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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 470

अध्याय बालकाण्ड ३९३
पत्नी पाषाणभूता हो गयी थी। राम के दर्शन से वह शापमुक्त होकर अपने पति गौतम के पास चली गयी। इन्हीं
प्रमाणों के आधार पर महाकवि कालिदास ने कहा है—
“प्रत्यपद्यत चिराय यत्पुनश्चारु गौतमवधूः शिलामयी।
स्वं वपुः स किल किल्बिषच्छिदां रामपादरजसामनुग्रहः ॥” ( रघुवं० ११।३४)।
अर्थात् शिलामयी गौतमवधू बहुत काल के अनन्तर जो पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त हो गयी, उसे
सकलकल्मषहारी राम पादरजों का ही अनुग्रह समझना चाहिये।
कथासरित्सागर, हनुमन्नाटक (३।१७), वह्निपुराण, गणेशपुराण, पद्मपुराण, आनन्दरामायण
( १।३।१६) भावार्थरामायण आदि भी प्रामाणिक ग्रन्थ हैं इनमें तथा अन्य रामकथाओं में अहल्या की शिलाभावप्राप्ति
वर्णित है।
शाप के कई रूप
महाभारत के अनुसार गौतमशाप के कारण इन्द्र की दाढ़ी हरी हो गयी तथा मुष्कवियोग हुआ। बाद में
मेष का वृषण धारण करना पड़ा। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार इन्द्र को शाप के ही कारण मेघनाद से
पराजित होना पड़ा तथा मनुष्यकृत तादृश व्यभिचारों का अर्धभाग इन्द्र को मिलने लगा और इन्द्रपद की अस्थिरता
हो गयी। वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार गौतम-शाप से ही इन्द्र नपुंसक हो गया। परवर्ती नहीं, किन्तु
प्राचीन ही आर्ष ग्रन्थों के अनुसार इन्द्र के शरीर में सहस्र भग प्रकट हुए जैसे ब्रह्मपुराण (८७।५९), स्कन्दपुराण
(नागरखण्ड अध्याय २०७), कथासरित्सागर (३।१७), पद्मपुराण (५।५१।२८) अध्यात्मरामायण (१।५।२६),
ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४६), आनन्दरामायण (१।३।१९) आदि। और इन्द्र के सहस्र भग ही
सहस्र नेत्र हो गये। उक्त विषयों में समन्वय करना ही उचित है, क्योंकि सभी प्रामाणिक ग्रन्थों पर निर्भर हैं।
ब्रह्मपुराण के अनुसार गौतमीस्नान से इन्द्र में यह परिवर्तन हुआ। ब्रह्मवैवर्त्त के अनुसार सहस्र वर्ष पर्यन्त सूर्य की
उपासना से यह परिवर्तन हुआ। किन्हीं प्रचलित कथाओं में राम के द्वारा शिवधनुर्भङ्ग की टङ्कार सुनकर इन्द्र के
सहस्र भग सहस्र नेत्र हो गये। अश्वमेधयज्ञ और देवी का वरदान भी उक्त परिवर्तन में हेतु हैं।
“तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे ततः पूता भविष्यासि।
स हि पावयितुं शक्तस्त्वया यद् दुष्कृतं कृतम्॥ (वा० रा० ७।३०।४३)
उत्तरकाण्ड तथा अन्य अनेक ग्रन्थों के अनुसार अहल्या निर्दोष नहीं थी—मुनिवेष में इन्द्र को जान कर
भी देवराज के कुतूहल से उसमें वैसी दुर्बुद्धि हो गयी—
“मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात् ॥” (वा० रा० १।४८।१९, )
बुल्के के अनुसार परवर्ती कथाओं में इस बात पर बल दिया गया है कि अहल्या ने इन्द्र को नहीं
पहचाना—जैसे ब्रह्मपुराण (अध्याय ८७) के वृत्तान्त में कहा गया है कि विवाह के पहले इन्द्र अहल्या में आसक्त
थे। वे गौतम की अनुपस्थिति में गौतम का रूप धारण कर अहल्या के पास आया करते थे—इत्यादि ठीक नहीं,
क्योंकि प्रामाणिक ग्रन्थों और ऋषियों के लिए यह कहना असङ्गत है कि उन्होंने वस्तुस्थिति के विपरीत किसी बात
पर बल दिया था। महाभारत, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्त्तपुराण आदि सभी प्राचीन ग्रन्थ हैं। सर्वज्ञकल्प महर्षि व्यास ही
इन ग्रन्थों के रचयिता हैं। अतः कल्पभेद के आधार पर विभिन्न वस्तुस्थिति के अनुसार उन्होंने वैसा ही लिखा भी है।
मुर्गे का रूप धारण कर मुर्गे की बोली बोल कर गौतम को भ्रम पैदा कर उनके स्नानार्थ गङ्गा जाने पर इन्द्रने गौतम-
वेष धारण कर अहल्या से छल किया।
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