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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 984 में से

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पृष्ठ 219

१३६ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०२ के 'वितस्तात्र' का पाठभेद
'वितस्ताद्रौ' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०२ (१) जिन-शासन : कल्हण यहाँ स्पष्ट
उल्लेख करता है कि राजा ने जिन-शासन स्वीकार
कर लिया था। यह मगध सम्राट् 'देवानाम् प्रिय',
'प्रियदर्शी' अशोक था इसमें सन्देह नहीं रह जाता ।
अशोक जन्मजात बुद्धधर्मावलम्बी नहीं था ।
कलिंग युद्ध के पश्चात् इतिहास की प्रचलित
धारणाओं के अनुसार बुद्ध धर्म स्वीकार किया था।
उसका व्यापक प्रचार किया था।
शंकराचार्य ने 'बौद्ध-शासन' शब्द का प्रयोग
किया है। 'धर्म' के स्थान पर 'शासन' शब्द का
प्रयोग वस्तुस्थिति में अन्तर नहीं उत्पन्न करता।
कल्हण के 'जिन-शासन' शब्द का कुछ लेखकों
ने अर्थ 'जैन धर्म' लगाया है। यह गलत है।
उस समय हिन्दू अथवा सनातन धर्म शब्द प्रचलित
नहीं थे। एक ही धर्म था। वह था भारतीय धर्म।
उसमें अनेक सम्प्रदाय एवं पन्थ थे। उसी प्रकार
'बुद्ध शासन' भी कश्मीर में तथा भारत में एक पन्थ,
सम्प्रदाय किंवा शासन था। धर्म शब्द आधुनिक काल
की देन है। जैसे सिख पन्थ है। राजनीतिक कारणों
से सिख धर्म को धर्म की संज्ञा देकर उसे भारतीय
हिन्दू धर्म से अलग करने का प्रयास किया गया है।
काशी में श्री गुरु तेगबहादुर देव जी की संगत है।
श्री गुरु नानक देव जी का बाग है। मुझे अच्छी तरह
याद है। हम छोटेपन में एक बैनर लेकर चलते
थे। उस पर लिखा रहता था 'हिन्दू धर्म रक्षक श्री
गुरु गोविन्द सिंह जी जयन्ती।' मैं कितने ही वर्षों
तक इस उत्सव में सम्मिलित होता रहा। परन्तु
पचास वर्षों में सब कुछ बदल गया है।
अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। यह
एक ऐतिहासिक तथ्य है। कल्हण के वर्णन की
सत्यता प्रमाणित करता है। इस श्लोक में स्तूपों के
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
स्थापित करने का उल्लेख मिलता है।
अशोक ने समस्त भारत में स्तूपों तथा स्तम्भों की
शृंखला स्थापित की थी। भगवान् के धातुओं पर
चारों ओर धर्मराजिक स्तूपों का निर्माण कराया था।
कल्हण अशोक द्वारा स्तूप मण्डलों की स्थापना
का उल्लेख करता है। यह अशोक के राज्यकाल
एवं जीवन की विशेषता थी। कल्हण इस अकाट्य
सत्य का समर्थन करता है।
इस तरंग के श्लोक संख्या १०३ से बातें और
साफ हो जाती हैं। अशोक ने चैत्य तथा विहार शब्द
की स्थापना करायी थी। चैत्य एवं विहार शब्द शुद्ध
बौद्ध धर्म सम्बन्धी शब्द हैं। उनके द्वारा पूजनीय
स्थान चैत्य तथा प्रव्रजितों के निवासस्थान विहारों
का बोध होता है। उनका निर्माण कराना बौद्ध धर्म के
प्रति श्रद्धालु भक्त का कर्तव्य माना जाता है।
धार्मिक पुण्य कर्म उसी प्रकार हैं जिस प्रकार हिन्दू
मन्दिर, धर्मशाला, मठ और मुसलमान मस्जिद,
जियारत, तथा सराय का निर्माण कराता
है। कल्हण अशोक के जीवन से इस पहलू पर प्रकाश
डालता है। जिसकी साक्षी भारतीय इतिहास स्पष्ट
और बलवती भाषा में करता है।
(२) शुष्क लेत्र : श्री स्टीन ने सन् १८९१
में पं० काशीराम को इस स्थान की जाँच के लिये
भेजा था। यह स्थान हुष्केलेत्र कहा जाता था। यह
वर्तमान ग्राम हुष्कलित्तर है। इसे हकलित्री भी कहते
हैं। श्री स्टीन द्वारा प्रस्तुत मानचित्र में इसे हकलेट्री
नाम से दिखाया गया है। दुस्त परगना में है। श्री
काशीराम को इस स्थान पर प्राचीन भग्नावशेष तथा
चिह्न नहीं मिले।
मैं यहाँ आया था। आधुनिक विकास के कारण
ग्राम का पुराना रूप बदलता जा रहा है। मुझे दो
चार शिला खण्ड अवश्य मिले। उनके देखने से किसी
समय यहाँ किसी इमारत के होने का अनुमान किया जा
सकता है। वर्तमान समय में पत्थर लाना और उनसे
निर्माण कराना प्रायः समाप्त हो गया है। कश्मीर