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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

१३४ राजतरंगिणी

मन्दिरों को खण्डित कर उनके पत्थरों से मसजिद
तथा जिमारत बनाना साधारण बात हो गयी थी ।
काशी विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा तथा अयोध्या
का जन्म स्थान, महरौली दिल्ली में विष्णु पर्वत पर,
विष्णु मन्दिर के स्थान पर, कुतुबमीनार तथा
मसजिद, कूबते इसलाम आदि का बन जाना अनेक
उदाहरण हैं ।
कश्मीर में राजाश्रय न मिलने के कारण बुद्ध
धर्म तथा उससे सम्बन्धित इमारतों की उपेक्षा हो
गयी । बुद्ध धर्म के प्रति रुचि न होने के कारण तत्स-
म्बन्धी धार्मिक स्थान क्षीणता को प्राप्त होते होते
सुप्त हो गये ।
कल्हण अशोक के १६ शताब्दी पश्चात् हुआ
था । इतने लम्बे काल तक बिना जीर्णोद्धार किंवा
मरम्मत के किसी भी रचना का कायम रहना
कठिन था । कश्मीर का प्रत्येक राजा किंवा रानी
अपने काल में अपने नाम से किसी न किसी नवीन
इमारत की रचना अपना नाम कायम रखने के लिए
करता था । मेरी समझ में यही कारण है । बौद्ध
भुवन रचना सामग्रियां जो प्रायः उस समय जीर्णा-
वस्था में थीं, बिसरी थीं और जिनका जन जीवन में
विशेष महत्त्व नही रह गया था । कल्हण ने उनका
प्रयोग नहीं किया। इसलिये 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी'
शब्दों का अभाव कल्हण के साहित्य में मिलता है ।

जीर्णोद्धार कराया । कालान्तर में उसने जैन शासन
चलाया । राजा जैनेह का अशोक भतीजा था ।
उसके काल में ब्राह्मण संस्कार के स्थान पर जैन
शासन कश्मीर में चलाया गया । राजा जैनेह कौन
था इसपर अबुल फजल आइने अकबरी में कोई
प्रकाश नहीं डालता ।
हसन लिखता है—'राजा शचोनर वल्द शकुनी
के पोतों में से अशोक था। कलयुग संवत् १६५५
में अपनी ख्वाहिश से तख्त कश्मीर को जीनत देकर
परगना खादर भारत मे एक शहर आलीशान और
दिलपसन्द महलात वाला बनाया । पिछले मुअरखीन
इन मकानों की तायदाद ६ लाख लिखते हैं । शहर
के आस-पास एक निहायत ऊँचो और पायदार
फसील बनवायी । पनगलवा और पतेख के गाँव
आबाद करके बरहमनों को बख्शिश दिये और
मजहब जैन यानी बुद्ध मजहब जिसका जिक्र पहले
हिस्सा में आ चुका है, अपने लिए पसन्द किया ।
उसकी इशाअत और तबलीग में दिल व जान से
कोशिश की और सारे मुल्क मे उमके अहकाम जारी
कर दिये। कसबा बिजबारह मे पिछले तमाम
मन्दिर तबाह व बरबाद करके उनकी जगह अपने
मजहब के इबादतखाने निहायत आलीशान और
पुख्तगी से बनवाये । बैजवारह के मुत्तसिल ही एक
और मन्दिर बनवाया जिसका नाम अपने नाम पर
अशोकेश्वर रखा । मोजा हैवलतरो और मोजा
बतर द्रेल में के बहुत से मन्दिर बनवाये । बिल
आखीर अछूतों की मुखालिफत और उनकी
नाफरमानी से पेशनजर तारिकुल दुनिया होकर
पहाट बदेश्वर की तलहटी में नारायण नाग के चश्मा
पर बूनेश्वर का मन्दिर जिसके निशानात ताहान
मौजूद हैं बनवाया । यहां आतों बकिया उम्र
इबादत बग्ग हकूमत करके इस दारेफानी से
रुख्सत हुआ ।'

हसन का यह कहना है कि ५१ वर्ष अशोक ने
राज्य किया सर्वथा मिथ्या है । अशोक का यह क०

प्रथम तरंग. १३५
यः शान्तवृजिनो राजा प्रपन्नो जिनशासनम् ।
शुष्कलेत्रवितस्तात्रौ तस्तार स्तूपमण्डलैः ॥१०२॥
१०२. यह नृप जिसके पाप शान्त हो गये थे, जिन¹ शासन स्वीकार किया। शुष्कलेत्र²
तथा वितस्तात्र³ स्थानों को स्तूप मण्डलों से आच्छादित कर दिया।
१६५५ संवत् में राज्यारोहण तथा उसके पश्चात् इतिहास का यह वह काल है जब रोम और
जलोक का राज्यारोहण क० १७२६ संवत् में बताता कार्थेज यूनिक युद्ध में रत थे। बुद्ध धर्म का कश्मीर
हैं। इस प्रकार अशोक का राज्य काल ७१ वर्ष में प्रवेश करने के कारण बौद्धधर्मानुयायियो को कष्ट
होता है न कि एक्कावन वर्ष। वह अशोक तथा सहने का आदत पड़ गयी थी। सहिष्णुता की भावना
जलोक के बीच किसी और राजा को नहीं रखता। बढ़ गयी थी। भूकम्प विसूचिका तथा महामारी
अशोक के पश्चात् जलोक का होना स्वीकार आदि का स्थिरतापूर्वक सामना करना चाहिये यह
करता है। भावना बढ़ने लगी थी। उन्हें केवल दैवो प्रकोप
ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि मानकर चुप बैठने की पुरानी आदत बुद्ध धर्म के
राज्य उत्तराधिकार का संघर्ष २७० वर्ष ईशा पूर्व व्यावहारिक रूप और ज्ञान के कारण बदल रही थी।
आरम्भ हुआ था। अशोक २७४ वर्ष ई० पू० राज नास्तिक बुद्ध धर्म के वैज्ञानिक तर्क ने पुराने विचारों
सिंहासन पर बैठा था। उसकी मृत्यु ई० पू० २३२ में एक क्रान्ति उपस्थित कर दी थी। कर्म,
वर्ष में हुई। (परिशिष्ट ए० 'अशोक' ले० राधाकुमुद आचरण, और शील की ओर लोगो को उन्मुख किया
मुकर्जी, १९६२ संस्करण)। था। अन्ध विश्वास, निष्क्रियता, केवल सैद्धान्तिक
इस प्रकार उसका राज्यकाल केवल ३८ वर्ष आकाशीय उड़ान के स्थान पर भूमि पर चलने की
ठहरता है। अतएव हसन का राज्यारोहण, राज्य- ओर लोगो को प्रवृत्त किया था।
काल आदि सब भ्रामक, परस्पर विरोधी तथा अशोक के कारण कश्मीरियो के चरित्र निर्माण
अप्रमाणित उसकी अन्य बातों की तरह होता है। में बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। यही
अशोक ने कितने दिनों तक शासन किया, इस पर कारण है कि कश्मीर की मसजिदें बौद्ध पगोड़ा तुल्य
कोई प्रकाश कल्हण नहीं डालता। उसका सम्बन्ध दिखायी पड़तो है। यद्यपि नूरजहाँ ने सर्व प्रथम
मौर्य वंश से भी नही जोड़ता है। अपने मसजिद के निर्माण द्वारा सेमेटिक स्थापत्य एवं
रत्नाकर पुराण की बात केवल कपोलकल्पना वास्तु कला का प्रवेश कश्मीर में कराया था।
है। इसका लाभ उठाकर हसन ने अनुमान से समय
निश्चित किया है। बुद्ध धर्म कल्हण के समय तक कश्मीर में किसी
अशोक के जीवन की प्रमुख घटनाओ पर तिथि- न किसी रूप में अत्यन्त लघु पैमाने पर प्रचलित
वार प्रकाश डाल देने से इतिहास समझने मे सुविधा था। कल्हण स्वयं शैव था। 'अशोक' परिशिष्ट में
होगी। कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा। विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। अन्यथा
इसका उल्लेख परिशिष्ट 'अशोक' में किया टिप्पणी स्वतः बहुत बड़ी हो जातो।
गया है। जोनराज, श्रीवर, प्रज्ञाभट्ट एवं शुक की राज-
अशोक कश्मीर का राजा था। इसपर विस्तृत तरंगिणियों में अशोकेश्वर तथा अशोक का
विवेचन मैने परिशिष्ट 'अशोक' में किया है। अशोक उल्लेख मै प्राप्त नही कर सका। उनका किसी
का एक राज्यपाल तक्षशिला में रहता था। सन्दर्भ मे भी वर्णन नही मिलता।

१३६ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०२ के 'वितस्तात्र' का पाठभेद
'वितस्ताद्रौ' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०२ (१) जिन-शासन : कल्हण यहाँ स्पष्ट
उल्लेख करता है कि राजा ने जिन-शासन स्वीकार
कर लिया था। यह मगध सम्राट् 'देवानाम् प्रिय',
'प्रियदर्शी' अशोक था इसमें सन्देह नहीं रह जाता ।
अशोक जन्मजात बुद्धधर्मावलम्बी नहीं था ।
कलिंग युद्ध के पश्चात् इतिहास की प्रचलित
धारणाओं के अनुसार बुद्ध धर्म स्वीकार किया था।
उसका व्यापक प्रचार किया था।
शंकराचार्य ने 'बौद्ध-शासन' शब्द का प्रयोग
किया है। 'धर्म' के स्थान पर 'शासन' शब्द का
प्रयोग वस्तुस्थिति में अन्तर नहीं उत्पन्न करता।
कल्हण के 'जिन-शासन' शब्द का कुछ लेखकों
ने अर्थ 'जैन धर्म' लगाया है। यह गलत है।
उस समय हिन्दू अथवा सनातन धर्म शब्द प्रचलित
नहीं थे। एक ही धर्म था। वह था भारतीय धर्म।
उसमें अनेक सम्प्रदाय एवं पन्थ थे। उसी प्रकार
'बुद्ध शासन' भी कश्मीर में तथा भारत में एक पन्थ,
सम्प्रदाय किंवा शासन था। धर्म शब्द आधुनिक काल
की देन है। जैसे सिख पन्थ है। राजनीतिक कारणों
से सिख धर्म को धर्म की संज्ञा देकर उसे भारतीय
हिन्दू धर्म से अलग करने का प्रयास किया गया है।
काशी में श्री गुरु तेगबहादुर देव जी की संगत है।
श्री गुरु नानक देव जी का बाग है। मुझे अच्छी तरह
याद है। हम छोटेपन में एक बैनर लेकर चलते
थे। उस पर लिखा रहता था 'हिन्दू धर्म रक्षक श्री
गुरु गोविन्द सिंह जी जयन्ती।' मैं कितने ही वर्षों
तक इस उत्सव में सम्मिलित होता रहा। परन्तु
पचास वर्षों में सब कुछ बदल गया है।
अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। यह
एक ऐतिहासिक तथ्य है। कल्हण के वर्णन की
सत्यता प्रमाणित करता है। इस श्लोक में स्तूपों के
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
स्थापित करने का उल्लेख मिलता है।
अशोक ने समस्त भारत में स्तूपों तथा स्तम्भों की
शृंखला स्थापित की थी। भगवान् के धातुओं पर
चारों ओर धर्मराजिक स्तूपों का निर्माण कराया था।
कल्हण अशोक द्वारा स्तूप मण्डलों की स्थापना
का उल्लेख करता है। यह अशोक के राज्यकाल
एवं जीवन की विशेषता थी। कल्हण इस अकाट्य
सत्य का समर्थन करता है।
इस तरंग के श्लोक संख्या १०३ से बातें और
साफ हो जाती हैं। अशोक ने चैत्य तथा विहार शब्द
की स्थापना करायी थी। चैत्य एवं विहार शब्द शुद्ध
बौद्ध धर्म सम्बन्धी शब्द हैं। उनके द्वारा पूजनीय
स्थान चैत्य तथा प्रव्रजितों के निवासस्थान विहारों
का बोध होता है। उनका निर्माण कराना बौद्ध धर्म के
प्रति श्रद्धालु भक्त का कर्तव्य माना जाता है।
धार्मिक पुण्य कर्म उसी प्रकार हैं जिस प्रकार हिन्दू
मन्दिर, धर्मशाला, मठ और मुसलमान मस्जिद,
जियारत, तथा सराय का निर्माण कराता
है। कल्हण अशोक के जीवन से इस पहलू पर प्रकाश
डालता है। जिसकी साक्षी भारतीय इतिहास स्पष्ट
और बलवती भाषा में करता है।
(२) शुष्क लेत्र : श्री स्टीन ने सन् १८९१
में पं० काशीराम को इस स्थान की जाँच के लिये
भेजा था। यह स्थान हुष्केलेत्र कहा जाता था। यह
वर्तमान ग्राम हुष्कलित्तर है। इसे हकलित्री भी कहते
हैं। श्री स्टीन द्वारा प्रस्तुत मानचित्र में इसे हकलेट्री
नाम से दिखाया गया है। दुस्त परगना में है। श्री
काशीराम को इस स्थान पर प्राचीन भग्नावशेष तथा
चिह्न नहीं मिले।
मैं यहाँ आया था। आधुनिक विकास के कारण
ग्राम का पुराना रूप बदलता जा रहा है। मुझे दो
चार शिला खण्ड अवश्य मिले। उनके देखने से किसी
समय यहाँ किसी इमारत के होने का अनुमान किया जा
सकता है। वर्तमान समय में पत्थर लाना और उनसे
निर्माण कराना प्रायः समाप्त हो गया है। कश्मीर

प्रथम तरंग १३७
धर्मारण्यविहारान्तर्वितस्तात्रपुरेऽभवद् ।
यत्कृतं चैत्यमुत्सेधावधिप्राप्त्यक्षमेक्षणम् ॥१०३॥
१०३. वितस्तात्र पुर में धर्मारण्य विहान्तर्गत राजा द्वारा निर्मित एक चैत्य' था। वह
इतना ऊँचा था कि आँखें उसके शिखर तक नहीं पहुँच पाती थीं।
में इतने मन्दिर, देवालय एवं विहार पत्थरों से बने
थे कि लगभग सात या आठ शताब्दी से पत्थर कही
से लाने की आवश्यकता ग्रामों तथा छोटे स्थानों में
नहीं थी। पुराने पत्थरों से काम. चल जाता था।
कश्मीर में शायद ही कोई ऐसी जियारत या दरगाह
मिलेगा जिसमें प्राचीन ध्वंसावशेषों के शिला खण्ड
न लगे हों अथवा वे मन्दिरों तथार विहार के स्थान
पर न निर्मित किये गये हों। कल्हण ने इसका उल्लेख
पुनः तरंग १:१७० में किया है।
(३) वितस्तात्र : यह स्थान वनिहाल पर्वत
मूल में वैरी नाग के वायव्य दिशा में लगभग एक
मिल पर विद्ययत्रो ग्राम है। इस ग्राम का वर्तमान
नाम वियवृतुर है, गाँव छोटा है।
ग्राम के समीप एक सरोवर है। उसमें एक
बड़ा जलस्रोत है। यह झरना वितस्ता नदी का
मुख्य उद्गम कहा जाता है। वनिहाल नाम का
मूल वितस्तात्र ग्राम ही था। उसी का अपभ्रंश
तथा बिगड़ता. रूप वनिहाल एक मत के अनुसार
हो गया है।
स्थानीय हिन्दू इसे एक तीर्थ मानते है। वाइन
ने अपने भ्रमण में इसका उल्लेख किया है। वितस्ता
माहात्म्य (२ : ४०) में इसे 'वितस्ता वतिका' कहा
गया है।
राजा अनन्त के समय में कल्हण ने (७:३६४)
वितस्तात्रपुर का उल्लेख किया है। महाराज
सुस्सल के राज्य काल (सन् ११२१-११२८ ई०)
में कल्हण ने 'वितस्ता' स्थान का उल्लेख (८:
१०७३) किया है। कल्हण के निम्नलिखित उद्धरण
इस स्थान के सम्बन्ध में द्रष्टव्य है। (१:१०२;
१०३; १:१७० ७:३५४, ८:१०७३-७४)
१८
नील नाग किंवा वैरी नाग की यात्रा के समय
इस स्थान की यात्रा की जा सकती है। यह स्थान
किसी बड़े नगर के लिये उपयुक्त स्थानाभाव के
कारण नहीं है। इसका महत्त्व प्राचीन काल में
पूर्वीय पंजाब से आवागमन मार्ग के कारण था।
रावलपिण्डी तक रेलवे लाइन और वहाँ से राजपथ
द्वारा उरी होते बारहमूला सडक से पहुँचा जाता
था। यह सड़क सर्वदा खुली रहती है। हिमपात
के कारण मार्गविरोध नही होता। भारतीय
स्वाधीनता और कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण
के कारण यह मार्ग बन्द हो गया है। रावलपिण्डी
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद नाम से
हो गया है। अतएव बनिहाल मार्ग का महत्त्व बढ़
गया है। भारत और कश्मीर को सम्बन्धित करने
वाला यही एक मात्र मार्ग शेष रह गया है। सन्
१९६३ के पूर्व बनिहाल के पास का मार्ग शीतकाल
में तुषारपात के कारण अवरुद्ध हो जाता था। अब
वहाँ बहुत नीचे दूसरी सुरंग खोद कर मार्ग बनाया
गया है। इससे यह मार्ग अब पूर्णतया खुला
रहता है।
कश्मीर आने वालो को प्रथम दर्शन बनिहाल
से वितस्तात्र ग्राम तथा नील कुण्ड किंवा वैरी नाग
का मिलता है। इस स्थान का महत्त्व अब बढ़
गया है।
इस स्थान पर स्तूपों के ध्वन्सावशेष नहीं
मिलते। कुछ स्थानों में प्राचीन इमारतों के आकार
मात्र भूमि में मिलते हैं। वहाँ गढ़े और अनगढ़
पत्थर भी कुछ पड़े हैं। परन्तु स्थान का रूप आधु-
निक प्रगति के साथ बदलता जा रहा है। कुछ
वर्षों में यह सब भी लुप्त हो जायगा। पत्थरों का
प्रयोग स्थानीय जनता मुक्तहस्त करती है।

१३८ राजतरंगिणी
स षण्णवत्या गेहानां लक्षैर्लक्ष्मीसमुज्ज्वलैः ।
गरीयसीं पुरीं श्रीमांशक्रे श्रीनगरों नृपः ॥१०४॥
१०४. उस श्रीमान् ने श्रीनगरी१ की स्थापना की जिसका महत्त्व उसके लक्ष्मी द्वारा
समुज्ज्वल छानवे लाख गेहों के कारण थी।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १०३ में 'यत्कृतं' का पाठभेद 'यात्कृतं' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
: १०३ (१) चैत्य : कश्मीर में चैत्यों की श्रृंखला थी। प्रत्येक ग्राम तथा महत्त्वपूर्ण स्थानों में चैत्य निर्मित थे। उनकी पूजा बौद्ध तथा हिन्दू दोनों करते थे। धर्मारण्य विहार तथा चैत्य दोनों का लोप हो गया है। कल्हण के वर्णन से प्रतीत होता है कि उसके समय विहार तथा चैत्य दोनों का अस्तित्व था। कश्मीर में हिन्दूराज के लोप तथा जनता के मुस्लिम धर्म ग्रहण करने के कारण विहारों तथा चैत्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया। वे गिरते-पड़ते खँडहर हो गये। उनके पत्थर लोग उठा ले जाने लगे। जब केवल आकार मात्र शेष रह जाता था तो उन पर इमारत बना दी जाती थी, इस प्रकार प्राचीन स्थानों का अस्तित्व लोप हो जाता था। यह बात केवल हिन्दू अथवा बौद्ध धर्मस्थानों के सम्बन्ध में ही नहीं लागू होती । बड़ी-बड़ी जियारतें तथा मजारें इसी तरह लोप की जाती है। मैं सन् १९४८ में दिल्ली आया था तो सफदरजंग से महरौली तक बिलकुल आबादी नहीं थी। चारों ओर कब्रिस्तान, मजार तथा जियारतें थीं आज वहाँ कुछ भी नहीं है। बदायूँ में बहुत बड़ा कब्रिस्तान है। वहाँ पर ऊँची पक्की कब्र के चारों ओर जमीन खोद देते हैं। दो-चार वर्षों के पश्चात् कब्र स्वतः गिर जाती है। पत्थर तथा ईंट बेच दिये जाते हैं। जमीन समथर हो जाती है। उन पर नवीन इमारत बन जाती है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०४ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
१०४ (१) श्रीनगरो : अशोक ने दो नगरियों का निर्माण कराया था। कश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में देवपत्तन। नेपाल में अशोक की कन्या चारुमति गयी थी उसका विवाह देवपाल से हुआ हुआ था। पति-पत्नी दोनों नेपाल में धर्म प्रचारार्थ आबाद हो गये थे। अशोक की नेपाल यात्रा के स्मरणार्थ नगर बसाया गया था। देवपत्तन नगर के नाम से अनुमान किया जा सकता है कि देवपाल ने अपने श्वशुर अशोक की यात्रा की स्मृति में नगर बसाया होगा।
ऋग्वेद में श्री शब्द सम्पदा के अर्थ में व्यवहृत किया गया है ( ८:२:१९; अथर्ववेद ६:५४;१, ६:७३:१, ९:५:३१, १०:६:२६, ११:१:१२ २१, १२:१:६३, १२.५:७ )
श्री शोभा, सम्पन्न, वृद्धि, विभूति, कीर्ति, यश, प्रभा, सिद्धि, विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती तथा वाणी के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। शतपथ ब्राह्मण में ( ११:४.३ ) श्री को देवी माना गया है।
अतएव श्रीनगरो का अर्थ संपदा, वृद्धि, यश, कीर्ति तथा सरस्वती नगरी हुआ। श्रीराज्य वर्तमान मैसूर राज्य का पुराना नाम था। दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय साम्राज्य स्थापित था।
जनरल कनिंघम ने वर्तमान ग्राम पाण्डरेथन अर्थात् पुराणधिष्ठानपुर को अशोक निर्मित श्रीनगरो की संज्ञा दी है। वह वितस्ता के वाम तट पर है, वर्तमान श्रीनगर से २ मील ऊपर श्रीनगर अनन्त-नाग सड़क पर स्थित है। कनिंघम ने कल्हण के रा० त० १.१२४ तथा रा० त० २:९९ के आधार

प्रथम तरंग १३९
पर इसका निर्धारण किया है। क्योकि जलौक ने ज्येष्ठ
रुद्र देवस्थान की स्थापना श्रीनगरो में की थी।
इस देवस्थान को शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर
से सम्बन्धित करते हैं। पर्वत मूल में दक्षिण-पूर्व
२ मील दूर पर पाण्डेरेन्यन है। किन्तु प्रोफेसर
बुहलर ने इस मत को ठीक नहीं माना है। वर्णनों
से प्रतीत होता है कि जलौक का मन्दिर या तो
पर्वत पर था अथवा उसके समीप कहीं आसपास
होना चाहिए ।
पुराधिष्ठान शब्द का अर्थ पुरानी राजधानी है।
सोदर जलस्रोत समीप होने ( रा० त० १:१२४ )
के कारण इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।
योग वासिष्ठ में राजा यशस्कर के सन्दर्भ में अधिष्ठान
नगर का उल्लेख किया गया है। वास्तव में नगर
का नाम अधिष्ठान था। नगर प्राचीन होने पर
उसमे पुरा अर्थात् प्राचीन शब्द विशेषण की तरह
जोड़ दिया गया था। यह नगर राजा यशस्कर के
समय तक समृद्धशाली था। योग वासिष्ठ मे कहा
गया है कि वृक्षों तथा पर्वतों से सुशोभित पुराधिष्ठान
कश्मीर के मध्य में स्थित है। यह वर्णन आज की
परिस्थितियों में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ महावंश
में उल्लेख आता है। उत्कल जनपद के अधिष्ठान
नगर के तपस्सु और मल्लिक व्यापारी थे। भगवान्
को बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् उरुवेला में
राजायतन वृक्ष के नीचे प्रथम बार भोजन उन लोगों
ने दिया था। उक्त नगर कश्मीर में नही उड़ीसा
में था ।
गुप्त काल में छोटे राज्यो की राजधानियो को
अधिष्ठान कहा जाता था। उड़ीसा में अधिष्ठान
नामक एक आबादी है।
नवीन राजधानी प्रवरसेनपुर है। प्रवरसेन
द्वितीय ने उसका निर्माण कराया था। वह वर्तमान
श्रीनगर है। उसे प्रवरपुर कहा गया है। श्रीनगर
का नपुंसक लिंग में कल्हण ने सब स्थानो पर वर्णन
किया है। वह केवल इस स्थान पर उसका स्त्री
रूप में प्रयोग किया है।
हैदर मल्लिक तथा मुहम्मद अजीम आदि
इतिहास लेखक अशोक-द्वारा निर्मित राजधानी
को लिदर नदी के वाम तटपर 'शीर' स्थान को बताते
हैं जो खादरयार परगना में है। प्रोफेसर बुहलर
ने एक स्थान पर कहा है कि कुछ काश्मीरी पण्डितों
का मत है कि यह नगर इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त
नाग के समीप था ।
पण्डरेथन में खनन कार्य किया गया है। जिस
सरोवर में पण्डरेथन का मन्दिर निर्माण किया गया
था उसका जल निकाल कर उसके नींव तक खनन
कार्य किया गया था। मन्दिर १८ वर्ग फीट क्षेत्रफल
में स्थित है। मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा
पार्थ ने सन् ९२१ ई० में कराया था।
जहाँगीर अपनी आत्मकथा में लिखता है :
'नगर का नाम श्रीनगर है। झेलम नदी इसके
बीच से बहती है। इसका उद्गम वैरनाग कहलाता
है। जो चौदह कोस दक्षिण है। हमारी आज्ञा से
सोते के पास एक इमारत तथा बाग बनवाया गया
है। नगर में पत्थर तथा लकड़ी के बड़े मजबूत
चार पुल बने हुए हैं। जिनसे लोग आते जाते हैं।
इस देश की भाषा मे पुल को कदल कहते हैं।
नगर में एक बड़ी ऊँची मसजिद है। जो सुलतान
सिकन्दर के चिह्न स्वरूप वर्तमान है। और हिजरी
सन् ७९५ ई० में बनी थी। कुछ दिनों के बाद यह जल
गयी। और तब पुनः सुलतान हुसेन ने इसे बनवाया।
यह पूरी नहीं हुई थी कि उसके जीवन का प्रासाद
ढह गया। सन् ९०९ हिजरी के सुलतान के वजीर
इब्राहीम माकरी ने इसे सुंदरता के साथ पूर्ण किया।
उस समय से अब तक १२० साल से यह बनी हुई
है। मेहराब से पूर्वी दिवाल तक एक सौ पैंतालीस
गज है और चौड़ाई एक सौ चौवालीस गज है।
इसमें चार ताक हैं और चारों ओर दालान तथा
खंभे हैं। संक्षेप में कश्मीर के शासकों का इससे
अच्छा स्मारक और कोई नहीं है। मीर सैय्यद

१४० राजतरंगिणी
हमदानो कुछ दिन इस नगर में रहा था। इसका
स्मारक यहाँ एक खानकाह है। नगर के पास
दो झीलें हैं जो वर्ष भर जल से भरी रहती हैं।
इनके जल का स्वाद कभी बिगड़ता नहीं।
मनुष्यों के आने जाने और अन्न ईधन आदि
लाने के लिए नावें काम में आती हैं। नगर तथा
परगनो में सत्तावन सो नावें तथा चौहत्तर सो
नाविक हैं। कश्मीर प्रान्त में अड़तालीस परगने हैं।
यह दो भागों में विभक्त हैं। और नदी के ऊपरी भाग
को बमराज कहते हैं। यहाँ भूमि का कर या व्यापार
के लेन-देन में सोना चाँदी देने की प्रथा नहीं है।
केवल कुछ सायर कर में दिया जाता है। ये वस्तुओं
का मूल्य चावल के खरवारों से करते हैं और हर
खरवार तीन मन आठ सेर वर्तमान तोल से होता है।
कश्मीरियों में २ सेर का एक मन होता है और
चार मन अर्थात् आठ सेर का एक तर्क होता है।
कश्मीर की आय तीस लाख तिरसठ हजार
पचास खरवार ग्यारह तर्क है। यह
नगदी में सात करोड़ छियालीस लाख सत्तर
सहस्र दाम होता है। साधारणतः यहाँ आठ सहस्र
सवार रहते हैं।' (पृष्ठ ६५३)
बरनीयर लिखता है—'कश्मीर प्रदेश तथा
उसकी राजधानी दोनों का नाम कश्मीर है।'
मुसलिम काल में श्रीनगर का नाम छोड़कर श्रीनगर
को कश्मीर कहने लगे थे। सिक्खों ने सन् १८६१
ई० में जब कश्मीर विजय किया तो उन्होंने पुराना
नाम श्रीनगर कश्मीर की राजधानी का पुनः प्रचलित
किया। बरनीयर तथा उन्नीसवीं शताब्दी तक
मुसलमान लोग श्रीनगर को 'कश्मीर' या 'कशूर'
कहा करते थे।
बरनीयर श्रीनगर का वर्णन करता है—'नगर
के चारों ओर चहार दिवारी नहीं है। यह तीन
चौथाई लीग लम्बा तथा आधा लीग चौड़ा शहर है।
यह मैदान के अर्ध चन्द्राकार पर्वत से २ लीग दूर पर
बसा है। ताजे पानी वाले लेक के तटपर बसा है। यह
सरोवर ४ से ५ लीग होगा। इस लेक मे बहुत से चलते
निर्भर हैं। तथा पर्वत से स्रोतस्विनीयाँ आकर मिलती
हैं। यह वितस्ता में एक नहर द्वारा मिलती है।
उसमें नावें आगो जाती हैं। नदी नगर के बीच में
बहती है। नदी में ७ तरडो के पुल (झेलम या
वितस्ता) पर बाँधे गये हैं। नगर के मकान अधिकतर
दो तथा तिमजले लकड़ी के बने हैं। कुछ पुरानी
इमारतें तथा प्राय. पत्थरों के बने मन्दिर टूटे पड़े
हैं। पत्थर की अपेक्षा लकड़ी सस्ती होती है। उसे
नदियों द्वारा पहाड़ से लाते हैं। नदी के प्रायः सभी
किनारों के मकानों के साथ वाटिकाएँ हैं अर्थात्
नगर में वाटिका गृहों की अधिकता है। ये गर्मी तथा
वसन्त ऋतु में बहुत ही रुचिकर लगते हैं। नगर
के भीतरी भाग के बहुत मकानों में वाटिकाएं हैं।
अनेक मकानों के के समीप महरे हैं। जहाँ मकान
मालिक अपनी नावें रखते हैं। उनमें वे सम्पर्क
स्थापित करते हैं।
'नगर के समीप एक अकेला पहाड़ है। उसके
ढाल पर बड़े ही सुन्दर मकान बने हैं। मकानों में
बगीचा है। चोटी पर मसजिद तथा आश्रम हैं।
दोनों ही अच्छी इमारतें हैं। पर्वत की चोटी पर
हरित पादपों के मुकुट हैं। अपने वृक्षों तथा बागों के
कारण स्थानीय लोग उसे 'हरीपर्वत' कहते हैं।
'हरीपर्वत' के दूसरी तरफ एक और पर्वत है।
उसपर एक छोटी मसजिद है। उसमें वाटिका हैं।
वहाँ पर एक बहुत ही पुरानी इमारत है। उसके
चिन्हों के देखने से स्पष्ट मालूम होता है। वह मन्दिर
था। यद्यपि उसे तख्ते सुलेमान कहते हैं। मुसलमान
कहते हैं। राजा सुलेमान जब कश्मीर में आए थे तो
उन्होंने इसे बनवाया था। परन्तु मुझे सन्देह है।
कभी हजरत सुलेमान का यहाँ प्रवेश हुआ था।
'दल लेक द्वीपो से भरी है। वे आरामगाह हैं।
जल के बीच में वे बहुत ही हरे भरे और सुन्दर
लगते हैं। उनमें फलदार वृक्ष तथा नियमित झफ्री-
दार भ्रमण मार्ग से पूर्ण हैं। दो-दो फिट की दूरी
पर लगाए गये हैं, यह वृक्ष इतने कम मोटे हैं कि

दोनों हाथों के बीच में आ जाते हैं। किन्तु वे जहाज के
मस्तूल इतने ऊंचे है। केवल शिरोभाग पर ताड़
के वृक्ष की तरह उनमें शाखों का गुच्छा
होता है।
'लेक के तटवर्ती पर्वतों के ढालों पर मकानो
तथा फूलों के बागों की भरमार है। हवा स्वास्थ्यकर
है। इनका जलवायु बहुत ही अच्छा है।
उनमें झरने तथा स्रोतस्विनियां खूब हैं। वहाँ से
लेक, द्वीप तथा नगर का बहुत ही हृदयग्राही दृश्य
मिलता है।'
शालीमार बाग का बर्नियर ने ऐसा ही वर्णन
किया है जैसा आज भी वह मौजूद है। केवल इतना
और कहता है, 'शाहजहाँ द्वारा तोड़े गये मन्दिरों के
खम्बो तथा द्वारों से नहरों के मध्य में ग्रीष्म भवन
बनाया गया है। उनका मूल्यांकन करना
कठिन है।'
केप्टन नाइट (१८६०) श्रीनगर के विषय में
लिखता है 'पूरे शहर में कोई भी प्राचीन निर्माणों
के ध्वंसावशेषों को देख सकता है। वे विशाल
शिलालेखों में अलंकृत मिलेंगे। ये लेख सब यहाँ लिखे
मिलेंगे जो गौरवशाली प्राचीन काल की दुःखभरी
कहानी कहते है। नदी के दोनों तटोंपर लकड़ियों के
दर्शनीय मकानो की पंक्तियां मिलेगी।........बहुत से
मकान मुझे मिलें। वे अपनी नींव की ओर जैसे
'पिसा के लीनिंग टावर' को भी लज्जित करते झाँक
रहे हैं।........मकान छह मंजिलों तक ऊँचे है। इनकी
खिडकियां लकड़ी के नक्काशी के कामो से सुन्दर बनी
रहती हैं।
'पूर्व के वेनिस सदृश इस शहर की नदी में सैर
करते हुए मैंने देखा कि नदी के तटपर बने भवनो
की दीवारों में बहुत से अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे।
हम घूमते हुए एक मुसलिम कब्रिस्तान में पहुँचे। यहाँ
एक गिरी मसजिद थी। उसमें बहुत से पुराने
मन्दिरों के अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। वे प्राचीन
मालूम होते थे। उन्होंने अपना जीवन इस मुसलिम
भूमि से कही और प्रारम्भ किया था।'
पण्डरेथन का मन्दिर सुन्दर है। में जिस
समय यहाँ अपनी यात्रा में चौथी बार १३-९-१९६२
ई० में पहुँचा तो मन्दिर का द्वार वितस्ता जल के
बाढ के कारण डूबने में केवल एक फीट ओर
बाकी रह गया था। वितस्ता में बाढ आई थी।
श्रीनगर अनन्त नाग तथा श्रीनगर-पठानकोट की
सड़कों की सतह तक पानी की धारा बह रही थी।
श्रीनगर पामपुर वाली सडक पर बाँध बँधने के
कारण जल नहीं आ सका था। पंडरेथन का कुछ
ऐसा विशद वर्णन लेखको ने किया है कि मैने
समझा था कोई बहुत बड़ा मन्दिर होगा। ध्वंसा-
वशेष तथा स्मारक अत्यधिक होंगे परन्तु यहाँ
जितनी बार आया निराशा हुई। कश्मीर में जल
प्लावन तथा वितस्ता के बाढ़ तथा उसके कारण
हुए विनाश का बहुत वर्णन किया गया है। अतएव
इस भयंकर बाढ के समय अपनी आँखों से कुछ
देख लेने के मोह के कारण यात्रा की थी।
इस समय यहाँ भारतीय सेना की छावनी पडी
है। मन्दिर के पृष्ठभाग में पाकिस्तानी आक्रमण
काल के समय वीरता प्रदर्शित करने के कारण मेजर
शोभनाथ शर्मा, कमायूँ रेजिमेण्ट का स्मारक बना
है। मन्दिर के दक्षिण मुख्य सड़क तक एक छोटा
उद्यान बनाया गया है। चिनार का पेड़ लगा है।
यहाँ पहले विलो अर्थात् बेंत के वृक्ष बहुत थे। परन्तु
उनकी संख्या कम हो गयी है।
मन्दिर का सरोवर ४० वर्ग गज होगा। मन्दिर
१८ वर्ग फीट में है। सरोवर के पूर्व तरफ २ छोटे
जलस्रोत हैं। उनका जल सरोवर में निरन्तर आता
रहता है। सरोवर का जल झेलम नदी में एक गहरी
नहर द्वारा निकल जाता है। झेलम मन्दिर से केवल
२०० फीट दूर बहती है।
मन्दिर कश्मीर के अन्य मन्दिरो तुल्य कश्मीर
शैली पर बना है। मन्दिर का कलश गायब है या

'१४२ राजतरंगिणी

टूट कर गिर गया है। आमलक शेष है। मन्दिर
सिकन्दर बुतशिकन द्वारा पूर्णतया नष्ट न किये जाने
का कारण यह मालूम होता है कि मन्दिर सरोवर
के मध्य में है। मन्दिर का आधार भूमि की सतह से
नीचा है। मन्दिर तोडने की अपेक्षा सरोवर को
मिट्टी से पाट देने पर सरोवर तथा मन्दिर दोनों
का अस्तित्व लोप हो जाता है। सम्भव है यही यहाँ
किया गया होगा। अन्यथा सिकन्दर बुतशिकन के
छापों के सम्मुख बचा रह जाना अनहोनी बात है।
अथवा मिट्टी से सरोवर भर गया होगा। मन्दिर
दृष्टिगत नही हो सका होगा। मैने स्वयं देखा कि
वितस्ता के बाढ के कारण सरोवर पूरा भर गया
था। जल में मन्दिर की पूरी भीत डूब गयी थी।
मन्दिर उपेक्षित पडा था। उसमे वितस्ता जल से
लाई मिट्टी जो शताब्दियो तक जमती रही। मन्दिर
सरोवर मे पड़ने के कारण स्वयं आँखों से लोप हो गया
होगा। काशी मे घाटो पर बने मन्दिर बरसात में गंगा
की मिट्टी जमने के कारण भर जाते है !
मन्दिर के द्वार की ऊपरी देहली पर मूर्तियाँ
बनी है। किन्तु ये कुरूप कर दी गयी है। स्थानीय
लोग इस मन्दिर को पंचमुखी महादेव का मन्दिर
कहते है। मन्दिर के भीतर अलंकृत तथा मूर्तिमय
शिलाखण्ड है। यह मेरुवर्धन स्वामी का मन्दिर
कहा जाता है। मेरुवर्धन राजा पार्थ का प्रधान
मन्त्री था।
अशोक द्वारा निर्मित यही प्राचीन श्रीनगर था।
राजा प्रवरसेन द्वितीय (११०-७० ई० पू०) ने
उक्त मन्दिर निर्माण होने के पूर्व प्रवरपुर अर्थात्
वर्तमान श्रीनगर बसाया था। उसे अपनी राजधानी
बनाया था।
पुराधिष्ठानपुर राजा अभिमन्यु द्वितीय (९६०
ई० पू०) के समय आग लगने के कारण भस्म हो
गया था। इतनी भयंकर आग लगी थी कि इस
मन्दिर के अतिरिक्त जो जल के मध्य मे था और जहाँ
आग नहीं पहुँच सकती थी, सब कुछ जल गया।
मन्दिर की उत्तर दिशा में कुछ खनन कार्य
हुआ था। उसमें पुराने मन्दिरो के पत्थर बिखरे
मिले थे। वहाँ एक ६ फीट ऊँचा शिवलिंग तथा
लगभग १६ फीट ऊँचा टूटा लिंग मिला था। इन
दोनो लिंगो के मध्य एक आसीन मूर्ति का पद तथा
पाँव जो ठेहुनी भर ऊँचा था, मिला था। बैरन
हुगेल ने इसे बुद्ध की प्रतिमा का अवशेष माना है।
ह्यूम ने लिखा है कि पाद तथा पैर २० फिट
ऊँची मूर्ति के अवशेष थे। वह बैठी मूर्ति थी।
उस सरोवर मे एक छोटी नाव बँधी रहती थी।
उससे दर्शक स्वयं नाव लेकर मन्दिर तक पहुँच
जाता था। वहाँ बहुत कम लोग आते थे।
सरोवर बडे नरकुल से भरा लगभग ४० वर्ग गज
मे है। पुराधिष्ठान के अन्य मन्दिरो के ध्वंसावशेषों
के कुछ पत्थर समीपस्थ मस्जिद के निर्माण में
लगाये गये हैं।
प्रश्न उपस्थित होता है ! अशोक ने इस स्थान
को अपनी राजधानी के लिए क्यों चुना ? अशोक
ने यह स्थान दो कारणों से राजधानी निमित्त चुना
होगा। प्रथम कारण यह मालूम होता है कि वितस्ता
का जल इस स्थान को डुबा नही सकता। यह
ऊँचा है। पृष्ठभाग मे पर्वतमाला है। पर्वत के ढाल
के पश्चात् पथरीली ऊँची भूमि है। पर्वत कच्चा
नही पक्का है। पत्थर गया जी के पत्थर की तरह
सख्त है। मैने स्वयं देखा सडक बनाने के लिए
गिट्टी पहाड़ तोड़कर बनाई जा रही थी। बाढ़ आने
पर लोग पीछे पर्वत के ढाल पर जाकर अपनी
रक्षा कर सकते थे। पर्वत के खिसकने का—भूभ्रंश
का भय नही था। इस बात का वितस्ता के बाढ़ तथा
अत्यन्त वर्षा के समय यहाँ रहकर मैने अनुभव
कर लिया।
दूसरा कारण यह मालूम होता है कि वर्तमान
पण्डरेथन ग्राम तथा शंकराचार्य पर्वत तक का भूखण्ड
वितस्ता तथा पर्वतमाला के मध्य समतल तथा
उपजाऊ है। विस्तृत भूखंड है। इस स्थान को
बादामो बाग कहते हैं। यहाँ बादाम के बहुत बगीचे

प्रथम तरंग १४३

हैं। बागों की यह श्रृंखला पामपूर तक मिलती चली
जाती है। बनिहाल श्रीनगर मार्ग पर है। आगे जाने
पर पामपुर पड़ता है। केसर की खेती के लिए
प्रसिद्ध है। वहाँ की उपजाऊ भूमि, फलदार वृक्षादि
के कारण इस स्थान का चयन अशोक ने किया
होगा।
इस समय मैदान में भारतीय सैनिक छावनी का
कैम्प गत सन् १९४७ ई० से पड़ा है। सैनिक एवं
सुरक्षा की दृष्टि से स्थान श्रेष्ठ माना जायगा। इसके
दक्षिण-पश्चिम वितस्ता तथा पूर्व ओर ऊँची पर्वत-
मालाएँ हैं। दक्षिण में पाण्डु चक पर वितस्ता तथा
पर्वत के मध्य अत्यन्त संकीर्ण मार्ग है। पश्चिम
हस्तम गढ़ी जिस पर इस समय कश्मीर राजा का
प्रासाद बना है। उस पर्वत तथा वितस्ता के मध्य का
स्थान हवाखातून की मज़ार के समीप का मार्ग
४० फीट संकीर्ण हो जाता है। यहाँ महासरित
वितस्ता पर्वत मूल तक खाई का काम करती है।
इस प्रकार यह स्थान प्राकृतिक सुरक्षा वेष्ठित—एक
ओर वितस्ता तथा तीन ओर पर्वत से घिर जाता
है। यही कारण है कि इस समय भारतीय सेना
यहाँ बड़े पैमाने पर रखी गयी है। उसका पूर्ति तथा
सम्भरण केन्द्र है। डोगरा काल में यहाँ कैण्टोनमेण्ट
था। अर्थात् सेना की छावनी थी। अशोक उत्तर-
पश्चिम भारत में रह चुका था। स्वयं युद्ध विद्या में
निपुण था। एक सैनिक होने के नाते उसने इस
स्थान का सैनिक महत्त्व समझा। अतएव इस स्थान
को राजधानी के लिए चुना।
अफगानिस्तान में जिस प्रकार भगवान् की बड़ी
मूर्ति खण्डित की गयी थी उसी प्रकार इस मूर्ति का
हाथ जो सम्भवतः अभय मुद्रा में था खण्डित कर
दिया गया। बामियान मूर्ति की मुखाकृति ललाट
से नीचे बिल्कुल छील दी गयी है। भगवान् त्रिचीवर
धारण किये हुए हैं। इस मूर्ति पर दृष्टि पड़ते ही मुझे
अपनी आँखों देखी बामियान की दोनों मूर्तियां स्मरण
हो आयीं। मैंने उक्त दोनों बामियान की मूर्तियों का
वर्णन विस्तार से अपनी पुस्तक 'आर्याना' में
किया है।
भगवान् की अभय मुद्रा में एक और मूर्ति है।
मूर्ति भव्य है। अनायास मन पर अभय भावना
स्थापित करती है। बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर की
मूर्ति है। यज्ञोपवीत, धोती, वाम कर में मृणाल
सहित पद्म, तथा दायें कर में माला और मूर्धा
पर केश के ऊपर मुकुट है। इस मूर्ति की मुद्रा मुझे
बहुत अच्छी लगी।
मूर्ति की मुखाकृति बड़ी सरल है। मालूम
पड़ता है मूर्ति जैसे कुछ कहना चाहती है। देखकर
मन अनायास मूर्ति की ओर आकर्षित हो जाता है।
संग्रहालय में यहाँ से प्राप्त गगन में गमनशील
गन्धर्व यक्षादि की भी मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं।
यहाँ से प्राप्त दो और मूर्तियाँ दर्शनीय हैं।
एक की संख्या 'ए' १०४ है। यह लुम्बिनी वन में
भगवान् के जन्म की घटना प्रदर्शित करती है।
देवी महामाया शाल वृक्ष की एक शाखा पकड़े खड़ी
हैं। उनका बायाँ हाथ एक महिला के स्कन्ध पर है।
कहते हैं यह महा प्रजापति गौतमी देवी महामाया की
कनिष्ठ बहन थीं। उनका विवाह उनके पति शुद्धो-
दन के साथ हुआ था। भगवान् के जन्म के सातवें
दिन देवी महामाया दिवंगत हो गयी थीं। अतएव
विमाता प्रजापति गौतमी ने भगवान् बुद्ध का लालन-
पालन किया था। भगवान् के बुद्धत्व प्राप्त होने
पर महाप्रजापति गौतमी ने स्वयं प्रव्रज्या ले ली
और अपने ही पुत्र की शिष्या हुईं। पुत्र को शास्ता
स्वीकार किया। देवी ने प्रव्रज्या के पश्चात् यह
मार्मिक शब्द कहा था—मैं तुम्हारी माता हूँ और
आप मेरे शास्ता हो। किन्तु किसी बुद्ध ग्रन्थ में मुझे
नहीं मिला कि प्रजापति गौतमी देवी महामाया के
देवदह जाते समय साथ थीं। सम्भव है कालान्तर में
इस प्रकार की कहानी प्रचलित हो गयी हो। अथवा
किसी लेखक के ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया गया
है। जिसके आधार पर यह मूर्ति बनायी गयी है।

१४४ राजतरंगिणी
मूर्ति के पृष्ठ भाग में एक चामर धारिणी युवती
है। कश्मीर में उस समय महिलाओं की क्या
वेशभूषा थी, किस प्रकार केशविन्यास, शृंगारादि
करती थी इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।
उसका वहाँ वर्णन अप्रासंगिक होगा।
एक विचित्र खण्डित मूर्ति इस संग्रहालय में
और है। मूर्ति का पाद से कटि प्रदेश तक का ही
भाग शेष रह गया है। शेष भाग खण्डित कर दिया
गया है। कही लुप्त हो गया है। यह पुरुष मूर्ति
है। सिंह वाहन है। अर्थात् सिंह पर आसीन है।
उसके पैर के अँगूठे से कटि तक, पादत्राण वस्त्रादि से
विभूषित है। यह मूर्ति किसी कुषाण वंशीय राजा
की हो सकती है। उसने अपनी शक्ति का परिचय
सिंह पर बैठ कर दिया है। सिंहवाहिनी दुर्गा या
देवी की यह मूर्ति नही है। यह किसी सैनिक राज-
पुरुष की मूर्ति है। इसके पद की जो वेशभूषा है
वह पेशावर जिला के ग्रामीण क्षेत्रों के बीसवी
शताब्दी के प्रारम्भ काल तक प्रचलित थी।
पुराधिष्ठान अर्थात् पण्डरेथन का वर्णन तथा
विस्तार के साथ उल्लेख महर्षि वाल्मीकि प्रणीत
'योग वासिष्ठ रामायण' में जैसा मै ऊपर लिख चुका
हूँ मिलता है। राजा यशस्कर के प्रसंग में मैने
इसका वर्णन किया है। योग वासिष्ठ रामायण,
पुराधिष्ठान तथा कश्मीर का सम्बन्ध है या नही।
यह प्रश्न स्वयं एक स्वतंत्र विषय है। इस प्रसंग
के लिये यहाँ इतना ही लिखना पर्याप्त प्रतीत
होता है।
योग वासिष्ठ के वर्णन और पुराधिष्ठान के
भौगोलिक आदि स्थिति का पूरा मेल खाता है।
कुछ विद्वान् कह सकते है कि योग वासिष्ठ का यह
अंश प्रक्षिप्त है। इस विवाद में यहाँ प्रवेश करना
अप्रासंगिक होगा।
पर्वत के ढाल पर लगभग एक मील से अधिक
के क्षेत्र में पुराने खिलौने, मूर्तियाँ आदि बहुत मिली
हैं। वे इस तरह तोड़ी गयी है कि खण्ड मात्र रह
गयी हैं। बादामी बाग के पास बैस्ट तथा अस्पताल
आदि सैनिकोपयोगी स्थान बने है। यहाँ के खनन में
हयग्रीव, वराह, रुद्र, पार्वती, शिव, भैरव, त्रिमूर्ति,
लक्ष्मी की मूर्तियां मिली है। ये इतनी बुरी तरह
तोड़ी गयी है कि उन्हें देखकर दया आती है।
मूर्तियां भव्य, सुन्दर तथा कलापूर्ण हैं। उनकी अपनी
शैली है।
पण्डरेथन का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल
की पुस्तक में छपा है। उसने पण्डरेथन के मन्दिर
तथा कला पर प्रकाश डाला है। मन्दिर उस समय
जिस अवस्था में था उसी अवस्था में आज है। केवल
कुछ मरम्मत कर दी गया है। सैनिक छावनी के
कारण इस स्थान पर कुछ चहल-पहल हो गयी है।
यहाँ की मूर्तियां जिस कठोरता के साथ भग्न की
गयी थी उसका प्रमाण श्रीनगर कला संग्रहालय में
संग्रहीत मूर्तियां है। यहाँ के प्राप्त वस्तुओं से कश्मीर
की तत्कालीन स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।
प्रतापसिंह संग्रहालय में कुछ मूर्तियाँ तथा
मूर्तिखण्ड संग्रहीत हैं। उनमें मूर्ति संख्या १६
गान्धार शैली की है। भगवान् बुद्ध ध्यान मुद्रा में
आसीन हैं। महीन चीवर धारण किये है।
पद्मासीन हैं। मूर्ति का हस्त नासिकादि खण्डित
कर दिया गया है। भगवान् बुद्ध की खड़ी मूर्ति
संख्या ११ मथुरा से प्राप्त भगवान् की प्रसिद्ध मूर्ति
से मिलती है।
कैप्टन सी नाइट (सन् १८६० ई०) के समय
पण्डरेथन में खनन कार्य नही हुआ था। परन्तु उनके
वर्णन से स्पष्ट होता है। वहीं यथेष्ट भग्नावशेष बिखरे
थे। कालान्तर में खनन कार्य यहाँ पर किया गया।
उससे प्रमाणित हो गया कि यह स्थान अत्यन्त प्राचीन
रहा है।
श्री नाइट ने अपनी पुस्तक में मन्दिर का जो
चित्र दिया है उससे प्रकट होता है। मन्दिर इतना
उपेक्षित एवं जीर्णावस्था में था कि शिखर पर एक

प्रथम तरंग १४५

पेड़ जम गया था। मन्दिर के चारों ओर नरकट के
लम्बे-लम्बे पेड़ उगे थे। मन्दिर का मध्य भाग दिवाल
सा लगता था। वह लिखता है—'श्रीनगर से तीन
कोस इधर हम लोग एक विस्तृत दानव सम्बन्धी
भूमि के ध्वंसावशेष पर ठहर गये। यह स्थान
पण्डेरेथन कहा जाता है। यहाँ हमने पूर्णावस्था में
एक इमारत देखी। इस प्रकार की इमारत अब तक
हम लोगों ने नहीं देखी थी। उसके चारों ओर बहुत
दूर तक इस प्रकार के चिह्न मिले जिनसे मालूम
होता था कि प्राचीन काल में यहाँ विशाल नगर
था।'
'अन्य रुचिकर अवशेषों में एक मूर्ति का ठोस
अधिष्ठान देखा। वह एक फसल कटे हुए खेत में
खड़ा था। मूर्ति की ठेहुनी से अधोभाग का शेष रह
गया था। यह शिलाखण्ड सात फिट ऊँचा था।
मूर्ति की उँगलियाँ तथा अँगूठे तोड़ डाले गये थे,
किन्तु पाँव टूटने से बच गये थे।
'यहाँ से आधा मील दूर पर एक विशाल स्तम्भ
की वेदी पड़ी थी। वह कुछ अच्छे स्थान पर थी। इसका
व्यास छहफिट था। इसे यहाँ रखने के लिये भारी
यन्त्र की आवश्यकता पड़ी होगी। कुछ दूर पर हमें
स्तम्भ का भाग मिला। वह तीन भागों में खण्डित
था। वह १२ फिट लम्बा था। उसका अधोभाग
बहु कोणीय था। मध्य भाग गोलाकार था। शिरस्
भाग नोकदार शुण्डाकार था। वह हिन्दुओं के
महादेव के मन्दिर में लगे पत्थर के समान था।
(पृष्ठ १२२)
श्री कनिंघम (सन् १८४८ ई०) पण्डेरेथन के
विषय में लिखते हैं—'इस नाम का अर्थ पुरानी
राजधानी अथवा प्राचीन मुख्य नगर होता है।
विभिन्न यात्रियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इसका
उच्चारण किया है। श्री मूर क्राफ्ट ने इसे 'पण्डेयन'
श्री वाइन ने 'पण्डरेण्टोन' तथा श्री बैरन हुगेल ने
'पण्डरीटन' लिखा है।
१९

'इस मन्दिर की इमारत का उल्लेख सन् ६१३
तथा ९२१ के बीच मिलता है। तत्पश्चात् सन्
९५८ तथा ९७२ के मध्यवर्ती कालों में मिलता है।
उस समय रोमन सम्राट् नीरो तुल्य राजा अभिमन्यु
ने अपनी राजधानी में आग लगवा दी थी। किन्तु
यह मन्दिर नष्ट होने से बच गया था।
'चूंकि यह एकमात्र मन्दिर पुरानी राजधानी
में स्थित है, अतएव इसमें सन्देह नहीं कि यह वही
मन्दिर है जो इस समय वर्तमान है। यह एक
सरोवर के मध्य में स्थित है। चारों ओर जल है।
यही स्थिति उस अग्निदाह के समय में रही होगी।
अतएव अग्निदाह से यह बच गया था। जब कि
अन्य इमारतें जलकर चूना और भस्म मात्र
रह गयीं।
'बैरन हुगेल मन्दिर को बौद्धों का मानते हैं।
कहते हैं। मन्दिर के अन्दर की मूर्तियां सुरक्षित
हैं। किन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। मन्दिर विष्णु का
है। भीतर की मूर्तियों का कोई सम्बन्ध बौद्ध धर्म से
नहीं है।
'श्री ट्रिवेक इसके भीतर तैर कर गये। उसे
वहाँ किसी प्रकार की मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ
था। उस समय छत तक पानी था अतएव वह
भीतर की मूर्तियां नहीं देख सके थे।
'जल के अन्दर मन्दिर बनाने का यह उद्देश्य
रहा होगा कि उन्हें नागों की संरक्षता में रखा
जाय। नागों के शरीर का ऊर्ध्व भाग मनुष्य तथा
अधोभाग सर्प का होता है। कश्मीर में उनकी पूजा
प्राचीन काल से प्रचलित थी।' जनरल एशियाटिक
सोसाइटी (भाग : १६) श्री डब्लू० वेल फोहड
(सन् १८७९ ई०) ने पण्डेरेथन को 'पण्डरिटन'
लिखा है। वह लिखते हैं—'पण्डरिटन एक समय
अत्यन्त समृद्धिशाली तथा बड़ा नगर था। प्रदेश की
की राजधानी था। कितने दुःख का विषय है। अपने
एक पुराने राजा के पागलपन के कारण यह पत्थरों
का संग्रह मात्र रह गया है।

१४६ राजतरंगिणी
जीर्णं श्रीविजयेशस्य विनिवार्य्य सुधामयम्।
निष्कल्मषेणाश्ममयः प्राकारो येन कारितः ॥१०५॥
१०५ उस निष्कल्मष राजा ने विजयेश्वर १ के पवित्र देव स्थान के जीर्ण हुए चूने आदि
से बने प्राकार के स्थान पर नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया ।

'कहा जाता है। यह नगर एक समय मीलों में
विस्तृत था। उसमें दर्शनीय भवन थे। अशोक ने
एक देवस्थान निर्माण कराया था। उसमें भगवान्
बुद्ध का एक धातु रखा गया था। इस समय उस
पवित्र देव स्थान का पता नहीं है। उस गौरवशाली
प्राचीन काल की स्मृति को जीवित रखने के लिये, इस
एक मन्दिर के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह
गया है। यह मन्दिर सरोवर के मध्य में है। इसके
चारों ओर विलों के उद्यान हैं। अतएव इसके
भीतर क्या है । बहुत लोग इसके अन्दर जाकर देख
नहीं सके हैं। (पृष्ठ २३६)

विजयेश्वर का मन्दिर राजा अनन्तदेव के समय
में भस्म हो गया था। राजा कलश ने उसका
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ७.५२४) पुराना
आकार अथवा सुधामय सम्भवतः ईंट अथवा पत्थरों
के ढोको का बना था। अशोक ने पत्थरों से उसका
निर्माण कराया था।

नीलमत पुराण में दो स्थानों पर विजयेश का
उल्लेख मिलता है। पहला वर्णन शक्र संशय तथा
दूसरा वितस्ता माहात्म्य के वर्णन के सन्दर्भ में
मिलता है। दोनों से कल्हण की बातों की पुष्टि
होती है।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १०५ में 'सुधामयम्' का पाठभेद
'सोधम्' और 'प्राकारो' का पाठभेद 'प्रासादो' तथा
'कारितः' का 'निर्मितः' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
१०५ (१) विजयेश्वर. काल शिव विजयेश्वर का
प्रसिद्ध देवालय वर्तमान बिजवोर तथा उसके आस-
पास का क्षेत्र था। इसे विजयेश्वर क्षेत्र कहते थे।
स्थानीय पुरोहितों के अनुसार विजयेश्वर का प्राचीन
मन्दिर लगभग ४०० गज नदी तट से दूर वितस्ता
सेतु के दूसरी तरफ था। यहाँ से कश्मीर के डोगरा
राजा रणवीर सिंह ने अपने नवीन मन्दिर निर्माण
निमित्त बहुत सामग्री प्राप्त की थी। यहाँ स्टीन
सन् १८८९ में आये थे। मन्दिर के अधिष्ठान के
पास कुछ टूटे हुए पत्थर तथा मलवे मिले थे। यहाँ
पर कुछ निर्माण किया गया है। नवीन मन्दिर के
समीप कुछ मूर्तियाँ जो पुरानी नही मालूम होती,
रखी थी। यह मन्दिर नदी के ऊपर कुछ दूर पर
बना है।

विशोकां विजयेशं च वितस्तां सिन्धुसंगमम् ।
एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥
1056 : १२४०

'—विशोका, विजयेश, वितस्ता, सिन्धु संगम
पार करते हुए वह भरतगिरि पर पहुँचा ।
विजयेशाग्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते ।
रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते सुखम् ॥
1303 : १५१६,१५१७

'महीपते ! विजयेश्वर के सम्मुख वितस्ता में
स्नान करने वाला अपने कुल का उद्धार करता स्वयं
रुद्रलोक प्राप्त कर सुख भोगता है ।
उक्त उद्धरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं।
विजयेश्वर तीर्थ था। विजयेश्वर घाटपर स्नान करने
पर मुक्ति मिलती थी । कुल का उद्धार होता था ।
सुख की प्राप्ति होती थी । विजयेश का महत्त्व सिन्धु
संगम जैसा महत्त्वपूर्ण था । उसकी गणना पवित्र
स्थानों में थी । इन आध्यात्मिक महत्त्व के साथ
दूसरा भौगोलिक महत्त्व भी प्रकट होता है। वितस्ता

प्रथम तरंग १४७
सभायां विजयेशस्य समीपे च विनिर्ममे ।
शान्तावसादः प्रासादावशोकेश्वरसंज्ञितौ ॥१०६॥
१०६. उस शान्त एवं अवसाद रहित राजा ने विजयेश्वर के समीप दो प्रासादों¹ का
निर्माण सभा² स्थान में कराया उनका नाम अशोकेश्वर³ था।

तटपर विजयेश तीर्थ था। वर्तमान बिजन्नोर अथवा
ब्रिजवेहरा किंवा व्रजब्रारी ही पूर्वकालीन विजयेश्वर
क्षेत्र था। वहाँ के मन्दिर में एक विजयेश का
मन्दिर था। अशोकेश्वर का वर्णन नीलमत पुराण में
नहीं आता है। इस अभाव के दो कारण हो सकते
हैं। पहला कारण यह हो सकता है कि नीलमत
पुराण अशोक के पूर्व लिखा गया हो अथवा विजयेश
यहाँ के प्राचीन नगर देवता थे अतएव उनका महत्त्व
काशी के देवता काशी विश्वनाथ की तरह था।
नीलमत पुराण ने विजयेश को ही तीर्थ तथा तीर्थ
का प्रधान देवता माना होगा। अन्य देवताओं का
उल्लेख विजयेश क्षेत्र में नहीं मिलता।

बिजन्नोर अर्थात् विजयेश्वर श्रीनगर से १९
मील दूर स्थित है। कल्हण के अनुसार इस मन्दिर
की स्थापना विजयराज ने की थी। (राज० त०
२:६२) सिकन्दर बुतशिकन ने इसे नष्ट किया था।
यहाँ पर बड़ी मसजिद के समीप कुछ ध्वंसावशेष पाये
जाते हैं। इस मन्दिर का स्तम्भ रतन हाजी की
मसजिद में तथा प्रसाद चढ़ाने का बड़ा शिलाखण्ड
मसजिद के बाहर पड़ा है। कथा है कि इस मन्दिर
के नष्ट होने का समय शिलालेख पर पहले ही
लिखकर रख दिया गया था। उस पर लिखा था
'बिस्मिल्लाह मन्त्रेण भग्नन्त विजयेश्वर।'

विजयेश्वर का उल्लेख जोन आदि की राज-
तरंगिणी (दत्त पृष्ठ ११, ८८, १२०, १३२,
१४०, १४६, १४७, ३२२, ३७२, ३८१, ४०८) में
विशेष रूप से किया गया है।

१०६ (१) प्रासाद : प्रासाद शब्द से किंचित्
भ्रम उत्पन्न हो सकता है। आजकल प्रासाद शब्द
मन्दिरों के लिये प्रयोग नहीं किया जाता। संस्कृत
में प्रासाद का अर्थ—राजभवन, विशाल भवन,
देवालय एवं मन्दिर है । ‘प्रासादो देवभूभुजाम्।’
अर्थात् देवालय एवं महल दोनो का अर्थ प्रासाद है।
अमर कोष (२:२:९)

(२) सभा : आज भी यह प्रथा प्रचलित है।
बड़े मन्दिरों में राजा तथा श्रीसम्पन्न लोग
छोटे-छोटे मन्दिर अपने नाम से स्थापित करा देते
हैं। काशी विश्वनाथ के मन्दिर में इस प्रकार
कितने ही शिव लिंगों की स्थापना लोगों ने करायी
है। छोटे-छोटे मन्दिर दीवारों तथा खाली स्थानों
में बनवा दिये जाते हैं। दक्षिण भारत की यात्रा
में भी मैंने विशाल मन्दिरों में यह प्रथा प्रचलित
पायी है। अशोक ने भी इसी प्रकार पुण्यार्जन
निमित्त विजयेश्वर जैसे पवित्र धाम में उसके सभा
स्थल अर्थात् प्राकार के भीतर मन्दिर निर्माण
कराया होगा।

सभा का अर्थ यहाँ सभामण्डप तथा विशाल
मन्दिर का प्राकार दोनो लगाया जा सकता है।
सभा का अर्थ वास, कुटी, शाला, सभा, सभाभवन,
सभासद् तथा परिषद् होता है। (अमर कोष २:२.७
तथा ३:१:१३७) सभामण्डप छाया हुआ सभा
का स्थान होता है। गर्भ गृह के सम्मुख ढके स्थान
को सभामण्डप कहते हैं। यह सभी मन्दिरों में
होता है। यहाँ पर अर्थ सभा अर्थात् विस्तृत प्राकार
वेष्टित स्थान लगाना उचित प्रतीत होता है। यद्यपि
मन्दिर के सभा मण्डप में भी लोग अपने नाम से
दीवालों या किसी कोने में मूर्तियाँ स्थापित कर
देते हैं। अशोक के निर्मित मन्दिर निश्चय ही
विजयेश्वर प्राकार के अन्तर्गत भिन्न मन्दिर थे।

(३) अशोकेश्वर : विजयेश्वर के प्रसंग में
लिखा जा चुका है कि मन्दिर का पता नहीं चलता।

१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशात्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलौक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।

[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे । अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । वह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है । यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे । परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी । मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिड्डामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पांडुचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है । पांडुचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है ।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है । (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)

[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
होता है । बोधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है ।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
मर्यादाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः गद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छः ... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है । उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है । भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है । यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है । शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है । जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है । (श० ब्रा० ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।

प्रथम तरंग
साधी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे । उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था ।
काश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे । वे
बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे । वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे ।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया । उस समय
काफिरिस्तान के निवासियों का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर में काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्दुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इसलाम धर्म स्वीकार नहीं किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्तयु म्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों मे अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेशवर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है । तरंग आठ में भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८ः२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कहीं भी
निवास करते थे । उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था ।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है । महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत में चारों दिशाओं में थे । महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छों ने ग्रहण किया था । अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था ।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तू प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८ः४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७:२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१:१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शाश्व० : ९१:२५; म० क० : १४.१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी । कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतों में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश तत्व आते हैं । अमरकोप-
कार भूत का अर्थ करता है—लब्धं प्राप्तं विन्नं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्

१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशत्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलोक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।

मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे। अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । यह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है। यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे। परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी। मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिद्दामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पाण्ड्रचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है। पाण्ड्रचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है। (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)
कल्हण के समय अशोकेश्वर का मन्दिर
वर्तमान था। उसने स्पष्ट उल्लेख किया है। जयसिंह
की रानी रड्डादेवी ने अशोकेश्वर मन्दिर का
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ८:३२९१)
१०७ (१) म्लेच्छ : म्लेच्छ का अर्थ—अनार्य,
जंगली भाषा बोलने वाले, असंस्कृत भाषाभाषी,
शास्त्रों को न मानने वाले, जाति बहिष्कृत आदि
होता है। बौधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः तद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छ ...... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है। उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रस्थन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है। भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है। यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है। शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है। जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है। (श० ब्रा. ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।
ऊँची सभ्यता वाले ईरानियों को भी 'अजम' अर्थात्
गूँगा अर्थात् बात न समझने वाला कहते थे।
चन्द्रगुप्त के समय भारत पर अलकसन्दर,
किंवा अलक्षेन्द्र (अलेकजेंडर), सिकन्दर, का आक्रमण
हुआ था। दार्वाभिसार के राजा आभी का सम्पर्क
सिकन्दर से था। यूनानियों के लौट जाने तथा
सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसने अनेक यूनानी

प्रथम तरंग
साथी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे। उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था।
कश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे। वे
बीसवी शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे। वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया। उस समय
काफिरिस्तान के निवासियो का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर मे काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्बुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्त्युम्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों में अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेश्वर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है। तरंग आठ मे भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८:२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कही भी
निवास करते थे। उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है। महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत मे चारो दिशाओं में थे। महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छो ने ग्रहण किया था। अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तृ प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८:४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७.२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१.१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शास्व० : ९१:२५; म० क० : १४:१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ मे म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी। कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतो में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश सत्त्व आते हैं। अमरकोष-
कार भूत का अर्थ करता है—लक्ष्यं प्राप्तं वृत्तं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्

१५० राजतरंगिणी .
सब्य प्राप्त, विघ्न, भावित, आसादित, बोर भूत
हैं। पुनः (३:३.७७) में अर्थ किया गया है।
अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च।
युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥
अर्थ होता है अत्याहितं —महाभय, साहसी कर्म,
व्याप्य, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, गत्य, प्राणी,
बीता समय।
ब्रह्माण्ड पुराण के मतानुसार भूतों की उत्पत्ति
भूत तत्त्व से हुई थी। इनका भोजन पिशित था।
(२८ ३९-४०) 'पिशित' का अर्थ होता है मांस-
भक्षी, राक्षस, पिशाचादि।
इनका वर्णन अद्भुत है। वे कृशांग अर्थात् छोटे
कद के थे। लंबकर्ण थे। प्रलम्बोष्ठ थे। लम्बे दाँत
युक्त थे। नखिन् अर्थात् नख रखते थे।
स्थूलपिण्डक अर्थात् स्थूल शरीर वाले थे। बभ्रु व
अर्थात् लम्बी भौ वाले थे। हरि तथा मु ज केश थे।
ठिगने थे। वर्ण नीललोहित था। पिंगल वर्ण भी
होता था।
सगोत्र विरोधी होते थे। शक्तिशाली होते थे।
सर्प यज्ञोपवीत धारण करते थे। शरीर को अनेक रंगों
के लेप द्वारा सज्जित करते थे। केशों को मुकुट तुल्य
बाँध कर रखते थे। हाथी का चमड़ा धारण करते
थे, अथवा नग्न रहते थे। इनके आयुध, शूल, धनुष,
निषंग, वरूथ तथा असि थे। यह वर्णन अफ्रीका
तथा आस्ट्रेलिया की घोर जंगली जातियों से
मिलता है।
पूर्व काल मे अत्यन्त जंगली जाति थे। किन्तु
असुर एवं देवों के सम्पर्क के कारण इनकी स्थिति
में विशेष सुधार हो गया था। असुरों के सम्पर्क के
कारण नृत्य एवं संगीत इन्होंने सीखा। एक तरह की
सामाजिक व्यवस्था में इन्होंने अपने को संघटित
किया। उनकी मूल सामाजिक व्यवस्था क्या थी।
पुराणो आदि मे विस्तार से वर्णन नही मिलता।
स्वायम्भुव मन्वन्तर के पूर्व युग में भारतवर्ष
में ये निवास करते थे। इनका निवासस्थान
हिमाचल का पर्वतीय प्रदेश था। धुर उत्तरीय
हिमालय भाग में रहते थे। भारतवर्ष के सबमे
पुराने रहनेवाले थे। मूल निवासी थे।
असुरों तथा भूत जाति में प्रायः संघर्ष होता
रहा। उत्तर से असुरों का दबाव पड़ने लगा। ये
अपनी रक्षा निमित्त विन्ध्य की पहाड़ियों में चले
आये। यही रहने लगे थे।
शंकर भगवान् तथा अन्धकासुर के युद्ध में भूतों
ने शंकर के पक्ष में रहकर युद्ध किया था। इस युद्ध
में विनायक भूत ने सर्वप्रथम अन्धकासुर पर
आक्रमण किया था। अंधक ने विनायक को परास्त
कर दिया। अनन्तर नंदी तथा विनायक दोनों ने
अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। उस युद्ध में
अन्धकासुर पराजित हो गया था। अंधक शंकर
की शरण में आ गया। शंकर ने उसे भूतगण
का गणपति बनाया। उसका नाम भृंगी पड़ा।
भूत एक जाति थी। यह पर्वतीय जाति थी।
पिशाच एवं नाग जाति की तरह उत्तर पश्चिम
भारतीय सीमा के आस-पास रहते थे।
कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के संघर्ष के कारण
आर्यों का वहाँ आगमन हुआ। उसी प्रकार प्रतीत
होता है। भूत तथा असुरों के संघर्ष के कारण
कालान्तर में दुर्बल होने पर भूत जाति उत्तर से
दक्षिण की ओर बढ़ने लगी। अन्त में विन्ध्य की
पहाड़ियों में शरण ली। वैवस्वत मन्वन्तर के
काल तक उनका स्थानान्तरण उत्तर से दक्षिण
की ओर पूर्ण हो गया था। (वायु पुराण
३०:८९-१०१, वामनपुराण ६७:१-२३;
ब्रह्माण्ड: १:३२:८८-८९; २:३:२-३४ २:८.३९-४०;
२:९:६८-७८;)
भूतों को प्रेतों की संज्ञा कालान्तर मे दे दी
गयी। उन्हे शरीरहीन मृतको के जीव रूप में मान
लिया गया। बात इसके विपरीत है। भूत को

प्रथम तरंग
१५१

एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया
है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं ।
वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग
तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई
साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों
के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता
है ।
पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव
जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के
चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा
(३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा ।
धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी ।
ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी
प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह
प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि
प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है ।
(ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७)
पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक
देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा
गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद्
कहा गया है ।
रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही
थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक
स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया
है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष
एवं सभापति से भिन्न थे ।
उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान
व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता
था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में
इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है ।
वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था ।
(वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम
नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का
नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२)
वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह
करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि
प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों
का विस्तृत वर्णन किया गया है ।
उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन
किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख'
कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य'
एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग
आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी
पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक
गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम
से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण :
६७:१-२३)
भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात्
वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह
पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि
कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका
वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य
में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया
गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली
जातियों से मिलता है ।
बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत
को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत
व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही
मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है ।
वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त
करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी
गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को
पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत
वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख
मिलता है ।
मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों
के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह
पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे
प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय