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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 158

व्यक्त नहीं हो सकता, वैसे ही अशोक सम्राट् के पूर्व जीवन का वर्णन भी मिथ्या न होकर ऐतिहासिक तथ्यों पर ही
आधारित है।
जब वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही वाल्मीकि को राम का समकालीन कहा गया
है, तब उस वर्णन को मिथ्या मानकर उनका अन्य काल ढूंढना सर्वथा असङ्गत और निराधार ही है। बालकाण्ड
और उत्तरकाण्ड को बाद का संस्करण मानना भी अप्रामाणिक ही है। किसी भी महान् नायक का जन्म, बाल्य-
जीवन, शिक्षण, विवाह आदि तथा अन्तिम स्थिति का वर्णन स्वाभाविक ही है। "वाल्मीकि और राम दोनों प्राचीन
हैं, इसलिये दोनों को समकालीन कह दिया गया" यह अटकल अशुद्ध है; क्योंकि यदि ऐसा हो तो राम और कृष्ण
दोनों ही प्राचीन थे, उन्हें भी समकालिक क्यों नहीं माना गया ? राम और व्यास भी तो प्राचीन ही थे, फिर
वाल्मीकि के समान ही व्यास को भी राम का समकालिक क्यों नहीं कहा गया ?
अतएव "वाल्मीकि की भाषा जिसमें उन्होंने रामायण की रचना की थी, वह वैदिक संस्कृत न होकर
लौकिक संस्कृत है; किन्तु राम का नाम ऋग्वेद में उपलब्ध होने से उनका वैदिक काल का होना सिद्ध है। यदि
वाल्मीकि राम के समकालिक होते तो वैदिक युग में रहकर लौकिक संस्कृत में किस प्रकार अपने काव्य की रचना
कर सकते थे। उनकी रचना वैदिक संस्कृत में ही होनी चाहिये, अतः वैदिककाल के पश्चात् और बौद्धकाल के ६००
ई० पूर्व ही रामायण का निर्माण मानना उचित है" यह कथन भी निस्सार है ? क्योंकि बौद्धकाल आदि कालों के
समान कोई खास काल वैदिककाल नहीं है, कारण कि "वाचा विरूपनित्यया" ( ऋ० सं० ८।७५।६) तथा "अत
एव च नित्यत्वम्" ( ब्र० सू० १।३।२९) के द्वारा वेद नित्य कहा गया है। अतएव वैदिक भाषा किसी समयविशेष
की भाषा नहीं थी। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उस समय की सभी रचनाएँ वैदिकभाषा में ही होती थीं
और सब वेद ही होते थे; इसलिए यह सब कथन निष्प्रमाण एवं वेदविरुद्ध ही है। यह भी नियम नहीं है कि जिस
ग्रन्थ में जिसका नाम आता है वह उस ग्रन्थकाल का ही होना चाहिये। हो सकता है, वेदकाल से भी प्राचीनकाल के
राम रहे हों और यह भी हो सकता है कि त्रिकालज्ञ वेदकार ने भविष्य के राम का ही वर्णन किया हो ।
अथवा आपके अनुसार "जैसे तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण काव्य के रचयिता वाल्मीकि
भिन्न हैं, वैसे ही वेद के राम से रामायण के राम भिन्न हैं।" वस्तुतः पूर्वकथन के अनुसार वेद किसी देश या काल के
वर्गविशेष की किसी वैदिकभाषा के मनुष्य या देवों द्वारा रचित ग्रन्थ नहीं हैं; किन्तु वे अनादि ही हैं। हाँ, जिन
सत्ययुग, त्रेतायुग आदि कालों में वेदों के पठन-पाठन एवं तदर्थानुष्ठान खूब प्रचलित होते हैं उन कालों को वैदिककाल
कहा जा सकता है; परन्तु उस समय सब ग्रन्थ वैदिक भाषा में ही होते थे या वेद ही होते थे, यह नहीं कहा जा
सकता।
“मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्" ( आप० सू० ) के अनुसार 'मन्त्र' और 'ब्राह्मण' दोनों ही वेद हैं। उन
वेदों के अनुसार ही विदित होता है कि वैदिक भाषा कभी किसी वर्गविशेष की भाषा थी ही नहीं । संस्कृत भाषा भी
देवभाषा थी, मानुषी भाषा नहीं थी। इसी लिए संस्कृतभाषा को गीर्वाणवाणी या सुरभारती कहा जाता है। अतएव
वैदिक यज्ञ, याग आदि में संस्कृत भाषा या देवभाषा बोलने का ही नियम है। उस बीच में यदि भूल से मानुषी
भाषा का उच्चारण हो जाय तो प्रायश्चित्तस्वरूप वैष्णव यजुर्मन्त्र या वैष्णवी ऋचा के जप का विधान है— “स यदिदं
पुरा मानुषीं वाचं व्याहरेत् ततो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेद्यज्ञो वै विष्णुस्तद् यज्ञं पुनरारभते तस्यो हैवा प्रायश्चि-
स्तिर्देवेभ्यस्त्वे त्वा गृह्णामीति देवानवदित्यु हि हविर्गृह्णते" ( श० ब्रा० १।१।४।६)।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि वेदकाल में संस्कृत भाषा ( सुरभारती ) और उससे भिन्न मानुषी भाषा
भी थी। युगों के अनुसार विचार करने से वर्तमान मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीरामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था।
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