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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 173

९६ रामायणमीमांसा चतुर्थ
राम का वह भाषण सुनकर लक्ष्मण सहित सब वानर मृतकल्प होकर निश्चेष्ट हो गये।
"ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः।
पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ॥"१७॥
उसी समय राघव के सामने तेजस्वी विमान द्वारा विशुद्धात्मा चतुर्मुख जगत्स्रष्टा पद्मयोनि (ब्रह्मा) आये ।
'शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च।
यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥१८॥
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् ।
विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥"१९॥
इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, कुबेर, सप्तर्षिगण तथा राजा दशरथ बहुमूल्य विमान से राम के समीप
आये।
"ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसङ्कुलम् ।
शुशुभे तारकैश्चित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥"२०॥
उस समय देवता और गन्धर्वों से संकुल अन्तरिक्ष वैसा ही शोभित हुआ जैसे शरद् ऋतु में तारों से
युक्त आकाश शोभित होता है ।
"तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी ।
उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥"२१॥
देवों के बीच उठकर यशस्विनी सीता ने विशालवक्षःस्थल राम से कहा—
"राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते ।
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥"२२॥
मैं आपको दोष नहीं देती हूँ। आप सभी स्त्रियों एवं पुरुषों की गति को जानते हैं। मेरे इस वचन को
सुनिये ।
"अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः ।
स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं करोम्यहम् ॥"२३॥
सदा गमनशील मातरिश्वा (वायु) सब भूतों के भीतर विचरण करते हैं। वे मेरे प्राणों को देह से पृथक्
कर दें; यदि मैंने कुछ भी पाप किया हो ।
"अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वायुरेव च।
विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥"२४॥
इसी प्रकार अग्नि, जल, आकाश, पृथिवी और वायु सब मुझे प्राणों से विमुक्त कर दें; यदि मुझमें पाप हो ।
"यद्यहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् ।
तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥"२५॥
वीर, यदि आपको छोड़कर मैंने स्वप्न में भी अन्य का चिन्तन नहीं किया है तो आप ही मेरे देवनिर्दिष्ट
पति हों।
"ततोन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी ।
पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥"२६॥