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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

[Page Header]
१८ राजतरङ्गिणी

[Shloka 21]
इयं नृपाणामुल्लासे ह्रासे वा देशकालयोः ।
भेषज्यभूतसंवादिकथा युक्तोपयुज्यते ॥ २१ ॥

[Hindi Translation 21]
२१ राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा¹ देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह
किंवा शांतिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी ।

[Shloka 22]
संक्रान्तप्राक्तनानन्त्यव्यवहारः सुचेतसः ।
कस्येदृशो न संदर्भों यदि वा हृदयङ्गमः ॥ २२ ॥

[Hindi Translation 22]
२२ कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारों से परिपूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को
हृदयंगम नहीं कर सकेगा ?

[Column 1]
मुल्तान विजय करता मुहम्मद बिन कासिम उत्तरी
पंजाब तक पहुँच गया था। सन् ९३३ ई० में
समानी बादशाह अलप्तगीन ने हिन्दुओं के राज
गजनी पर अधिकार कर लिया था। सन् ९७७ ई०
में अलप्तगीन के पिता के गुलाम ने गजनी पर
अधिकार कर लिया। सन् ९९७ ई० में महमूद गजनवी
राज्य सिंहासन पर बैठा । भारत पर सन् १००१
ई० में आक्रमण किया। उसका आक्रमण होता रहा ।
उत्तरी भारत में अव्यवस्था फैल गई। यद्यपि कल्हण
के रचना-काल में मुसलमानों का अधिकार भारत
पर नहीं स्थापित हुआ था, तथापि उनका आक्रमण
होता रहता था। अतएव कल्हण ने काश्मीर से बाहर
जाकर इतिहास सामग्री एकत्र करने का सम्भवतः
प्रयास नहीं किया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २२ में 'प्राक्तना' का 'प्रार्थना'
और 'सुचेतसः' का 'सचेतसः' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२१ (१) कथा—कथा का शाब्दिक अर्थ
होता है कहानी, किस्सा, कल्पित कहानी, वृत्तान्त,
वर्णन, वार्तालाप-कथोपकथन, आख्यायिका शैली का
गद्यमय निबन्ध । कथा पद्य और गद्य दोनों प्रकार
का काव्य होता है।
कथा साहित्य का मूल स्रोत ऋग्वेद है। ऋग्वेद
में ३५ कथाएँ हैं। उन्हें कथा का रूप बृहद्देवता में
देने का प्रयास किया गया है। वेद की कथाएँ अत्यन्त

[Column 2]
संक्षिप्त हैं। पुराणों तथा रामायण, महाभारत में
उन्हें विस्तृत कर, लिखा गया है। व्यक्ति विशेष
अथवा किसी घटना के आदि और अंत से युक्त
वर्णन को कथा कहा गया है।
कथाएँ ऐतिहासिक तथा कल्पित होती हैं।
भारत में कथा साहित्य विकसित था। रामायण और
महाभारत में वर्णित कथाओं की शैली पर कथा
साहित्य भारत में प्रचलित हुआ । 'बृहत्कथा', 'जातक
कथा', 'पंचतंत्र' आदि उनके उदाहरण हैं। 'कुमार'-
सम्भव', 'कादम्बरी', 'दश कुमार चरित', 'प्रबन्ध
चिन्तामणि' 'भविष्यत कहा' 'लोतावई कहा'
आदि कथा काव्य हैं। 'हितोपदेश', 'कुवलयमाला',
'मलय सुन्दरी कथा', 'भोज प्रबन्ध' कथा साहित्य के
अन्तर्गत आते हैं। मैंने भी 'रामायण कथा', 'योग
वासिष्ठ कथा' और 'वेद कथा' लिखा है। मैं कथा
साहित्य का प्राचीन चाहे जो रूप रहा हो, आज कथा
शब्द से प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में निहित जीवन
चरित्रों, घटना विशेषों के वर्णनों से लिया जाता है।
उन्हें पढ़ना तथा सुनना पुण्य कार्य माना जाता है।
कालान्तर में कथा का सम्बन्ध पौराणिक
महाभारत तथा रामायण कथाओं से हो गया। उन्हें
धार्मिक रूप दे दिया गया। एकादशी, पूर्णिमाओं तथा
अनेक पर्वों पर मन्दिरों, जलाशयों, नदी तटों, अथवा
घरों में कथा कहने की परिपाटी चल निकली ।
सत्यनारायण की कथा का आयोजन प्रायः पूर्णिमासी
को सम्पन्न घरों में होता है। मन्दिरों में प्रातः

प्रथम तरङ्ग १९

तथा सायं प्रति दिन नियमित रूप से कथा कहने की
रीति है। कथावाचक पण्डित या तो नौकर रख
लिए जाते हैं, अथवा कथा-सुनने वाले श्रोतागण
उन्हें कुछ दे दिया करते हैं।
कथा शब्द से सम्बोधन होता है—कहना अथवा
वह जो कहा जाय। कल्हण ने राजतरंगिणी इस
लिए लिखी थी कि लोग उससे लाभ उठायें। उसे
सुना जाय। उसके पात्रों तथा उसमें वर्णित चरित्रों
को लोग सुनें। उन्हें स्मरण रख कर लाभ उठायें !
यह धार्मिक नहीं राजनीतिक किंवा ऐतिहासिक कथा
है। कल्हण सम्भवतः इसे श्रव्य ग्रन्थ बनाने की
कल्पना कर रहा था। किन्तु वह अपने इस उद्देश्य
में सफल नहीं हुआ। राजतरंगिणी धार्मिक ग्रन्थ नहीं
बन सकी। उसका श्रवण पुराण, रामायण तथा
महाभारत के समान धार्मिक रूप नहीं ले सका।
उसे वह पवित्रता तथा आध्यात्मिक महत्त्व नहीं प्राप्त
हो सका, जो धार्मिक ग्रन्थों की श्रेणी में रख दिये
गया काव्यों को मिला था।
निःसन्देह धार्मिक कथाओं में चरित्र, उससे
सम्बन्धी घटनाओं, उनका उतार चढ़ाव, आदि, अन्त
सब कुछ देकर उसे पूर्ण बनाया जाता है। राजतरं-
गिणी में राजाओं आदि के चरित्र का सुन्दर वर्णन
दिया गया है। परन्तु राजा देवत्व भाव नहीं प्राप्त
कर सके। इसलिए राजतरंगिणी की कथा धार्मिक
कथाओं के समान महत्त्व नहीं प्राप्त कर सकी।
वह जनसाधारण में घर नहीं कर पायी। यद्यपि
राजाओं ने अपने नाम पर विष्णु तथा शिव की मूर्तियाँ
स्थापित करवाईं। मन्दिर बनवाये। नगर बनवाये।
अपने नाम जीवित रखने के लिए उनपर दान
चढ़ाये। अग्रहार दिये। तथापि यह स्वीकार करना
पड़ेगा कि कल्हण की भावना उदात्त थी। धार्मिक
कथा के कारण जैसे चरित्र सुधरता है, उसी प्रकार
इस राजनीतिक कथा के कारण राजाओं तथा देश
का चरित्र सुधार होगा, यही कल्हण की उदात्त
कल्पना थी। इसी लिए यहाँ पर कथा शब्द का
उसने प्रयोग किया है। किन्तु उसकी यह आशा
सफल न हो सकी कि राजतरंगिणी को कथा रूप
में स्वीकार कर उसका पाठ किया जाय।
(२) भेषज—कल्हण यहाँ अपने इतिहास
लिखने का उद्देश्य उपस्थित करता है। उसका
एकमात्र लक्ष्य काश्मीर के राजाओं तथा काश्मीर
राज्य की राजनैतिक व्याधियों के लिये देशकाल-
पात्र के अनुसार औषध प्रस्तुत करना था। उसका
उद्देश्य अर्वाचीन ऐतिहासिकों के समान वैज्ञानिक
इतिहास नहीं लिखना था। उसने इतिहास को
'काव्य की क्रांति' के अंग्रेजी लेखक तुल्य इतिहास
को गप्पों का परिणाम नहीं माना है।
रोम साम्राज्य के ह्रास और पतन के प्रसिद्ध
लेखक श्री गिबन की तरह इतिहास को मूर्खताओं,
दुर्दशाओं के कथानक के रूप में नहीं देखा है।
महान् सेनानी नेपोलियन कहा करता था—'इतिहास
कथानकों के अतिरिक्त और है क्या?'
कल्हण कथानक को इतिहास का एकमात्र
हेतु नहीं मानता। उसने इतिहास को दार्शनिक
श्री इमरसन के शब्दों में प्रसिद्ध व्यक्तियों के
जीवनचरित्रों का संग्रह नहीं माना है। जर्मन
दार्शनिक श्री हेगल ने इतिहास रचनाकारों की तुलना
उन मनीषियों से की है, जो भूतकाल की ओर आँखें
फेरकर देखते हैं। कल्हण ने राजाओं का इतिहास
लिखा है। उसने पीछे फिरकर झाँका है। उसमें
फँस नहीं गया है। श्री एच. जी. वेल्स ने इतिहास
को मानव के विचारों का इतिहास माना है।
आधुनिक इतिहास लेखक श्री टायनबो ने इतिहास
से तात्पर्य माना है कि सभ्यताओं के अन्दर एक
प्रक्रिया चलती रहती है। यह उसकी उत्पत्ति, विकास,
ह्रास और विघटन को उपस्थित करता है। उसके
अनुसार 'इण्डिक' सभ्यता काल ईसापूर्व १७०० से
ईसा पश्चात् ५०० वर्ष रही है। विकास का समय
वह वेद से बुद्ध काल तक मानता है। उसका मत
जहाँ तक काश्मीर के इतिहास का सम्बन्ध है,
काश्मीर 'इण्डिक' तथा 'हिन्दू' दोनों सभ्यता काल में

२० राजतरङ्गिणी
क्षणभङ्गिनि जन्तूनां स्फुरिते परिनिन्दिते ।
मूर्धाभिषेकः शान्तस्य रसस्याऽत्र विचार्यताम् ॥ २३ ॥
२३ क्षणभंगुर प्राणियों के स्फुरण के विषय में जब परिनिन्दा करता हूँ तब यही परिणाम
निकलता है कि रसों में शांत रस१ श्रेष्ठ है । अतएव ग्रंथ में शांत रस की
प्रमुखता है।
आ जाता है। यहाँ पर घोर अहिंसा लिखना अप्रासं-
गिक होगा। यह विषय विवादास्पद है।
कल्हण इतिहास को निष्प्राण नहीं मानता।
उसका उद्देश्य उन पाश्चात्य लेखकों की अपेक्षा
अधिक व्यापक है, जिनके विचारों से जगत् प्रायः
प्रभावित होता है। वह इतिहास की श्रृंखला जोड़कर
उन्हें तरङ्गिणी रूप में प्रस्तुत करता है। नदियाँ ऋतु
परिवर्तन के अनुसार विभिन्न रूप धारण
करती हैं। उनसे मनुष्य तृप्त होता है। प्यास
बुझाता है। उसमें डूबकर मर भी सकता है। नदी
बाढ़ लाकर विप्लव उपस्थित कर सकती है, परन्तु
उसके बँधे जल से सिंचकर हरी भरी भूमि और
लहलहाते खेत प्राणियों को जीवन-दान देते हैं।
कल्हण की दृष्टि में इतिहास विषम परिस्थितियों
में राजाओं के लिये ओषधि प्रस्तुत करता है। उसने
राजाओं के प्रशस्तिवाचन के लिये लेखनी नहीं उठाई
थी। इसमें रोचक कथाओं का वर्णन है। विचारों
का वर्णन है। राजाओं तथा उनके अधिकारियों की
मूर्खताओं, दुष्टताओं तथा उनमें उत्पन्न होने वाली
दुर्दशाओं का वर्णन है। उत्तम चरित्रांकन है।
जीवन के अंधकारमय पहलू के साथ प्रकाश का
उल्लेख है। आशा के साथ निराशा की झलक
मिलती है।
'वाक्यं रसात्मकं काव्यं' साहित्य दर्पण कहता है।
शांत रस आन्तरिक शांति प्रदान करता है। यद्यपि
राजतरंगिणी में सभी रसों का रसास्वादन पाठक कर
सकते हैं, परंतु कल्हण ने शांत रस को प्रधान माना
है। संस्कृत साहित्य का किंचित् मात्र ज्ञान होगा, उसे
कल्हण के काव्य में शांत रस की अविच्छिन्न धारा
प्रवाहित मिलेगी। ऐतिहासिक लेखक के लिए शांत
रस ही उत्तम माध्यम है। राज्यों के उत्थान-पतन,
राजनीतिक प्रवाह, घटनाओं का वर्णन में यदि कवि
शांत रस का आश्रय न ले तो भावावेश में भटक
सकता है। भावाविष्ट होने पर निर्णय उचित नहीं
हो सकेगा। अतः घटनावलियों, गुण-दोष, पुण्य-पाप,
उत्थान-पतन, गौरव-निंदा आदि का यथास्थिति
सच्चाई से वर्णन करने के लिये मन को संतुलित
रखना आवश्यक है। शांत होने पर मन संतुलित
होता है। अतएव शांत रस काव्य का प्रधान रस
रखकर कल्हण ने इतिहास रचना की शैली के साथ
न्याय किया है।
काव्य की अनेक परिभाषाएँ की गयी हैं।
अलंकारशास्त्र के पंडित किसी एक परिभाषा पर
सहमत नहीं होते। तथापि स्वीकार करते हैं कि
रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहते हैं।
सामान्य, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतम लक्षणों की दृष्टि से
काव्य देखा जा सकता है।
काव्य कवि की प्रतिभा का द्योतक है। वह
प्रतिभा कहीं वरदान, आशीर्वाद अथवा जन्मजात
गुण और कहीं व्युत्पत्ति तथा अभ्यास द्वारा परिलक्षित
होती है। कल्हण का यह काव्य सूक्ष्म है। उसके पिता
कुलीन तथा सुगठित थे। उसमें काव्य-कारण जन्म-
पाठभेद :
श्लोक संख्या २३ में 'चिन्तिते' का पाठभेद
'चिन्तिनि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२३ (१) शांत रस—अलंकार ग्रंथों के नव
रसों में शांत एक रस है। काश्मीरी विद्वान् द्वारा
लिखित काव्यप्रकाश के अनुसार आठ रस होते हैं।

प्रथम तरङ्ग २१
जात तथा अभ्यास दोनों से कहा जायगा ।
उसका यह काव्य लक्षण तथा कारण की दृष्टि से
किस वर्ग में आता है। उसने स्वयं कहीं नहीं लिखा है।
चार वर्गों में काव्यों का भेद विभाजित किया
गया है, उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तथा अधम ।
कल्हण की राजतरंगिणी प्रथम वर्ग में रखी जायगी ।
उत्तमोत्तम काव्य ध्वनि के पाँच भेद होते हैं। ध्वनि
दो प्रकार की होती है—अभिधामूलक तथा लक्षणा-
मूलक । अभिधामूलक ध्वनि के तीन प्रकार होते हैं—
रस ध्वनि, वस्तु ध्वनि और अलंकार ध्वनि । कल्हण
स्वयं कहता है कि उसके काव्य में शांत रस प्रधान
है। कुछ विद्वान् शांत रस को नाटक के लिए ठीक
नहीं मानते ।;
नव रस शृंगार, करुण, ... शान्त, रौद्र, वीर,
अद्भुत, हास्य, भयानक तथा वीभत्स हैं ।
शांत रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' है । 'निर्वेद'
का लक्षण दिया गया है—'नित्यानित्यवस्तु-विचार-
जन्मा विषयविरागाख्यो निर्वेदः ।' शांत रस का
विरोधी 'शृंगार' रस है । राजंतरंगिणी इतिहास है।
वह काव्य ग्रंथ, नाटक, उपाख्यान, उपन्यास, कथा,
गीत आदि के तुल्य नहीं है। घटनानुसार सभी रसों
का समावेश इसमें मिलेगा । कल्हण का आशय इतिहास
लिखकर राजाओं तथा राज्य की बीमारी के लिये
उपयुक्त औषध का निदान करना था। सभी राजाओं,
जिनका काल लम्बे चार हजार वर्षों का है, उनके
चरित्र का चित्रण कर, उनके गुण-अवगुण, उनके
उत्थान-पतन, राज्य की समृद्धि तथा ह्रास आदि पर
निष्पक्ष वैद्य की तरह, रोगी की भावनाओं से अलग
रहकर, निःस्पृह, निष्काम, निर्वेद तुल्य औषध चुनना
था । अपना मत प्रकट करना था । इसके लिये शान्त
मन, स्थिर बुद्धि और स्वस्थ शरीर का होना आव-
श्यक था । यह केवल शांत द्वारा ही हो सकता था ।
राजतरंगिणी को कल्हण ने शांतरसप्रधान रखा
है। यदि राजा तथा राज्य की बात छोड़ दी जाय,
तो भी समकालीन तथा पूर्वकालीन समाज, लोक,
रीति, कुरीति, अधोगति, उन्नति, आचार-विचार
और सभी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक
प्रश्नों पर स्वानुभव तथा अर्जित और प्राक्तन ज्ञान
के आधार पर निर्णय देना था। यह शांत, प्रबुद्ध,
स्थिरचित्त द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सबसे
अलग रहकर, ऊपर उठकर, न्यायाधीश की तरह
निर्णय दे सके ।
काव्य की आत्मा रस है। रसों में शान्त रस
को कल्हण ने श्रेष्ठ माना है। संकल्प सूर्योदय नाटक
ने इसे स्वीकार करते हुए तथ्य पूर्ण तर्क उपस्थित
किया है।
अभ्यर्पपाटिकामधिकरोति शृंगारिता
परस्परं तिरस्कृतिं परिचिनोति वीरायितम् ।
विरुद्धगतिशृङ्गनस्तदलमल्यमारैः परैः
शमस्तु परिशिष्यते शमितचित्तखेदो रसः ॥
( सं० सू० १ अंकः १९ )
शृंगार रस असभ्यों के व्यवहार का प्रतीक है।
वीर रस परस्पर तिरस्कार का परिचायक है । अद्भु-
भूत रस विरोधी बातों का आश्रय लेता है। अन्य
रस वाले को अन्य रसों से क्या लाभ हो सकता है ।
चित्त के खेद को शान्त करने में केवल शान्त रस ही
शेष रह जाता है ।
मम्मट ने काव्य प्रकाश में—निर्वेदः स्थायि-
भावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः' कहा है । (४।३५)
भरत ने 'नाट्य शास्त्र' में केवल आठ रसों को
मान्यता दी है। शान्त रस को मान्यता नहीं देता ।
अध्यात्म भावना की इस रस द्वारा उत्पत्ति होती है ।
स्यात् इसीलिए भरत ने अन्य रसों की श्रेणी में
शान्त रस को नहीं रखा है। नाट्यशास्त्र में उल्लेख
मिलता है। शान्त रस द्वारा रति आदि आठ स्थायी
भावों की उत्पत्ति होती है।
स्वयं निमित्तमासाद्य, शान्ताद्भावो प्रवर्तते ।
पुनर्निवित्तापाये च शान्त एवोपलीयते । (६।१०८)
काश्मीरी पण्डित अभिनवगुप्त ने शान्त रस को
जिन विद्वानों ने रस नही माना है, उनका तर्क सम्मत

२२ रामनरहरियाँ
उत्तर दिया है। शान्त रस की तुलना सभी रसों से
करते हुए, मम्मट ने उसे पूर्ण रस माना है। तत्त्व ज्ञान
को शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करता है।
अग्निपुराण ने शान्त रस को उत्पत्ति 'रति' का
अभाव माना है। रुद्रट ने 'सम्यक् ज्ञान', आनन्द
वर्धन ने 'तृष्णा क्षय सुख' को शान्त रस का
स्थायी भाव माना है। विद्वानों ने अन्य रसों के
समान शान्त रस का भेद-प्रभेद करने का प्रयास नहीं
किया है। 'रसकलिका' ने (१) वैराग्य, (२) दोष
निग्रह (३) सन्तोष, (४) तत्त्व साक्षात्कार—चार
भेद शान्त रस का किया है।
हिन्दी के काव्याचार्यों ने शान्त रस की परिभाषा
की है। कुलपति मिश्र कहते हैं :
तत्त्व ज्ञान ते कविता में जहँ प्रगटै निर्वेद ।
कहैं सान्त रस जासु को सो है, मौमो भेद ।
( रसरहस्य : २८ )
यहाँ पर मम्मट के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया
गया है। पद्माकर कहते हैं :
सुरस शान्त निर्वेद है जाको थाई भाव ।
( जगद्विनोद : ७२० )
कवि केशव दास जी कहते हैं :
सबते होय उदास मन बसै एक हीं ठौर ।
ताहो सो समरस कहत केशव कपि सिरमौर ।
( रसिक प्रिया १४:३७ )
हास्य रस द्वारा मनुष्य में हास्य रस की
अधिकता होती है। हँसी आती है। करुण कविता का
पाठ करते समय करुणा उत्पन्न होतो है। हृदय
भर आता है। वीर रस काव्य सुनने पर उत्साह
उत्पन्न होता है। अंग फडकने लगते हैं। शान्त रस
की कविता पाठ के समय मन शान्त रहता है।
कल्हण के शब्दो में 'स्थेय' भाव अर्थात् न्याय दृष्टि
उत्पन्न होतो है। वह इतिहास को तोलने लगता
है। भावातिरेक में स्वयं बह नहीं जाता। काश्मीरी
आचार्य काश्मीरी पण्डित अलंकार शास्त्र के आलोचक

श्री आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक (सन् ८५५—
८८४ ई०) तृतीय उद्योत में (२५-२७) में
शान्त रस पर प्रकाश डाला है। तृष्णा का प्रध्वंसा-
भाव शान्तरस कहा गया है। एक अच्छा उदाहरण
उक्त पुस्तक की तारावती टीका में उपस्थित किया
गया है।
मनुष्य को पूर्ण तृप्ति हो जाती है तो उसे एक
प्रकार का आनन्द होता है—जैसे स्वादिष्ट भोजन
के पश्चात् एक प्रकार के आनन्द का अनुभव होता
है। ठीक इसी प्रकार तृष्णा क्षय के सुख में भी एक
प्रकार के आनन्द का बोध होता है। यही आनन्द
शान्त रस का स्थायी भाव है।
शान्त एक प्रकार की प्राकृतिक चित्त वृत्ति होती
है। रति आदि मैथुन चित्तवृत्तियाँ हैं। सभी रसों
की शान्त अवस्था को शान्त रस कह सकते हैं। तृष्णा
सुख का जहाँ परितोष होता है, वहीं शान्त रस का
उदय होता है। विषयों की अभिलाषा से निवृत्ति
प्राप्त करना निर्वेद है। उसे वैराग्य भी कहते हैं।
यही निर्वेद शान्त रस का स्थायी भाव है।
'शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः
परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव ।
( ध्वन्यालोक : ३:२६ )
कल्हण ने सभी रसो का समावेश राजतरंगिणी
काव्य में किया है। शान्त को उसने प्रधान माना है।
शृंगार से शान्त रस तक पहुँचने के लिए बीच में वीर
रस का माध्यम लेना पड़ता है। शृंगार का विरोधी
रस शान्त रस है। अतएव सीधे शृंगार से शान्त रस
पर नहीं जाया जा सकता। इसी प्रकार शान्त रस से
शृंगार रस पर आने के लिए बीच में अद्भुत रस का
माध्यम लेना पड़ता है। कल्हण ने इस प्राचीन
परम्परागत काव्य पद्धति का अनुसरण किया है।
एक मत शान्त रस का अन्तर्भाव बीभत्स रस
में मानता है। कारण दिया जाता है। शान्त रस के
लिए विषयों से घृणा होती है। यह तर्क सम्मत

प्रथम तरङ्ग २३
तदमन्दरसस्यन्दसुन्दरेयं निपीयताम् ।
श्रोत्रशुक्तिपुटैः स्पष्टमङ्ग राजतरङ्गिणी ॥ २४ ॥
२४ सुहृद्वर ! शांत सुंदर रसधार युक्त इस राजतरंगिणी का अपने कर्णशुक्तिपुटों
(सुतुहियों) द्वारा आनंदपूर्ण उन्मुक्त भाव से परिपूर्ण रसास्वादन कीजिए ।
नहीं है। शान्त रस का स्थायी भाव घृणा नहीं हो
सकती। वह शान्त रस का व्यभिचारी भाव हो
सकता है।
मनुष्य जीवन का लक्ष्य भारतीय विचारधारा-
नुसार मोक्ष प्राप्ति है। सभी विद्या, धर्म, मत-
मतान्तर एवं सिद्धान्त मनुष्य को इसी दिशा की ओर
ले जाते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है। राजनीति
और मोक्ष से क्या सम्बन्ध है। राजतरंगिणी इतिहास
ग्रन्थ है। उसका सम्बन्ध तत्कालीन काश्मीर की
राजनीति से है।
भारत में राजनीति साध्य नही साधन मात्र
समझा गया है। देश में शान्ति रखकर अराज-
कता को दूर हटाना है। शान्तिमय वातावरण तथा
समाज से ही मानव अपने चरम उद्देश्य की पूर्ति कर
सकता है। चाणक्य ने उसे सूत्रवत् योग-क्षेम शब्द
में रखा है। इस योग-क्षेम का चरम लक्ष्य मोक्ष
प्राप्ति है। राज्य इसमें सहायक होता है।
मोक्ष प्राप्ति सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है।
इस पुरुषार्थ की तरफ शान्त रस बढ़ाता है। अतएव
शान्त रस काश्मीरी साहित्यशास्त्री अभिनवगुप्त
(सन् ९५०-८६० ई०) के शब्दो में अन्य रसों की
अपेक्षा श्रेष्ठ रस है। कल्हण ने अपने पूर्व के अलंकार
शास्त्री तथा काव्याचार्यों के मत के अनुसार शान्त
रस को श्रेष्ठ रस मानकर काश्मीर के पूर्व विद्वानों
के मतों का अनुकरण किया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २४ में 'स्यंद' का 'स्पंद', 'मंग' का
'संग' 'सांग' और 'राज' का 'राजा' पाठभेद
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२४ (१) शुक्ति पुट-इस शब्द का साधारण
अर्थ होता है, सीप का खोल या सुतुही। शुक्ति पुट
तरल पदार्थ पीने के काम में आता है। श्री आर.
एस. पण्डित इस श्लोक पर टिप्पणी लिखते हैं।
'कल्हण प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक हिराक्लीत्तस की
तरह जीवन को शाश्वत माना है। तरंगिणी के जल
के समान जीवन का क्रम टूटता नहीं है। वह सतत
चलता रहा है। भारतीय और यूनानी दोनों जीवन
की अविच्छिन्नता में विश्वास करते थे। सुरा पीने
के लिए शुक्ति पुट के गिलास कल्हण के समय
प्रचलित रहे होंगे। वह तरंग ६:३६६ के सन्दर्भ
में इसकी पुष्टि करता है। कुलीनों में इस प्रकार के
पानपात्र प्रचलित थे। वरनियर का उदाहरण
उन्होंने दिया है-"औरंगजेब काश्मीर में आया था
तो उसे तिब्बती हरित मणि भेंट किया गया था।
जिसका मुगलों के दरबार में बड़ा मूल्याकंन था।
उसका रंग हरापन लिये था। उसपर उज्ज्वल शिराएँ
थीं। वह इतना सख्त था कि हीरे के चूर्ण से ही
उसे बनाया जा सकता था। इस प्रकार के पत्थरों
से प्याले और अलंकृत पात्र बनाये जाते थे।"
श्रोत्रशुक्तिपुटैः-यह शब्द काश्मीर में बहुत
प्रचलित था। कल्हण के पश्चात् महाकवि
जगद्धर भट्ट ने स्तुति कुसुमाञ्जलि में इस शब्द का
प्रयोग किया है। उस समय काश्मीर में मुस्लिम राज
स्थापित हो चुका था। उनका अनुमानित काल सन्
१३५० ईस्वी है। कल्हण से २०२ वर्ष पश्चात् हुए थे।'
पीता सुधा श्रवण शुक्ति पुटैः समक्ष-
मास्वादिता पुनरियं शिवभक्तिरेव ॥
(नवम स्तोत्र : ३५)

२४ राजतरङ्गिणी
पुरा सतीसरः कल्पारम्भात् प्रभृति भूरभूत् ।
कुक्षौ हिमाद्रेर्णोभिः पूर्णे मन्वन्तराणि षट् ॥ २५ ॥
काश्मीर वर्णन
२५ कल्प का प्रारंभ था। छः मन्वन्तर बीत चुके थे। उस पुरा काल में हिमाद्रि कुक्षि¹
में अर्णवपूर्ण सतीसर² था।

जीवन और तरंगिणी की उपमा भारतीय
दार्शनिक विचार की ओर लक्ष्य करती है। भारतीय
आत्मा को अमर मानते हैं। जीवन कभी नष्ट नहीं
होता। वह चलता रहता है। चलता रहेगा। जीवन
की यह धारा कभी विच्छिन्न होने वाली नहीं है।
पाठभेद ·
श्लोक संख्या २५ में 'पुरा' शब्द का पाठभेद
'पुरः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२५. (१) हिमाद्रि कुक्षि—हिमाद्रि शब्द का
उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है। 'हिमाद्रि
कुक्षि' शब्द काश्मीर के लिये नीलमत पुराण तथा
राजतरंगिणी दोनों में मिलता है। कुक्षि का अर्थ
कोख होता है। माता की कोख में जिस प्रकार
शिशु सुरक्षित तथा आराम से रहता है, उसी प्रकार
काश्मीर हिमालय की गोद में सब प्रकार से रक्षित
सुखपूर्वक है। माता शिशु को अपने बाहु से घेर
कर कोख में रखती है। हिमालय काश्मीर को शिशु
तुल्य अपने शैल बाहु से घेरकर माता की तरह गोद
में रखे हुए हैं। शिशु माँ के पीन पयोधर से चिपका
रहता है। बिना प्रयास दुग्ध पान करता रहता है।
ठीक इसी प्रकार काश्मीर में जलधारा चारो ओर
शैल श्रृंग से स्रवित होकर बिना प्रयास काश्मीर
की प्यास बुझाती रहती है।
कुक्षि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में अनेक काव्यो
में महान् भारतीय साहित्यकारों ने किया है।
अश्वघोष ने कपिलवस्तु नगर को—'कुक्षिः हिमद्रि-
रिरिव' कहा है (१ ३५२:३५५)। ऋग्वेद में—
'कुक्षि सोम पातमा.'—कोख के लिये कुक्षि शब्द
का प्रयोग किया गया है ( १:८.७)। अथर्ववेद

१:८:७ तथा ७ ९:१२, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:३८)
में कुक्षिका का अर्थ भरा पूरा, रक्षित होना, किया
गया है। ऋग्वेद (२:११:११) तथा १०:८६:१४,
अथर्व वेद २:५:४,२:३३:४, ४:१६:३, ९:५:६०
या ६०१, १०:९:१७ एवं ऋग्वेद में एक स्थान
पर और कुक्षि का प्रयोग मिलता है। 'इय कुक्षयः
सोम धानाः' अर्थात् दूध के समान कुक्षियाँ सोम
गाधन हैं (३.३६:८)।
रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने कुक्षि शब्द
का प्रयोग दरी अर्थ में किया है—'पुंनाग गहनं
कुक्षि बहुलोदालकाकुलम्।' वाल्मीकि रामायण,
किष्किन्ध्या काण्ड ४२:७।
हिमाद्रि कुक्षि शब्द का प्रयोग बड़े अच्छे
ढंग से नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी में किया
गया है। इसमें हिम बर्फ के लिये और अद्रि शैल के
लिये व्यवहृत किया गया है। हिमाद्रि का अर्थ
होता है बर्फ का पहाड़। कुक्षि का अर्थ कोख है।
महाभारत में सागर तट के देशों के लिये भी
कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—'ततः
सागरकुक्षिस्थान···' सभापर्व ३२:१६। अतः
हिमालय शैल की कोख में स्थित प्रदेश काश्मीर है।
इसका संकेत हिमाद्रि कुक्षि शब्द करता है। हिमालय
के अंक में स्थित काश्मीर माता की कोख में शिशु
की तरह रक्षित है।
हिमाद्रि शब्द का प्रयोग विशाल किंवा विग्रहराज
(सन् १०५६-१०६४ ई०) 'चमन वंश' अजमेर तथा
शाकम्भरी के सम्बन्ध में किया गया है। (इण्डियन
एण्टीक्वेरी १९:२१५ अप्रकाशित)
हिमाद्रि शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये
नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनो ने किया है।

प्रथम तरङ्ग २५

प्राचीन काल में हिमालय का नाम, हिमवान्
हिमाचल, हिमवंत, हैमवत, हिम शैल, पर्वतराज,
नगाधिराज आदि था और आज भी है।
भारतवर्ष का एक नाम हैमवत वर्ष है। वह
हिमालय के नाम पर रखा गया है। हिमालय पर्वत
इस प्रकार वर्ष पर्वत है। हैमवत क्षेत्र को किन्नर
खण्ड भी कहीं-कहीं कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण
२:१५:३१, वायु पुराण ३४:२८)।
काश्मीर के साहित्य में हिमवंत शब्द का
प्रयोग हिमालय पर्वत के लिये किया गया है।
काश्मीर के उत्तर में उत्तरकुरुओं तथा मद्रो को
इसके मूल अर्थात् दक्षिण निवास करने का उल्लेख
है। हिमवंत शब्द में हिमालय की पर्वतमालाओं के
अतिरिक्त आधुनिक नामधारी कराकोरम (कृष्ण
गिरि), सुलेमान पहाड़ (धंजन पर्वत), हिंदू कुश
(निषध), अल्ताई (चंडीरण) या माल्यवान्
पर्वतमालाएँ आ जाती है। कराकुरम पर्वत के
पूर्वीय शैलबाहु को 'विद्युत्' पर्वत कहा जाता है।
सुलेमान पर्वत अर्थात् धंजन पर्वत के दक्षिणी भाग
को 'कीर्तहर' पर्वत कहते हैं। (हरिवंश पुराण:
१:१८ मत्स्य पुराण अ० १३, महाभारत वनपर्व
२५३:१३५, १०, ६९४, ६९५; सभापर्व
३:५८-६०)।
क्षुद्र हिमवंत पश्चिमी तथा महा हिमवंत
हिमालय की पूर्वीय पर्वतमालाओ के लिये व्यवहृत
किया गया है। विशेष द्रष्टव्य परिशिष्ट
'हिमालय' है।
२. सती सर—नीलमत पुराण में सतीसर का
निम्नलिखित उल्लेख मिलता है।
इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमे । ६२ ।
नौबन्धनम् इति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥41॥
कृतयुगे सदा काले व्यतीते तु मनुप्रदा । ६३ ।
विदधाति प्रजासर्गं यथापूर्वम् अरिन्दम ॥42॥
नौदेहन् सती देवी भूमिर् भवति पार्थिव । ६४ ।
यांस्त सु भूमीं भवति सरस् तु विमलोदकम् ॥43॥
षड्योजनायतम् रम्यं तदर्धेन च विस्तृतम् । ६५ ।
सतीदेशम् इति ख्यातं देवाक्रीडं मनोहरम् ॥44॥
आकाशम् इव गम्भीरं जलजैश् च विवर्जितम् ॥६६।
शीतलामलपानीयम् सर्वभूमिमनोहरम् ॥45॥
अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल । ६७ ।
मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥46॥

अबुल फजल सतीसर को उमासर कहता है—
काश्मीर पेश अज अग्रत सती सर नाम अस्त सती-
नाम ईजा अस्त व सर नाम ए होज कता।
फारस के लोग प्रायः हिंदू गाथा को मानते
हैं। इतिहासकार बयैउद्दीन बेयल अपवाद है। वह
कहता है 'आदम शरन दीप अर्थात् लंका से
काश्मीर में आये। सेथ के वंश में काश्मीर का
राज्य ११०० वर्ष रहा। हजरत सुलेमान ने काश्मीर
को आबाद किया। उसने अपने भतीजा इसोन को
काश्मीर का राजा बनाया।
'हिंदुओं ने राजा हरीमंद के नेतृत्व में काश्मीर
पर विजय प्राप्त की। उसका वंश जलप्लावन
तक राज्य करता रहा। जलप्लावन के पश्चात्
तुर्किस्तान की एक जाति काश्मीर में आकर आबाद
हो गयी।
'काश्मीर निवासियो को एकेश्वरवाद का
उपदेश हजरत मूसा ने दिया। वे काश्मीर की
भूमि पर दिवंगत हुए। उनकी मजार अथवा कब्र
काश्मीर में है। उसका अभी पता लगाना बाकी
है। कालांतर में काश्मीरियों ने हिंदुओं की
बुतपरस्ती स्वीकार कर ली। काश्मीरियो के
इस दोष के कारण काश्मीर में जलप्लावन
हुआ था।'
वाकयाते काश्मीर में उल्लेख है—'काश्मीर
प्रदेश जल से भरा था। दैत्य जलदेव वहाँ रहता
था। वह मनुष्यों को खाता था। आसपास जो कुछ
मिलता था, खा जाता था।' विस्तृत वर्णन जलोद्भव
के प्रसंग में किया गया है।

२६ राजतरङ्गिणी


सम्राट् अकबर के समय में प्रथम बार कश्मीर
पर कश्मीर के अतिरिक्त अन्य कश्मीर वंशीय
मुसलमान का राज्य स्थापित हुआ। सम्राट् अकबर
जिस समय कश्मीर पहुँचे, तो अबुलफजल को
कश्मीरियों ने एक पुस्तक, जिसका नाम 'राज-
तरंगिणी' था, समर्पित की। उसमें चार हजार वर्ष
पूर्व से कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखा था।
यह पुस्तक संस्कृत में थी। सम्राट् अकबर ने आदेश
दिया कि पुस्तक का फारसी में अनुवाद किया
जाय।
अबुल फजल अकबर का प्रियपात्र था। उसके
नवरत्नों में एक था। आइने अकबरी में एक
अध्याय सूबा कश्मीर पर लिखा गया है। वह
राजतरंगिणी तथा तत्कालीन स्थिति पर आधारित
है। मंत्री होने के कारण अबुल फजल साधनसंपन्न
था। उसका वर्णन साधिकारिक माना जायेगा।
वह लिखता है—
'इस इतिहास में कहा गया है कि कश्मीर का
अधिकांश भाग प्रारंभिक काल मे केवल उसके
पर्वतों को छोड़कर जलमग्न था। उसे सतीसर
कहते थे। सती महादेव की पत्नी है। सर का अर्थ
सरोवर अर्थात् जहाँ जल एकत्र रहता है, किया
जाता है।
'ब्रह्मा का एक दिन १४ मन्वन्तरों का होता है।
प्रत्येक मन्वन्तर में ७० कल्प होते हैं। सत्तर चतुर्युग
मिलकर एक कल्प होता है। यह वर्ष सम्राट् अकबर
के राज्य काल का चौदहवाँ वर्ष है। कश्मीर में
जिस समय आबादी हुई उसे बीते सातवें मन्वन्तर
का २७वां कल्प हैं। तीन युग २८वें मन्वन्तर का
बीत चुका है। चौथे युग का ४७०१वाँ सौर वर्ष
व्यतीत हो चुका है।'
वरनियर अपने नवें पत्र में लिखता है :
'प्राचीन काल में कश्मीर जल से भरा था। कश्यप
ने बारहमूला के पास जल बहने के लिये मार्ग
बनाया था। यह जहाँगीर काल के ऐतिहासिक
श्री हैदर मलिक वल्द हसन मल्लिक बिन मल्लिक
मुहम्मद नजी छदवराह [ १६१७-१६१९] के
इतिहास में मिलता है। छदवराह श्रीनगर के पास
एक गाँव है। वह कश्मीर का एक कुलीन था।
यह इतिहास प्राचीन काल से अकबर के कश्मीर
विजय तक का संक्षिप्त इतिहास है। उसका आधार
राजतरंगिणी है। बड़शाह जैनुलआवदीन की आज्ञा
पर इसका फारसी में अनुवाद किया गया था।
इसका नाम 'बहसुल असम्र' रखा गया था। सन्
१५९४ में बदायूंनी को अकबर ने आज्ञा दी थी कि
वह उसका अनुवाद करे।'
वरनियर लिखता है : 'निस्संदेह यह क्षेत्र कभी
जल से भरा था। थेसलो की भी पूर्व काल में यही
अवस्था थी। वह भी कभी जल से भरा था। किंतु
मैं यह नहीं विश्वास करता कि जहाँ काटकर जल
बहना (बारहमूला) बताया जाता है वहाँ पत्थर
काटा गया है। वह आदमी का काम नहीं हो
सकता। वह पर्वत बहुत ऊँचा है। मैं समझता हूँ
कि यहाँ पर्वत बैठ गया है। यह भूकंप के कारण
हुआ होगा। क्योंकि कश्मीर में भूकंप बहुत
आते हैं।'
सतीसर और काश्मीर—शुक ने चौथी राज-
तरंगिणी में काश्मीर को सतीसर कहा है। सतीसर
देश शब्द कश्मीर के लिए व्यवहृत होता रहा है।
शुक लिखता है—मिरजा हैदर मुहम्मद वाक्पटु
नौशेरवां के समान हैं। इस जगत् में पूर्वकालीन
राजाओं के उन कार्यों को कहने के लिए पैदा हुआ
है जो सतीसर में बहुत दिनों से बुरी हालत में
थे। (दत्त ३५१)
कश्मीर पर मुगलों के आक्रमणों की चर्चा
करते हुए पुनः लिखता है—इस प्रकार सतीसर देश
के पापियों पर वज्रपात हुआ। आकाश में धूमकेतु
निरन्तर पूर्व और पश्चिम दिखाई देने रहे।
(दत्त २७३)

प्रथम तरङ्ग २७
मुगलों के आक्रमण के पूर्व काश्मीर को सतीसर
कहा जाता था । मैं समझता हूँ । सतीसर शब्द
काश्मीर उपत्यका के लिए प्रयुक्त होता रहा है।
इसमें वह भूखण्ड आता है जो कभी जल मग्न था ।
बारहमूला से वीर नाग तक का भूखण्ड वास्तव, में
सतीसर था । अतएव काश्मीर मण्डल, काश्मीर
राज्य तथा सतीसर शब्दों के अर्थ में भिन्नता है ।
काश्मीर मण्डल और काश्मीर राज्य के अन्दर
सतीसर देश किंवा भूखण्ड का समावेश हो
जाता है । सतीसर में काश्मीर मण्डल अथवा
काश्मीर राज्य का समावेश नही होता । सतीसर
काश्मीर मण्डल अथवा राज्य का एक भूखण्ड
था ।
क्षेमेन्द्र ने लोक प्रकाश में तीन स्थानों पर सती
सर का उल्लेख किया है । उससे मेरे मत की पुष्टि
होती है :
श्रीमत्सतीसरासा शारिकाशैलभूषितम् ।
श्रीजैननगरादस्मान्नानोपवनविभूषितम् ॥ २ ॥
अस्ति त्रिभुवनाख्या मुत्तमं भूषणं भुवः ।
श्रीकश्मीरपुरं रम्यं नानोपवनशोभितम् ॥३॥
( पृष्ठ ३४ )
सतीसर में शारिका शैल, जैन नगर, तथा
काश्मीर पुरं का उल्लेख किया गया है । शारिका
पर्वत सूखे सतीसर में है । जिस समय सतीसर में
जल भरा था उस समय द्वीप की तरह इसका शिखर
दिखाई पड़ता था । सतीसर के जल की गहराई
३०० से ४०० फीट तक थी । इस पर अकबर द्वारा
निर्मित दुर्ग आज वर्तमान है । जैन नगरो का उल्लेख
जोनराज श्रीवर तथा शुक की राजतरंगिणियों में है ।
( दत्त ४७, १३१, १३८, २०६, ३७१ )
कश्मीर पुर शब्द यहाँ श्रीनगर किंवा प्रवरसेनपुर
के लिये आया है । श्रीनगर शब्द लोग भूल गये थे ।
कश्मीर पुर शब्द श्रीनगर के लिए व्यवहृत होने लगा
था । प्रवरसेनपुर का भी उल्लेख लोक प्रकाश (पृष्ठ
३५) मे किया गया है । श्रीनगर शब्द का उल्लेख
जोनराज, श्रीवर और शुक की राज तरंगिणियों में
प्रायः, नही मिलता है । प्रवर पुर ( द० २८, २०१,
४२६ ) तथा प्रवरेश पुर का ( द० २३२ ) उल्लेख
मिलता है ।
लोक प्रकाश में पृष्ठ ६० पर पुनः सतीसर का
उल्लेख किया गया है :
त्रिविष्टपस्य सारं तत्पार्थिवं क्षेत्रमीश्वरम् ।
तत्रापि सारं हिमवांस्तत्र सारं सतीसरः ॥२॥
सतीसर और काश्मीर मण्डल में स्पष्ट भेद किया
गया है :
मनुवारजभित्यूचुः पूतनात्मकध्यते किल ।
सतीसरसि ग्रामाणां यत्प्रमाणमुदीरितम् ।
षष्टियामसहस्राणि षष्टिग्रामशतानि च ।
षष्टियामस्त्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥३॥
शुक की चौथी और अन्तिम राजतरंगिणी है ।
जिसे शुक काश्मीरी पंडित ने प्राचीन शैली पर
लिखा है । तत्पश्चात् काश्मीर में पुरानी शैली पर
संस्कृत में इतिहास लिखने की परम्परा लोप हो
गयी । मुगल शासन के साथ मुसलमान लेखको का
काल आता है । उन्होने परसियन अर्थात् फारसी मे
अधिकतर लिखा है । काश्मीरी पण्डित भी फारसी
में विद्वत्ता प्राप्त कर, प्रथम फारसी में लिखे
तत्पश्चात् उर्दू में और अब अग्रेजो में लिखने
लगे है ।
जनरल ए. कनिंघम भूगर्भीय चिन्हो के
अध्ययन से इसो परिणाम पर पहुँचे है कि काश्मीर
उपत्यका जल से भरी थी । वे लिखते हैं :
'एक पर्वतीय चट्टान ( बिलफ़ ) तन्तमूल तथा
बारहमूला के १६ मील अधोभाग में समकोण बनाती
झेलम नदी से ऊपर उठी है । उसको ऊँचाई करीब
३ या ४ सो फीट होगी । कुछ स्थानो पर मैने देखा

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प्रथम तरङ्ग २९


महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से
निकली हैं। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः
अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों
की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय
बारहमूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान
पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे
जल के अवरोध अलोड़ मिट्टी (एल्लूवियन) के
जमा होने में सहायक हुए जोकि बाड़ों के कारण
पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने
से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी
भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका
में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन
बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली
अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे
अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ
जल रोकने वाले बारहमूला के पास वाले व्यवधानों
को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण
कुछ भागों में मिलता है जहाँ कि चूने के पत्थरों पर
क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के
कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय
बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर
नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह
झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और
झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका
के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और
इस प्रकार वहाँ बारहमूला पास के बचे हुये पानी
रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी
गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि
हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए
देखते हैं। चारो तरफ के पर्वतों से आता हुआ
बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता
है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप
बनने नहीं देता।" ट्रॅवेल इन काश्मीर—७१-७३

कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं
सन् १९६४ में जाकर देखा। बामजू की गुफा के
अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग
२१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो
जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस
गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खों के छाता की
तरह जल टपकने से छत बन गयी हैं। एण्डरू
विलगन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों
की हड्डियाँ पड़ी थीं। मालूम होता है मन्दिर के
दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया
था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है।
यहा पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर
भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम
के तर्क की पुष्टि होती है।

पामपुर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति
खड़ा हो जाय तो उसे चारो ओर ऊँचा पर्वत
मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यहाँ केसर
होती है। बनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा
के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट
स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का
स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा
करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।

गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर
में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के
लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में
ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में
यह बात थी। मैने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की
बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया।
श्री खजाची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय
वहाँ टेस्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैने ध्यान
आकर्षित कराया। मैने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर-
मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया
है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े
चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में
कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान
पर प्रकट होता है।

३८ राजतरङ्गिणी १

है कि पर्वतीय चट्टानें ८ सो फीट ऊँचाई से कम नहीं
हैं । तन्तमूल के समीप झेलम समुद्र की सतह से ५
हजार फीट ऊंचाई पर है । समस्त काश्मीर उपत्यका
जलमय रही होगी । जब तक वह चट्टान घिसकर
पतली नहीं हो गई होगी । काश्मीर की झील का
जल स्तर समुद्र की सतह से ५८०० फीट ऊँचा है ।
उपत्यका में इस समय तक के बचे करेवा और
बिखरी एलूवियल (कछारी) समतल भूमि से ५०
या १०० फीट ऊंचाई पर जल रहा होगा । भारतण्ड
की ऊँची भूमि जल के नीचे नहीं रही होगी । वामजू
की गुफा के चूने के पत्थरो के चट्टान के ऊपर समयर
तटवर्ती पानी की सतह का चिह्न स्पष्ट दिखाई देता
है । इसी प्रकार वामन के पवित्र जलस्रोत के ऊपर
इस प्रकार के चिह्न दिखाई देते हैं । शुपियान नदी
पर स्थित रामू के सराय के ऊपर करेवा एक
किनारा बनाता है । उसको ऊंचाई १०० फीट है ।
उसके क्षैतिज परतो में विभिन्नता है । सबसे ऊँचाई
पर २० फीट की जमीन एलूवियल है । उसके
पश्चात् २० फिट का परत गोले-गोले पत्थरो और
भुरभुरी मिट्टी का बना है । सबसे नीचे का परत
कड़ी नीली मिट्टी का है । यह परत निश्चय ही झील
के जल की निश्चल स्थिति के कारण बन गया
होगा । किन्तु मध्यवर्ती मिट्टी की परत उस समय
बनी होगी जब उपत्यका का जड़ बड़े वेग के साथ
तन्तमूल के नीचे वाली चट्टान के अवरोध के हट
जाने के कारण निकला होगा । यह जणावरोध
चट्टान के अकस्मात् टूट जाने के कारण हुआ होगा ।
सबसे ऊपर की मिट्टी उस समय जमी होगी जबकि
पानी घटता-घटता अपनी वर्तमान स्थिति पर आ
गया होगा । तत्पश्चात् चट्टान का अवरोध अथवा
पानी रोकने वाली पथरीली नदी का नदीगर्त क्रमशः
जल प्रवाह के कारण घिसता-घिसता क्षीण हो गया
होगा तो विभिन्न नदियों ने झील के पुराने गर्त में
नवीन धाराओं में अपने को परिणत कर लिया
होगा । जब तक कि मोनार, पामपुर तथा खानपुर
के करवा घटते पानी के कारण द्वीप तुल्य लगते
होंगे । और कालान्तर में लम्बे चोपटे शिखरीय
पहाड़ियों के रूप में खुले मैदान में रह गये जैसे आज
दिखाई पड़ते है ।' (लद्दार)
डब्लू वेकफील्ड लिखते हैं : कोई प्रामाणिक
प्रमाण इस बात का नहीं मिलता कि काश्मीर
उपत्यका झील से अकस्मात् अपनी वर्तमान दशा में
किस समय परिवर्तित हो गयी है जैसा कि आज
दिखाई देती है । न तो हमे यह प्रमाण मिलता है
कि यह झील कब सूख गयी । अथवा यह प्रक्रिया
बारहमूला दर्रा के समीप हठात् एक मार्ग बन
जाने के कारण हो गया अथवा इसका पानी
कालान्तर में निकलता गया ।' (हैप्पी वैली
६९, ६०)
वाइन के इस सिद्धान्त पर कि वह कभी
समुद्री जल की झील थी और समुद्र का पानी
निकल जाने पर प्राकृतिक मीठे पानी के झरनों के
कारण नमकीन जल समाप्त होकर काश्मीर उपत्यका
ने वर्तमान रूप प्राप्त किया है, वेकफील्ड लिखता है-
इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि उपत्यका
का जल हठात् बाहर निकल गया और उसने वह
रूप प्राप्त कर लिया है जिसे हम आज देखते हैं ।
बातो की जाँच करने और जैसा कि एक योग्य
भूगर्भ-शास्त्रीय करता है । बात उल्टी साबित होती
है । वाइन ने उन्हें स्वय सम्मुख रखा है । वह योग्य
तथा निपुण पर्यवेक्षक था । वह यहाँ के
निवासियो की परम्परा में विश्वास करता है कि
उपत्यका अपने मूल रूप में ३०० या ४०० फीट
गहरी झील थी । किन्तु वह कहता है कि समय
प्रभाव के कारण पानी बहकर बाहर निकल गया ।
अपने पर्यवेक्षण में वह इस नतीजे पर आगया है कि
यहाँ गहरी हरी अथवा बादामी चट्टानो की पहाड़ियों
को जो काश्मीर के चारो तरफ है वे विशाल

प्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से
निकली है। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः
अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों
की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय
बारहकूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान
पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे
जल के अवरोध अलोढ़ मिट्टी (एल्लूवियन) के
जमा होने में सहायक हुए जोकि बाढ़ों के कारण
पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने
से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी
भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका
में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन
बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली
अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे
अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ
जल रोकने वाले बारहकूला के पास वाले व्यवधानों
को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण
कुछ भागों में मिलता है जहां कि चूने के पत्थरों पर
क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के
कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय
बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर
नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह
झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और
झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका
के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और
इस प्रकार वहाँ बारहकूला पास के बचे हुये पानी
रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी
गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि
हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए
देखते हैं। चारों तरफ के पर्वतों से आता हुआ
बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता
है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप
बनने नहीं देता।” ट्रेवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं
सन् १९६४ में जाकर देखा। पामपूर की गुफा के

अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग
२१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो
जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस
गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खी के छाता की
तरह जल टपकने से छत बन गयी है। एण्डरू
विलसन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों
की हड्डियाँ पड़ी थी। मालूम होता है मन्दिर के
दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया
था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है।
यहाँ पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर
भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम
के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपूर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति
खड़ा हो जाय तो उसे चारों ओर ऊँचा पर्वत
मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यही वेसर
होती है। वनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा
के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट
स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का
स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा
करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर
में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के
लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में
ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में
यह बात थी। मैंने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की
बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया।
श्री खजांची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय
वहाँ टेण्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैंने ध्यान
आकर्षित कराया। मैंने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर-
मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया
है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े
चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में
कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान
पर प्रकट होता है।

२० राजतरङ्गिणी
अथ वैवस्वतोऽस्मिन् प्राप्ते मन्वन्तरे सुरान्।
द्रुहिणोपेन्द्ररुद्रादीनवतार्य प्रजासृजा ॥ २६ ॥
२६ वैवस्वत मन्वन्तर¹ का प्रारम्भ था। सतीसर में जलोद्भव असुर निवास करता था
प्रजापात कश्यप ने द्रुहिण, उपेन्द्र, रुद्र से प्रार्थना की। देवताओं के साथ जलोद्भव
वध निमित्त उतरे।
वूलर लेक काश्मीर उपत्यका का सबसे निचला मत्स्य पुराण विष्णु पुराण नीलमत पुराण
स्थान और पूर्व सतीसर का अवशेष समुद्र की सतह १. स्वायंभुव " १. स्वायंभुव
से ५१८७ फीट ऊँचा है। श्रीनगर ५२३५ फीट २. स्वारोचिष " २. स्वारोचिष
समुद्र की सतह से ऊँचा है। बावन जिसके समीप ३. उत्तम, औत्तम " ३. औत्तम
वामजू गुफा है वह भूमि समुद्र की सतह से ५८१६ ४. तामस " ४. तामस
फीट ऊँचा है। अवन्तीपुर तथा बिज बेहरा अर्थात् ५. रैवत " ५. रैवत
विजयेश्वर ५४०० फीट समुद्र की सतह से ऊँचा ६. चाक्षुष " ६. चाक्षुष
है। श्रीनगर तथा अवन्तीपुर और बिज बेहरा के ७. वैवस्वत " ७. वैवस्वत
बीच अनेक करेवा तथा पामपुर हैं। इस प्रकार यह ८. सावर्णि " ८. अर्क सावर्णि
स्पष्ट है कि जिस समय काश्मीर उपत्यका में जल ९. दक्ष सावर्णि रुचि ९. ब्रह्म सावर्णि
भरा होगा उस समय वामजू पामपुर आदि जो वूलर १०. ब्रह्म सावर्णि भौम १०. भद्राश्व (रुद्रेन)
लेक की सतह से ऊँचाई पर हैं सर के तट होगी। दोनों पाठ हैं)
वहाँ पर पानी का चिह्न बन जाना स्वाभाविक है। ११. धर्म सावर्णि ११. दक्ष सावर्णि
१२. रुद्र पुत्र सावर्णि १२. रौच्य
काश्मीर में सन् १५५२, १६८०, जून २६ १३. देव सावर्णि १३. भौत्य
सन् १८२८ तथा सन् १८८५ में भयंकर भूकंप १४. इन्द्र सावर्णि
आया था। सन् १८८५ के भूकंप से १३०,००० नीलमत में भूतकालीन छः तथा वर्तमान सातव
वर्ग मील क्षेत्र प्रभावित हुआ था। लगभग ५०० मनु वैवस्वत का नाम मिलता है परन्तु भविष्य के
वर्ग मील में तो महाभयंकर विनाश हुआ था। मनुओ के नामो में भिन्नता है •
लगभग २०,००० मकान, १०,००० जानवर, कालकल्पावुभौ पूज्यौ मनवश्च चतुर्दश।
३००० मनुष्य, मर गये थे। बारहमूला में सबसे अतीताश्च भविष्याश्च तेषाम् नामानि मे शृणु ॥
भयानक असर हुआ था। वहाँ एक किला, यात्री —५६४/ ६०
निवास तथा शहर के लगभग तीन चौथाई मकान स्वायंभुवो मनुः पूर्वम् मनुः स्वारोचिषस्तथा।
नष्ट हो गये थे। द्यौत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥
—५६१/६९१
पादटिप्पणियाँ : वैवस्वतोऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्ण्य एव च।
२६ (१) वैवस्वत मन्वन्तर—नीलमत पुराण भद्रेश दक्ष सावर्णी रौच्य भौतस्तथैव च ॥
तथा अन्य पुराणों में वर्णित मनुओ के नाम तथा —५70/६९२
तालिका में अंतर है— संपूजनीया देवेन्द्रस्तथा मन्वन्तरानुदश।
—571/६९३

प्रथम तरङ्ग ३१
भागवत पुराण : ३:१:५२-५६, ५:१.२२,
८:१:१९, ८:१:२३, २७, ८:५:२, १३:१०,
११, १८, २४, २७, ३०, ३३, ८.७:५
ब्रह्माण्ड पुराण : २:१४.४, वायु पुराण : ६२,
मनुस्मृति : १:६१-६३, विष्णु पुराण : ३:२-३
ऋग्वेद : १:८०:१६, २:३३:१३, ८:३०:३,
८:६३:१, ८:५१:१, १०:१००:५
तैत्तिरीय संहिता १:५:१:३ शतपथ ब्राह्मण
७:५.५:३, २:२:१०:२, २-··· ६०१, २:३:८:३
जैमिनो उपनिषद्
ब्राह्मण : ३:१५:१, ऐतरेय ब्राह्मण ५:१४:१:२
३:१:९:४, अथर्ववेद ८:१०:२४, ३:३:२:१
१४:२:४१
५:४:१०:५, पंचविश २३:१:६७।
नीलमत पुराण के अनुसार १२ सौर मास का
एक वर्ष होता है। दो मास का एक ऋतु, ६
ऋतुओं का एक अयन, २ अयनों का एक वर्ष और
४३२००० वर्षों का एक कलियुग होता है। कलियुग
का दूना (८६४००० वर्ष) द्वापर, कलियुग का
तिगुना (१२९६०००) त्रेता काल और चौगुना
(१७२८००० वर्ष) सतयुग किंवा कृत युग काल
होता है। एक मन्वंतर ७१ चतुर्युगों का होता है।
मन्वंतर के अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है। सब
कुछ जलमय हो जाता है। युग का प्रमाण
४३२००० वर्ष तथा मन्वंतर का प्रमाण १७२८०००
वर्ष है। केवल हिमालय, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत,
शृङ्गवान्, गंधमादन, मेरु, माल्यवान्, महेन्द्र, मलय,
सह्य, शक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य, पारियात्र का नाश
नहीं होता। जम्बूद्वीप का सर्वथा विनाश हो जाता है।
प्रलय के पश्चात् स्वयं महादेव जल स्वरूप
स्थित रहते हैं। देवीसती एक नाव का रूप तत्काल
धारण कर लेती हैं।। मनु उस नाव पर सर्व प्रकार
के बीज रख देते हैं। मत्स्य रूप धारण कर विष्णु
उस नाव को एक शृङ्ग की ओर खींच लाते हैं।
उसे पर्वत के मस्तक पर लाकर बांध देते हैं। वह
पर्वत शिखर काश्मीर की पश्चिम दिशा में स्थित
नौबंधन शिखर है। शिखर पुण्यदायक है। पाप
तथा भय को हरता है। कृतयुग के इतना समय
बीत जाने पर मनु पुनः प्रजावर्ग की यथापूर्व रचना
आरम्भ करते हैं।
नावस्वरूप देह धारण की हुई सती देवी
स्वयं भूमि का रूप धारण करती है। छः योजन
लम्बा तथा ३ योजन चौड़ा रम्य विमलोदक
सर बन जाता है। यहाँ देवगण मनोहर
क्रीड़ा करते हैं। इस देश की ख्याति सती देश
(काश्मीर) हो जाती है। जलजो से विवर्जित शीतल
अमल जलपूर्ण देश की सब भूमि मनोहर हो जाती
है। वैवस्वत मन्वंतर के आरंभ में दक्ष अपनी १३
कन्याओं का विवाह मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि
से कर देते हैं। नीलमत पुराण ५०-६७ (ब्रीज)
३३-५५ .(जादू)। नौबंधन तीर्थ का शतपथ
ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है १:८:१:१।
बाइबिल में जलप्लावन किंवा जलप्रलय तथा
नाव और उस पर सब प्रकार के बीज तथा सब
प्रकार के प्राणियो का एक जोड़ा रखने का वर्णन
मिलता है। उस नाव को 'हज़रत नूह का आर्क'
कहते हैं। वह पर्वत शिखर पर जाकर रुक जाती है।
कुरान शरीफ और बाइबिल मे यह गाथा दी
गयी है।
हिमालय और हेमकूट :
प्रलय काल मे हिमालय तथा हेमकूट पर्वतो के
बच जाने की बात नीलमत पुराण मानता है।
हिमालय तथा हेमकूट दो भिन्न-भिन्न पर्वत माने गए
हैं। हेमकूट पर्वत हिमालय के दक्षिण में है। बाण ने
हर्षचरित के अध्याय ७ में कहा है कि अर्जुन ने
राजसूय यज्ञ के समय हेमकूट पर अधिकार किया
था। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अध्याय में
हेमकूट, तथा हेमकूट शिखर का उल्लेख आया है।

३२ राजतरंगिणी
यहाँ पर हिमालय के लिये उसरा प्रयोग किया गया चारों युगों के महायुग का काल ४३२००००
है । हेमकूट क्षेत्र को पुरुष वर्ष तथा हिमवत् क्षेत्र को सौर वर्ष है । ब्रह्मा का एक दिन एक सहस्र महायुगों
किन्नर खंड कहा गया है । किन्नर खंड आधुनिक का होता है । इस एक दिन को १ कल्प कहते हैं ।
हिमालय प्रदेशका किन्नौर-मंडल है । किम्पुरुष एक सत्युग का समय मान १७,२८,००० सौर वर्ष है ।
वर्ष है । इसे हिमालय के दूसरी तरफ पुराणों के त्रेता का समय मान १२, ९६,००० सौर वर्ष है ।
अनुसार मानते हैं । द्वापर का मान वर्ष ८,६४,००० वर्ष है । कलियुग
का ४, ३२,००० मान वर्ष है । सृष्टि वर्ष का आदि-
( भागवत पुराण ५:१९; मत्स्य पुराण ११३:२९,
काल आज से ७, १४, ४०,४१,४६,२५६ वर्ष पूर्व
११४:५९;६३-६५, १२१:४९, वायु पुराण ३४.२८,
हुआ है ।
विष्णु पुराण २:२;१२ ।)
ब्रह्मा की एक सहस्र वर्ष आयु जितनी विष्णु की
किम्पुरुष प्रियव्रत का पौत्र और आग्नीध्र के नव
एक घड़ी होती है । बारह लाख विष्णुओ की आयु
पुत्रों में एक था । आग्नीध्र ने अपने पुत्रों के लिये
के जितनी, रुद्र की आधी कला होती है । रुद्र की
जम्बू द्वीप के वर्षों को विभाजित किया था । ( विष्णु
एक अर्बुद आयु के काल का समय अक्षर ब्रह्म का
पुराण २ १:१७ तथा १९ ) । किम्पुरुष वर्ष को उसने
समय होता है ।
अपने पुत्र हेमकूट को दिया था । किम्पुरुष-वर्ष का
राजा द्रुम्न था । कृष्ण तथा जरासंध के संघर्ष में मनुस्मृति के अनुसार कालपरिमाण में १८ निमेष
द्रुम्न ने जरासंध का पक्ष लेकर कृष्ण के विपक्ष में की एक काष्ठा; तीस काष्ठाओं की एक कला; तीस
युद्ध किया था । जरासंध ने गोमन्त आक्रमण के समय कलाओं का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र
पश्चिम पार्श्व में आक्रमणार्थ द्रुम्न को नियुक्त किया होता है । अहोरात्र का विभाग सूर्य के उदय अस्त के
था । भागवत पुराण ( १:६:१२ तथा १०:५२:११ ) कारण होता है । मानव के दो पक्ष पितरों का एक
के अनुसार परीक्षित ने उत्तर के देशों के विजय काल अहोरात्र होता है । कृष्ण पक्ष पित्रो के कर्म करने
में किम्पुरुष देश को जीता था । तथा शुक्लपक्ष शयन निमित्त है । इसी प्रकार भूतों
वैदिक साहित्य में किम्पुरुष के लिये घृणास्पद अर्थात् प्राणियों के लिये दिन चेष्टा तथा रात्रि शयन
शब्दों का प्रयोग किया गया है । कुछ विद्वानों ने निमित्त निश्चित किया गया है ।
इन्हें जंगली, कुत्सित तथा कहीं बंदरों जैसे मनुष्यों
मानव का एक वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र
की नकल करने वाला कहा है । ( ऐतरेय ब्राह्मण
होता है । उत्तरायण देवताओं की चेष्टा तथा दक्षिणा-
२:८, शतपथ ब्राह्मण १:२:३:९ तथा ७:५:२:३२;
यन रात्रिकाल माना जाता है । चालीस हजार वर्ष
ऐतरेय ब्राह्मण ३:१:१२.१ ।)
का सत्युग होता है । चार सहस्र वर्षों की संध्या
जगत् सृजन कर्ता ब्रह्मा है । उनकी आयु १०० तथा संध्यांश होता है । त्रेतायुग तीन सहस्र वर्षों का
वर्षों की है । पूर्वार्द्ध काल ब्रह्मा का व्यतीत हो चुका होता है । तीन सौ वर्षों की संध्या तथा संध्यांश
है । अर्थात् अपने जीवन का ५० वर्ष वे व्यतीत कर होता है । द्वापर दो सहस्र वर्षों का होता है । दो
चुके हैं । ब्रह्मा के उत्तरार्द्ध काल के चारों महायुगों सौ वर्षों का संध्यांश होता है । कलियुग एक सहस्र
के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन की ३ घड़ी वर्षों का होता है । एक सौ वर्षों की संध्या तथा
तथा ४२ पल अब तक बीत चुका है । संध्यांश होता है ।
४

प्रथम तरङ्ग ३३
―― चारों युग मिलकर देवताओं का एक युग होता
है। देवताओं के सहस्र युग मिलकर ब्रह्मा का एक
दिन होता है। सहस्र युगों की एक रात्रि होती है।
इस प्रकार देवताओं के एक सहस्र वर्ष दिन तथा
रात्रि मिलकर ब्रह्मा का अहोरात्र होता है। देवताओं
के इकहत्तर गुने वर्षों का एक मन्वंतर होता है
(मनुस्मृति १:६४-७६) ।
इस समय श्वेत वाराह कल्प के छः मन्वंतर
बीत चुके हैं। राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में
इसी ओर संकेत किया गया है। सातवाँ वैवस्वत
मन्वंतर चल रहा है। उसके २८वें महायुग के
कलियुग का प्रथम चरण संधि में है। कार्तिक शुक्ल
६ के प्रथम प्रहर में श्रवण नक्षत्र, वृद्धियोग में सत्युग
का जन्म हुआ था। सत्युग में, (१) मत्स्य (२)
कच्छप, (३) वाराह और (४) नृसिंह अवतार
हुए हैं।
वैशाख शुक्ल तृतीया सोमवार को रोहिणी नक्षत्र,
शोभन योग के द्वितीय प्रहर में त्रेता की उत्पत्ति हुई
है। त्रेता में (१) वामन, (२) परशुराम एवं (३)
रामचन्द्र के अवतार हुए हैं।
माघ कृष्ण अमावस्या, शुक्रवार को धनिष्ठा
नक्षत्र, परिघ योग; वृष लग्न में द्वापर की उत्पत्ति
हुई है। इसमें (१) कृष्ण तथा (२) बुद्ध दो अवतार
हुए हैं।
भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, रविवार, अश्लेषा नक्षत्र,
व्यतीपात योग में अर्धरात्रि काल के मिथुन लग्न में
कलियुग का जन्म हुआ है। विष्णु पुराण (अंश ४
अध्याय २४, श्लोक ११०-११३) के अनुसार
भगवान् कृष्ण के स्वर्गारोहण के दिन से कलियुग
आरम्भ होता है। कृष्ण के स्वर्गारोहण के साथ ही
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ राज्यत्याग किया
था। इस युग में केवल कल्कि नामक एक अवतार
होगा। कलिगताब्द संवत् इस समय ५०६८ तथा
काश्मीर का सप्तर्षि संवत् ५०४३ तथा विक्रम
संवत् २०२४ तथा शक संवत् १८८६ तथा सन्
१६६७ ई०; हिजरी सन् १३८६-८७ और फसली
सन् १३७४-७५ है।
इस सनातन तथा प्रचलित संवत्सर गणना के
अनुसार द्वापर में कृष्ण का अवतार ग्रहण करना ठीक
बैठ जाता है। भगवान बुद्ध का समय २५०० वर्ष
ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। यह अवतार
द्वापर काल में नहीं पड़कर कलियुग में पड़ता है।
नीलमत पुराण ने बुद्ध को एक अवतार माना
है। एक विचित्र पहेली है। ज्योतिषियों का इसका
समाधान करना आवश्यक है। नीलमत पुराण में
बुद्धपूजा का वर्णन है। बुद्ध को भगवान् का अवतार
माना गया है।
विश्रादैत्यो जगन्नाथ प्राप्ते ब्रह्मन् कलियुगे ।
अष्टाविंशतिमे भाविबुद्धोनाम जगद्गुरुः ॥८०६॥
शास्त्रीय धारणा के अनुसार इस मन्वंतर के
अवतार बुद्ध नहीं वामन हैं। सप्तर्षि : (१) अत्रि (२)
कश्यप (३) गौतम (४) जमदग्नि (५) भरद्वाज (६)
वशिष्ठ (७) विश्वामित्र है।
वैवस्वत मन्वंतर के देवगण-१० अंगिरस, २
अश्विनी, १२ आदित्य, १० भृगुदेव, ४६ मरुत, ११
रुद्र, ८ वसु, १० विश्वेदेव और १२ साध्य हैं।
इस मन्वंतर के इंद्र का नाम-उर्ध्वस्विन्,
किंवा महाबल है।
मनु के पुत्र; अरिष्ठ, इक्ष्वाकु, इल, करुष, कुश-
नाभ, घृष्ट, नभ, नृग, पृषध्र, प्राशु, वसुमति तथा
शर्याति हैं।
काश्मीर किंवा कश्मीर
काश्मीर किंवा कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति के
विषय में अनेक मत हैं। सनातन मत है। कश्यप
ऋषि ने सतीसर को सूख जाने पर आबाद किया
था। सतीसर का नाम कश्यपपुर पड़ गया। कश्यपपुर
का अपभ्रंश कश्मीर किंवा काश्मीर शब्द है।
५

३४ राजतरङ्गिणी

पुर, नगर, पत्तन तथा क्षेत्र शब्दो के अर्थों में
अन्तर है । नगर तथा पत्तन शहरी क्षेत्र का द्योतक
है । किसी संज्ञा के अन्त में जोड़ देने पर नगर
किंवा पत्तन स्थान विशेष का परिचायक होता है ।
पुर शब्द इससे भिन्न है । किसी व्यक्ति वाचक संज्ञा
के साथ पुर जोड़ा जाता है । किसी स्थान को बसाने
वाले व्यक्ति के साथ पुर शब्द जोड़ कर बसाने
वाले की स्मृति चिरस्थायी की जाती है । काश्मीर
में अवन्तीपुर, शूरपुर, जयपुर, प्रवरसेनपुर,
जोनपुर, प्रतापपुर, हिरण्यपुर, कनिष्कपुर, जुष्कपुर,
शिवपुरी, ब्रह्मपुरी, विष्णुपुरी, अभिमन्युपुर,
आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । श्रीनगर
किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं बसाया गया
था । उसका नाम श्रीनगर पड़ा । परन्तु श्रीनगर
में ही प्रवरसेन ने नगर बसाया तो उसका नाम
प्रवरसेनपुर हो गया । नागरिक शब्द देशीय किंवा
राष्ट्रीयता का बोधक है । सम्पूर्ण देश के व्यक्तियों
के लिए नागरिक शब्द व्यवहृत होता है । पौरजन
किंवा पौर शब्द स्थानीय निवास स्थान का
परिचायक है । वह किसी एक नगर में रहने की ओर
संकेत करता है । नागरिक शब्द का समावेश अंग्रेजी
सिटिजन शब्द में हो जाता है । काश्मीर में पुर शब्द
व्यक्ति विशेष के नाम के साथ जोड़कर नगर वाचक
बना दिया जाता था । आजकल पुर के स्थान पर
व्यक्तियो के साथ नगर शब्द जोड़ने की प्रथा चल
निकली है जैसे—टाटानगर, मोदीनगर गंगानगर,
सरदारनगर आदि ।
पत्तन शब्द नगर तथा शहर के लिए प्रयुक्त
किया जाता है । यह शब्द नदी तथा समुद्रतटीय
नगर तथा बन्दरगाहो के लिये विशेष रूप से व्यवहृत
हुआ है । पत्तन व्यापार का केन्द्र होता है ।
विशाखा पत्तन, मछली पत्तन आदि इसके उदाहरण
है । समुद्र तटीय नगरों के अतिरिक्त अन्य स्थानों के
नगरों के लिए नगर अर्थ में पत्तन शब्द का बहुत
कम व्यवहार किया गया है ।

चाणक्य पत्तन शब्द की यही परिभाषा देता है—
वारिस्थल पथ पत्तनानि च निवेशयेत् । (अध्यक्षप्रचार
द्वितीय अधिकरण १ अध्याय १ प्रकरण १९)
क्षेत्र शब्द का अपभ्रंश खेत शब्द है । अन्नोत्पा-
दक भूमि, समतल भूमि, उत्पत्ति स्थान, प्रदेश तथा
तथा तीर्थ स्थान के लिए क्षेत्र शब्द का व्यवहार
किया गया है। क्षेत्र भूखण्ड विशेष की निर्धारित
सीमा के लिए आता है । क्षेत्र के अन्तर्गत नगर, पुर,
पत्तन, ग्राम आदि सब आ जाते हैं । काश्मीर में
क्षेत्र शब्द तीर्थ स्थानों की सीमा के लिए व्यवहृत
किया गया है। वाराह क्षेत्र, मडव क्षेत्र, उत्तर मानस
क्षेत्र, विजयेश्वर क्षेत्र, नन्दिक्षेत्र, आदि इसके
उदाहरण हैं ।
कुछ विदेशी विद्वानो ने एक और मत प्रकट
किया है । 'कशप' नाम कश्यप ऋषि का है । 'मर'
शब्द का अर्थ 'मठ' है । 'कशपमर' प्राचीन नाम
था । कशपमर बिगड़ कर कश्मीर हो गया है ।
शुद्ध शाब्दिक अर्थ भी लगाया गया है । 'क'
का अर्थ जल है । 'समीर' का अर्थ वायु किंवा हवा
है । 'क' + 'समीर' दोनों शब्द मिलकर कसमीर हो
गया है। कश्मीर का जल-वायु सर्वश्रेष्ठ है । अपनी
जल वायु की उत्तमता के कारण भूखण्ड का नाम
कश्मीर पड गया है ।
और अर्थ लगाया गया है । वायु के कारण
जल सतीसर के बाहर निकल गया । अतएव भूखण्ड
का नाम कश्मीर पड़ गया ।
डा० सूफी ने एक मत का प्रतिपादन किया है ।
उनका मत है । 'कस' का अर्थ होता है धोत
'मीर' का 'अर्थ' पर्वत है । कश्मीर चारों ओर पर्वत
से घिरा है । कटोरा जैसा लगता है ।' इसलिए इस
भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया ।
कुछ विद्वानो ने कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति को
तोड़ मरोड़ कर एक विचित्र मत का प्रतिपादन
किया है । उनका मत है । 'कश' एक शामी अर्थात्

प्रथम तरङ्ग ३५
सेमेटिक जाति या ट्राइब थी। उस जाति ने 'कश'
नगर बसाया। यह नगर बुखारा में है। उसे अब
'शहर-ए-सब्ज' कहते हैं। वह दक्षिण, पश्चिम और
पूर्व दिशाओं में पर्वत से घिरा है। वह शहर सातवीं
शताब्दी में आबाद हुआ था। यहीं से काश्मीर में
सेमेटिक लोग आये। यहूदियों का काश्मीर में आबाद
होना सिद्ध होता है। हिन्दूराज काल में काश्मीर में
कोई बाहरी आबाद नहीं हो सकता था। यहूदी इसके
अपवाद थे। यहूदी सेमेटिक अर्थात् शामी जात है।
अतएव अनुमान लगाया गया है कि इसका नाम
'कश' के आधार पर कश्मीर पड़ गया।
उक्त वर्ग के लेखकों ने एक और अनुमान
लगाया है। 'काशान' या 'काशगर' शब्द का अपभ्रंश
कश्मीर हो गया। 'काशान' इराक में शहर है।
तेहरान से १५० मील तथा इस्फ़हान से ९० मील
ईशान दिशा में पड़ता है। देश भर में सबसे अधिक
यहाँ गरमी पड़ती है।
'काशगर' चीनी तुर्किस्तान में उसकी पश्चिमी
सीमान्त पर शहर है। काश्मीर के रहने वाले मुसल-
मान काश्मीर को 'कशीर' कहते हैं। स्थानीय मुस-
लिम जनता कश्मीर को 'कसीर' कहती है। इसलिए
कश्मीर शब्द को 'काशगर' 'काशान' तथा 'कश'
नगरों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। श्रीनगर
के स्थान पर कश्मीर शब्द श्रीनगर के लिए मुस्लिम
काल में प्रयुक्त होता रहा है। सिखों के काश्मीर में
आधिपत्य स्थापित हो जाने पर श्रीनगर और कश्मीर
समानार्थक माने जाते थे। उक्त तीनों शहर हैं।
श्रीनगर को कश्मीर कहा जाता था। अतएव
'कशीर' शब्द ही कश्मीर शब्द का मूल है।
श्री स्तीन ने कश्मीर शब्द का अपभ्रंश 'कशीर'
शब्द को माना है। उर्दू तथा फारसी में 'ब्राह्मण'
शब्द को 'बरहमन' अबतक लिखते हैं। इसी प्रकार
'कश्मीर' को अगर उर्दू तथा फारसी के लेखक
'कशीर' लिखने लगे हों तो कोई आश्चर्य की बात
नहीं मानी जा सकती है
जिस प्रकार मुसलमान होने पर पुराना नाम बद-
लकर मुस्लिम नाम रख दिया जाता है। उसी प्रकार
काश्मीर मुस्लिम बहुल आबादी तथा मुस्लिम राज
होने के कारण 'कश्मीर' के स्थान पर उसे 'कशीर'
और काश्मीरी भाषा को 'कौशुर' कहा जाने लगा।
इसी प्रकार १४ वीं शताब्दी में शाह हमदान
ने जो काश्मीर उपत्यका के रक्षक सन्त मुसलमानों
द्वारा माने जाते हैं। काश्मीर का नाम 'बाग-ए-
सुलेमान' रख दिया था। शंकराचार्य पर्वत का नाम
भी बदलकर 'तख्त-ए-सुलेमान' रखा गया। 'अनन्त'
नाग शहर का नाम इस्लामाबाद पड़ा। यद्यपि आज
भी अनन्त नाग एक जिला है।
'कश्मीर' या 'काश्मीर' शब्द महाभारत,
पुराणादि सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। उनका अस्तित्व
आज से ४ या ५ हजार वर्ष पूर्व था। उस समय
'बाइबिल' जिसमें 'हजरत सुलेमान' का नाम आता
है का अस्तित्व ही नहीं था। मुस्लिम काल का
इतिहास चौदह सदी से अधिक तथा बाइबिल काल
ईसा पूर्व २ हजार वर्ष से ऊपर नहीं जाता। कश्मीर
शब्द प्राचीन शब्द है। यही प्रचलित है। निश्चयात्मक
रूप से 'कश्यप' से इस शब्द को जोड़ना उचित
प्रतीत होता है।
· कम से कम २ हजार वर्षों से इतिहास इस बात
का साक्षी है कि 'काश्मीर' शब्द सर्वदा प्रयुक्त
होता रहा है। पतंजलि ने काश्मीर शब्द का उल्लेख
किया है। उसके पश्चात् पाणिनि ने काश्मीर शब्द
का उल्लेख किया है। प्लोतमी (सन् १५० ई०)
यूरोपियन लेखक ने काश्मीर का नाम 'कस्र्पीरा'
दिया है। वराहमिहिर (५वीं शताब्दी) के वृहद्
संहिता में काश्मीर का उल्लेख किया है। हुयेन सांग
(स० ५४१ ई०) चीनी पर्यटक ने काश्मीर को 'किया
शि मिलो' लिखा है। रत्नावली नाटक (७ वी सदी)
('काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुमकुमम् पद्‌मवेदितन्-)'
'काश्मीर' शब्द का स्पष्ट उल्लेख है।