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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

अध्याय बालकाण्ड ३९९
अहल्योवाच-
अज्ञानाद्यत्कृतं कर्म क्षन्तुमर्हसि वे प्रभो ॥३२॥
मुनिरुवाच-
परेणाभिगतासि त्वममेध्या पापचारिणी ।
अस्थिचर्मसमाविष्टा निर्मांसा नखवर्जिता ॥
चिरं स्थास्यसि चैकापि त्वां पश्यन्तु जनाः स्त्रियः ॥३३॥
श्रोमगवानुवाच—
दुःखिता तमुवाचेदं शापस्यान्तो विधीयताम् ॥३४॥
जगाद गौतमो वाक्यं रामो दाशरथिर्मदा।
वनमभ्यागतो विष्णुः सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥३५॥
दृष्ट्वा त्वां दुःखितां शुष्कां निर्देहां पथि संस्थिताम् ।
गदिष्यति च वै रामो वसिष्ठस्याग्रतो हसन् ॥३६॥
किमियं शुष्करूपा च प्रतिमास्थिमयी शिवा।
न दृष्टं मे पुरा ब्रह्मन् रूपं लोकविपर्ययम् ॥३७॥
अर्थ- उक्त वचनों में कहा गया है कि इन्द्र ने गौतमपत्नी से दुराचार किया। गौतम के आने पर इन्द्र
ने विडाल का रूप धारण कर लिया। मुनि ने पूछा तुम विडालरूपधारी कौन हो ? यह सुनकर भयभीत होकर साञ्जलि
इन्द्र खड़े हो गये। मुनि ने इन्द्र के साहसपूर्ण छल से कुपित होकर उसके शरीर में सहस्र भग होने और लिङ्गनिपात
का शाप दिया।
अहल्या ने कहा मैने अज्ञानवश यह दुष्कर्म किया, आप क्षमा कर दें। फिर भी मुनि ने उसे अस्थिचर्मस-
माविष्ट निर्मांस तथा नखवजिर्त होने का शाप दिया। उसकी प्रार्थना पर यह कहा कि जब लक्ष्मण और सीता के साथ
राम यहाँ आकर शुष्क देहवाली मार्ग में पड़ी हुई तुम्हें देखेंगे और यह अस्थिमयी शुष्क प्रतिमा क्या है ? ऐसा
रूपविपर्यय मैंने कभी नहीं देखा है, ऐसा वसिष्ठ से प्रश्न करेंगे।
ततो रामं महाभागं विष्णुं मानुषविग्रहम् ।
वसिष्ठः कथयामास यद्वृत्तमखिलं च तत् ॥३८॥
वसिष्ठवचनं श्रुत्वा पुनराह स धर्मवित् ।
अस्या दोषो न चैवास्ति दोषोऽयं पाकशासने ॥३९॥
एतदुक्ते तु रामे त्वं त्यक्त्वा रूपं जुगुप्सितम् ।
दिव्यं रूपं समास्थाय मद्गृहं चागमिष्यसि ॥४०॥
( पद्मपु० सृष्टि० अध्याय ५१ )
अर्थ- तब मनुष्यविग्रह राम से वे सब वृत्तान्त वर्णन करेंगे। वसिष्ठ के वचन सुनकर धर्मवित् राम कहेंगे
कि इसका दोष नहीं; यह तो इन्द्र का ही दोष है। तब तुम कुत्सित रूप त्याग कर दिव्य देह धारण कर मेरे
समीप आओगी।
"तेन नीतो विनीतात्मा अहल्या यत्र तिष्ठति ।
व्यभिचारान्महेन्द्रेण भर्त्रा शप्ता हि सा पुरा ॥९६॥