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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 474

आइये, हरी—हरि नामक दो घोड़े—जिसके हैं वह इन्द्र हरिवान् है। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के अभिमानी दोनों
देवता इन्द्र के अश्व बनकर रथवहन करते हैं, इसलिए इन्द्र हरिवान् हैं। सम्बोधन में नकार को रुत्व हो जाता
है, अतः वह हरिवः रूप से सम्बोधित होते हैं। मेधातिथि को मेषरूप धारण कर हरण करके स्वर्ग में ले जानेवाले
इन्द्र मेधातिथिसम्बन्धी मेषरूप से सम्बोधित होते हैं। इसी प्रकार वृषणश्व नामक ऋषि को मेनका नाम्नी दुहिता
की कामना करनेवाले इन्द्र वृषणश्वमेने रूप से सम्बोधित होते हैं। गौर मृगरूप से यज्ञ-भाग के मध्य में आकर सोम
पीनेवाले इन्द्र गौरवास्कन्दिन् रूप से सम्बोधित होते हैं। क्वचित् कुशिक गोत्रोत्पन्न होकर इन्द्र कौशिकब्राह्मण हुए
थे। इसी लिए उन्हें कौशिकब्राह्मण नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। कुशिक ने इन्द्रतुल्य पुत्र की प्राप्ति के
लिए तप किया था। कुशिक का उग्र तप देखकर त्रस्त होकर इन्द्र ने अपने आप को ही गाधि के रूप में प्रदान किया
था। इस प्रकार इन्द्र का नाम कौशिक हुआ है—
कुशिकस्तु तपस्तेते पुत्रमिन्द्रसमप्रभम् ।
लभेयमिति तं शक्रस्त्रासादभ्येत्य जज्ञिवान् ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे वै तं तु शक्रो ह्यपश्यत ।
अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरन्दरः ॥
समर्थः पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत् ।
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः ॥
स गाधिरभवत् राजा मघवान कौशिकः स्वयम् ।"
(हरि० पु० १।२७।१३-१५; १।३२।५१,५२)
उप एवं नि उपसर्गपूर्वक इण गतौ धातु से परोक्षार्थक लिट् लकार में उपन्येति रूप बना है, अर्थात् अहल्या
का उपगमन करके इन्द्र उसके भर्त्ता बने थे—
"कौशिको ह स्मैनामुपन्येति"
के अनुसार इन्द्र ही विश्वामित्र के रूप में गाधि से उत्पन्न हुए थे, अतः उपचार से इन्द्र को कौशिक-
ब्राह्मण भी कहा जाता है। गौतमब्रुवाण गौतमरूप से व्यवह्रियमाण होने के कारण इन्द्र को गौतमब्रुवाण नाम से
सम्बोधित किया जाता है। इस सम्बन्ध में आख्यायिका प्रसिद्ध है कि कभी देवता और असुर दोनों युद्ध के लिए
तत्पर हुए थे। गौतम दोनों पक्षों के मध्य में तप कर रहे थे। इन्द्र ने उनके पास जाकर कहा कि असुर लोग
आपको बाधित करेंगे, अतः आप हमारे चार ( गुप्तचर ) बन जाइये। परन्तु ऋषि ने कहा मैं चार नहीं बनूँगा ।
तब इन्द्र ने कहा यदि आपकी अनुमति हो तो आपके रूप से मैं स्पश ( चार ) हो जाऊँ । इस पर गौतम ने कहा यदि
आप चाहें तो ऐसा कर सकते हैं, अतः गौतमब्रुवाणरूप से सम्बोधित होते हैं। इन्द्र उस देवता का प्रत्यक्ष नाम है,
अतः इन्द्र नाम से उस देवता का आह्वान किया गया है ।
शुक्लकृष्णपक्षौ हरी अश्वौ स्तोऽस्य इति सम्बुद्धौ हरिवः । हरिवः आगच्छ- "मतुवसो रु संबुद्धौ छन्दसि"
( पा० सू० ८।३।१ ) के द्वारा हरिवन् के नकार को रु हो जाता है। गौरावास्कन्दिन्—गौर मृग होकर इन्द्र
सोमरस का पान करता है, इसी लिए इन्द्र को गौरावस्कन्दी कहा जाता है। अहल्यायै जार मित्र दुहिता—मैत्रेयी
के जार उपपति होने के कारण इन्द्र को अहल्यायै जार कह कर सम्बोधित किया जाता है ।
उपन्येति गौतमब्रुवाणेति देवासुरा हवै संयत्ता आसंस्तानन्तरेण—गौतमः शश्राम तमिन्द्र
उत्पेत्योवाचेह नो भवां स्पशंश्चरत्विति नाहमुत्सह इत्यथाहं भवतो रूपेण चराणीति यथा मन्यसे इति स
यत्तद्गौतमो वा ब्रुवाणश्चचार गौतमरूपेण वा तदेतदाह ।