रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४११
कौशल्या को अर्धभाग, कैकेयी को एक चतुर्थांश और सुमित्रा को दो अष्टमांश । रघुवंश, आध्यात्मरामायण
आदि में चारों भाई एक एक चतुर्थांश से जन्म लेते हैं।
श्रीबुल्के कहते हैं, किन्तु आगे चलकर तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न एक एक चतुर्थांश से समन्वित
माने जाते जाते हैं (वा० रा० १।१८।१३,१४)। यह अन्तिम रूप सबसे प्राचीन है । चारों भाई विष्णु के चतुर्थांश
माने जाते हैं। हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि में विष्णु का चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख है ।
“कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” ( हरिवं० १।४१।१२२ )
“कौशल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा ।
अर्धार्थं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥
कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् ।
प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम् ।।
अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः ।” (वा० रा० १।१६।२७,२८)
राजा ने कौशल्या के लिए पायस का अर्धभाग प्रदान किया, अर्ध से अर्ध अर्थात् चतुर्थांश सुमित्रा को दिया
गया एवं अवशिष्टार्थ अर्थात् चतुर्थांश का अर्ध यानी अष्टमांश कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च अन्य अष्टमांश सुमित्रा
को दिया गया । कैकेयी की अपेक्षा ज्येष्ठ और कौशल्या की अपेक्षा कनिष्ठ सुमित्रा को पादोन अर्धांश प्रदान किया
गया । संभोग-पक्षपात होने पर भी धर्मविभाग कर्म में पक्षपात नहीं होता । तथा च भरत और शत्रुघ्न दोनों पाद
( चतुर्थांश ) के अर्ध-अर्ध हैं। अन्य दृष्टि से राम और भरत प्रत्येक त्र्यंश हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो अष्टमांश हैं ।
कौशल्या को दिये गये अर्धांश का अर्धांश (चतुर्थांश) सुमित्रा को कौशल्या द्वारा दिलाया गया अर्थात् कौशल्या के
लिए दत्त भाग से अवशिष्ट भाग में दो भाग करके एक भाग सुमित्रा को दिया गया था । अवशिष्ट अन्य भाग कैकेयी
को दिया गया, परन्तु उसमें से अर्धभाग पुनः कैकेयी द्वारा सुमित्रा को प्रदान किया गया । कौशल्या के लिए दिये हुए
अर्धांश से अर्धावशिष्ट—अवशिष्ट अर्ध-भाग कैकेयी को प्रदान किया गया । पुनश्च उसमें से अर्धांशभाग कैकेयी के
द्वारा पुनः सुमित्रा को दिलाया गया ।
कालिदास भी यही कहते हैं—
“स तेजो वैष्णवं पत्न्योर्विभेजे चरुसंज्ञितम् ।
द्यावापृथिव्योः प्रत्यग्रमहर्पतिरिवातपम् ॥
अर्चिता तस्य कौशल्या प्रिया केकयवंशजा ।
अतः सम्भावितां ताभ्यां सुमित्रामैच्छदीश्वरः ॥
ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञे पत्न्यौ पत्युर्महीक्षितः ।
चरोरर्धार्धभागाभ्यां तामयोजयतामुभे ॥
सा हि प्रणयवत्यासीत् सपत्न्योरुभयोरपि ॥” ( रघुवं० १०।५४-५७ )
जैसे अहर्पति अर्थात् सूर्य अपने अभिनव आतप (घाम) को द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों के लिए
विभक्त कर देते हैं वैसे ही राजा ने उस चरुरूप वैष्णव तेज को ज्येष्ठ होने से धर्मतः आदरणीय कौशल्या और प्रिय
होने से कैकेयी के लिए बराबर विभक्त कर दिया । राजा दशरथ ने यह भी चाहा कि दोनों रानियाँ सुमित्रा को
सम्मानित करें । राजा के मन की बात को जाननेवाली कौशल्या और कैकेयी ने चतुर्थांश अर्थात् अपने अर्ध से अर्ध
भाग सुमित्रा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वह दोनों ही सपत्नियों से स्नेह करती थी । इस व्याख्या के अनुसार ही