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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९१
२८२ वें अध्याय में उधर राम ने माल्यवान् पर्वत पर लक्ष्मण के साथ वर्षा ऋतु बिताकर विमल आकाश
तथा ग्रह, तारा और नक्षत्रों से युक्त निर्मल चन्द्र को देखा तथा कुमुद और पद्मों की सुगन्ध लेकर बहते हुए शीतल,
वायु ने उनकी सीताविषयक सुधि उद्बोधित कर दी। लङ्का में रुद्ध सीता का स्मरण कर उनका मन खिन्न हो उठा।
उन्होंने लक्ष्मण से कहा—वत्स, जाकर देखो, ग्राम्य धर्मों में प्रमत्त होकर सुग्रीव कृतघ्न तो नहीं हो गया ? वह क्या
कर रहा है ? प्रतीत होता है कि वह अपनी प्रतिज्ञा भूल गया है। यदि मेरे लिए उचित प्रयास नहीं कर रहा हो तो
उसे साथ लेकर तुरन्त लौट आओ ।
अनुशासनपरायण लक्ष्मण किष्किन्धा के द्वार पर जा पहुँचे। सक्रोध हो बिना किसी रोकटोक के भीतर
चले गये । राजा सुग्रीव ने आगे आकर उनका स्वागत सम्मान किया । पूजित होकर लक्ष्मण ने राम की बातें कह
सुनायीं । तारा सहित कपिराज सुग्रीव ने नम्रता से कहा--मैं अकृतज्ञ नहीं हूँ। सीता के अन्वेषणार्थ मैंने विभिन्न
दिशाओं में विनीत वानरों को भेज दिया है। जिस मास के समाप्त होने पर वानरों को लौट आना है उसके समाप्त
होने में पाँच रात्रियाँ शेष हैं
यह सुनकर रोष त्याग कर लक्ष्मण ने वानरेन्द्र की प्रशंसा की। सुग्रीव के साथ राम के पास जाकर
श्रीलक्ष्मण ने सब वृत्तान्त सुनाया । इसके बाद ही हजारों वानर तीन दिशाओं से लौट आये । लौटनेवाले बन्दरों ने
बताया कि हम लोगों ने सागर के तटवर्ती वन और पर्वत सहित सारी भूमि चप्पा चप्पा खोज डाली; परन्तु सीता का
पता नहीं लगा। फिर भी दक्षिण दिशा की ओर गये हुए वानरों के प्रति आशावान् होकर व्यथित होने पर भी राम
ने धैर्य धारण किया ।
दो मास बीतने पर वानर सुग्रीव से आकर कहते हैं --वाली ने और आपने जिस महान् मधुवन की रक्षा
की थी, पवनात्मज आदि वानर, राजाज्ञा के बिना ही, उसका उपभोग कर रहे हैं। अङ्गद, हनुमान् आदि दक्षिण
दिशा की ओर सीता की खोज में गये थे । उनका अविनय देखकर सुग्रीव ने समझ लिया कि वे लोग अवश्य अपने
कार्य में सफल हुए हैं।
मेधावी सुग्रीव ने यह बात राम से कही। राम को भी वैसा ही प्रतीत हुआ । इतने में विश्रान्त होकर
हनुमान् आदि सब वानर सुग्रीव के पास आ पहुँचे । उनकी गति एवं मुखवर्ण को देखकर राम को विश्वास हो गया
कि इन लोगों ने सीता को देख लिया है।
सबने आकर राम, लक्ष्मण और सुग्रीव को प्रणाम किया । राम के प्रश्न करने पर हनुमान् ने कहा—
मैं आपको प्रिय समाचार सुनाता हूँ। मैंने जानकी का दर्शन किया है। दक्षिण दिशा के पहाड़ों, कन्दराओं और वनों
को ढूँढ़कर हम लोग थक गये थे । यहाँ लौटने का समय भी बीत चुका था। हम लोगों ने एक महती गुफा देखी ।
बहुयोजन विस्तारवाली गहन वन और अन्धकारवाली गुफा में प्रवेशकर बहुत दूर जाने पर आदित्य के समान प्रकाश
हम लोगों को दिखायी दिया और वहाँ हमने मय का एक दिव्य भवन देखा । प्रभावती नामकी तपस्विनी वहाँ तप
कर रही थी । उसके द्वारा दिये गये विविध भोज्य और पान से सन्तुष्ट एवं सबल होकर हम लोगों ने उसके बताये
मार्ग से जाकर समुद्र के साथ सह्य तथा दर्दुर पर्वत देखे । मलय पर आरूढ़ होकर वरुणालय देखकर हम सब
खिन्न हो गये । वहाँ अनशन का सङ्कल्प कर हम सब बैठ गये तथा जटायु की चर्चा करने लगे । इतने में हम लोगों
ने पर्वत-शिखर के तुल्य दूसरा गरुड़ जैसा घोररूप भयावह पक्षी देखा। उसने कहा—तुम लोग कौन हो ? मेरे प्रिय
भ्राता जटायु की चर्चा कर रहे हो । मैं उसका बड़ा भाई सम्पाति हूँ। हम दोनों अन्योन्य स्पर्धा से आकाश में
सूर्यमण्डल तक उड़ने की होड़ कर रहे थे। सूर्य की गरमी से मेरे पङ्ख जल गये; किन्तु जटायु के पङ्ख मेरी छाया
से बच गये । हम लोगों ने उसको जटायुवध और श्रीसीता के हरण का वृत्तान्त बताया । सम्पाति उस अप्रिय