सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९७
उस समय अन्तरिक्ष में सब महान् आत्माओं तथा वानरों को हर्षित करनेवाली सुभगा लोकसाक्षिणी
दिव्य वाणी हुई।
वायुरुवाच—
‘भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः ।
अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥’’२७॥
वायु ने कहा—मैं सदागति वायु हूँ। राघव ! मैथिली सर्वथा निष्पाप है। राजन् ! आप इन्हें
स्वीकार करें।
अग्निरुवाच—
‘‘अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन ।
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥’’२८॥
अग्नि ने कहा—हे रघुनन्दन, मैं सब प्राणियों के शरीर में रहता हूँ। हे काकुत्स्थ, मैथिली का, सुसूक्ष्म
भी कोई अपराध नहीं है।
वरुण उवाच—
“रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव ।
अहं वै त्वा प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥’’२९॥
वरुण ने कहा—हे राघव, सब भूतों में रस मुझ से उत्पन्न होते हैं। तुमसे मैं कहता हूँ—मैथिली को
ग्रहण करो।
ब्रह्मोवाच—
“पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मिणि ।
साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ श्रृणु चेदं वचो मम ॥’’३०॥
ब्रह्मा ने कहा—पुत्र ! राजर्षि धर्मयुक्त तुममें ऐसी निष्ठा हो तो आश्चर्य नहीं है। हे सुवृत्त ! हे साधो !
मेरी बात सुनो।
‘शङ्कुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् ।
यक्षाणां दानवानाञ्च महर्षीणां च पातितः ॥’’३१॥
हे वीर ! तुमने देवताओं, नागों, यक्षों, दानवों तथा महर्षियों के इस कंटक ( रावण ) को मार गिराया ।
“वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना ।
नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥’’३२॥
अपने वध के लिए ही उस दुरात्मा ने सीता का हरण किया था। नलकूबर के शाप के द्वारा मैंने पहले ही
से सीता की रक्षा की व्यवस्था कर रखी थी।
“यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ॥
शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥’’३४॥
यदि रावण अकामा किसी भी अन्य स्त्री का सेवन करेगा तो उसके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे—
इस प्रकार उसको नलकूबर का शाप था ।
१३ .