राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग २१
जात तथा अभ्यास दोनों से कहा जायगा ।
उसका यह काव्य लक्षण तथा कारण की दृष्टि से
किस वर्ग में आता है। उसने स्वयं कहीं नहीं लिखा है।
चार वर्गों में काव्यों का भेद विभाजित किया
गया है, उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तथा अधम ।
कल्हण की राजतरंगिणी प्रथम वर्ग में रखी जायगी ।
उत्तमोत्तम काव्य ध्वनि के पाँच भेद होते हैं। ध्वनि
दो प्रकार की होती है—अभिधामूलक तथा लक्षणा-
मूलक । अभिधामूलक ध्वनि के तीन प्रकार होते हैं—
रस ध्वनि, वस्तु ध्वनि और अलंकार ध्वनि । कल्हण
स्वयं कहता है कि उसके काव्य में शांत रस प्रधान
है। कुछ विद्वान् शांत रस को नाटक के लिए ठीक
नहीं मानते ।;
नव रस शृंगार, करुण, ... शान्त, रौद्र, वीर,
अद्भुत, हास्य, भयानक तथा वीभत्स हैं ।
शांत रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' है । 'निर्वेद'
का लक्षण दिया गया है—'नित्यानित्यवस्तु-विचार-
जन्मा विषयविरागाख्यो निर्वेदः ।' शांत रस का
विरोधी 'शृंगार' रस है । राजंतरंगिणी इतिहास है।
वह काव्य ग्रंथ, नाटक, उपाख्यान, उपन्यास, कथा,
गीत आदि के तुल्य नहीं है। घटनानुसार सभी रसों
का समावेश इसमें मिलेगा । कल्हण का आशय इतिहास
लिखकर राजाओं तथा राज्य की बीमारी के लिये
उपयुक्त औषध का निदान करना था। सभी राजाओं,
जिनका काल लम्बे चार हजार वर्षों का है, उनके
चरित्र का चित्रण कर, उनके गुण-अवगुण, उनके
उत्थान-पतन, राज्य की समृद्धि तथा ह्रास आदि पर
निष्पक्ष वैद्य की तरह, रोगी की भावनाओं से अलग
रहकर, निःस्पृह, निष्काम, निर्वेद तुल्य औषध चुनना
था । अपना मत प्रकट करना था । इसके लिये शान्त
मन, स्थिर बुद्धि और स्वस्थ शरीर का होना आव-
श्यक था । यह केवल शांत द्वारा ही हो सकता था ।
राजतरंगिणी को कल्हण ने शांतरसप्रधान रखा
है। यदि राजा तथा राज्य की बात छोड़ दी जाय,
तो भी समकालीन तथा पूर्वकालीन समाज, लोक,
रीति, कुरीति, अधोगति, उन्नति, आचार-विचार
और सभी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक
प्रश्नों पर स्वानुभव तथा अर्जित और प्राक्तन ज्ञान
के आधार पर निर्णय देना था। यह शांत, प्रबुद्ध,
स्थिरचित्त द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सबसे
अलग रहकर, ऊपर उठकर, न्यायाधीश की तरह
निर्णय दे सके ।
काव्य की आत्मा रस है। रसों में शान्त रस
को कल्हण ने श्रेष्ठ माना है। संकल्प सूर्योदय नाटक
ने इसे स्वीकार करते हुए तथ्य पूर्ण तर्क उपस्थित
किया है।
अभ्यर्पपाटिकामधिकरोति शृंगारिता
परस्परं तिरस्कृतिं परिचिनोति वीरायितम् ।
विरुद्धगतिशृङ्गनस्तदलमल्यमारैः परैः
शमस्तु परिशिष्यते शमितचित्तखेदो रसः ॥
( सं० सू० १ अंकः १९ )
शृंगार रस असभ्यों के व्यवहार का प्रतीक है।
वीर रस परस्पर तिरस्कार का परिचायक है । अद्भु-
भूत रस विरोधी बातों का आश्रय लेता है। अन्य
रस वाले को अन्य रसों से क्या लाभ हो सकता है ।
चित्त के खेद को शान्त करने में केवल शान्त रस ही
शेष रह जाता है ।
मम्मट ने काव्य प्रकाश में—निर्वेदः स्थायि-
भावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः' कहा है । (४।३५)
भरत ने 'नाट्य शास्त्र' में केवल आठ रसों को
मान्यता दी है। शान्त रस को मान्यता नहीं देता ।
अध्यात्म भावना की इस रस द्वारा उत्पत्ति होती है ।
स्यात् इसीलिए भरत ने अन्य रसों की श्रेणी में
शान्त रस को नहीं रखा है। नाट्यशास्त्र में उल्लेख
मिलता है। शान्त रस द्वारा रति आदि आठ स्थायी
भावों की उत्पत्ति होती है।
स्वयं निमित्तमासाद्य, शान्ताद्भावो प्रवर्तते ।
पुनर्निवित्तापाये च शान्त एवोपलीयते । (६।१०८)
काश्मीरी पण्डित अभिनवगुप्त ने शान्त रस को
जिन विद्वानों ने रस नही माना है, उनका तर्क सम्मत