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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

व्यक्त नहीं हो सकता, वैसे ही अशोक सम्राट् के पूर्व जीवन का वर्णन भी मिथ्या न होकर ऐतिहासिक तथ्यों पर ही
आधारित है।
जब वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही वाल्मीकि को राम का समकालीन कहा गया
है, तब उस वर्णन को मिथ्या मानकर उनका अन्य काल ढूंढना सर्वथा असङ्गत और निराधार ही है। बालकाण्ड
और उत्तरकाण्ड को बाद का संस्करण मानना भी अप्रामाणिक ही है। किसी भी महान् नायक का जन्म, बाल्य-
जीवन, शिक्षण, विवाह आदि तथा अन्तिम स्थिति का वर्णन स्वाभाविक ही है। "वाल्मीकि और राम दोनों प्राचीन
हैं, इसलिये दोनों को समकालीन कह दिया गया" यह अटकल अशुद्ध है; क्योंकि यदि ऐसा हो तो राम और कृष्ण
दोनों ही प्राचीन थे, उन्हें भी समकालिक क्यों नहीं माना गया ? राम और व्यास भी तो प्राचीन ही थे, फिर
वाल्मीकि के समान ही व्यास को भी राम का समकालिक क्यों नहीं कहा गया ?
अतएव "वाल्मीकि की भाषा जिसमें उन्होंने रामायण की रचना की थी, वह वैदिक संस्कृत न होकर
लौकिक संस्कृत है; किन्तु राम का नाम ऋग्वेद में उपलब्ध होने से उनका वैदिक काल का होना सिद्ध है। यदि
वाल्मीकि राम के समकालिक होते तो वैदिक युग में रहकर लौकिक संस्कृत में किस प्रकार अपने काव्य की रचना
कर सकते थे। उनकी रचना वैदिक संस्कृत में ही होनी चाहिये, अतः वैदिककाल के पश्चात् और बौद्धकाल के ६००
ई० पूर्व ही रामायण का निर्माण मानना उचित है" यह कथन भी निस्सार है ? क्योंकि बौद्धकाल आदि कालों के
समान कोई खास काल वैदिककाल नहीं है, कारण कि "वाचा विरूपनित्यया" ( ऋ० सं० ८।७५।६) तथा "अत
एव च नित्यत्वम्" ( ब्र० सू० १।३।२९) के द्वारा वेद नित्य कहा गया है। अतएव वैदिक भाषा किसी समयविशेष
की भाषा नहीं थी। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उस समय की सभी रचनाएँ वैदिकभाषा में ही होती थीं
और सब वेद ही होते थे; इसलिए यह सब कथन निष्प्रमाण एवं वेदविरुद्ध ही है। यह भी नियम नहीं है कि जिस
ग्रन्थ में जिसका नाम आता है वह उस ग्रन्थकाल का ही होना चाहिये। हो सकता है, वेदकाल से भी प्राचीनकाल के
राम रहे हों और यह भी हो सकता है कि त्रिकालज्ञ वेदकार ने भविष्य के राम का ही वर्णन किया हो ।
अथवा आपके अनुसार "जैसे तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण काव्य के रचयिता वाल्मीकि
भिन्न हैं, वैसे ही वेद के राम से रामायण के राम भिन्न हैं।" वस्तुतः पूर्वकथन के अनुसार वेद किसी देश या काल के
वर्गविशेष की किसी वैदिकभाषा के मनुष्य या देवों द्वारा रचित ग्रन्थ नहीं हैं; किन्तु वे अनादि ही हैं। हाँ, जिन
सत्ययुग, त्रेतायुग आदि कालों में वेदों के पठन-पाठन एवं तदर्थानुष्ठान खूब प्रचलित होते हैं उन कालों को वैदिककाल
कहा जा सकता है; परन्तु उस समय सब ग्रन्थ वैदिक भाषा में ही होते थे या वेद ही होते थे, यह नहीं कहा जा
सकता।
“मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्" ( आप० सू० ) के अनुसार 'मन्त्र' और 'ब्राह्मण' दोनों ही वेद हैं। उन
वेदों के अनुसार ही विदित होता है कि वैदिक भाषा कभी किसी वर्गविशेष की भाषा थी ही नहीं । संस्कृत भाषा भी
देवभाषा थी, मानुषी भाषा नहीं थी। इसी लिए संस्कृतभाषा को गीर्वाणवाणी या सुरभारती कहा जाता है। अतएव
वैदिक यज्ञ, याग आदि में संस्कृत भाषा या देवभाषा बोलने का ही नियम है। उस बीच में यदि भूल से मानुषी
भाषा का उच्चारण हो जाय तो प्रायश्चित्तस्वरूप वैष्णव यजुर्मन्त्र या वैष्णवी ऋचा के जप का विधान है— “स यदिदं
पुरा मानुषीं वाचं व्याहरेत् ततो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेद्यज्ञो वै विष्णुस्तद् यज्ञं पुनरारभते तस्यो हैवा प्रायश्चि-
स्तिर्देवेभ्यस्त्वे त्वा गृह्णामीति देवानवदित्यु हि हविर्गृह्णते" ( श० ब्रा० १।१।४।६)।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि वेदकाल में संस्कृत भाषा ( सुरभारती ) और उससे भिन्न मानुषी भाषा
भी थी। युगों के अनुसार विचार करने से वर्तमान मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीरामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था।
११

८२ रामायणमीमांसा तृतीय
उसी समय महर्षि वाल्मीकि और उनके वर्तमान रामायण महाकाव्य का आविर्भाव हुआ । पुराणान्तरों के अनुसार
वाल्मीकि और शतकोटिप्रविस्तर रामायण तो राम के पूर्व ही आविर्भूत हो चुके थे ।
स्कान्दे पातालखण्डे अयोध्यामाहात्म्ये तत्रत्यतीर्थाश्रमवर्णनप्रस्तावे--
“शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् ।
प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥
न निषादः स वै रामो मृगयां कर्तुमागतः ।
तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥
इत्युक्त्वा तु जगामाशु ब्रह्मलोकं सनातनः ।
ततः संवर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥”
कोटिभिः शतकोटिभिः, चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरमित्यन्यत्रोक्तेः ( वा० रा० १।२।१५
रामाभिरामीयटीकायाम् ) ।
अर्थात् स्कन्दपुराण पातालखण्ड अयोध्यामाहात्म्य में वहाँ के तीर्थ और आश्रमों के वर्णन के सिलसिले में
कहा है—
महर्षि वाल्मीकि “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः” (वा० रा० १।२।१५) इत्यादि शाप देकर अन्तःसन्तप्त
हो रहे थे उसी समय ब्रह्माजी आये । महर्षि से सत्कृत होकर उन्होंने कहा—“वह निषाद नहीं राम ही मृगया के
लिए आये थे । तुम उनका चरित्र वर्णन करके सुश्लोक्य ( महायशस्वी ) होओगे ।” यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक
चले गये । महर्षि ने शतकोटि श्लोकों द्वारा रामचरित्र का वर्णन किया था । उसी में से कुश और लव के लिए
चतुर्विंशत्साहस्रीसंहिता का उपदेश किया था ।

चतुर्थ अध्याय
वाल्मीकिरामायण और महाभारत-रामोपाख्यान
महाभारत वनपर्व के रामोपाख्यान के आधार के सम्बन्ध में पाश्चात्यों ने चार सम्भावनाएँ व्यक्त की
हैं—( १ ) रामोपाख्यान रामायण का आधार है, ( २ ) रामोपाख्यान एक ऐसी रामायण पर निर्भर है, जो
प्रचलित रामायण का पूर्वरूप है, ( ३ ) रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्त रूप है एवं ( ४ ) रामोपाख्यान
तथा रामायण दोनों किसी सामान्य मूल स्रोत के स्वतन्त्र विकास हैं ।
पहला पक्ष ई० हाप्किन्स तथा ए० लुड्विग का है । इसके अनुसार रामोपाख्यान और रामायण में जो
अन्तर है, वह यह सिद्ध करता है कि वह रामायण का संक्षिप्त रूप नहीं हो सकता । इसपर डा० याकोबी का उत्तर
यह है कि यद्यपि रामोपाख्यान के रचयिता ने प्रचलित रामायण की हस्तलिपि का सहारा नहीं लिया, पर उसे अपने
देश की प्रचलित रामायण कण्ठस्थ थी !
संक्षिप्त वर्णन में छोटे-मोटे अन्तर सहज ही आ गये होंगे, यह तीसरा मत है । अधिकांश विशेषज्ञ डा०
याकोबी का मत मानते हैं। महाभारत के सम्पादक सुकण्ठकर ८६ स्थल उद्धृत करते हैं, जिनमें रामोपाख्यान और
और रामायण में शाब्दिक साम्य मिलता है । साथ ही रामोपाख्यान के इन्द्रजित्-यज्ञ, काक-वृत्तान्त आदि रामायण के
बिना समझ में नहीं आ सकते, अतः रामोपाख्यान का वृत्तान्त स्वतन्त्र नहीं है । महाभारत में रामायण तथा कवि
वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है; अतः रामायण को रामोपाख्यान का आधार मानने में कोई आपत्ति नही, यह बुल्के
स्वीकार करते हैं ।
रामोपाख्यान के बालकाण्ड में राम तथा उनके भाइयों का जन्म वर्णित है । रामायण के पुत्रेष्टियज्ञ तथा
पायस का उल्लेख नहीं है । सीता जनक-पुत्री हैं, उनकी अयोनजता का उल्लेख नहीं है ।
ब्रह्मर्षि, देवता आदि रावण से त्रस्त होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं । ब्रह्मा राम के अवतार का रहस्य
बतलाते हैं । ब्रह्मा के आदेश से देवता विष्णु की सहायता के लिए ऋक्ष, वानर आदि रूपों में प्रकट होते हैं ।
चारों भाइयों के विवाह का वर्णन है, पर सीता को छोड़कर अन्य माण्डवी आदि का नाम-निर्देश नहीं
है । २य काण्ड में गुह तथा अत्रि का उल्लेख नहीं हैं । कैकेयी को एक वरदान मिलना तथा मन्थरा को गन्धर्वी
दुन्दुभी का अवतार कहा गया है ।
अरण्यकाण्ड में वाल्मीकिरामायण के समान ही कथा है; किन्तु विराध, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, अयोमुखी और
शबरी से सम्बन्धित सामग्री का अभाव है ।
किष्किन्धा में राम और सुग्रीव की मैत्री, वालीवध, सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण तथा उनका पूर्व,
पश्चिम और उत्तर दिशाओं से प्रत्यागमन वर्णित है । सुग्रीवसख्य के पहले राम की बल-परीक्षा का अभाव, वाली
और सुग्रीव का एक ही द्वन्द्वयुद्ध इस अंश में रामायण से भिन्नता है । रामोपाख्यान के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् एवं
उनके साथियों की यात्रा के वृत्तान्त का वर्णन लौटकर स्वयं हनुमान् ने ही किया है । इसमें अविन्ध्य को अधिक
महत्त्व दिया गया है। रामायण में सीता ने हनुमान् से अविन्ध्य की चर्चा की है—

८४ रामायणमीमांसा चतुर्थ
“अविन्ध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षसपुङ्गवः ।
धृतिमाञ्छीलवान् वृद्धो रावणस्य सुसम्मतः ॥
रामात् क्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत् ।
न च तस्य स दुष्टात्मा शृणोति वचनं हितम् ॥”
(वा० रा० ५।३६।१२,१३)
अर्थात् अविन्ध्य विद्वान्, शीलवान् तथा राक्षसों में श्रेष्ठ है। उसने ‘राम से राक्षसों का क्षय प्राप्त है’
ऐसा कहा, पर दुष्ट रावण ने उसका हित वचन नहीं सुना ।
रामोपाख्यान में त्रिजटा ने सीता को अविन्ध्य का यह सन्देश सुनाया था कि राम और सुग्रीव की मैत्री
हो गयी है। राम शीघ्र आ रहे हैं।
‘अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः ।
स रामस्य हितान्वेषी·······” (म० भा० ३।२७०।५६)
मेघनाद के मरने पर सीता के वध के लिए उद्यत रावण को अविन्ध्य रोकता है। रामायण में सुपार्श्व
रोकता है।
युद्धकाण्ड में भी कुछ परिवर्तन हैं। जैसे—रावण की सभा में राम के मायामय सिर की उपस्थिति एवं
रावण और सुग्रीव का युद्ध आदि रामोपाख्यान में नहीं हैं।
रामोपाख्यान में सेतु-बन्धन के वृत्तान्त में समुद्र ने स्वप्न में राम को दर्शन देकर सहायता देने का वचन
दिया। वहाँ समुद्र के लिए राम के बाणप्रयोग का अभाव है।
अङ्गद का दौत्य कार्य, लङ्कावरोध, पहला शरबन्ध, द्वन्द्वयुद्ध आदि रामोपाख्यान में नहीं हैं। रामो-
पाख्यान के अनुसार कुम्भकर्ण का वध लक्ष्मण के द्वारा हुआ है। इन्द्रजित् द्वारा माया सीता की हत्या का उल्लेख
रामोपाख्यान में नहीं है। नागपाश का वृत्तान्त रामायण में दो बार वर्णित है, पर रामोपाख्यान में एक ही बार
कहा गया है। उसमें विभीषण राम और लक्ष्मण को प्रज्ञास्त्रसे स्वस्थ कर देते हैं एवं राम को कुबेर का भेजा हुआ
जल देते हैं। उस जल से आँखें धोने से राम अदृश्य प्राणियों को देख सकते हैं। हनुमान् का पर्वत से ओषधियां लाने
का उसमें उल्लेख नहीं है।
रामोपाख्यान में लक्ष्मण को शक्ति लगने का वृत्तान्त नहीं है। उसमें रावण माया द्वारा राम और लक्ष्मण
का रूप धारण किये हुए मायामय राक्षसों को उत्पन्न करता है। राम उनकी हत्या करते हैं। बाद में ब्रह्मास्त्र
द्वारा रावण को ऐसा भस्म करते हैं कि उसकी राख भी शेष नहीं रहती।
“न च भस्माप्यदृश्यत” ( म० भा० ३।२९०।३३ )
रामोपाख्यान में सीता की अग्निपरीक्षा भी नहीं है। उत्तरकाण्ड में रामकथा, अयोध्या आगमन, अभिषेक
आदि का वर्णन है।
जैसा कि पहले कहा गया है, शतकोटिप्रविस्तर रामायण महाकाव्य वाल्मीकि द्वारा वर्णित हुआ है।
चौबीस हजार श्लोकोंवाला प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ उसी का सार है। मार्कण्डेय, व्यास आदि महर्षि भी
समाधिसम्पन्न तथा सर्वज्ञ हैं, अतः प्रसिद्ध रामायण में अनुक्त अंशों का वर्णन असङ्गत और अप्रामाणिक नहीं है।
संक्षिप्त करने की दृष्टि से रामायणोक्त कई अंशों का वर्णन न करना भी सङ्गत ही है। अतएव व्यास द्वारा वर्णित

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८५
पद्मपुराण में रामायणोक्त कथाओं से विलक्षण बहुत-सी कथाओं का वर्णन है । रामाश्वमेध नामक एक बहुत बड़ा भाग
वहाँ वर्णित है । कल्पभेद से भी राम की अवतारकथाओं में भेद पुराणसम्मत है ।
महाभारत का रामोपाख्यान
रामोपाख्यान के सहारे बुल्के रामायण के बहुत अंशों को प्रक्षिप्त कहते हैं । लङ्कादाह को वे प्रक्षिप्त कहते
हैं । परन्तु रामोपाख्यान में लङ्कादाह का स्पष्ट उल्लेख है । सेतुबन्ध को भी वे असम्भव समझते हैं, पर वह भी रामो-
पाख्यान में विद्यमान है ।
“प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः ।
बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥” ( म० भा० ३।२७४।३ )
अर्थात् राम सुग्रीव की सहायता से समुद्र में सेतु बाँधकर एवं हनुमान् द्वारा लङ्का को जलाकर सीता को
लौटा लाये ।
रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का भी वर्णन है—
“विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो ।
यां चकार स्वयं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥ ” ( म० भा० ३।२७४।९ )
इसमें असाधारणरूपवती होने से सीता को त्वष्टा द्वारा निर्मित कहा गया है । रावण को भी सर्वलोकस्रष्टा
ब्रह्मा का प्रपौत्र एवं कुबेर का भ्राता कहा गया ।
पुलस्त्य से उनकी गोनाम्नो पत्नी में वैश्रवण की उत्पत्ति हुई । वैश्रवण पिता को छोड़कर पितामह की
उपासना में संलग्न हुए, अतः वैश्रवण के प्रतीकारार्थ क्रुद्ध होकर पुलस्त्य अपने ही अर्धभाग से विश्रवा रूप में उत्पन्न
हुए । उधर पितामह ने वैश्रवण पर प्रसन्न होकर उन्हें धनेशत्व, लोकपालत्व, अमरत्व, ईशानसख्य आदि महान् पद
प्रदान किये, इतना ही नहीं उन्हें रक्षोगणान्वित लङ्का राजधानी, कामगामी पुष्पक विमान, यक्षाधिपत्य तथा राज-
राजत्व भी प्रदान किया ।
पुलस्त्य के अर्धदेह से उत्पन्न विश्रवा वैश्रवण को सक्रोध दृष्टि से निहारते थे । उनको प्रसन्न करने के
लिए राजराज कुबेर ने उन्हें सेवा के लिए पुष्पोत्कटा, राका और मालिनी नाम की तीन राक्षसियाँ प्रदान कीं ।
वे परस्पर उत्कर्ष की कामना से महर्षि की सेवा में तत्पर रहीं । उनपर संतुष्ट होकर विश्रवा ने उन्हें लोकपालों के
सदृश पुत्र प्रदान किये ।
पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण की, मालिनी से विभीषण की तथा राका से खर एवं शूर्पणखा की
उत्पत्ति हुई । विभीषण सर्वाधिक रूपवान् तथा धार्मिक था । रावण महान् उत्साही तथा महाबलवान् था । कुम्भकर्ण
सर्वाधिक बलवान्, मायावी तथा रणकोविद था । खर धनुर्धर और विक्रमी था तथा शूर्पणखा सिद्धिविघ्नकारिणी
रौद्री थी । सभी वेदविद् तथा सम्यक् व्रतचारी थे एवं पिता के साथ गन्धमादन पर्वत पर रहते थे । नरवाहन कुबेर
का वैभव देखकर ईर्ष्यावश तपस्या में लगकर सबने ब्रह्मा को सन्तुष्ट कर विविध वर प्राप्त किये ।
रावण सहस्र वर्ष की तपस्या पूर्ण होने पर अपना सिर अग्नि में होम कर देता है । इससे प्रसन्न होकर
ब्रह्मा ने उसे अमरत्व छोड़कर इष्ट वर मांगने को कहा । उसने गन्धर्व, देव, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर और
भूतों से अवध्यता का वरदान मांगा । ब्रह्मा ने कहा—मनुष्य को छोड़कर तुम्हें और किसी से भय नहीं होगा ।
विभीषण ने धर्मबुद्धि होने का वरदान माँगा । फलतः अमरत्व का वरदान उन्हें बिना माँगे ही मिल गया ।

८६ रामायणमीमांसा चतुर्थ
दशग्रीव ने वैश्रवण पर आक्रमण कर लङ्का और पुष्पक विमान छीन लिये। वैश्रवण ने शाप दिया था
कि वह विमान तुम्हारा वाहन न बन सकेगा, किन्तु जो तुम्हें मारेगा उसी का वाहन बनेगा—
“शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद् वहिष्यति।
यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद् वहिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७५।३४ )
बुल्के पुष्पक विमान के वर्णन को प्रक्षेप मानते हैं। उनका यह भी तर्क है कि यदि पुष्पक होता तो रावण
पुष्पक द्वारा ही सीता का हरण करता, परन्तु उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध है कि शापवश पुष्पक विमान रावण का वहन
नहीं करता था। उपर्युक्त वचनों में रावण को दशग्रीव भी कहा गया है। कुम्भकर्ण को महती निद्रा का वरदान भी
उक्त है। वहीं रावण को कामरूपी तथा आकाशगामी भी कहा गया है—
“कामरूपी विहङ्गमः” ( म० भा० ३।२७५।३९ ) तथा “दशग्रीवः कामबलः” ( ३।२७५।४० )
उसे दशग्रीव एवं कामबल भी कहा गया है।
अग्रिम २७६ वें अध्याय में अग्निसहित सभी देवता ब्रह्मा की शरण में जाते हैं। ब्रह्मा ने बताया, मेरे
वरदान के प्रभाव से रावण देव और असुरों से अवध्य है। मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु ही अवतरित होकर उसका
वध करेंगे—
“तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः ।
विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७६।५ )
वहीं ब्रह्मा ने इन्द्र आदि देवताओं को भी यह आदेश दिया कि तुम लोग ऋक्षियों एवं वानरियों में काम-
रूप बलान्वित वीरों को उत्पन्न कर विष्णु की सहायता करो। तदनुसार देवताओं ने साल, ताल, शिला आदि
आयुधोंवाले वानरों को उत्पन्न किया। वे बल, वीर्य, विद्या, यश आदि में अपने पितृभूत देवों के ही तुल्य थे। वज्र-
संहनन, कामबल-वीर्य तथा कामरूप थे। दस हजार हाथियों का बल रखते थे ( म० भा० ३।२७६।१६-१८ )।
दुन्दुभी गन्धर्वी कुब्जा मन्थरा बनकर आयी थी।
२७७ वें अध्याय में महाराज दशरथ के यहाँ राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म, ब्रह्मचर्य, वेद,
उपवेद के अध्ययन और राम की विशेषता का वर्णन है। राम के यौवराज्य की तैयारी का विचार हुआ। राम
मत्तमतङ्गगामी, महाबाहु, लोहिताक्ष, कम्बुग्रीव, महोरस्क, नीलकुञ्चितमूर्धज तथा दिव्यश्री से दीप्यमान थे। वे सब
धर्मों में पारङ्गत तथा बुद्धि में बृहस्पति एवं बल में इन्द्र के तुल्य थे। सर्वविद्याविशारद, जितेन्द्रिय तथा अमित्रों के
भी नेत्र एवं मन को हरण करनेवाले वे शत्रुओं को भी परम प्रिय लगते थे।
“जितेन्द्रियममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ॥”
वे असाधुओं के नियन्ता तथा साधुओं के गोप्ता थे। धृतिमान्, अप्रधृष्य, जेता एवं अपराजित थे। ऐसे
कौशल्यानन्दवर्धन पुत्र को पाकर राजा दशरथ परम प्रसन्न थे। पुरोहित वसिष्ठ की सम्मति से पुष्य नक्षत्र में अभिषेक
के लिए संभारों के संग्रहार्थ राजा ने मन्त्रियों को आदेश दिया। यह सब सुनकर मन्थरा ने कैकेयी के सापत्न्य को
उकसाया और कैकेयी ने प्रेमवशीभूत राजा से वरदान माँग लिया कि राम के लिए उपस्थापित अभिषेक की सामग्री
से भरत का अभिषेक किया जाय और राम वन जायें। राजा दारुण विप्रिय वचन सुनकर कुछ न बोल सके।
वीर्यवान् राम ने सब वृत्तान्त जानकर राजा की सत्यरक्षा के लिए वन को प्रस्थान किया। धनुष्मान् लक्ष्मण और
पतिप्राणा जानकी ने उनका अनुगमन किया। राम के वन जाने पर राजा का देहान्त हो गया। कैकेयी ने भरत को
ननिहाल से बुलाकर निष्कण्टक राज्य करने को कहा।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८७
भरत ने वह सुनकर कैकेयी की भर्त्सना कर मन्त्रियों के समक्ष अपने चरित्र का विशोधन किया और राम
को वन से लौटाने की लालसा से भरत दुःखिता कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी को यानों द्वारा प्रस्थापित कर वसिष्ठ,
वामदेव तथा अन्य सहस्रों विप्रों तथा पौर-जानपदों को साथ लेकर वन में गये और चित्रकूट में तापस वेषधारी राम
और लक्ष्मण को देखा तथा राम से लौटकर राज्य स्वीकार करने की आकांक्षा व्यक्त की। राम ने प्रेम से समझा-
बुझाकर भरत को लौटा दिया।
इस प्रसङ्ग में यहाँ गुह निषाद की चर्चा नहीं है। संक्षेप के कारण ही सुमन्त्र की भी चर्चा नहीं है।
यज्ञरक्षार्थ राम और लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ वनगमन, जनकपुर-गमन, धनुर्भङ्ग तथा सीता-विवाह का वर्णन
भी नहीं है, फिर भी उनका अभाव नहीं समझना चाहिये ।
राम पुनः पौरों और जानपदों के आगमन की शङ्का से महारण्य में शरभङ्ग के आश्रम की ओर चले गये
और गोदावरी के रम्य तट पर निवास करने लगे। वहाँ उनका शूर्पणखा के कारण खर के साथ महान् वैर हो
गया। तापसों के रक्षार्थ धर्म-वत्सल राम ने चौदह हजार राक्षसों का वध किया। दूषण एवं खर को मार कर
दण्डकारण्य को धर्मारण्य बना दिया। विकृतनासा और विकृतोष्ठी शूर्पणखा शुष्करुधिरानना होकर लङ्का गयी। दुःख
से मू्र्च्छित होकर भ्राता रावण के चरणों में गिर पड़ी। रावण क्रुद्ध होकर आसन से उठा। अपने अमात्यों को हटा
कर एकान्त में उसने शूर्पणखा से पूछा—किसने मेरा अपमान कर तुम्हें विरूपित किया है। कौन तीक्ष्ण शूल से अपने
सर्वाङ्ग का छेदन कराना चाहता है, कौन सिर पर अग्नि जलाकर विश्वस्त होकर सोता है, कौन घोर नाग का पैर
से स्पर्श करना चाहता है और केसरी सिंह का दाँत पकड़कर खड़ा रहना चाहता है। यह कहते उसके नेत्रादि स्रोतों
से ज्वालाएँ भभक उठीं ।
शूर्पणखा ने रावण को राम का विक्रम तथा खर-दूषण सहित राक्षसों का पराभव बतलाया। वह बहन को
आश्वस्त कर, नगररक्षा की व्यवस्था कर तथा महोदधि पार करके शूलपाणि के प्रिय गोकर्ण धाम में मारीच के
पास पहुँचा।
२७८ वें अध्याय में मारीच रावण का सम्मान कर और उसके आगमन का उद्देश्य जानकर उसे समझाता
है और कहता है मैं राम के वीर्य का जानकार हूँ । राम के बाण-वेग को कौन सहन कर सकता है। जिसने तुम्हें
वैसा परामर्श दिया है वह दुरात्मा है। यह तुम्हारे विनाश का मार्ग है। इसपर रावण ने सक्रोध होकर स्पष्ट
कहा—मेरी आज्ञा का पालन न करने पर मृत्यु ध्रुव है।
मारीच ने सोचा यदि मरना ही है तो विशिष्ट अरि के हाथ मरना ही श्रेष्ठ है और रावण के इच्छानुसार
वह रत्नशृङ्ग, रत्नचित्रलोमा कनकमृग बनकर सीता के सामने गया। रावण भी मुण्डी त्रिदण्ड यति होकर राम के
आश्रम के समीप गया। विधिवशात् सीता ने राम से उस विचित्र मृग को लाने के लिए कहा। राम ने धनुष लेकर,
लक्ष्मण को सीता की रक्षा में छोड़कर, मृगलाभ की इच्छा से मृग का अनुसरण किया ।
मृग कभी अन्तर्हित होता था, कभी प्रकट होता था। इस तरह वह राम को बहुत दूर ले गया। प्रति-
भावान् राम ने उसे राक्षस समझ कर अमोघ बाण मारा और वह राम के स्वर के सदृश स्वर में 'हा-सीते',
'हा-लक्ष्मण' यों चीखकर मर गया। राम के सदृश करुण स्वर सुनकर वैदेही उस शब्द की ओर दौड़ पड़ी। लक्ष्मण
ने समझाया, आप डरिये नहीं, राम को कोई भी नहीं मार सकता। आप शीघ्र ही अपने भर्ता को देखेंगी।
ऐसा कहने पर भी रोती हुई सीता स्त्रीस्वभाव से हतबुद्धि होकर लक्ष्मण के प्रति शङ्का करने लगीं ।
शुक्ल-चरितभूषणा पतिव्रता सीता ने लक्ष्मण के प्रति परुष वचन कहे। सुवृत्त राघवप्रिय लक्ष्मण ने कान मूंद कर राम
के मार्ग का अनुसरण किया। इस बीच अभव्य रावण भव्य रूप में भस्मच्छन्न अनल के समान यतिवेश से प्रच्छन्न

होकर सीताहरण की इच्छा से आया । उसे देखकर धर्मज्ञा सीता ने फलादि भोजन के लिए निमन्त्रित किया । सबकी
उपेक्षा कर रावण ने कहा—मैं राक्षसराज रावण हूँ । महोदधि के पार मेरी रम्या लङ्कापुरी है। वहाँ तुम हमारी
भार्या बनकर शोभित होओगी । सीता ने कान मूंद कर कहा—भले नक्षत्रों सहित अन्तरिक्ष गिर पड़े, भले पृथ्वी
छिन्न-भिन्न हो जाय और भले अग्नि शीतल हो जाय, पर मैं राम को त्याग नहीं सकती । करेणु गजेन्द्र को छोड़कर
सूकर का अनुसरण कैसे कर सकती है ? इत्यादि कहकर सीता क्रुद्ध होकर आश्रम में प्रविष्ट हो गयीं । रावण ने
दौड़कर रूखे स्वर से सीता की भर्त्सना करके उनके सिर के बालों को पकड़कर आकाश की ओर प्रस्थान किया ।
गृध्र जटायु ने 'राम' 'राम' कहकर रोती हुई सीता को देखा । २७८ वें अध्याय में यह भी कहा गया है कि
वह अरुणपुत्र दशरथ का सखा तथा सम्पाति का भाई था । उसने रावण के अङ्क में पुत्रवधू सीता को
देखकर रावण से कहा—मैथिली सीता को छोड़ दो । मेरे जीते जी तुम इस वधू को कैसे ले जा सकते हो । बुल्के
कहते हैं कि हरण के पहले राम आदि से जटायु का परिचय नहीं था । पर प्रस्तुत वर्णन से यह कथन सर्वथा
विरुद्ध है ।
“सखा दशरथस्यासीद् जटायुररुणआत्मजः” (म० भा० ३।२७९।१), “रावणाङ्कगतां स्नुषाम्”
(म० भा० ३।२७९।२), 'यदि नोत्सृज्यसे वधूम्' (म० भा० ३।२७९।४)
इससे यह स्पष्ट है कि वह सीता को अपनी स्नुषा (पुत्रवधू) मानता था । जटायु ने प्रहारों से रावण को
जर्जर कर दिया । अन्त में रावण खड्ग से जटायु के पक्ष काटकर आकाश मार्ग से चला गया ।
सीता जहाँ जहाँ ऋषियों का आश्रम या सरिता और सरोवर देखती थी वहाँ वहाँ अपने आभूषणों को
छोड़ती जाती थी । उसने गिरिप्रस्थों पर वानरपुङ्गवों को देखा । वहाँ उसने अपने महद् दिव्य वस्त्र छोड़ दिये ।
अन्त में रावण सीता को लेकर लङ्का पहुँच गया ।
इधर लौटते हुए राम ने लक्ष्मण को देखकर कहा, “तुम राक्षससंकुल वन में सीता को छोड़कर कैसे
आये ? लक्ष्मण ! वैदेही जीवित नहीं हो सकती ।” आश्रम के समीप जाकर पर्वततुल्य गृध्र को देखा और उसे
राक्षस समझकर धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ायी । उसने कहा, “भद्र, मैं तुम्हारे पिता दशरथ का सखा गृध्रराज हूँ ।”
राम ने उसकी बात सुन छिन्नपक्ष जटायु को देखा ।
जटायु ने सीता को छुड़ाने के लिये रावण से हुए युद्ध में अपने आहत होने की बात बतायी । इशारे से
रावण के गगनमार्ग का निर्देश कर गृध्र जटायु ने प्राण त्याग दिये । राम ने पिता के सखा जटायु का संस्कार किया ।
दुःख और शोक से समाक्रान्त हो श्रीराम सीता की खोज करते हुए दक्षिण की ओर चले ।
आगे बढ़ने पर उन्होंने घोर-दर्शन महाभुज कबन्ध को देखा । उसने लक्ष्मण को पकड़ लिया । लक्ष्मण
बड़े खिन्न हो उठे । राम ने उन्हें आश्वासन दिया और कबन्ध की वाम बाहु काटकर लक्ष्मण से कहा उसकी दक्षिण
बाहु काट डालो । लक्ष्मण ने उसकी दक्षिण बाहु काट दी । लक्ष्मण ने भ्राता की ओर देखकर कबन्ध को पुनः
पार्श्व में मारा । वह निष्प्राण होकर गिर पड़ा । उसके शरीर से दिव्यदर्शन सूर्य-तुल्य पुरुष निकल कर अन्तरिक्ष
में स्थित हुआ । राम के यह पूछने पर कि तुम कौन हो ? उसने बताया, मैं विश्वावसु गन्धर्व हूँ, ब्राह्मण-शाप से
राक्षसयोनि में आ गया था । आपकी अनुकम्पा से शापमुक्त हुआ हूँ । लङ्कावासी रावण ने सीता का अपहरण किया
है । सुग्रीव के पास आप जायें । वह आप की सहायता करेगा । यहीं पम्पा है । ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव चार
मन्त्रियों के साथ रहता है । उसके सहयोग से सीता को आप प्राप्त करेंगे । वानर-राज सुग्रीव रावण का घर जानता
है । यह कहकर विश्वावसु अन्तर्हित हो गया ।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८९
२८०वें अध्याय में राम पम्पातट पर प्रिया का स्मरण करके विलाप करते हैं। सौमित्रि उन्हें आश्वासन
देते हैं। अन्त में राम पितरों का तर्पण एवं पम्पा का जल पान कर ऋष्यमूक की ओर चले। वहाँ उन्होंने पाँच
वानरों को देखा। सुग्रीव ने उनका परिचय जानने के लिये हनुमान् को भेजा। हनुमान् से सम्भाषण कर दोनों
सुग्रीव के पास पहुँचे । श्रीराम ने वानरराज से मित्रता की।
सुग्रीव ने सीता के वे दिव्य वस्त्र दिखलाये जिन्हें रावण द्वारा हरी जा रही सीता ने नीचे गिरा दिया
था। उन्हें देखकर राम को बड़ा सन्ताप हुआ ।
राम ने सुग्रीव को अभिषिक्त कर पृथिवी के सभी वानरों का राजा बना दिया और वाली-वध की
प्रतिज्ञा की। सुग्रीव ने वैदेही के प्रत्यानयन का राम को विश्वास दिलाया। इस तरह परस्पर विश्वास प्राप्त कर सब
किष्किन्धा गये ।
सुग्रीव ने गर्जना की। वाली ने उसको सहन नहीं किया। तारा ने कहा—सुग्रीव जैसी गर्जना कर रहा
है उससे प्रतीत होता है कि वह आश्रयवान् है; अतः आप न जायें। वाली ने कहा—तुम सब भूतों की बोली
जानती हो, बुद्धि से देखो सुग्रीव किसके बल का सहारा लेकर आया है। तारा ने विचार कर कहा—'कपीश्वर !
सुनिये, हृतदार महासत्त्व राम सुग्रीव के साथ तुल्यारिमित्रता कर चुके हैं। वे तदनुसार परस्पर एक दूसरे के शत्रु
को शत्रु और मित्र को मित्र मानने की प्रतिज्ञा कर परस्पर हित साधन के लिए सन्नद्ध हैं। राम के भ्राता अपराजित
सौमित्रि, जो महामेधावी हैं, कार्यसिद्धि के लिये तत्पर हैं। मैन्द, द्विविद, हनुमान् एवं जाम्बवान् उनके साथ हैं।
ये सभी महासत्त्व, महात्मा एवं महाबली हैं।' वाली ने तारा की हितोक्ति अनसुनी कर दी और उसके मन में
ऐसा विचार आया कि इसका मन सुग्रीव पर आसक्त है, इसलिये ऐसा कह रही है।
वाली ने सुग्रीव से कहा—अनेक बार मैंने तुझे स्वजातीय समझकर छोड़ दिया था, तुझे मरने की त्वरा
क्यों उत्पन्न हुई है ? सुग्रीव ने कहा—जब तुमने मेरे राज्य और पत्नी का हरण कर लिया तो मुझमें जीवन का
सामर्थ्य कहाँ है ? इसके अनन्तर दोनों भिड़ गये एवं साल, ताल तथा शिलाओं से प्रहार करने लगे। दोनों दोनों
पर प्रहार करते हुए भूमि पर गिरे और सँभल कर पुनः मुष्टिप्रहार करने लगे। दोनों नख और दाँतों से क्षतविक्षत
होकर रुधिर से लथपथ हो गये थे । परस्पर युद्ध कर रहे उन दोनों में कोई भेद प्रतीत नहीं होता था ।
दोनों में परस्पर विभेद के लिये हनुमान् ने सुग्रीव के गले में माला डाल दी। इस तरह माला से
चिह्नित देखकर राम ने महाधनुष को खींचकर वाली को लक्ष्य बनाकर बाण प्रहार किया। भयभीत वाली शर
से आहत हो गया तथा रुधिर वमन करते हुए उसने लक्ष्मणसहित राम को देखा ( यहाँ राम के छिपने का वर्णन नहीं
है) और राम की गर्हणा कर भूमि पर गिर पड़ा। वाली के मरने पर सुग्रीव ने किष्किन्धा और तारा दोनों को
प्राप्त कर लिया। राम ने वर्षा के चार मास माल्यवान् पर्वत पर निवास किया ।
उधर रावण ने लङ्का पहुँचकर सीता को नन्दनोपम अशोकवाटिका में राक्षसियों के पहरे में सुरक्षित
रखा। वे सब राक्षसियाँ द्वयक्षी, त्र्यक्षी, ललाटाक्षी, दीर्घजिह्वा, त्रिस्तनी, एकपदा, त्रिजटा, एकलोचना, दीप्ताक्षी
आदि भीषण रूप की थीं, और रातदिन जागकर सीता का तर्जन करती थीं। वे कहती थीं, इसे तिल-तिल विभक्त
कर हम खा जायेंगी। यह हमारे स्वामी की अवहेलना करके कैसे जीवित रह सकती है ?
सीता ने कहा—आर्याओ ! मुझे खा जाओ, पुण्डरीकाक्ष नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन
का कोई लोभ नहीं है। प्रियतम से विलग हुई मैं निराहार रहूँगी एवं अपने शरीर का शोषण करूँगी। राघव
से भिन्न अन्य पुरुष का मैं कदापि स्पर्श नहीं करूँगी। सीता के ऐसे वचन सुनकर राक्षसियाँ उनका निश्चय सुनाने
रावण के पास चली गयीं। उस समय त्रिजटा नाम की राक्षसी ने सीता को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा—सीते !
१२

९० रामायणमीमांसा चतुर्थ
तुम मेरी बात पर विश्वास कर निर्भय हो जाओ । अविन्ध्य नाम का मेधावी वृद्ध राक्षस तुम्हारा हितैषी है । उसने
मुझसे कहा है कि लक्ष्मणसहित तुम्हारे भर्ता सकुशल हैं । शक्रतुल्य वानरराज से सख्य कर वे तुम्हारी रक्षा के लिए
उद्योगशील हैं । तुम र्गहित रावण से मत डरो । रावण को नलकूबर का शाप है कि यदि वह अवशा नारी का स्पर्श
करेगा तो नष्ट हो जायगा
सौमित्रिसहित तुम्हारे भर्ता शीघ्र ही आ रहे हैं । मैंने राक्षसों के लिए अनिष्ट फलवाले बहुत से स्वप्न
देखे हैं । मैंने स्वप्न में देखा है—यह क्षुद्रकर्मा दारुण रावण मुण्डित एव तैललिप्त होकर खरयुक्त रथ पर नृत्य कर
रहा है । इसी तरह कुम्भकर्ण आदि भी नग्न, मुण्डित एवं लाल माला और लाल ही अङ्गराग से युक्त होकर दक्षिण
दिशा की ओर जा रहे हैं ।
विभीषण श्वेत छत्र एवं श्वेत उष्णीष धारण किये हुए शुक्ल माला और अङ्गराग से विभूषित होकर श्वेत
पर्वत पर आरूढ़ हैं एवं उनके चार सचिव भी शुक्ल माल्यादियुक्त हो श्वेतपर्वत पर आरूढ़ हैं । राम के अस्त्र से सागर
सहित पृथिवी पूरित हो गयी है । तुम्हारे पति के यश से सारी पृथिवी पूरित है । लक्ष्मण अस्थियों के अम्बार पर
आरूढ़ होकर मधु और पायस भक्षण कर रहे हैं । तुम्हें रोती हुई और रुधिर से सराबोर होकर एवं व्याघ्र के मुख
से बच कर उत्तर दिशा की ओर जाते हुए मैंने कई बार देखा है । वैदेहि ! तुम शीघ्र ही अपने भर्ता से युक्त होकर
हर्ष को प्राप्त होओगी । त्रिजटा के ये वचन सुनकर सीता भर्तृसमागम के लिए आशान्वित हुईं । राक्षसियों ने आकर
त्रिजटा के साथ शिला पर बैठी हुई सीता को देखा ।
२८१ वें अध्याय के अनुसार भर्तृशोकार्ता, दीना, मलिनवसना, मणिमात्र अलङ्कारवाली, रोती हुई, शिला-
तल पर राक्षसियों के बीच बैठी हुई, पतिव्रता सीता के पास आकर कामार्त रावण ने उसे देखा । जो रावण देव,
दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर आदि से कभी भी पराजित नहीं हुआ, पतिप्राणा सीता के सम्मुख उसकी दाल न गली
और वह दिव्यभूषण दिव्याम्बरधारी होकर मूर्तिमान् वसन्त के तुल्य प्रतीत होता था; परन्तु भूषित होने पर भी वह
कल्पवृक्ष के समान नहीं बन सका, वह चैत्यवृक्ष के तुल्य भयङ्कर लगता था। जैसे रोहिणी के समक्ष शनैश्चर आया
हो वैसे ही वह सीता के समीप आया । रावण ने संबोधित कर सीता से कहा—तन्वङ्गि ! तुमने अपने भर्ता का
पर्याप्त आदर कर लिया है । वरारोहे ! महार्ह आभरण एवं वस्त्र धारण कर मुझे स्वीकार करो । मेरे पास देव,
गन्धर्व, दानव और दैत्यों की १४ कन्याएँ मेरी भार्याओं के रूप में विद्यमान हैं। मेरे पास १४ करोड़ पिशाच एवं
१४ करोड़ नरभक्षी राक्षस हैं । इन सबकी अपेक्षा तिगुनी संख्या यक्षों की है । वे सब मेरे भाई कुबेर के समान ही
हैं । पानगोष्ठी में गन्धर्व और अप्सराएँ सामने खड़ी होकर मेरी आराधना करती हैं ।
मैं विश्रवा मुनि का पुत्र हूँ। चार लोकपालों के समान ही मेरा यश फैला हुआ है । इन्द्र के समान दिव्य
भक्ष्य, भोज्य तथा विविध पान मेरे लिए सदा उपस्थित रहते हैं । तुम्हारा वनवास का हेतूभूत दुष्कृत क्षीण हो जाय,
तुम मन्दोदरी के समान मेरी भार्या बन जाओ । यह सुनकर शुभानना वैदेही मुख फेरकर और बीच में तृण रखकर
राक्षसों के लिए अमङ्गल सूचक आँसुओं से अपने पीनोन्नत वक्षस्थल को निरन्तर भिगोती हुई उस क्षुद्र राक्षस से
बोली—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनीं हैं । मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं
सर्वथा अलभ्य हूँ । भद्र ! तुम अपना मन मेरी ओर से हटा लो । मुझ विवशा की धर्षणा से तुम्हें क्या लाभ होगा ?
ब्रह्मा के वंश में उत्पन्न प्रजापति के समान विश्रवा तुम्हारे पिता हैं। तुम भी लोकपालों के तुल्य हो । अपने को
महेश्वर का सखा एवं कुबेर का भाई कहते हो । फिर, ऐसा बरताव करते तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है ? यह कहकर
गर्दन और मुख को वस्त्र से ढककर श्रीसीता रोने लगीं ।
इस प्रकार सीता के निष्ठुर वचनों से प्रत्याख्यात हुए रावण ने कहा—सीते ! भले ही मेरे अङ्ग काम से
पीड़ित हों फिर भी मैं अकामा का स्पर्श नहीं करूँगा । यह कहकर वह अन्तर्हित हो गया ।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९१
२८२ वें अध्याय में उधर राम ने माल्यवान् पर्वत पर लक्ष्मण के साथ वर्षा ऋतु बिताकर विमल आकाश
तथा ग्रह, तारा और नक्षत्रों से युक्त निर्मल चन्द्र को देखा तथा कुमुद और पद्मों की सुगन्ध लेकर बहते हुए शीतल,
वायु ने उनकी सीताविषयक सुधि उद्बोधित कर दी। लङ्का में रुद्ध सीता का स्मरण कर उनका मन खिन्न हो उठा।
उन्होंने लक्ष्मण से कहा—वत्स, जाकर देखो, ग्राम्य धर्मों में प्रमत्त होकर सुग्रीव कृतघ्न तो नहीं हो गया ? वह क्या
कर रहा है ? प्रतीत होता है कि वह अपनी प्रतिज्ञा भूल गया है। यदि मेरे लिए उचित प्रयास नहीं कर रहा हो तो
उसे साथ लेकर तुरन्त लौट आओ ।
अनुशासनपरायण लक्ष्मण किष्किन्धा के द्वार पर जा पहुँचे। सक्रोध हो बिना किसी रोकटोक के भीतर
चले गये । राजा सुग्रीव ने आगे आकर उनका स्वागत सम्मान किया । पूजित होकर लक्ष्मण ने राम की बातें कह
सुनायीं । तारा सहित कपिराज सुग्रीव ने नम्रता से कहा--मैं अकृतज्ञ नहीं हूँ। सीता के अन्वेषणार्थ मैंने विभिन्न
दिशाओं में विनीत वानरों को भेज दिया है। जिस मास के समाप्त होने पर वानरों को लौट आना है उसके समाप्त
होने में पाँच रात्रियाँ शेष हैं
यह सुनकर रोष त्याग कर लक्ष्मण ने वानरेन्द्र की प्रशंसा की। सुग्रीव के साथ राम के पास जाकर
श्रीलक्ष्मण ने सब वृत्तान्त सुनाया । इसके बाद ही हजारों वानर तीन दिशाओं से लौट आये । लौटनेवाले बन्दरों ने
बताया कि हम लोगों ने सागर के तटवर्ती वन और पर्वत सहित सारी भूमि चप्पा चप्पा खोज डाली; परन्तु सीता का
पता नहीं लगा। फिर भी दक्षिण दिशा की ओर गये हुए वानरों के प्रति आशावान् होकर व्यथित होने पर भी राम
ने धैर्य धारण किया ।
दो मास बीतने पर वानर सुग्रीव से आकर कहते हैं --वाली ने और आपने जिस महान् मधुवन की रक्षा
की थी, पवनात्मज आदि वानर, राजाज्ञा के बिना ही, उसका उपभोग कर रहे हैं। अङ्गद, हनुमान् आदि दक्षिण
दिशा की ओर सीता की खोज में गये थे । उनका अविनय देखकर सुग्रीव ने समझ लिया कि वे लोग अवश्य अपने
कार्य में सफल हुए हैं।
मेधावी सुग्रीव ने यह बात राम से कही। राम को भी वैसा ही प्रतीत हुआ । इतने में विश्रान्त होकर
हनुमान् आदि सब वानर सुग्रीव के पास आ पहुँचे । उनकी गति एवं मुखवर्ण को देखकर राम को विश्वास हो गया
कि इन लोगों ने सीता को देख लिया है।
सबने आकर राम, लक्ष्मण और सुग्रीव को प्रणाम किया । राम के प्रश्न करने पर हनुमान् ने कहा—
मैं आपको प्रिय समाचार सुनाता हूँ। मैंने जानकी का दर्शन किया है। दक्षिण दिशा के पहाड़ों, कन्दराओं और वनों
को ढूँढ़कर हम लोग थक गये थे । यहाँ लौटने का समय भी बीत चुका था। हम लोगों ने एक महती गुफा देखी ।
बहुयोजन विस्तारवाली गहन वन और अन्धकारवाली गुफा में प्रवेशकर बहुत दूर जाने पर आदित्य के समान प्रकाश
हम लोगों को दिखायी दिया और वहाँ हमने मय का एक दिव्य भवन देखा । प्रभावती नामकी तपस्विनी वहाँ तप
कर रही थी । उसके द्वारा दिये गये विविध भोज्य और पान से सन्तुष्ट एवं सबल होकर हम लोगों ने उसके बताये
मार्ग से जाकर समुद्र के साथ सह्य तथा दर्दुर पर्वत देखे । मलय पर आरूढ़ होकर वरुणालय देखकर हम सब
खिन्न हो गये । वहाँ अनशन का सङ्कल्प कर हम सब बैठ गये तथा जटायु की चर्चा करने लगे । इतने में हम लोगों
ने पर्वत-शिखर के तुल्य दूसरा गरुड़ जैसा घोररूप भयावह पक्षी देखा। उसने कहा—तुम लोग कौन हो ? मेरे प्रिय
भ्राता जटायु की चर्चा कर रहे हो । मैं उसका बड़ा भाई सम्पाति हूँ। हम दोनों अन्योन्य स्पर्धा से आकाश में
सूर्यमण्डल तक उड़ने की होड़ कर रहे थे। सूर्य की गरमी से मेरे पङ्ख जल गये; किन्तु जटायु के पङ्ख मेरी छाया
से बच गये । हम लोगों ने उसको जटायुवध और श्रीसीता के हरण का वृत्तान्त बताया । सम्पाति उस अप्रिय

९२ रामायणमीमांसा चतुर्थ
समाचार को सुनकर विषण्ण हो गया एवं उसने सारा वृत्तान्त विस्तार से जानना चाहा। हमने उसे सारा वृत्तान्त
सुनाया। उसने कहा, मैं रावण तथा लङ्का को जानता हूँ। लङ्का समुद्र से पार त्रिकूट पर बसी है। अवश्य वहाँ
जानकी मिलेगी। यह सुनकर शतयोजन समुद्र का लङ्घन कर मैंने जलराक्षसी को मारा और रावण के घर में
उपवास और तप में निरत भर्तृ-दर्शनार्थ उत्सुक सीता को देखा।
मैंने आर्या के समीप जाकर कहा, मैं राम का दूत मारुतात्मज हूँ। समुद्र पार कर आया हूँ। श्रीराम
और लक्ष्मण कुशली हैं। राम तुम्हारे लिए बहुत बड़ी वानर-सेना के साथ आयेंगे। विश्वास करो, मैं वानर हूँ,
राक्षस नहीं हूँ—
"प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ।"
थोड़ी देर सोचकर सीता ने कहा—अविन्ध्य के कहने से मैं जानती हूँ तुम हनुमान् हो। उसने त्रिजटा के
द्वारा सब समाचार दिया है। सीता ने अभिज्ञानस्वरूप मणि दी, जिसे उन्होंने धारण कर रखा था एवं विश्वासार्थ
चित्रकूट में कौए के लिए क्षिप्त ईषिका की कथा बतायी। उसके बाद मैंने सारा उपवन उजाड़ दिया। पकड़े जाने
पर लङ्का पूरी तरह जला डाली। तदुपरान्त पुनः समुद्र लाँघ कर मैं यहाँ आया हूँ।
बुल्के लङ्का-दाह को क्षेपक मानते हैं। पर यह रामोपाख्यान से विरुद्ध है। वहाँ स्पष्टतः यह उल्लेख है—
"ततो दग्ध्वा पुरीं च ताम् ॥"
२८३ वें अध्याय के अनुसार वहाँ कोटि कोटि वीर वानर एकत्रित हुए। गज, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन,
पनस, जाम्बवान् आदि महापराक्रमी बड़े-बड़े वानर करोड़ों वानर वीरों के साथ आये।
शुभ मुहूर्त्त में सेनाव्यूह बनाकर सुग्रीवसहित श्रीराम और लक्ष्मण ने लङ्का के लिए प्रस्थान किया। सेना
के मुहाने पर हनुमान् तथा पृष्ठरक्षार्थ लक्ष्मण सन्नद्ध हुए। साल, ताल एवं शिला रूप आयुधवाली नल, नील,
अङ्गद, मैन्द, द्विविद आदि से पालित महती सेना ने रामकार्यार्थ चलकर सागरतट के प्रशस्त फल और जल से परिपूर्ण
क्षेत्रों में पड़ाव डाल दिया।
अब समुद्रलङ्घन का प्रश्न सामने आया। किसी ने लङ्घन की बात कही, किसी ने नावों का प्रबन्ध
करना ठीक समझा। अन्त में राम ने समुद्र से मार्ग माँगने के लिये व्रत करने का निश्चय किया। समुद्र से सदुत्तर
न मिलने पर बाण से समुद्र के शोषण की बात कही। सागर ने स्वप्न में दर्शन दिया और राम से कहा—"मैं आपके
मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता हूँ, परन्तु यदि आपके बाण के भय से मार्ग देता हूँ तो अन्य लोग भी धनुष के बल
पर मुझे ऐसी ही आज्ञा देंगे।
आपकी सेना में त्वष्टा का पुत्र नल नाम का वानर है। वह जिस काष्ठ, तृण या शिला को समुद्र में
डालेगा मैं उसको धारण करूँगा। इस तरह पुल बन जायेगा। राम ने नल को आज्ञा दी और नल ने सेना की
सहायता से दस योजन चौड़ा एवं सौ योजन लम्बा सेतु बना दिया। उसी प्रख्यात नल द्वारा निर्मित सेतु से राम ने
सेना के साथ समुद्र पार किया। उसके पहले ही विभीषण राम की शरण में आ चुका था। राम ने उसका स्वागत
किया। सुग्रीव को शङ्का हुई कि यह रावण का प्रणिधि हो सकता है। परन्तु राम ने विभीषण की सत्य चेष्टाओं
तथा उसके आचरणों से सन्तुष्ट होकर उसे सर्वराक्षसराज्य पर अभिषिक्त किया और उसे अपना मन्त्री बनाया।
उसकी सम्मति से समुद्र पार कर लङ्का के उद्यानों में श्रीराम ने सेनासहित पड़ाव डाला।
वहाँ वानररूप में शुक तथा सारण नामक रावण के चर आये। वे पकड़े गये और उन्हें सेना दिखाकर
छोड़ दिया गया एवं प्राज्ञ अङ्गद को दूत बनाकर लङ्का भेजा गया।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९३
२८४ वें अध्याय के अनुसार रावण की लङ्का नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों से युक्त, कपाट-यन्त्र तथा वीरों
से सुरक्षित थी। अङ्गद ने निर्भय होकर लङ्काद्वार पर जाकर रावण को सूचना दी। उसकी अनुमति से वे अनेक
करोड़ राक्षसों की सेना के बीच निर्भय होकर पहुँचे। वहाँ बादलों की घटा से घिरे हुए सूर्य के समान वे शोभित
हुए। अङ्गद ने मन्त्रियों से परिवृत रावण से कहा—"कोसलेन्द्र ने कहा है कि अन्यायरत अकृतात्मा राजा को पाकर
देश, नगर सब नष्ट हो जाते हैं। तुमने सीता का हरण किया है। बल के दर्प से ऋषियों तथा राजर्षियों को मारा
है। रोती हुई स्त्रियों का हरण किया है। उस सबका फल तुम्हारे सामने है। मैं तुम्हारा वध करूँगा। साहस हो
तो युद्ध करो। मेरे धनुष का बल देखो। जानकी को लौटा दो अन्यथा लोक को राक्षस-हीन बना दूँगा।" यह
सुनकर राजा क्रोधमूर्च्छित हो गया। उसके इङ्गित को जाननेवाले चार राक्षस अङ्गद के चारों अङ्गों को पकड़ने
लगे। उनके साथ ही अङ्गद उछलकर महल की छत पर जा चढ़े। अङ्गद के वेग से छूटकर चारों धरणीतल पर
गिरे और मर गये। अङ्गद ने राम के पास आकर सब समाचार सुनाया।
राम ने वायु के समान वेगवाले वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार को तुड़वा दिया। विभीषण की सम्मति
से लङ्का-द्वार को घेर लिया और विविध वानरों को युद्ध करने के लिए आदेश दिया। वे सब लङ्का को नष्ट करने
लगे। उधर से राक्षस भी युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गये। राम और लक्ष्मण के बाणों से राक्षसवीर नष्ट होने लगे।
अन्त में राम की आज्ञा से युद्ध का प्रत्याहार हुआ।
२८५ वें अध्याय के अनुसार जब वानर सैनिक शिविर में प्रवेश करने लगे तब रावणसेना के पवन,
जम्भ, खर आदि ने क्रोधवश उनपर धावा बोल दिया। वे दुरात्मा अन्तर्धानविद्या से अदृश्य होकर वानरों को मारने
लगे; परन्तु विभीषण ने अपनी विद्या से उनकी शक्ति नष्ट कर दी। दृश्य होते ही वे वानरों द्वारा मारे जाने लगे।
तब सदलबल रावण स्वयं युद्धभूमि में आया। उसने शुक्रनीति के अनुसार व्यूह का निर्माण कर वानरों को घेर लिया।
राघव ने बार्हस्पत्य नीति के अनुसार सेना का व्यूह बनाया और श्रीराम रावण का घोर युद्ध हुआ। बड़े बड़े राक्षस
वानरों से भिड़ गये, जिससे चराचर जगत् व्यथित हो उठा।
प्रहस्त ने विभीषण पर प्रहार किया, परन्तु शतघण्टावाली महाशक्ति को अभिमन्त्रित कर विभीषण ने
प्रहस्त को मार डाला। हनुमान् एवं धूम्राक्ष का महान् युद्ध हुआ। श्रीहनुमान् ने धूम्राक्ष को मार डाला। रावण ने
महान् प्रयत्न से कुम्भकर्ण को जगाया। वह भी भीषण युद्ध करते हुए रामदर्शन की लालसा से आगे बढ़ा। सामने
धनुष्पाणि लक्ष्मण को देखा। वानरों ने उसपर वृक्षों, शिलाओं तथा विविध प्रहरणों से प्रहार किया। वह हँसता
हुआ वानरों को खाने लगा। तब निर्भय होकर सुग्रीव ने कुम्भकर्ण पर भीषण प्रहार किया। कुम्भकर्ण महानाद
कर सुग्रीव को दोनों बाहुओं से पकड़कर लङ्का की ओर चल पड़ा। लक्ष्मण ने उसका पीछा किया। अपने
भीषण बाणों से उसके कवच को छिन्न-भिन्न कर उसे लहूलुहान कर दिया। वह सुग्रीव को छोड़कर लक्ष्मण की
ओर दौड़ा।
महेष्वास कुम्भकर्ण 'तिष्ठ, तिष्ठ' कहता हुआ महती शिला लेकर दौड़ा। लक्ष्मण ने उसके उच्छ्रित हाथों
को क्षुरों से काट दिया। दोनों भुजाओं के कटते ही वह चार भुजावाला हो गया—
"स बभूव चतुर्भुजः" उसने चारों भुजाओं से बड़ी चट्टानों को उठा लिया। सौमित्रि ने बड़ी फुर्ती
के साथ बाणों से उसकी चारों भुजाएँ काट डाली। अन्त में वह लक्ष्मण के दिव्य अस्त्रों से वज्रदग्ध पादप के तुल्य
जलकर मर गया।
तदनन्तर भागती हुई राक्षसी सेना को प्रमाथी ने रोका। श्रीलक्ष्मण का उससे घोर युद्ध हुआ। श्रीहनु-
मान् ने पर्वतशृङ्ग से वज्रवेग को और नील ने प्रमाथी को मार गिराया। तदनन्तर अन्य राक्षसों एवं वानरों के
युद्ध हुए।

९४ रामायणमीमांसा चतुर्थ
२८८ वें अध्याय के अनुसार रावण ने इन्द्रजित् को युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा, वत्स !
तुमने सहस्राक्ष इन्द्र को जीतकर मेरा यश बढ़ाया है । तुम चाहे प्रकट चाहे अन्तर्हित होकर दिव्य शरों से शत्रुओं
को मार डालो । प्रहस्त, कुम्भकर्ण आदि ने खर का बदला नहीं चुकाया, तुम उसका बदला चुकाओ । इन्द्रजित्
रथारूढ़ हो रणक्षेत्र में पहुँचा । उसने नाम सुनाकर लक्ष्मण का आह्वान किया । लक्ष्मण अपने तलघोष से राक्षसों
को त्रस्त करते हुए सामने आये । दोनों का भयङ्कर युद्ध हुआ । रावण-पुत्र इन्द्रजित् बाणों द्वारा लक्ष्मण से आगे बढ़
न सका । तब उसने महान् यत्न से वेगशाली तोमरों की वर्षा की । लक्ष्मण ने उन्हें भी तीक्ष्ण बाणों से काट दिया ।
अङ्गद ने तीव्र वेग से इन्द्रजित् पर प्रहार किया । इन्द्रजित् ने सावधानी से भीषण प्रास से अङ्गद को मारना चाहा;
पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही काट दिया । फिर, उसने गदा से अङ्गद पर प्रहार किया । अङ्गद ने उसपर महान्
साल वृक्ष के तने से प्रहार किया । उससे इन्द्रजित् के सारथि, अश्व और रथ नष्ट हो गये । इन्द्रजित् उस समय
अन्तर्हित हो गया । महामायावी इन्द्रजित् के अन्तर्हित होने पर राम ने स्वयं आकर सैन्यरक्षा का भार संभाला ।
इन्द्रजित् ने वरदान में प्राप्त बाणों से राम को क्षत-विक्षत करना आरम्भ कर दिया । राम और लक्ष्मण दोनों ही
अदृश्य मेघनाद से लड़ते रहे । उसने सहस्रों बाणों द्वारा राम तथा लक्ष्मण को विद्ध किया । अदृश्य इन्द्रजित् को
ढूंढते हुए वानर वीर आकाश में प्रविष्ट हुए । उसने उनपर भी भीषण प्रहार किये ।
२८९ वें अध्याय के अनुसार उसने रणाङ्गण में गिरे हुए राम और लक्ष्मण को वरदानप्राप्त बाणों द्वारा
सब ओर से बाँध दिया । पिंजड़े में पक्षी के समान दोनों पुरुषव्याघ्र बँध गये । सुग्रीव, सुषेण, मैन्द, द्विविद,
कुमुद, अङ्गद, हनुमान्, नल, नील आदि मिलकर दोनों की रक्षा करने लगे । इतने में विभीषण ने आकर
प्रज्ञास्त्र द्वारा दोनों को प्रबुद्ध किया एवं सुग्रीव ने अभिमन्त्रित विशल्या औषधि से दोनों को क्षणभर में स्वस्थ
कर दिया ।
राम और लक्ष्मण दोनों क्षणभर में पुनः युद्धार्थ सन्नद्ध हो गये । विभीषण ने कृताञ्जलि होकर कहा,
राजाधिराज कुबेर के आज्ञानुसार एक गुह्यक जल लिये हुए श्वेत पर्वत से आया है । कुबेर के अनुसार इस जल को
आँख में लगाने से अदृश्य प्राणियों को भी आप देख सकेंगे । आप यह जल जिसे देंगे वह भी अन्तर्हित प्राणियों को
देख सकेगा । दोनों ने उस संस्कृत जल से नेत्र धोये और सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद, जाम्बवान्, नील आदि प्रमुख
वानरों ने भी उस जल से अपने अपने नेत्र धोये । सबकी आँखें अतीन्द्रिय पदार्थों को भी देखने लगीं । उधर इन्द्रजित्
अपना पराक्रम पिता को बताकर शीघ्रता से पुनः रण-भूमि में आ गया । उसको आते देख विभीषण की सम्मति से
लक्ष्मण आगे आये । विजय के उल्लास से इन्द्रजित् ने आह्निक कर्म भी नहीं किया । लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर उसपर
भीषण बाणों से प्रहार करना प्रारम्भ किया । दोनों में आश्चर्यजनक युद्ध हुआ । सौमित्रि के बाणों से आहत होकर
इन्द्रजित् ने नागतुल्य आठ बाण चलाये । लक्ष्मण ने एक बाण से उसके धनुषयुक्त बाहु को काट दिया, दूसरे बाण
से उसके बाण सहित बाहु को काट दिया एवं तृतीय बाण से उसका मुकुट-कुण्डलयुक्त सिर काट दिया । रथ के सूत
को भी मार दिया । घोड़ों ने सूत के बिना उसके रथ को लङ्का में पहुँचा दिया । रावण मृत पुत्र को देखकर विक्षुब्ध
मन होकर वैदेही को मारने चला । परन्तु अविन्ध्य ने समझाबुझाकर उसे स्त्री-हत्या से निवृत्त किया ।
२९० वें अध्याय के अनुसार रथारूढ़ होकर वह स्वयं युद्धभूमि में आया । सब वीरों ने उसपर एक साथ
आक्रमण कर दिया, मायावी रावण ने माया का प्रयोग किया । उसके शरीर से सहस्रों राक्षस युद्ध के लिए निकल
पड़े । राम ने सबको मार डाला । उसने सहस्रों राम तथा लक्ष्मण के रूप बनाकर राम और लक्ष्मण तथा वानरों पर
आक्रमण किया । सौमित्रि की सम्मति से राम ने उस माया को भी नष्ट कर दिया । इतने में मातलि आदित्य के
अश्वों के तुल्य हर्यश्वों से युक्त रथ लेकर आया । श्रीराम से उसपर चढ़कर युद्ध करने की प्रार्थना करने लगा । राम
को शङ्का हुई कि यह भी कहीं रावण की माया तो नहीं है, परन्तु विभीषण ने कहा—यह माया नही है ।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९५
राम ने रथारूढ़ होकर बड़े रोष से रावण पर आक्रमण किया। समस्त प्राणी हाहाकार करने लगे।
देवलोक में नगाड़े बजने लगे। उन दोनों के युद्ध की और कोई उपमा नहीं थी। उनका युद्ध उनके युद्ध के ही
तुल्य था--
"अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् ॥"
राम पर रावण ने ब्रह्मदण्ड तुल्य शूल छोड़ा। राम ने उसे काट दिया। उस दुष्कर कर्म को देखकर
रावण को भय हुआ।
फिर उसने बहुत शस्त्रास्त्र चलाये। रावण की माया देख डरकर सब वानर भागने लगे। तब राम ने
तूणीर से हेमपुङ्ख सुपत्न सुमुख बाण निकाला। उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रयुक्त किया। यह देखकर देव,
गन्धर्व आदि प्रसन्न हुए। उसके छूटते ही रथ और सारथि से युक्त रावण महाज्वालामाली अग्नि से परिप्लुत होकर
प्रज्वलित हो उठा। सबने हर्ष से देखा कि ब्रह्मास्त्र के तेज से वह दग्ध हो उठा।
रावण को मारने पर महर्षियों सहित देवताओं ने महाबाहु राम को विविध आशीर्वाद दिये तथा उनपर
पुष्प वृष्टि की। विभीषण और अविन्ध्य ने सीता को लाकर राम से कहा, 'महाबाहो ! आप अपनी सद्वृत्ता पत्नी
को ग्रहण करें।' राम ने शोककर्षित, मलोपचितसर्वाङ्गी, जटिला, कृष्णवस्त्रा, सीता को देखकर कहा--वैदेही !
जाओ, तुमसे मेरा कोई कार्य नहीं है। मुझ जैसे पति को प्राप्त कर वृद्धावस्था तक तुम्हें राक्षस के गृह में न रहना
पड़े, इसी लिये मैंने रावण को मारा है।
बुल्के कहते हैं--"राम का सीता में उत्कृष्ट प्रेम था और वह अन्त तक नहीं बदला। वे सीता के प्रति
शङ्कायुक्त कटुवचन कैसे कहते, इसी लिये महाभारत रामोपाख्यान में अग्निपरीक्षा का संकेत तक नहीं मिलता।"
परन्तु उनका यह कथन सरासर धोखा देना है, क्योंकि रामोपाख्यान में स्पष्ट ही राम की सीता के प्रति शङ्का और
वायु, अग्नि आदि देवों तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की शुद्धि का वर्णन है--
"कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् ।
परहस्तगतां नारीं मुहूर्त्तमपि धारयेत् ॥१२॥
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि ।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ॥"१३॥
चाहे तुम सुवृत्त हो या असुवृत्त हो, श्वान के द्वारा स्पृष्ट हवि के समान मैं तुम्हें ग्रहण नहीं कर सकता।
"ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः ।
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ॥"१४॥
वैसा दारुण वचन सुनकर सीता सहसा मूर्च्छित होकर वैसे ही गिर पड़ीं जैसे कटी हुई कदली गिर
पड़ती है।
"योऽप्यस्या हर्षसंभूतो मुखरागस्तदाऽभवत् ।
क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ॥"१५॥
जो क्षण भर के लिये उसके मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ रही थी वह भी निःश्वास से उपहत
(मलिन) दर्पण की तरह नष्ट हो गई।
"ततस्ते हरयः सर्वे तच्छ्रुत्वा रामभाषितम् ।
गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ॥"१६॥

९६ रामायणमीमांसा चतुर्थ
राम का वह भाषण सुनकर लक्ष्मण सहित सब वानर मृतकल्प होकर निश्चेष्ट हो गये।
"ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः।
पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ॥"१७॥
उसी समय राघव के सामने तेजस्वी विमान द्वारा विशुद्धात्मा चतुर्मुख जगत्स्रष्टा पद्मयोनि (ब्रह्मा) आये ।
'शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च।
यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥१८॥
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् ।
विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥"१९॥
इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, कुबेर, सप्तर्षिगण तथा राजा दशरथ बहुमूल्य विमान से राम के समीप
आये।
"ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसङ्कुलम् ।
शुशुभे तारकैश्चित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥"२०॥
उस समय देवता और गन्धर्वों से संकुल अन्तरिक्ष वैसा ही शोभित हुआ जैसे शरद् ऋतु में तारों से
युक्त आकाश शोभित होता है ।
"तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी ।
उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥"२१॥
देवों के बीच उठकर यशस्विनी सीता ने विशालवक्षःस्थल राम से कहा—
"राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते ।
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥"२२॥
मैं आपको दोष नहीं देती हूँ। आप सभी स्त्रियों एवं पुरुषों की गति को जानते हैं। मेरे इस वचन को
सुनिये ।
"अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः ।
स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं करोम्यहम् ॥"२३॥
सदा गमनशील मातरिश्वा (वायु) सब भूतों के भीतर विचरण करते हैं। वे मेरे प्राणों को देह से पृथक्
कर दें; यदि मैंने कुछ भी पाप किया हो ।
"अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वायुरेव च।
विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥"२४॥
इसी प्रकार अग्नि, जल, आकाश, पृथिवी और वायु सब मुझे प्राणों से विमुक्त कर दें; यदि मुझमें पाप हो ।
"यद्यहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् ।
तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥"२५॥
वीर, यदि आपको छोड़कर मैंने स्वप्न में भी अन्य का चिन्तन नहीं किया है तो आप ही मेरे देवनिर्दिष्ट
पति हों।
"ततोन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी ।
पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥"२६॥

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९७
उस समय अन्तरिक्ष में सब महान् आत्माओं तथा वानरों को हर्षित करनेवाली सुभगा लोकसाक्षिणी
दिव्य वाणी हुई।
वायुरुवाच—
‘भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः ।
अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥’’२७॥
वायु ने कहा—मैं सदागति वायु हूँ। राघव ! मैथिली सर्वथा निष्पाप है। राजन् ! आप इन्हें
स्वीकार करें।
अग्निरुवाच—
‘‘अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन ।
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥’’२८॥
अग्नि ने कहा—हे रघुनन्दन, मैं सब प्राणियों के शरीर में रहता हूँ। हे काकुत्स्थ, मैथिली का, सुसूक्ष्म
भी कोई अपराध नहीं है।
वरुण उवाच—
“रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव ।
अहं वै त्वा प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥’’२९॥
वरुण ने कहा—हे राघव, सब भूतों में रस मुझ से उत्पन्न होते हैं। तुमसे मैं कहता हूँ—मैथिली को
ग्रहण करो।
ब्रह्मोवाच—
“पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मिणि ।
साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ श्रृणु चेदं वचो मम ॥’’३०॥
ब्रह्मा ने कहा—पुत्र ! राजर्षि धर्मयुक्त तुममें ऐसी निष्ठा हो तो आश्चर्य नहीं है। हे सुवृत्त ! हे साधो !
मेरी बात सुनो।
‘शङ्कुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् ।
यक्षाणां दानवानाञ्च महर्षीणां च पातितः ॥’’३१॥
हे वीर ! तुमने देवताओं, नागों, यक्षों, दानवों तथा महर्षियों के इस कंटक ( रावण ) को मार गिराया ।
“वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना ।
नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥’’३२॥
अपने वध के लिए ही उस दुरात्मा ने सीता का हरण किया था। नलकूबर के शाप के द्वारा मैंने पहले ही
से सीता की रक्षा की व्यवस्था कर रखी थी।
“यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ॥
शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥’’३४॥
यदि रावण अकामा किसी भी अन्य स्त्री का सेवन करेगा तो उसके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे—
इस प्रकार उसको नलकूबर का शाप था ।
१३ .

९८ रामायणमीमांसा चतुर्थ
“नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते ।
कृतं त्वया महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ।।’’ ३५ ।।
तुम सीता के सम्बन्ध में किञ्चिन्मात्र भी शङ्का मत करो। हे महाद्युते ! सीता को ग्रहण करो। हे
अमरप्रभ ! तुमने देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न किया है।
दशरथ उवाच—
“प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते ।
अनुजानामि राज्यञ्च प्रशाधि पुरुषोत्तम ।।’’३६।।१
महाराज दशरथ ने कहा—वत्स, मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ। मैं आज्ञा देता हूँ, सीता को ग्रहण करो
और राज्य का प्रशासन भी करो।
राम ने पिता एवं देवताओं का अभिवादन किया। अविन्ध्य एवं त्रिजटा को वरदान दिया। ब्रह्मा ने
राम से वरदान माँगने को कहा। राम ने सदा धर्म में स्थिति और रण में अपराजय एवं रण में मारे गये वानरों का
पुनर्जीवन माँगा।
सीता ने भी हनुमान् को वर प्रदान किया। पुत्र ! राम की कीर्ति के साथ तुम्हारा अनन्त जीवन होगा
और मेरे

पञ्चम अध्याय
बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित
दशरथ जातक
दशरथ जातक के अनुसार बुद्धदेव राजा दशरथ श्रीवाराणसी में धर्मपूर्वक राज्य करते थे । उनकी ज्येष्ठा
महिषी की तीन सन्तानें थीं । दो पुत्र रामपण्डित और लक्ष्मण एवं एक पुत्री सीता ( सीतादेवी ) । इस महिषी के
पश्चात् राजा ने एक दूसरी को ज्येष्ठा के पद पर नियुक्त किया । उसके भी एक पुत्र ( भरत कुमार ) उत्पन्न हुआ ।
राजा ने उसी अवसर पर उसको वर दिया । तब भरत की अवस्था सात वर्ष की थी । रानी ने वरस्वरूप अपने पुत्र
के लिए राज्य माँगा; पर राजा ने स्पष्ट इनकार कर दिया । लेकिन जब रानी पुनः पुनः इसके लिए अनुरोध करने
लगी तब राजा ने उसके षड्यन्त्रों के भय से अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा—'यहाँ तुम्हारे रहने से अनर्थ होने
की सम्भावना है, किसी अन्य राज्य या वन में जाकर रहो । मेरे मरने के बाद लौटकर राज्य पर अधिकार प्राप्त
करो ।' राजा ने ज्योतिषियों से अपने मरने की अवधि जानकर कहा—पुत्रो, बारह वर्ष बाद आकर छत्र को उठाना ।
पिता की वन्दना कर दोनों भाई जानेवाले ही थे कि सीतादेवी भी पिता से बिदा लेकर उनके साथ हो ली, तीनों
चले । तीनों के साथ और भी बहुत से लोग चल पड़े थे; उन सबको लौटाकर तीनों हिमालय पहुँच गये और वहाँ
आश्रम बनाकर रहने लगे ।
नौ वर्षों के बाद दशरथ पुत्र-शोक से मर गये । रानी भरत को राजा बनाने में असफल रही, क्योंकि
अमात्य और भरत भी इसका विरोध करते रहे । तब भरत चतुरङ्गिणी सेना लेकर राम को लाने के उद्देश्य से वन
गये । उस समय राम अकेले ही थे । भरत उनसे पिता के देहान्त का सारा समाचार कहकर रोने लगे । रामपण्डित न
तो शोक करते हैं, न रोते हैं—
“रामपण्डितो नैव शोचति न रोदिति”
सन्ध्यासमय लक्ष्मण और सीता लौटते हैं । पिता का मरण सुनकर दोनों रोने लगे । इसपर रामपण्डित
ने उनको धैर्य देने के लिए अनित्यता का धर्मोपदेश किया । उसे सुनकर सबों का शोक मिट जाता है ।
बाद में भरत के बहुत अनुरोध करने पर भी रामपण्डित ने यह कहकर वन में रहने का निश्चय प्रकट
किया कि मेरे पिता ने मुझे बारह वर्ष पर्यन्त वन में रहने का आदेश दिया था । अभी मैं लौटकर उनकी आज्ञा का
पालन नहीं कर सकूँगा, अतः तीन वर्ष के बाद लौट आऊँगा ।
जब भरत भी शासनाधिकार अस्वीकार कर देते हैं, तब रामपण्डित ने अपनी पादुकाएँ देकर कहा कि
मेरे आने तक ये शासन करेंगी ।
पादुकाओं को लेकर भरत, लक्ष्मण और सीता अन्य लोगों के साथ वाराणसी लौट आये ।
अमात्य इन पादुकाओं के आदेश से राज्यकार्य करते थे । अन्याय होते ही 'पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात
करती थीं 'परिहणन्ति' और ठीक निर्णय होने पर शान्त रहती थीं ।
तीन वर्ष व्यतीत होने पर रामपण्डित लौटकर अपनी बहन सीता से विवाह करते हैं एवं १६ हजार वर्ष
तक राज्य करने के बाद स्वर्ग चले जाते हैं ।

बुद्धदेव ने कहा कि पूर्वकाल में 'शुद्धोदन ही दशरथ थे, महामाया (बुद्धमाता) राम की माता थी, यशोधरा
(राहुल की माता) सीता थी, आनन्द भरत थे और मैं राम था।
अनामक जातक
ऐसा ही एक अनामक जातक है। तीसरी शती ई० में अनामक जातक का चीनी अनुवाद हुआ है। इस
जातक में किसी भी पात्र के नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन राम और सीता का वनवास, सीताहरण, जटायु का
वृत्तान्त, वाली और सुग्रीव का युद्ध, सेतुबन्ध, सीता की अग्निपरीक्षा आदि के संकेत मिलने हैं। इसके अनुसार राम
की विमाता कैकेयी के कारण पिता द्वारा वनवास नहीं दिया जाता, किन्तु वे अपने मामा के आक्रमण की तैयारियां
सुनकर स्वेच्छा से राज्य छोड़ देते हैं। वाली के वध का वृत्तान्त भी इसमें बदल गया है। राम के धनुषबाण को
देखते ही वाली भयभीत होकर भाग जाता है। शायद बोधिसत्त्व राम के द्वारा वाली का वध उचित नहीं समझा
गया हो। उसका सारांश निम्नरोक्त है--
एक समय बोधिसत्त्व एक महान् राजा हुआ। वह सदा ही दान, प्रियवचन, न्याय तथा समदर्शिता से
सभी जीवों की रक्षा करता था। उसका मामा भी राजा था। वह लोभी, निर्लज्ज, निर्दय तथा दुष्ट था। उसने
बोधिसत्त्व का राज्य छीन लेने के लिए सेना तैयार की। बोधिसत्त्व के अमात्यों ने भी सेना तैयार की। सेना का
निरीक्षण करके बोधिसत्त्व अपने स्वार्थ के लिए असङ्ख्य मनुष्यों का जीवन नष्ट करना ठीक नहीं यह सोचकर, राज्य
छोड़कर वन चला गया।
मामा ने राज्य पर अधिकार कर लिया। बोधिसत्त्व ने वही वन में अपनी रानी के साथ निवास किया।
एक दुष्ट नाग ने छद्म से उस समय रानी का हरण कर लिया जिस समय बोधिसत्त्व जङ्गल में फल लेने के लिए
गया था।
एक पक्षी ने उस दुष्ट नाग का मुकाबला किया। नाग ने पक्षी को मारा और उसका दाहिना पङ्ख तोड़
डाला और स्वयं समुद्र में स्थित अपने द्वीप में चला गया।
राजा फल लेकर लौटा, रानी को न पाकर वाण लेकर रानी की खोज में इधर उधर घूमने लगा। एक
नदी के स्रोत पर पहुँच कर राजा ने एक बन्दर को देखा, जो बड़ा उदास था। पूछने पर उस बन्दर ने कहा—मैं एक
राजा था, मेरे चाचा ने मेरा राज्य छीन लिया है। अब मेरा कोई साथी नहीं रहा। राजा ने भी अपना वृत्तान्त
सुनाया। दोनों ने परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध होकर मैत्री कर ली। दूसरे दिन बन्दर ने अपने चाचा से युद्ध
किया। राजा ने धनुष में बाण का सन्धान किया। जिसे देखते ही बन्दर का चाचा डरकर भाग निकला। बन्दर ने
अपने साथियों को रानी खोजने के लिए भेजा। बन्दरों ने एक पक्षी देखा। उसने बताया कि नाग ने रानी को
चुराया है। कपिराज ने अपनी सेना को समुद्रपार जाने में असमर्थ पाया। इन्द्र ने छोटे बन्दर का रूप धारण कर
कहा—"प्रत्येक बन्दर को पर्वत का एक टुकड़ा लाने की आज्ञा दो। इस प्रकार समुद्र एक मार्ग बन जायेगा और
आप द्वीप में पहुँच जायेंगे।" बन्दरों ने ऐसा ही करके समुद्र पार किया और नागद्वीप को घेर लिया।
नाग ने एक विषैला घना कुहरा उत्पन्न किया जिससे सभी पृथ्वी पर गिर पड़े। छोटे बन्दर ने एक दैव
ओषधि सबकी नाकों में लगायी जिससे सब स्वस्थ हो गये। नाग ने आँधी और बादलों से सूर्य को छिपा लिया।
बिजली चमकने लगी। छोटे बन्दर ने बताया कि बिजली ही नाग है। राजा ने एक बाण से नाग को मार डाला।
छोटे बन्दर ने रानी को मुक्त किया एवं राजा अपने मामा का देहान्त सुनकर अपने देश चला गया।
राजा ने रानी से कहा—"पति से अलग दूसरे के घर में निवास करने पर लोग स्त्री के आचरण पर
सन्देह करते हैं। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है?"