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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 489

४१२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न की घनिष्ठता और एकवाक्यता सिद्ध होती है। अन्यथा इसका कोई बीज नहीं सिद्ध
होगा । पद्मपुराण में पायस विभाग के अनुसार ही उनकी घनिष्ठता कही गयी है—
“युगं बभूवतुस्तत्र सुस्निग्धौ रामलक्ष्मणौ ।
तथा भरतशत्रुघ्नौ पायसांशवशात् स्वतः ॥”
मल्लिनाथ के अनुसार, रघुवंश में “चरयोरर्धार्धभागाभ्याम्” का अर्थ निम्नोक्त है । “चरयोरर्धार्धभागौ समभागौ
तयोर्योऽर्धभागौ तौ च तौ भागौ च ।” अर्थात् अपने भाग के अर्ध का जो अर्ध भाग है वह भाग दोनों ने सुमित्रा को
प्रदान किया । मल्लिनाथ के अनुसार यह विभाग वाल्मीकिरामायण के अनुसार नहीं है, किन्तु नृसिंहपुराण के
अनुसार है—
“ते पिण्डप्राशने काले सुमित्रायै महीपतेः ।
पिण्डाभ्यामल्पमल्पन्तु स्वभगिन्यै प्रयच्छतः ॥”
अर्थात् पिण्डप्राशन-काल में कौशल्या और कैकेयी ने अपने अपने पिण्ड में से थोड़ा-थोड़ा भाग अपनी
भगिनी सुमित्रा को प्रदान किया । परन्तु रामाभिरामी टीका के अनुसार रामायण का भी वही अर्थ है। उनके
अनुसार कौशल्या के अर्धभाग से ही अर्धार्ध सुमित्रा को दिया गया है। इस पक्ष में छः छः आना भाग से राम और
भरत तथा दो-दो आना भाग से लक्ष्मण और शत्रुघ्न होते हैं । वाल्मीकिरामायण के अन्य टीकाकारों के अनुसार
राजा ने ज्येष्ठ पत्नी होने से कुछ अधिक पायस का आधा अंश कौशल्या को प्रदान किया । फिर यह विचार करके
कि सुमित्रा का एक पुत्र राम का अनुयायी हो और एक भरत का अनुयायी हो, कौशल्या के भाग से ही अर्ध अर्थात्
कुछ न्यून अर्ध अंश राजा ने कौशल्या से सुमित्रा को दिलाया । इसी तरह कौशल्या के भाग से कुछ न्यून अवशिष्ट
अर्धभाग कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च कैकेयी के भाग से अर्धभाग सुमित्रा को कैकेयी के द्वारा दिलाया । इनके
अनुसार पायस में आठ भाग किये गये। उनमें पाँच अंश कौशल्या को दिये गये, कौशल्या के भाग से डेढ़ अंश सुमित्रा
को दिया गया । कौशल्या के भाग से अवशिष्ट तीन अंश कैकेयी को दिये गये । कैकेयी के भाग से डेढ़ अंश पुनः
कैकेयी के द्वारा सुमित्रा को दिया गया। साढ़े तीन अंशों को एक करके कौशल्या ने खाया, उसी से राम का
प्रादुर्भाव हुआ । डेढ़ अंश कैकेयी ने खाया उससे भरत का आविर्भाव हुआ । सुमित्रा ने पहले कौशल्या दत्त डेढ़ अंश
खाया उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ । पश्चात् कैकेयी द्वारा दत्त डेढ़ अंश खाया उससे शत्रुघ्न का जन्म हुआ ।
रामाभिरामी टीका के दृष्टिकोण से भी ‘अर्धार्धभागाभ्याम्’ रघुवंश के इस पद्यांश का अर्थ है—स्वस्वलब्धांशसम्बन्ध्य-
र्धार्धभागाभ्याम् । स्वस्वलब्ध अंशसम्बन्धी अर्ध के अर्धभाग को दोनों ने सुमित्रा के लिए प्रदान किया । इससे नृसिंह-
पुराण की यह उक्ति भी अपने पिण्ड से अल्पम् अल्पम् ( थोड़ा-थोड़ा ) दोनों ने सुमित्रा को दिया, अपने समान भाग
नहीं दिया, सिद्ध होती है । पद्मपुराण उत्तरखण्ड के अनुसार राजा ने अपनी ज्येष्ठा और कनिष्ठा पत्नियों को देखकर
दिव्य पायस प्रदान किया । इसी बीच उनकी मध्यमा पत्नी सुमित्रा आ गयी । वह भी पुत्रकामा थी, उसको देखकर
कौशल्या और कैकेयी ने अपना आधा-आधा भाग सुमित्रा को प्रदान किया---
“स राजा तत्र दृष्ट्वाऽथ पत्नीं ज्येष्ठां कनीयसीम् ।
विभज्य पायसं दिव्यं प्रददौ सुसमाहितः ॥
एतस्मिन्नन्तरे पत्नी सुमित्रा तस्य मध्यमा ।
तत्समीपं प्रयाता सा पुत्रकामा सुलोचना ॥
तां दृष्ट्वा तत्र कौशल्या कैकेयी च सुमध्यमा ।
अर्धमर्धं प्रददतुस्ते तस्यै पायसं स्वयम् ॥” (पद्मपु० उत्तरखं० २४२।५९-६१)