकोप मुनिपुङ्गवः ॥२७॥
मुनिरुवाच—
यत्त्वया चेदृशं कर्म भगत्वाच्छलसाहसम् ।
कृतं तस्मात्तवाङ्गं तु सहस्रभगमुत्तमम् ॥२८॥
भवत्विह तु पापिष्ठ लिङ्गं ते निपत्तिष्यति ।
गच्छ मे पुरतो मूढ सुरस्थानं दिवौकसः ॥२९॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो रुदतीं तां पतिव्रताम् ।
पप्रच्छ किमिदानीं ते कर्म दारुणमागतम् ॥३१॥

अध्याय बालकाण्ड ३९९
अहल्योवाच-
अज्ञानाद्यत्कृतं कर्म क्षन्तुमर्हसि वे प्रभो ॥३२॥
मुनिरुवाच-
परेणाभिगतासि त्वममेध्या पापचारिणी ।
अस्थिचर्मसमाविष्टा निर्मांसा नखवर्जिता ॥
चिरं स्थास्यसि चैकापि त्वां पश्यन्तु जनाः स्त्रियः ॥३३॥
श्रोमगवानुवाच—
दुःखिता तमुवाचेदं शापस्यान्तो विधीयताम् ॥३४॥
जगाद गौतमो वाक्यं रामो दाशरथिर्मदा।
वनमभ्यागतो विष्णुः सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥३५॥
दृष्ट्वा त्वां दुःखितां शुष्कां निर्देहां पथि संस्थिताम् ।
गदिष्यति च वै रामो वसिष्ठस्याग्रतो हसन् ॥३६॥
किमियं शुष्करूपा च प्रतिमास्थिमयी शिवा।
न दृष्टं मे पुरा ब्रह्मन् रूपं लोकविपर्ययम् ॥३७॥
अर्थ- उक्त वचनों में कहा गया है कि इन्द्र ने गौतमपत्नी से दुराचार किया। गौतम के आने पर इन्द्र
ने विडाल का रूप धारण कर लिया। मुनि ने पूछा तुम विडालरूपधारी कौन हो ? यह सुनकर भयभीत होकर साञ्जलि
इन्द्र खड़े हो गये। मुनि ने इन्द्र के साहसपूर्ण छल से कुपित होकर उसके शरीर में सहस्र भग होने और लिङ्गनिपात
का शाप दिया।
अहल्या ने कहा मैने अज्ञानवश यह दुष्कर्म किया, आप क्षमा कर दें। फिर भी मुनि ने उसे अस्थिचर्मस-
माविष्ट निर्मांस तथा नखवजिर्त होने का शाप दिया। उसकी प्रार्थना पर यह कहा कि जब लक्ष्मण और सीता के साथ
राम यहाँ आकर शुष्क देहवाली मार्ग में पड़ी हुई तुम्हें देखेंगे और यह अस्थिमयी शुष्क प्रतिमा क्या है ? ऐसा
रूपविपर्यय मैंने कभी नहीं देखा है, ऐसा वसिष्ठ से प्रश्न करेंगे।
ततो रामं महाभागं विष्णुं मानुषविग्रहम् ।
वसिष्ठः कथयामास यद्वृत्तमखिलं च तत् ॥३८॥
वसिष्ठवचनं श्रुत्वा पुनराह स धर्मवित् ।
अस्या दोषो न चैवास्ति दोषोऽयं पाकशासने ॥३९॥
एतदुक्ते तु रामे त्वं त्यक्त्वा रूपं जुगुप्सितम् ।
दिव्यं रूपं समास्थाय मद्गृहं चागमिष्यसि ॥४०॥
( पद्मपु० सृष्टि० अध्याय ५१ )
अर्थ- तब मनुष्यविग्रह राम से वे सब वृत्तान्त वर्णन करेंगे। वसिष्ठ के वचन सुनकर धर्मवित् राम कहेंगे
कि इसका दोष नहीं; यह तो इन्द्र का ही दोष है। तब तुम कुत्सित रूप त्याग कर दिव्य देह धारण कर मेरे
समीप आओगी।
"तेन नीतो विनीतात्मा अहल्या यत्र तिष्ठति ।
व्यभिचारान्महेन्द्रेण भर्त्रा शप्ता हि सा पुरा ॥९६॥

४०० रामायणमीमांसा त्रयोदश
पाषाणभूता राजेन्द्र तस्य रामस्य दर्शनात् ।
अहल्या मुक्तशापा च जगाम गौतमं प्रति ॥९७॥” (नृ० पु० अध्याय ४७)
नृसिंहपुराण के अनुसार अहल्या पाषाणप्रतिमा हो गयी थी । राम के दर्शन से वह शापमुक्त हुई—
“जगाम शक्रः स्नानार्थं स्वर्णदीं सुमनोहराम् ।
ददर्श तत्र रुचिरां मार्जन्तीं च नितम्बिनीम् ॥१९॥
सस्मितां सकटाक्षां तामहल्यां गौतमप्रियाम् ।
दृष्ट्वा च विपुलश्रोणीं स्तनयुग्मं मनोहरम् ॥२०॥
मूर्ति विधाय तद्भर्तुः तत्समीपं जगाम ह ।
गत्वा तु स्निग्धवस्त्रां तां समाकृष्य स्मरातुरः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे तप्त्वा समागत्य मुनीश्वरः ।
ददर्श गेहे मिथुनं मैथुने च रतिप्रिये ॥२५॥
विज्ञानेनातिरोषेण बभञ्ज सुरतिक्षणम् ॥२६॥
वेदं विज्ञाय नीच त्वं योनिलुब्धोऽसि कर्मणा ॥३०॥
योनीनां च सहस्रं च तव गात्रे भवत्विह ।
पूर्णं वर्षं च सततं योनिगन्धमवाप्नुहि ॥३१॥
पादानतामहल्यां तामुवाच मुनिपुङ्गवः ॥३६॥
वनं गत्वा चिरं तिष्ठ विधाय मूर्तिमश्मनः ॥३७॥
श्रीरामचरणस्पर्शात् सद्यःशुद्धा बभूव ह ॥४३॥”
( ब्र० वै० पु० कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४७ )
इन वचनों में इन्द्र को सहस्रभग तथा योनिगन्ध होने का शाप दिया है और सूर्य की आराधना से इन्द्र को
सहस्राक्ष होने का शापानुग्रह किया गया है और अहल्या को पाषाण शिला बनकर रहने एवं रामपादस्पर्श से उद्धार
की बात कही गयी है ।
“कस्यचित्त्वथ कालस्य गौतमस्य मुनेः प्रिया ॥ ७ ॥
अहल्या नाम भार्याभूद् रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
तां दृष्ट्वा चकमे शक्रः कामदेववशं गतः ॥ ८ ॥
नित्यमेव समागत्य स्वर्गलोकात् स कामभाक् ।
गौतमे निर्गते राजन् समिदिध्मार्थमेव हि ॥
दर्भार्थं फलमूलार्थं स्वयमेव महात्मभिः ॥ ९ ॥
अथ तस्य समाचख्यो नारदो मुनिसत्तमः ।
शक्रस्य चेष्टितं सर्वं तथाहल्यासमुद्भवम् ॥१०॥
तच्छ्रुत्वा सहसा तूर्णं गौतमो गृहमभ्यगात् ।
यावत्पश्यति देवेशं सह पत्न्या समागतम् ॥११॥
शक्रोऽपि गौतमं दृष्ट्वा पलायनपरायणः ।
निर्जगामाश्रमात्तस्मात् विवस्त्रोऽपि भयाकुलः ॥१२॥
अहल्या च भयत्रस्ता दृष्ट्वा भर्तारमागतम् ।
अधोमुखी स्थिता राजन् तदा व्याकुलितेन्द्रिया ॥१३॥

अध्याय बालकाण्ड ४०१
गौतमोऽपि च तद् दृष्ट्वा सम्यग्भार्याविचेष्टितम् ।
ददौ शापं महाराज कोपसंरक्तलोचनः ॥१४॥
यस्माच्छक्र पापकर्म कृतमीदृग् विगर्हितम् ।
भार्या मे दूषिता साध्वी तस्मादवृषणो भव ॥१५॥
सहस्रं च भगानां ते वक्त्रे भवतु मा चिरम् ।
येन त्वं विप्लवं यासि त्रैलोक्ये सचराचरे ॥१६॥
अपरं मर्त्यलोकेऽत्र यद्यागच्छसि वासव ।
पूजाकृते ततो मूर्धा शतधा ते भविष्यति ॥१७॥
एवं शप्त्वा च तं शक्रं ततोऽहल्यामुवाच सः ।
कोपसंरक्तनेत्रस्तु भर्त्सयित्वा मुहुर्मुहुः ॥१८॥
यस्मात्पापे त्वया कर्म कृतमेतद् विगर्हितम् ।
तस्माच्छिलामयी भूत्वा त्वं तिष्ठ वसुधातले ॥”१९॥
( स्कन्दपु० नागरखण्ड अध्याय २०७ )
अर्थ—उपर्युक्त वचनों में कहा गया है कि अहल्या के सौन्दर्य से मोहित होकर काम के वशीभूत हो इन्द्र
सदा अहल्या के पास आया करते थे । नारदजी ने गौतम से इन्द्र-अहल्या का सब वृत्तान्त बताया । यह सुनकर गौतम
तुरन्त घर गये । इन्द्र भयभीत होकर विवस्त्र ही भागे । अहल्या भी भयभीत हो गयी । गौतम ने इन्द्र को सहस्र भग
होने का शाप दिया और यह भी कहा कि मर्त्यलोक में आते ही तुम्हारा मूर्धा शतधा विदीर्ण हो जायेगा । अहल्या को
शिला होने का शाप दिया ।
“पुराभूद् गौतमो नाम त्रिकालज्ञो महामुनिः ।
अहल्येति च तस्यासीद् भार्या रूपजिताप्सराः ॥१३७॥
एकदा रूपलुब्धस्तामिन्द्रः प्रार्थितवान् रहः ।
प्रभूणां हि विभूत्यन्धा धावत्यविषये मतिः ॥१३८॥
सानुमेने च तं मूढा वृषस्यन्ती शचीपतिम् ।
तच्च प्रभावतो बुद्ध्वा तत्रागाद् गौतमो मुनिः ॥१३९॥
मार्जाररूपं चक्रे च भयादिन्द्रोऽपि तत्क्षणम् ।
कः स्थितोऽत्रेति सोऽपृच्छदहल्यामथ गौतमः ॥१४०॥
एसो ठिओ खु मज्जारो इत्यपभ्रष्टवक्त्रया ।
गिरा सत्यानुरोधिन्या सा तं प्रत्यब्रवीत् पतिम् ॥१४१॥
सत्यं त्वज्जार इत्युक्त्वा विहसन् स ततो मुनिः ।
सत्यानुरोधकृत्सान्तं शापं तस्यामपातयत् ॥१४२॥
पापशीले शिलाभावं भूरिकालमवाप्नुहि ।
आ वनान्तरसंचारिराघवालोकनादिति ॥१४३॥
वराङ्ग्लुब्धस्याङ्गे ते तत्सहस्रं भविष्यति ।
दिव्यस्त्रीं विश्वकर्मा यां निर्मास्यति तिलोत्तमाम् ॥१४४॥
५१

४०२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
तां विलोक्य तदेवाक्ष्णां सहस्रं भविता च ते।
इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥’’१४५॥
(कथासरित्सागर-३।३)
अर्थ-उपर्युक्त वचनों में भी इन्द्र और अहल्या दोनों सदोष हैं। मार्जाररूप में इन्द्र को सत्यानुरोधिनी
प्राकृत भाषा में अहल्या ने मार्जार-बोधन की दृष्टि से मज्जार कहा। जिसका वास्तविक अर्थ मज्जार मेरा जार ही
था। गौतम ने उपहास करते हुए कहा सत्य ही यह त्वज्जार तुम्हारा जार (उपपति) ही है। उन्होंने उसे शाप
दिया पापशीले तुम बहुत काल तक शिलाभाव को प्राप्त होओ और तबतक शिला बनी रहो जबतक वनान्तर संचारी
राघव का दर्शन नहीं होता। इन्द्र के लिए पुनः कहा वराङ्गलुब्ध इन्द्र, तुम्हारे शरीर में सहस्र भग तबतक रहेंगे
जबतक विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्यस्त्री तिलोत्तमा नहीं प्राप्त होती। उसको देखते ही वे सहस्र भग सहस्र नेत्रों के
रूप में परिणत हो जायेंगे।
“दत्वाऽस्य वृषणौ भूमौ नाशयित्वा भगानिमान् ।
मर्त्यलोके गतिश्चास्य यथा स्यात्तत्समाचर ॥४६॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां स मुनिर्दैवगौरवात् ।
वृषणौ मेषसम्भूतौ योजयामास तौ तदा ॥४७॥
तान् भगान् पाणिना स्पृष्ट्वा चक्रे नेत्राणि सन्मुनिः ।
ततः प्रोवाच तान् देवान् गौतमश्च महातपाः ॥४८॥
सहस्राक्षो मया शक्रो निर्मितोऽयं सुरोत्तमाः ।
समेषवृषणश्चापि स्वं च राज्यं करिष्यति ॥४९॥
शोभास्य नेत्रजा वक्त्रे सुरम्या सम्भविष्यति ।
पुंस्त्वं च मेषजोत्थाभ्यां वृषणाभ्यां भविष्यति ॥”५०॥
(स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०७)
उक्त वचनों के अनुसार गौतम से अनुग्रह करके इन्द्र को वृषण प्रदान करने और भगों को मिटाने तथा
मर्त्यलोक आ सकने की देवताओं ने प्रार्थना की। देवताओं के गौरव से मुनि ने मेषवृषण लगाकर, अपने हाथ से भगों
का स्पर्श करके उन्हें नेत्र बना दिया और मर्त्यलोक-गति की भी अनुमति दे दी।
“ततो मार्गे मया दृष्टा गौतमस्याश्रमे शुभे ।
अहल्या सा शिलारूपा प्रमाणेन महत्तमा ॥२४॥
ततः प्रोक्तौ मया रामः स्पृशेमां वत्स पाणिना ।
मानुषत्वं लभेद्येन गौतमस्य प्रिया मुनेः ॥२५॥
अविकल्पं ततो रामो मम वाक्येन तां शिलाम् ।
पस्पर्श पार्थिवश्रेष्ठ कौतूहलसमन्वितः ॥२६॥
अथ रामेण संस्पृष्टा सहसैवाङ्गना मुनेः ।
शुशुभे मानुषी जाता दिव्यरूपवपुर्धरा ॥”२७॥
(स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०८)
इन वचनों के अनुसार शिलारूप में पड़ी अहल्या का परिचय देकर मुनि ने उसे हाथ से स्पर्श करने के
लिए राम को प्रेरित किया। राम के स्पर्श करते ही वह दिव्यदेहधारिणी दिव्य स्त्री हो गयी।

अध्याय बालकाण्ड ४०३
“गौतमो ब्राह्मणस्त्वासीत्साक्षाद् ब्रह्मोव चापरः ।
सत्यधर्मसमायुक्तो वानप्रस्थाश्रमे रतः ॥२॥
तस्य पत्नी महाभागा अहल्या नाम विश्रुता ।
रूपयौवनसम्पन्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥३॥
अस्या अप्यतिरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।
मोहितो लोभयामास ह्यहल्यां बलसूदनः ॥४॥
मां भजस्व वरारोहे देवराजमनिन्दिते ।
क्रीडयस्व मया सार्धं त्रिषु लोकेषु पूजिता ॥५॥
किं करिष्यसि विप्रेण शौचाचारकृशेन तु ।
तपःस्वाध्यायशीलेन क्लिश्यन्तीव सुलोचने ॥६॥
एवमुक्ता वरारोहा स्त्रीस्वभावात् सुलोचना ।
मनसाध्याय शक्रं सा कामेन कलुषीकृता ॥७॥
तस्या विदित्वा तं भावं स देवः पाकशासनः ।
गौतमं वञ्चयामास दुष्टभावेन भावितः ॥८॥
विदित्वा चान्तरं तस्या गृहीत्वा वेषमुत्तमम् ।
अहल्यां रमयामास विश्वस्तां मन्दिरान्तिके ॥९॥
क्षणमात्रान्तरे तत्र देवराजस्य भारत ।
आजगाम मुनिश्रेष्ठो मन्दिरं त्वरयान्वितः ॥१०॥
आगतं गौतमं दृष्ट्वा भीतभीतः पुरन्दरः ।
निर्गतः स ततो दृष्ट्वा शक्रोऽयमिति चिन्तयन् ॥११॥
ततः शशाप देवेन्द्रं गौतमः क्रोधमूर्च्छितः ।
अजितेन्द्रियोऽसि यस्मात्त्वं तस्माद् बहुभगो भव ॥१२॥
एवमुक्तस्तु देवेन्द्रः तत्क्षणादेव भारत ।
भगानां तु सहस्रेण तत्क्षणादेव वेष्टितः ॥१३॥
त्यक्त्वा राज्यं सुरैः सार्धं गतश्रीको जगाम ह।
तपश्चचार विपुलं गौतमेन महीतले ॥१४॥
अहल्यापि ततः शप्ता यस्मात्त्वं दुष्टचारिणी ।
प्रेक्ष्य मां रमसे शक्रं तस्मादश्ममयी भव ॥१५॥
गते वर्षसहस्रान्ते रामं दृष्ट्वा यशस्विनम् ।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन धौतपापा भविष्यसि ॥१६॥”
( स्कन्दपु० रेवाखण्ड अ० १३६ )
उपर्युक्त वचनों से विदित होता है कि इन्द्र और अहल्या दोनों ही सदोष थे । देवराज के अनेक चाटुमय
वचनों से मोहित हुई उसकी बुद्धि स्त्रीस्वभाववशात् चञ्चल हो गयी । तब इन्द्र ने उत्तम वेष ग्रहण करके उसे रमण
कराया । गौतम ने क्रोधमूर्च्छित होकर इन्द्र को बहुभग होने का शाप दिया तथा अहल्या को पाषाणमयी होने का शाप
दिया । सहस्र वर्षों के अन्त में राम के दर्शन से शापमुक्त होने का अनुग्रह भी किया ।

४०४ रामायणमीमांसा त्रयोदश
परशुराम
जैसे "काशी में राम ने गङ्गास्नान किया" और "काशी दशाश्वमेध घाट पर राम ने गङ्गास्नान किया"
इन वचनों का आपस में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि प्रथम वाक्य सामान्य है, द्वितीय विशेष है। गङ्गा में किसी
विशेष घाट पर ही स्नान बन सकता है, अतः उसकी दशाश्वमेध घाट के साथ एकवाक्यता बन जाती है। इसी प्रकार-
असति विरोधे-सभी विशेषों का सामान्य के साथ समन्वय हो जाता है। इस नीति से राम, सीता, लक्ष्मण और परशुराम
सभी के चरित्रों में समन्वय कर लेना उचित है। महावीरचरित, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक, प्रसन्नराघव,
रामचरितमानस, रामचन्द्रिका आदि में परशुराम के तेजोभङ्ग का मिथिला में वर्णन किया गया है। इनमें परशुराम के
वाग्युद्ध का विस्तृत वर्णन है। परशुराम का क्रोध उग्र होता है। वे वध करने की धमकी देते हैं। राजशेखर के
बालरामायण के अनुसार दशरथ तथा परशुराम सीता और राम के विवाह के बाद मिथिला में पहुँचते हैं। उसके
अनुसार विश्वामित्र का आदेश पाकर लक्ष्मण ही नारायणीय धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं। जिसपर जनक, लक्ष्मण
और उर्मिला के विवाह का प्रस्ताव करते हैं। विश्वामित्र के सुझाव के अनुसार भरत और माण्डवी एवं शत्रुघ्न और
श्रुतकीर्ति का विवाह होता है।
अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने धनुष चढ़ाकर परशुराम को विराट् रूप दिखाया और बाण छोड़कर
उनका तेज ले लिया। तब परशुराम ने होश में आकर राम को विष्णु का अवतार मानकर उन्हें प्रणाम किया और
उनकी आज्ञा से महेन्द्र पर्वत पर चले गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ के अनुसार राम ने क्षत्रिय-विध्वंस के
प्रायश्चित्तार्थ तप के उद्देश्य से उन्हें महादेव के पास भेजा था। इनमें कई अंशों को प्रशंसार्थवाद समझकर उनका
समाधान करना उचित है। रामकीर्ति में रामपरमस्र को एक क्रूर यक्ष माना है। राम उनसे कहते हैं कि मैं नारायण
का अवतार हूँ। उसपर वे प्रमाण चाहते हैं कि राम उनका चाप उठा लें। राम बायें हाथ से लीलापूर्वक उस
धनुष को उठाकर बाण चढ़ाते हैं। तब रामपरमस्र क्षमा मांगते हैं तथा राम को अपना ऐन्द्रजालिक बाण भी दे देते
हैं। यह भी वाल्मीकिरामायण की कथा का ही संवर्धित रूप है।
कृत्तिवासरामायण में सीता को शङ्का होती है कि एक धनुष को तोड़कर मेरे साथ विवाह किया, अब
भृगुमुनि एक धनुष और लाये हैं। न जाने मेरी कितनी सपत्नियां होंगी।
अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, राघवोल्लास तथा रामचरितमानस में तेजोभंग के पश्चात् परशुराम
राम की स्तुति करते हैं। रामभक्ति का वरदान लेकर चले जाते हैं। राघवोल्लास में राम की प्रभावपूर्ण बातों से
ही परशुराम शान्त हो जाते हैं। विष्णु-धनुष चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वे अपने सब अस्त्र-शस्त्र राम के
चरणों में अर्पित कर देते हैं। कम्बरामायण के अनुसार तेजोभङ्ग के पश्चात् देवता पुष्पवृष्टि करते हैं और राम विष्णु
का धनुष वरुण को अर्पित कर देते हैं।
सामान्य विशेषपर्यवसायी होता है, अतएव सामान्य का विशेष से विरोध भी नहीं होता। हाँ, विरुद्ध
विशेष्यों में विरोध हो सकता है। विष्णु के हुंकार से स्तम्भित होकर शिव ने धनुष छोड़ दिया था। वही धनुष
जनक को प्राप्त हुआ था। उसी का भंग होने से परशुराम क्षुब्ध हुए थे। देवता लोगों ने "शिव और विष्णु में कौन
श्रेष्ठ हैं" यह प्रश्न पितामह ब्रह्मा से किया। ब्रह्मा ने शङ्का दूर करने के लिए अपने सत्य संकल्प से दोनों में विरोध
उत्पन्न कर दिया। ब्रह्मा की संकल्पसिद्धि के लिए ही दोनों ने विरोध स्वीकार किया। विष्णु के हुंकार से शिव
का धनुष शिथिल हो गया और स्वयं महादेव स्तम्भित हो गये। देवताओं की प्रार्थना से दोनों ने युद्ध बन्द कर दिया।
देवताओं ने इस घटना से विष्णु को अधिक श्रेष्ठ माना। रामाभिरामी टीका के अनुसार इस युद्ध में विष्णु की
उत्कृष्टता सिद्ध हुई है। त्रिपुरवध में विष्णु बाण बनकर शिव के उपकरण हुए थे। अतः दोनों समान ही हैं।

अध्याय बालकाण्ड ४०५
शिवपुराण एवं शिवमहिम्न के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गरूप भगवान् का अन्त नहीं पा सके ।
अतएव विष्णु भगवान् सदा सहस्र कमलों से शिव की अर्चा किया करते थे । भक्ति-परीक्षा के लिए एक दिन शिवजी
ने एक कमल लुप्त कर दिया, तब विष्णु ने अपना नेत्रकमल ही चढ़ा दिया । शिव भगवान् के वरदान से वह नेत्र
ही सुदर्शनचक्र हो गया ।
इस तरह शिव और विष्णु दोनों ही वस्तुतः एक हैं, फिर भी एक दूसरे की उपासना करते हैं तथा एक
दूसरे को अपने से उत्कृष्ट प्रख्यापित करते हैं ।
वाल्मीकिरामायण तथा अन्य राम-कथाओं में विवाह के पश्चात् अयोध्या की यात्रा के समय परशुराम
आते हैं ।
“राम रामापति कर धनु लेहू । खैंचहु चाप मिटै सन्देहू ॥ ( रा० मा० १।२८३।४)
उनके यह कहने पर ज्यों ही राम विष्णु का धनुष चढ़ाते हैं, परशुराम निस्तेज हो जाते हैं और युद्ध का
अवसर ही नहीं आता । वे राम को विष्णु समझकर प्रणाम करते हैं ।
राम ने चढ़े हुए बाण से परशुराम के तपोबल से संचित लोकों को नष्ट कर दिया, क्योंकि राम का
बाण अमोघ था और ब्राह्मण परशुराम पर प्रहार करना राम को इष्ट नहीं था । उनकी दिव्य गति पर बाण का
प्रयोग इसलिए नहीं किया कि परशुराम ने यह कहा कि कश्यप के अनुरोध से मैं पृथ्वी पर निवास नहीं कर सकता ।
मैं समुद्र से नया स्थान महेन्द्राचल लेकर वहीं रहता हूँ । दिव्यगति नष्ट होने पर वहाँ पहुँचना असंभव होगा, अतः
मेरे तपोबल से अर्जित लोकों पर ही बाण चलाइये ।
कहते हैं, परशुराम एक सुयोग्य प्रतिद्वन्द्वी क्षत्रिय से युद्ध करना चाहते थे । पर यह कथन निष्प्रमाण ही
है । सहस्रबाहु कार्तवीर्यार्जुन जैसे महान् क्षत्रियों से वे द्वन्द्वयुद्ध कर ही चुके थे ।
महाभारत के अनुसार उन्होंने भीष्म से २१ दिन तक द्वन्द्वयुद्ध किया था ।
परशुराम राम से कहते हैं विष्णु-धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दो तो मैं तुमसे द्वन्द्वयुद्ध करूँगा । शिव-धनुष
और विष्णु-धनुष दोनों ही विश्वकर्मा से निर्मित थे । अध्यात्मरामायण के अनुसार परशुराम कहते हैं—या तो अपना
राम नाम छोड़ दो अथवा मुझसे युद्ध करो । नृसिंहपुराण में भी ऐसा उल्लेख है—
“त्यज त्वं रामसंज्ञां तु मया वा समरं कुरु ।”
“त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ।
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ॥ अध्यात्मरामायण ( १।७।११ )
तथा आनन्दरामायण ( १।३।३५ ) में भी ऐसा ही उल्लेख है ।
अध्यात्मरामायण के अनुसार “पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ।” ( १।७।८२ )
परशुराम कहते हैं तुम जर्जर पुराने धनुष को तोड़कर व्यर्थ डींग हांकते हो । यहाँ वे शिव-धनुष का
अपमान नहीं करते हैं, परन्तु उसकी प्राचीनता कहकर राम के पराक्रम का ही अपकर्ष बताना चाहते हैं । अतएव
अन्यत्र परशुराम को शिव का शिष्य माना गया है और शिव-धनुष तोड़ने को वे अपने गुरु का अनादर समझते हैं—
“सुनहु राम जो शिव-धनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥”
( रा० मा० १।२७०।२ )
वस्तुतः इनका कोई विरोध नहीं है ।

४०६ रामायणमीमांसा त्रयोदश
वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड में वर्णित परशुराम की कथा को बुल्के विकास या प्रक्षिप्त मानते हैं,
क्योंकि महाभारत के रामोपाख्यान में उसका संकेत नहीं है । परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध है, कारण रामो-
पाख्यान में संक्षिप्त रामकथा का वर्णन है । जब वाल्मीकिरामायण महाभारत से प्राचीन है तो उसकी कथावस्तु का
अस्तित्व अर्वाचीन महाभारत पर कैसे निर्भर हो सकता है ? अतः परशुराम की कथा को अर्वाचीन नहीं कहा जा
सकता है ।
महाभारत के अनुसार परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा के अनुसार अपनी माता रेणुका का
वध किया था । आज्ञापालन के फलस्वरूप वर पाकर उसे पुनः जिलाया था ( म० भा० ३।११६ ) । रामचरितमानस
में भी उसकी चर्चा है—
“परशुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥
( रा० मा० २।१७२।४ ) ।
इसी तरह कार्तवीर्यार्जुन ने जमदग्नि की कामधेनु का हरण किया था तब परशुराम ने उसका वध किया
था । सहस्रार्जुन के पुत्रों ने जामदग्न्य की अनुपस्थिति में जमदग्नि को मार डाला । उन्होंने उसके प्रतीकारस्वरूप
पृथिवी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन बना दिया था । कश्यप को पृथिवी देकर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगे—म०
भा० ३।११७।१४ तथा शान्तिपर्व ४९ अध्याय—
‘त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६४ ॥’ वाल्मीकिरामायण के अनुसार परशुराम
क्षत्रियविरोधी थे । वे राम द्वारा धनुर्भङ्ग सुनकर उनसे द्वन्द्वयुद्ध करने के लिए प्रस्तुत थे ।
प्रसन्नराघव, रामचरितमानस तथा कृत्तिवासरामायण में लक्ष्मण परशुराम से कुछ उग्रता से बातें करते
हैं । रामचन्द्रिका में भरत तथा शत्रुघ्न भी वार्तालाप में भाग लेते हैं । अन्त में महादेव आकर विवाद शान्त करते
हैं । महावीरचरित, अनर्घराघव तथा प्रसन्नराघव में राम तथा परशुराम युद्ध करने के लिए रङ्गमञ्च पर आ जाते
हैं; परन्तु राम के वैष्णव धनुष चढ़ाने से परशुराम का तेजोभङ्ग होने के कारण युद्ध की नौबत नहीं आती । शङ्कर-
देवकृत रामविजय के अनुसार अयोध्या के मार्ग में परशुराम राम का वध करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि उन्होंने
उनके गुरु का धनुष तोड़ डाला था । द्वन्द्वयुद्ध में राम ने उन्हें पराजित किया । तोरवेरामायण में राम ने तोमर से
परशुराम का परशु आकाश में फेंक दिया तथा अपने रथ से उतरकर, परशुराम का धनुष छीन लिया । इन अंशों को
वस्तुतः विकार ही समझना चाहिये, क्योंकि ये सब राम की ब्रह्मण्यता तथा धीरोदात्तता के विरुद्ध हैं । विदेशी राम-
कथाओं में उक्त संघर्ष और भी उग्र हो जाता है । खोतानी रामायण के अनुसार दशरथ ने परशुराम के पिता के
आश्रम में कामधेनु गाय देखी तथा दशरथ का पुत्र सहस्रबाहु उसका अपहरण करने को गया । परशुराम ने तपस्या द्वारा
कुठार प्राप्त कर सहस्रबाहु का वध किया । बाद में सहस्रबाहु के पुत्र राम तथा लक्ष्मण परशुराम को खोज में निकले ।
अन्त में राम ने बाण से परशुराम को मार डाला। यह भी विदेशियों के भारतीय शास्त्रानभिज्ञता का ही परिणाम है ।
उन्हें हैहयवंश तथा रघुवंश का भेद ज्ञात न होने से इस प्रकार का विपर्यय हुआ है । सेरीराम के अनुसार पुष्पराम
( परशुराम ) राम को आदेश देते हैं कि अपना राम नाम छोड़ दो । अस्वीकार करने पर राम से उनका युद्ध होता
है । अगले दिन राम का बाण पुष्पराम का पोछा करता है । वे स्वर्ग, पाताल और सागर में भ्रमण करके कहीं त्राण
न पाकर राम की ही शरण लेते हैं । रामकियेन के अनुसार राम ने द्वन्द्वयुद्ध के अन्त में अपने को नारायण के रूप में
प्रकट किया, इसपर रामासुर ने राम को ईश्वर का धनुष प्रदान किया । राम ने उसे ले लिया । उसे आकाश में
फेंक दिया, जिससे आवश्यकता पड़ने पर वह धनुष उनके काम आ सके । कहना न होगा कि विविध देशों में होकर
के उन देशों में पहुँचने तक राम-कथा में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं ।

श्रीबुल्के कहते हैं, "महाभारत में परशुराम की कथा अनेक स्थलों में वर्णित है, किन्तु इसमें कहीं भी उनके
विष्णुत्व की ओर संकेत नहीं मिलता । फिर भी नारायणीयोपाख्यान में (म० भा० १२।३२६।७७), हरिवंश ( १।४१
११२-१२०; २।२२।२-४८, ) विष्णुपुराण ( १।९।१४३ ), भागवतपुराण ( १।३।२०; २।७।२२ ) में उनका अवतारों
में उल्लेख विद्यमान है ।" परन्तु बुल्केजी भारतीय विचार-पद्धति से बिलकुल अपरिचित हैं, अतएव आर्ष ग्रन्थों के
समन्वय का दृष्टिकोण उन्हें विदित नहीं है और मान्य भी नहीं है । नारायणीयोपाख्यान में जो अंश है उसका अन्य
स्थलों के साथ समन्वय ही अभीष्ट है । विष्णुपुराण आदि भी आर्ष ग्रन्थ एवं प्रमाण ही हैं । यदि विष्णुपुराण आदि
में परशुराम को स्पष्टरूप से विष्णु का अवतार कहा गया है और महाभारत में भी नारायणीयोपाख्यान में परशुराम
का विष्णु अवतार होना भी प्रसिद्ध ही है फिर भी महाभारत के ही कई स्थलों में उनका विष्णुत्व-वर्णन न होने से
परशुराम विष्णु के अवतार नहीं हैं यह कैसे कहा जा सकता है ? यह स्पष्ट जान लेना चाहिये कि केवल

परन्तु उक्त कथन अर्धसत्य ही है, क्योंकि अवतार के कारणों का निरूपण तो बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण
में भी है ही । विवाह के प्रसङ्ग में सूर्यवंश या इक्ष्वाकुवंश का वर्णन भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में है ही
( १।७०।२१-४३ ) । दशरथ के विवाह और अन्धमुनि की कथा भी वाल्मीकिरामायण में है ही । कृष्णलीला का
अनुकरण राम में संभव नहीं है, क्योंकि राम कृष्ण से प्राचीन ही हैं, यही कहना युक्त भी है । आर्ष वर्णन सभी
प्रामाणिक हैं । वाल्मीकिरामायण में अनुक्त होने पर भी कोई विरोध नहीं है । वाल्मीकिरामायण से अनुक्त भी
अविरुद्ध विशेष मान्य होता ही है—'अनुक्तमप्रतिषिद्धमनुमतं भवति ।' तीर्थ-यात्रा, वैराग्य आदि भी योगवासिष्ठ
प्रोक्त होने से प्रामाणिक ही हैं। इसी तरह वाल्मीकिरामायण में अनुक्त भी विशेष अन्य ग्रन्थों द्वारा वर्णित होने पर
मान्य ही हैं । शतकोटिप्रविस्तर रामायण में अविरुद्ध अन्य विशेषों का वर्णन संभव ही है ।
अवतारवाद
अवतारवाद के विरुद्ध बुल्के द्वारा प्रस्तुत तर्कों का पीछे विस्तार से खण्डन किया जा चुका है । अतएव इस
सम्बन्ध में अधिक वक्तव्य अपेक्षित नहीं है ।
श्रीबुल्के का पुत्रेष्टियज्ञ के प्रसङ्ग को प्रक्षिप्त कहना भी असङ्गत ही है । अन्यान्य अंशों में श्रीबुल्के
महाभारत के रामोपाख्यान का सहारा पकड़ते हैं, पर वह इस प्रसङ्ग में यह मानते हैं कि उसमें अवतारवाद का
उल्लेख है । फिर भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में वर्णित अवतारवाद को प्रक्षिप्त मानने का हठ करते हैं। साथ
ही यह भी आवश्यक नहीं है कि संक्षिप्त रामोपाख्यान में विस्तृत रामकथा के सर्वांश का वर्णन हो । एक प्राचीन ग्रन्थ
का प्रामाण्य अर्वाचीन ग्रन्थ पर निर्भर नहीं हो सकता । बुल्के कहते हैं हरिवंशपुराण, वायुपुराण एवं भागवतपुराण
में दशरथ के यज्ञ का वर्णन नहीं है; परन्तु यदि वर्णन होता तो भी जैसे उनमें वर्णित अवतारवाद उन्हें मान्य नहीं है
वैसे ही उनमें वर्णित यज्ञ भी मान्य न होता या बुल्के उसे भी प्रक्षिप्त मान बैठते ।
“सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद् वंशकरः सुतः ।” वाल्मीकिरामायण ( १।८ ) के अनुसार श्रीदशरथजी
तप हो रहे थे, परन्तु कोई वंशकर पुत्र नहीं हुआ था अथवा 'तप्यमानस्य' का अभिप्राय यह है कि राजा दशरथ
विविध प्रकार के तप कर रहे थे । जैसा कि स्कन्दपुराण के दो स्थलों में उनकी तपस्या का वर्णन है, नागरखण्ड के
अनुसार दशरथ का शनैश्चर के साथ युद्ध होने के पश्चात् इन्द्र ने उनसे कहा—
“अपुत्रस्य गतिर्नास्ति” अपुत्र की गति नहीं होती । इसपर राजा कार्तिकेयपुर में १०० वर्ष तक तपस्या
करते हैं । अन्त में जनार्दन प्रकट होकर स्वयं चार पुत्रों के रूप में प्रकट होने का वरदान देते हैं । बाद में दशरथ
को चार पुत्रों एवं एक पुत्री की प्राप्ति होती है । प्रभासखण्ड के अनुसार प्रभास में तप करने और शिवलिङ्ग-
स्थापना करने की भी चर्चा आती है । वाराहपुराण के अनुसार दशरथ वसिष्ठ के परामर्श से राम-द्वादशी का
व्रत करते हैं । फलस्वरूप विष्णु उनके सन्तानरूप में प्रकट हुए । वस्तुतः किसी महाफल की प्राप्ति के लिए लोग
अनेक प्रकार की तपस्याएँ तथा आराधनाएँ करते ही हैं । तदनुसार दशरथ के भी अनेक तप और व्रतों की बात
सङ्गत ही है ।
सारलादास के महाभारत के अनुसार इन्द्र के यहाँ से लौटते हुए दशरथ के द्वारा कपिला की अवज्ञा हो
गयी थी, इसलिए कपिला के शाप से पुत्र-प्राप्ति में बाधा हुई; परन्तु बाद में व्याघ्र के आक्रमण से कपिला को
बचाने के कारण कपिला के वरदान से उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होती है । ग्रामगीतों के अनुसार किसी योगी के
प्रसाद से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है । बिहौर के अनुसार किसी ब्राह्मण को अपने ज्येष्ठ पुत्र देने की प्रतिज्ञा से दशरथ
को पुत्र-प्राप्ति हुई है । संथाल जाति में प्रचलित कथा के अनुसार किसी योगी ने चार आम दिये थे । उन्हें अपनी
पत्नियों को खिलाने से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है ।

अध्याय बालकाण्ड ४०९
सबका निष्कर्ष यही है कि श्रीदशरथजी को अनेक तपस्याओं, यज्ञों तथा व्रतों एवं योगियों और मुनियों के
अनुग्रह से ही राम, लक्ष्मण आदि जैसे दिव्य सुपुत्रों की प्राप्ति हुई । तिब्बती रामायण के अनुसार ५०० पाँच सौ
कैलासवासी ऋषियों से दशरथ ने पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की थी । उनके दिये हुए एक फल के खाने से उनकी दो
पत्नियों को राम और लक्ष्मण दो पुत्र हुए थे । असमिया बालकाण्ड के अनुसार अन्धकमुनि के दिये फल से दशरथ
को पुत्र-प्राप्ति हुई । सेरीराम के अनुसार एक योगी ने सन्तान-प्राप्ति के लिए चार "वाजहर" नामक पत्थर प्रदान
किये थे । एक अन्य पाठ के अनुसार दशरथ को दस हजार हाथियों के वध का परामर्श दिया गया था। देशान्तर
और कालान्तर में विविध संसर्गों से रामायण की मूल कथाओं में अनेक प्रकार की विकृतियों का आ जाना स्वाभाविक
ही है, अतः राम की कथाओं में वाल्मीकिरामायण मुख्य प्रमाण है। तदनुसार आर्ष रामायण एवं पुराणों, संहिताओं
की कथाएँ प्रमाण हैं। अन्य कथाएँ भी पूर्वोक्त आर्ष ग्रन्थों से अविरुद्ध ही प्रमाण हैं। विरुद्ध कथाओं को विकृति ही
समझना चाहिये ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार एक अश्वमेधयज्ञ एवं एक पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन मिलता है । इसी अवसर
पर हविर्भाग-ग्रहणार्थ देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा परमर्षि आते हैं और ब्रह्मा से निवेदन करते हैं कि आपके वरदान से
दृप्त होकर रावण हम सबको बाधित करता है । उसके वध का आप मार्ग निकालिये । ब्रह्मा कहते हैं मनुष्य के द्वारा
उसका वध संभव है । उसी समय वहाँ विष्णु भगवान् का भी आगमन होता है । वह सब की प्रार्थना पर दशरथ के
पुत्ररूप में प्रकट होकर रावण-वध करने का आश्वासन देते हैं।
पुत्रेष्टियज्ञ की अग्नि से प्रकट होकर अग्निदेव दशरथ को पायसान्न प्रदान करते हैं । श्रीदशरथजी उसे
अपनी पत्नियों में बांट देते हैं, जिससे तीनों गर्भवती होती हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १५ और १६ ) । अनन्तर विष्णु
के अवतार भूत राम की सहायता के लिए ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवता लोग अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों
के रूप में प्रकट होते हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १७ ) ।
बुल्के कहते हैं, "वाल्मीकिरामायण में पहले अश्वमेध का ही वर्णन किया था; बाद में पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन
जोड़ दिया गया है ।" परन्तु यह उनकी भ्रान्ति ही है। उनकी दृष्टि में तो अश्वमेध-वर्णन भी प्रक्षिप्त ही है। वही
क्यों वे तो सारे बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, जिसका कि हम पीछे खण्डन कर चुके हैं । वस्तुतः अश्वमेधयज्ञ
तो श्रवणकुमार-वध आदि पापों के प्रायश्चित्तार्थ किया गया था । पुत्र के लिए पुत्रेष्टियज्ञ का ही अनुष्ठान किया गया
था । अतएव पद्मपुराण, नृसिंहपुराण, रघुवंश, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि में
पुत्रेष्टियज्ञ का ही वर्णन है।
ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३ ) में श्रवणकुमार-वध का प्रायश्चित्त करने के लिए ही अश्वमेधयज्ञ के आयोजन
का उल्लेख है । यज्ञ में आकाशवाणी भी हुई थी कि राजा अपने ज्येष्ठ पुत्र के प्रसाद से पापमुक्त हो जायेंगे ।
अन्य कथाओं के अनुसार पुत्रेष्टियज्ञ-वर्णन के प्रसङ्ग में ही हनुमान्, विभीषण और सीता तथा वानर-
सेनापतियों के भी जन्म का निर्देश है। आनन्दरामायण के अनुसार एक गीध ने कैकेयी का पायस उसके हाथ से
छीन लिया था और अञ्जनी पर्वत पर फेंक दिया था । इसपर अन्य रानियों ने पायस का कुछ अंश कैकेयी को दे
दिया । भावार्थरामायण में भी ऐसी ही कथा है । अन्य रचनाओं के अनुसार दशरथ ने सर्वप्रथम कैकेयी को पायस
प्रदान नहीं किया था, अतः वह मानिनी हो रही थी । इतने में चील ने उसके हाथ से पायस लेकर अञ्जनी के मुख
में डाल दिया । उसी से हनुमान् की उत्पत्ति हुई । आनन्दरामायण ( १।१।९६ ), भावार्थरामायण ( १।१ ), पाश्चात्य
वृत्तान्त नं० १ तथा दक्षिण भारतीय एक वृत्तान्त के अनुसार ऋषि ने दशरथ की पत्नियों का नाम पूछा । भूल से
दशरथ के मुख से कैकसी रावण की माता का नाम निकला । इसपर ऋषि ने पायस के चार भागों के पाँच भाग
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बना दिये । एक काक ने उसका एक भाग चुराकर कैकसी के पास पहुँचा दिया । उसे खाने के कारण कैकसी ने
विभीषण को जन्म दिया । सेरीराम तथा रामकियेन में सीता के जन्म का सम्बन्ध पुत्रेष्टियज्ञ से स्थापित किया गया
है । सेरीराम के अनुसार एक काक पायस का षष्ठांश चुराता है । इसपर याज्ञिक कहता है कि यह काक दशरथ-पत्नी के
पुत्र द्वारा मारा जायगा तथा जो इस पायस को खायेगा उसे एक पुत्री उत्पन्न होगी, जिसका विवाह राम के साथ होगा ।
बाद में रावण उस पायस को खाता है । रामकियेन के अनुसार यज्ञ के उस पायस की सुगन्धि लङ्का तक पहुँच
गयी । मन्दोदरी ने रावण से उसे माँगा । रावण ने काकना राक्षसी को पायस लाने का आदेश दिया । राक्षसी ने
पायस का अष्टमांश चुराया । वह मन्दोदरी को दिया गया । उसी से सीता का जन्म होता है ( अ० १० ) । भुइयां
माधवदासकृत विचित्ररामायण के अनुसार डाकिनियाँ आकर पुत्रेष्टियज्ञ के धूम का पान करती हैं और गर्भवती होकर
वानर-सेना के २५ सेनापतियों को जन्म देती हैं ।
भट्टिकाव्य तथा रामायण ककविन में दशरथयज्ञ का वर्णन है, पर किसी दिव्य पुरुष द्वारा पायस प्रदान
का उल्लेख नहीं है । भट्टिकाव्य के अनुसार वे हुतावशिष्ट हवि का कुछ अंश खाती हैं ( सर्ग १ ) ।
पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।२३ और उत्तरखण्ड १८९।४७ ) के अनुसार विष्णु ही यज्ञाग्नि से प्रकट
होकर पायस प्रदान करते हैं । रामरहस्य ( २।१४३ ) में भी वैसा ही उल्लेख है । वस्तुतः अग्निमुखेन विष्णु आदि
सभी देवताओं का तर्पण होता है । अग्नि के अन्तर्यामी विष्णु ही हैं । बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वखं० अ० १८ ) तथा
वाल्मीकिरामायण ( १ । सर्ग १५ ) के अनुसार विष्णु देवताओं को आश्वासन देते हैं कि मैं राम के रूप में अवतार
लूँगा । उसी समय शिव हनुमान् के रूप में राम को सहायता देने की प्रतिज्ञा करते हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार
गोरूपधारिणी धरित्री देवताओं और मुनियों के साथ ब्रह्मा की शरण लेती है । ब्रह्मा सबको साथ लेकर क्षीरसमुद्र-
वासी विष्णु के पास जाते हैं और स्तुति कर रावण-वध की प्रार्थना करते हैं । विष्णु कश्यप और अदिति के
वर प्रदान की चर्चा करते हुए लक्ष्मी सहित अवतार लेने का आश्वासन देते हैं । ब्रह्मा देवताओं को वानरवंश
में अवतरित होने का आदेश देते हैं । पद्मपुराण ( गौडीय पातालखण्ड अध्याय १४ ) में शान्ता अपने पिता दशरथ
से अपने पति ऋष्यशृङ्ग की शक्ति का वर्णन करती है, दशरथ उनके द्वारा पुत्रेष्टियज्ञ कराते हैं ।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ अपने मन्त्रियों से कहते हैं कि मुझे अन्धक मुनि ने वर दिया है ।
ऋष्यशृङ्ग द्वारा यज्ञ कराने से पुत्र-प्राप्ति होगी । यह ऋष्यशृङ्ग कौन हैं ? इसपर वसिष्ठ ने उनकी कथा बतायी ।
तब दशरथ लोमपाद के यहाँ जाकर ऋष्यशृङ्ग को अयोध्या लाकर यज्ञ कराते हैं । विचित्ररामायण के अनुसार
पुत्रेष्टि के समय परशुराम प्रकट होकर आदेश देते हैं जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसका मेरा नाम रखना । काश्मीरीरामायण के
अनुसार नारायण ने दशरथ को स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा ।
अवतारवाद का विकास ?
श्रीबुल्के यह मानते हैं कि पहले वाल्मीकिरामायण में अवतार का वर्णन नहीं था । यह पीछे का
विकास है, परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध और निराधार है, क्योंकि मन्त्रों, ब्राह्मणों, पुराणों, महाभारत, गीता
आदि में सर्वत्र अवतारवाद प्रसिद्ध है । अतः वाल्मीकिरामायण के अवतार-वर्णन को प्रक्षिप्त कहना सर्वथा
निर्मूल ही है ।
दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कौशल्या को पायस का आधा भाग प्राप्त हुआ । सुमित्रा को एक चतुर्थांश
तथा कैकेयी को एक अष्टमांश दिया गया है ।
वाल्मीकिरामायण उदीच्यपाठ तथा रामचरितमानस का पायस-विभाग निम्नोक्त है—

अध्याय बालकाण्ड ४११
कौशल्या को अर्धभाग, कैकेयी को एक चतुर्थांश और सुमित्रा को दो अष्टमांश । रघुवंश, आध्यात्मरामायण
आदि में चारों भाई एक एक चतुर्थांश से जन्म लेते हैं।
श्रीबुल्के कहते हैं, किन्तु आगे चलकर तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न एक एक चतुर्थांश से समन्वित
माने जाते जाते हैं (वा० रा० १।१८।१३,१४)। यह अन्तिम रूप सबसे प्राचीन है । चारों भाई विष्णु के चतुर्थांश
माने जाते हैं। हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि में विष्णु का चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख है ।
“कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” ( हरिवं० १।४१।१२२ )
“कौशल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा ।
अर्धार्थं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥
कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् ।
प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम् ।।
अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः ।” (वा० रा० १।१६।२७,२८)
राजा ने कौशल्या के लिए पायस का अर्धभाग प्रदान किया, अर्ध से अर्ध अर्थात् चतुर्थांश सुमित्रा को दिया
गया एवं अवशिष्टार्थ अर्थात् चतुर्थांश का अर्ध यानी अष्टमांश कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च अन्य अष्टमांश सुमित्रा
को दिया गया । कैकेयी की अपेक्षा ज्येष्ठ और कौशल्या की अपेक्षा कनिष्ठ सुमित्रा को पादोन अर्धांश प्रदान किया
गया । संभोग-पक्षपात होने पर भी धर्मविभाग कर्म में पक्षपात नहीं होता । तथा च भरत और शत्रुघ्न दोनों पाद
( चतुर्थांश ) के अर्ध-अर्ध हैं। अन्य दृष्टि से राम और भरत प्रत्येक त्र्यंश हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो अष्टमांश हैं ।
कौशल्या को दिये गये अर्धांश का अर्धांश (चतुर्थांश) सुमित्रा को कौशल्या द्वारा दिलाया गया अर्थात् कौशल्या के
लिए दत्त भाग से अवशिष्ट भाग में दो भाग करके एक भाग सुमित्रा को दिया गया था । अवशिष्ट अन्य भाग कैकेयी
को दिया गया, परन्तु उसमें से अर्धभाग पुनः कैकेयी द्वारा सुमित्रा को प्रदान किया गया । कौशल्या के लिए दिये हुए
अर्धांश से अर्धावशिष्ट—अवशिष्ट अर्ध-भाग कैकेयी को प्रदान किया गया । पुनश्च उसमें से अर्धांशभाग कैकेयी के
द्वारा पुनः सुमित्रा को दिलाया गया ।
कालिदास भी यही कहते हैं—
“स तेजो वैष्णवं पत्न्योर्विभेजे चरुसंज्ञितम् ।
द्यावापृथिव्योः प्रत्यग्रमहर्पतिरिवातपम् ॥
अर्चिता तस्य कौशल्या प्रिया केकयवंशजा ।
अतः सम्भावितां ताभ्यां सुमित्रामैच्छदीश्वरः ॥
ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञे पत्न्यौ पत्युर्महीक्षितः ।
चरोरर्धार्धभागाभ्यां तामयोजयतामुभे ॥
सा हि प्रणयवत्यासीत् सपत्न्योरुभयोरपि ॥” ( रघुवं० १०।५४-५७ )
जैसे अहर्पति अर्थात् सूर्य अपने अभिनव आतप (घाम) को द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों के लिए
विभक्त कर देते हैं वैसे ही राजा ने उस चरुरूप वैष्णव तेज को ज्येष्ठ होने से धर्मतः आदरणीय कौशल्या और प्रिय
होने से कैकेयी के लिए बराबर विभक्त कर दिया । राजा दशरथ ने यह भी चाहा कि दोनों रानियाँ सुमित्रा को
सम्मानित करें । राजा के मन की बात को जाननेवाली कौशल्या और कैकेयी ने चतुर्थांश अर्थात् अपने अर्ध से अर्ध
भाग सुमित्रा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वह दोनों ही सपत्नियों से स्नेह करती थी । इस व्याख्या के अनुसार ही

४१२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न की घनिष्ठता और एकवाक्यता सिद्ध होती है। अन्यथा इसका कोई बीज नहीं सिद्ध
होगा । पद्मपुराण में पायस विभाग के अनुसार ही उनकी घनिष्ठता कही गयी है—
“युगं बभूवतुस्तत्र सुस्निग्धौ रामलक्ष्मणौ ।
तथा भरतशत्रुघ्नौ पायसांशवशात् स्वतः ॥”
मल्लिनाथ के अनुसार, रघुवंश में “चरयोरर्धार्धभागाभ्याम्” का अर्थ निम्नोक्त है । “चरयोरर्धार्धभागौ समभागौ
तयोर्योऽर्धभागौ तौ च तौ भागौ च ।” अर्थात् अपने भाग के अर्ध का जो अर्ध भाग है वह भाग दोनों ने सुमित्रा को
प्रदान किया । मल्लिनाथ के अनुसार यह विभाग वाल्मीकिरामायण के अनुसार नहीं है, किन्तु नृसिंहपुराण के
अनुसार है—
“ते पिण्डप्राशने काले सुमित्रायै महीपतेः ।
पिण्डाभ्यामल्पमल्पन्तु स्वभगिन्यै प्रयच्छतः ॥”
अर्थात् पिण्डप्राशन-काल में कौशल्या और कैकेयी ने अपने अपने पिण्ड में से थोड़ा-थोड़ा भाग अपनी
भगिनी सुमित्रा को प्रदान किया । परन्तु रामाभिरामी टीका के अनुसार रामायण का भी वही अर्थ है। उनके
अनुसार कौशल्या के अर्धभाग से ही अर्धार्ध सुमित्रा को दिया गया है। इस पक्ष में छः छः आना भाग से राम और
भरत तथा दो-दो आना भाग से लक्ष्मण और शत्रुघ्न होते हैं । वाल्मीकिरामायण के अन्य टीकाकारों के अनुसार
राजा ने ज्येष्ठ पत्नी होने से कुछ अधिक पायस का आधा अंश कौशल्या को प्रदान किया । फिर यह विचार करके
कि सुमित्रा का एक पुत्र राम का अनुयायी हो और एक भरत का अनुयायी हो, कौशल्या के भाग से ही अर्ध अर्थात्
कुछ न्यून अर्ध अंश राजा ने कौशल्या से सुमित्रा को दिलाया । इसी तरह कौशल्या के भाग से कुछ न्यून अवशिष्ट
अर्धभाग कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च कैकेयी के भाग से अर्धभाग सुमित्रा को कैकेयी के द्वारा दिलाया । इनके
अनुसार पायस में आठ भाग किये गये। उनमें पाँच अंश कौशल्या को दिये गये, कौशल्या के भाग से डेढ़ अंश सुमित्रा
को दिया गया । कौशल्या के भाग से अवशिष्ट तीन अंश कैकेयी को दिये गये । कैकेयी के भाग से डेढ़ अंश पुनः
कैकेयी के द्वारा सुमित्रा को दिया गया। साढ़े तीन अंशों को एक करके कौशल्या ने खाया, उसी से राम का
प्रादुर्भाव हुआ । डेढ़ अंश कैकेयी ने खाया उससे भरत का आविर्भाव हुआ । सुमित्रा ने पहले कौशल्या दत्त डेढ़ अंश
खाया उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ । पश्चात् कैकेयी द्वारा दत्त डेढ़ अंश खाया उससे शत्रुघ्न का जन्म हुआ ।
रामाभिरामी टीका के दृष्टिकोण से भी ‘अर्धार्धभागाभ्याम्’ रघुवंश के इस पद्यांश का अर्थ है—स्वस्वलब्धांशसम्बन्ध्य-
र्धार्धभागाभ्याम् । स्वस्वलब्ध अंशसम्बन्धी अर्ध के अर्धभाग को दोनों ने सुमित्रा के लिए प्रदान किया । इससे नृसिंह-
पुराण की यह उक्ति भी अपने पिण्ड से अल्पम् अल्पम् ( थोड़ा-थोड़ा ) दोनों ने सुमित्रा को दिया, अपने समान भाग
नहीं दिया, सिद्ध होती है । पद्मपुराण उत्तरखण्ड के अनुसार राजा ने अपनी ज्येष्ठा और कनिष्ठा पत्नियों को देखकर
दिव्य पायस प्रदान किया । इसी बीच उनकी मध्यमा पत्नी सुमित्रा आ गयी । वह भी पुत्रकामा थी, उसको देखकर
कौशल्या और कैकेयी ने अपना आधा-आधा भाग सुमित्रा को प्रदान किया---
“स राजा तत्र दृष्ट्वाऽथ पत्नीं ज्येष्ठां कनीयसीम् ।
विभज्य पायसं दिव्यं प्रददौ सुसमाहितः ॥
एतस्मिन्नन्तरे पत्नी सुमित्रा तस्य मध्यमा ।
तत्समीपं प्रयाता सा पुत्रकामा सुलोचना ॥
तां दृष्ट्वा तत्र कौशल्या कैकेयी च सुमध्यमा ।
अर्धमर्धं प्रददतुस्ते तस्यै पायसं स्वयम् ॥” (पद्मपु० उत्तरखं० २४२।५९-६१)