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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

६ प्रासादमण्डने
जिस दिशा में वत्स का मुख हो, उस दिशा में तथा मुख के सामने वाली दिशा में खात,
देव प्रतिष्ठा, द्वार प्रतिष्ठा आदि कार्य करना शास्त्र मे वर्जित है, परन्तु वत्समुख एक दिशा में
तीन तीन मास तक रहता है। इसलिये तीन मास तक उक्त कार्य को नही रोकने के लिये
ठक्कुर फेरु कृत 'वत्थुसार पयरण' प्र० १ गाथा २० में विशेष रूप से बतलाया है कि—
“गिहभूमि सत्तभाए पण दह तिहि तीस तिहि दहक्क कमा
इम्र दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमकि वच्छठिई ॥”
घर या प्रासाद की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात सात भाग करना, उनमे अनुक्रम से प्रथम
भाग में पांच दिन, दूसरे में दस दिन, तीसरे में पंद्रह दिन, चौथे में तीस दिन, पांचवें मे पंद्रह
दिन, छठे में दस दिन और सातवे भाग में पांच दिन वत्स का मुख रहता है। इस प्रकार भूमि
की चारो दिशाओं मे दिन संख्या समझना चाहिये। जिस अंक पर वत्स का मुख हो, उसी अंक के
सामने वाले बराबर के अंक पर वत्स की पूंछ रहती है। इस प्रकार की वत्स की स्थिति है।
[चक्र: उत्तर— वायव्य

प्रथमोऽध्यायः ७
वत्सके सिर के भाग में और उनके सामने के भाग मे देव मंदिर अथवा मनुष्य के घर
नही बनावे, यदि बनावेगे तो मृत्यु, रोग और भय हमेशा बना रहेगा। इसलिये वत्स की कुक्षि
में कार्य करना अच्छा है। विशेष उक्त ग्रंथ मे देखें ।
आयादिका विचार—
आयो व्ययर्द्ध्मंशस्य भित्तिवाह्ये सुरालये ।
ध्वजायो देवनक्षत्रं व्ययांशौ प्रथमौ शुभौ ॥१६॥
आय, व्यय, नक्षत्र और अंश आदि की गणना देवालय मे दीवार के बाहर के भाग से
होती है। देवालय मे ध्वज आय, देव नक्षत्र, प्रथम व्यय और प्रथम अंश ये शुभ है ॥१६॥
केषाञ्चिन्मरुतां¹ गेहे वृषसिंहगजाः शुभाः ।
आयादूने² व्ययः श्रेष्ठः पिशाचस्तु समोऽधिकः ॥२०॥
देवालयों मे वृष, सिंह और गज आय भी श्रेष्ठ है। अपराजित पृच्छा सूत्र ६४ में भी
कहा है कि—'ध्वजः सिंहो वृषगजो शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।' आय से व्यय कम हो तो श्रेष्ठ है।
सम व्यय हो तो पिशाच और अधिक व्यय हो तो राक्षस नाम का व्यय माना जाता है ॥२०॥
देवालय में विचारणीय—
देवतानां गृहे चिन्त्य-मायाद्यङ्गचतुष्टयम् ।
नवाङ्गं नादीवेधादि-स्थापकामरयोर्मिथः ॥२१॥
देवालय मे आय, व्यय, अंश और नक्षत्र इन चार अंगों का, तथा स्थापक (देव स्थापन
करने वाले ) और देव इन दोनो के परस्पर नाडीवैध, योनि, गण, राशि, वर्ण, वश्य, तारा,
वर्ग और राशिपति, इन नव अङ्गों का विचार करना चाहिये ॥२१॥
आयादिचिन्तनं भूमि-लक्षणं वास्तुमण्डलम् ।
मासनक्षत्रलग्नादि-चिन्तनं पूर्वशास्त्रतः ॥२२॥
आय आदिका विचार, भूमिका लक्षण, वास्तु मण्डल, मास, नक्षत्र और लग्न आदिका
विचार, ये सब राजवल्लभ मंडन और अपराजित पृच्छा आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥२२॥
आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार—
“व्यासे दैर्घ्यगुणेऽष्टभिर्विभजिते शेषो ध्वजाद्यायको,
ऽष्टघ्ने तद्गुणिते च धिष्ण्यभजिते साहक्षमश्वादिकम् ।
(१) केपा च (२) हीन आय.द

८ प्रासादमण्डने
नक्षत्रे वसुभिर्व्ययोऽपि भजिते हीनस्तु लक्ष्मीप्रदः,
तुल्यायश्च पिशाचको ध्वजमृते संवर्द्धितो राक्षसः ॥” राज व० अ० ३
प्रासाद अथवा गृह बनाने की भूमि की लंबाई और चौड़ाई के नाप का गुणाकार करने
से जो गुणनफल हो, वह क्षेत्रफल कहा जाता है । इसको आठ से भाग देने से जो शेष बचे,
वह ध्वज आदि आय कहलाती है । क्षेत्रफल को आठ से गुणा करके, गुणनफल को सत्ताईस से
भाग दे जो शेष बचे वह अश्विनी आदि नक्षत्र होता है । नक्षत्र की जो संख्या आवे, उसमे आठ
का भाग देने से जो शेष बचे वह व्यय कहलाता है । आय से व्यय कम हो तो लक्ष्मी को प्राप्त
करने वाला है । आय और व्यय दोनों बराबर हो तो पिशाच नाम का व्यय और ध्वज आय
को छोड़कर दूसरी आयों से व्यय अधिक हो तो वह राक्षस नाम का व्यय कहलाता है ।
आयों की संज्ञा और दिशा—
“ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरो गजः ।
ध्वांक्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राचादिषु प्रदक्षिणाः ॥” अप० सू० ६४
ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज और ध्वांक्ष, ये आठ आयों के नाम है। वे
अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी हैं ।
प्रासाद के प्रशस्त आय—
ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यते सुरवेश्मनि ।
अधमानां खरध्वांक्ष-धूम्रश्वानाः सुखावहाः ॥” अप० सू० ६४
ध्वज, सिंह, वृष और गज ये चार आय देवालय में शुभ हैं । तथा खर, ध्वांक्ष, धूम
और श्वान ये चार आय अधम जातिवालों के घरों मे सुखकारक है¹ ।
व्यय संज्ञा—
“शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः ।
श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥
· समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसास्तु व्ययोऽधिकः ।
व्ययो यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥” अप० सू० ६६
शान्त, पौर, प्रद्योत, श्रियानन्द, मनोहर, श्रीवत्स, विभव और चिन्तात्मा, ये व्ययों के
आठ नाम हैं । आय और व्यय समान हो तो पिशाच नाम का व्यय, आय से व्यय अधिक
हो तो राक्षस नाम का व्यय और आय से व्यय कम हो तो यक्ष नाम का व्यय होता है । यह,
धन धान्य की वृद्धि करने वाला है ।
(१) विशेष जानने के लिये देखो मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ

प्रथमोऽध्यायः ६
राशि, योनि, नाड़ी, गण आदि जानने का शतपद्‌चक्र—

संख्यानक्षत्रअक्षरराशिवर्णवश्ययोनिराशीशगणनाडीचन्द्रव्यय
१अश्विनिचू. चे.<br>चो. ला.मेषक्षत्रियचतुष्पदअश्वमंगलदेवआद्यउत्तरशान्त
२भरणीली. लू.<br>ले. लो.मेषक्षत्रियचतुष्पदगजमंगलमनुष्यमध्यउत्तरपीर
३कृत्तिकाअ. इ.<br>उ. ए.१ मेष<br>२ वृष१ क्षत्रिय<br>३ वैश्यचतुष्पदबकरा१ मंगल<br>३ शुक्रराक्षसअन्त्यपूर्वप्रद्योत
४रोहिणीओ. वा.<br>वी. वु.वृषवैश्यचतुष्पदसर्पशुक्रमनुष्यअन्त्यपूर्वश्रियानंद
५मृगशिरवे. वो.<br>का. की.२ वृष<br>२ मिथुन२ वैश्य<br>२ शूद्र२ चतुष्पद<br>२ मनुष्यसर्प२ शुक्र<br>२ बुधदेवमध्यपूर्वमनोहर
६आर्द्राकु. घ.<br>ङ. छ.मिथुनशूद्रमनुष्यश्वानबुधमनुष्यआद्यपूर्वश्रीवत्स
७पुनर्वसुके. को.<br>हा. ही.३ मिथुन<br>१ कर्क३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ जलचरमार्जार३ बुध<br>१ चन्द्रदेवआद्यपूर्वविभव
८पुष्यहू. हे.<br>हो. डा.कर्कब्राह्मणजलचरबकराचन्द्रमादेवमध्यपूर्वचिन्तात्म
९आश्लेषाडी. डू.<br>डे. डो.कर्कब्राह्मणजलचरमार्जारचन्द्रमाराक्षसअन्त्यपूर्वशान्त
१०मघामा. मी.<br>मु. मे.सिंहक्षत्रियवनचरचूहासूर्यराक्षसअन्त्यदक्षिणपीर
११पूर्वा फा०मो. टा<br>टी. टू.सिंहक्षत्रियवनचरचूहासूर्यमनुष्यमध्यदक्षिणप्रद्योत
१२उत्तरा फा.टे. टो.<br>पा. पी.१ सिंह<br>३ कन्या१ क्षत्रिय<br>३ वैश्य१ वनचर<br>३ मनुष्यगो१ सूर्य<br>३ बुधमनुष्यआद्यदक्षिणश्रियानन्द
१३हस्तपु. षा.<br>ण. ठ.कन्यावैश्यमनुष्यभैंसबुधदेवआद्यदक्षिणमनोहर

१० प्रासादमण्डने

संख्यानक्षत्रअक्षरराशिवर्णवश्ययोनिराशीशगणनाडीचन्द्रव्यय
१४चित्रापे. पो<br>रा. री.२ कन्या<br>२ तुला२ वैश्य<br>२ शूद्रमनुष्यवाघ२ बुध<br>२ शुक्रराक्षसमध्यदक्षिणश्रीवत्स
१५स्वातिरु. रे.<br>रो. ता.तुलाशूद्रमनुष्यभैंसशुक्रदेवअंत्यदक्षिणविभव
१६विशाखाती. तु.<br>ते. तो.३ तुला<br>१ वृश्चिक३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ कीडाव्याघ्र३ शुक्र<br>१ मंगलराक्षसअंत्यदक्षिणचिन्तात्मा
१७अनुराधाना. नी.<br>नु. ने.वृश्चिकब्राह्मणकीडाहीरणमंगलदेवमध्यपश्चिमशान्त
१८ज्येष्ठानो या.<br>यी. यु.वृश्चिकब्राह्मणकीडाहीरणमंगलराक्षसआद्यपश्चिमपौर
१९मूलये. यो.<br>भा. भी.धनक्षत्रियमनुष्यकुक्कुरगुरुराक्षसआद्यपश्चिमप्रद्योत
२०पूर्वाषाढाभु. धा.<br>फ. ढा.धनक्षत्रियमनुष्य<br>चतुष्पदवानरगुरुमनुष्यमध्यपश्चिमश्रियानन्द
२१उत्तराषाढाभे. भो.<br>जा. जी.१ धन<br>३ मकर१ क्षत्रिय<br>३ वैश्यचतुष्पदन्योला१ गुरु<br>३ शनिमनुष्यअंत्यपश्चिममनोहर
२२श्रवणखी. खू.<br>खे खो.मकरवैश्यचतुष्पद<br>जलचरवानरशनिदेवअंत्यपश्चिमश्रीवत्स
२३धनिष्ठागा. गी.<br>गु गे.२ मकर<br>२ कुम्भ२ वैश्य<br>२ शूद्र२ जलचर<br>२ मनुष्यसिंहशनिराक्षसमध्यउत्तरविभव
२४शतभिषागो. सा.<br>सी. सुकुम्भशूद्रमनुष्यघोडाशनिराक्षसआद्यउत्तरचिन्तात्मा
२५पूर्वा भाद्रसे. सो.<br>दा. दी३ कुम्भ<br>१ मीने३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ जलचरसिंह३ शनि<br>१ गुरुमनुष्यआद्यउत्तरशान्त
२६उत्तराभाद्रदु. थ.<br>झ. ञ.मीनब्राह्मणजलचरगौगुरुमनुष्यमध्यउत्तरपौर
२७रेवतीदे. दो.<br>चा ची.मीनब्राह्मणजलचरहाथीगुरुदेवअंत्यउत्तरप्रद्योत

प्रथमोऽध्यायः ११
ध्वजाय और देवगणनक्षत्रवाले समचोरस क्षेत्र का माप—
गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र
१-१ मृगशीर ७-२१ रेवती १५-१ अनुराधा
१-३ रेवती ७-२३ मृगशीर १५-६ रेवती
१-५ मृगशीर ८-७ अनुराधा १५-१६ पुष्य
१-१३ अनुराधा ८-१५ रेवती १६-३ रेवती
१-२१ रेवती ८-२३ पुष्य १६-११ अनुराधा
२-५ पुष्य ९-१ पुष्य १६-१६ मृगशीर
२-७ पुष्य ९-६ रंवती १६-२१ रेवती
२-१५ रेवती ९-१७ अनुराधा १७-१३ रेवती
२-२३ अनुराधा १०-१ मृगशीर १७-१५ रेवती
३-७ मृगशीर १०-३ रेवती १७-२३ पुष्य
३-६ रेवती १०-५ मृगशीर १८-१ पुष्य
३-११ मृगशीर १०-१३ अनुराधा १८-६ रेवती
३-१६ अनुराधा ११-५ पुष्य १८-१७ रेवती
४-३ रेवती ११-७ पुष्य १९-१ मृगशीर
४-११ पुष्य ११-१५ रेवती १९-३ रेवती
४-१३ पुष्य ११-२३ अनुराधा १९-५ मृगशीर
४-२१ रेवती १२-७ मृगशीर १९-२१ रेवती
५-५ अनुराधा १२-६ रेवती १९-२३ पुनर्वसु
५-१३ मृगशीर १२-११ मृगशीर २०-५ पुष्य
५-१५ रेवती १२-१६ अनुराधा २०-७ पुष्य
५-१७ मृगशीर १३-३ रेवती २०-१५ रेवती
६-१ अनुराधा १३-११ पुष्य २०-१६ हस्त
६-६ रेवती १३-१३ पुष्य २०-२३ अनुराधा
६-१७ पुष्य १३-२१ रेवती २१-७ मृगशीर
६-१६ पुष्य १४-५ अनुराधा २१-६ रेवती
७-३ रेवती १४-१३ मृगशीर २१-११ मृगशीर
७-११ अनुराधा १४-१५ रेवती २१-१६ अनुराधा
७-१६ मृगशीर १४-१७ मृगशीर २१-२३ मृगशीर

१२ प्रासादमण्डने
अंश लाने का प्रकार—
"तन्मूले व्ययहर्म्यनामसहिते भक्ते त्रिभिस्त्वंशकः,
स्यादिन्द्रो यमभूपती क्रमवशाद् देवे सुरेन्द्रो हितः ।
वेश्यामेष यमस्तु पण्यभवने नागे तथा भैरवे,
राजांशो गजवाजियाननगरे राज्ञां गृहे मन्दिरे ॥" राज० अ० ३
मूलराशि (क्षेत्रफल) मे व्यय की संख्या और घरके नामाक्षर की संख्या जोड़ करके
उसमें तीन से भाग दें । जो एक शेष बचे तो इन्द्रांश, दो शेष बचे तो यमांश और तीन (शून्य)
शेष बचे तो राजांश जाने । इन्द्र का अंश-देवालय और वेदी में शुभ है । यमका अंश-दुकान,
नागदेव और भैरव के प्रासाद में शुभ है । राजा का अंश-गजशाला, अश्वशाला, वाहन, नगर,
राजमहल और साधारण घर मे शुभ है ।
दिक् साधन—
रात्रौ दिक्साधनं कुर्याद् दीपसूत्रध्रुवैक्यतः ।
समे भूमिप्रदेशे तु शङ्कुना दिवसेऽथवा ॥२३॥
घर और देवालय आदि बराबर वास्तविक दिशा में न होने से दिङ् मूढदोष माना जाता
है । इसलिये गृह आदि बराबर ठीक दिशा मे रखने के लिये दिक् साधन करना जरूरी है ।
रात्रि मे दिशा का साधन दीपक, सूत और ध्रुव से किया जाता है और दिन मे दिशा का
साधन समतल भूमि के ऊपर शंकु रखकर किया जाता है ॥२३॥
"प्राची मेषतुलारवेरुदयतः स्याद् वैष्णवे वह्निभे,
चित्रास्वातिभमध्यगा निगदिता प्राची बुधैः पञ्चधा ।
प्रासादं भवनं करोति नगर दिङ्मूढमर्थक्षयं,
हर्म्ये देवगृहे पुरे च नितरामायुर्धनं दिङ्मुखे ॥" राज० अ० १
मेष और तुला संक्रान्ति को सूर्य का उदय पूर्व दिशा मे होता है । श्रवण और कृत्तिका
नक्षत्र का उदय पूर्व दिशा मे होता है । चित्रा और स्वाति नक्षत्र के मध्य में पूर्व दिशा मानी
जाती है । विद्वानो ने कहा है कि इन पांच प्रकार से पूर्व दिशा को जानें । प्रासाद गृह और
नगर को दिङ् मूढ करने से धन का नाश होता है । यदि ये वास्तविक दिशा मे हो तो हमेशा
आयु और धन की वृद्धि होती है ।
रात्री में और दिन में दिक्साधन—
"तारे मार्कटिके ध्रुवस्य समतां नीतेऽवलम्बे नते,
दीपाग्रेण तदैक्यतश्च कथिता सूत्रेण सा सौम्या दिशा ।

प्रथमोऽध्यायः १३
शङ्कोर्नेत्रगुणे तु मण्डलवरे छायाद्वयान्मत्स्ययो-
र्जाता यत्र युतिस्तु शङ्कु तलतो याम्योत्तरे स्त* स्फुटे ॥'*
राज० अ० १ श्लो० ११
रात्रि में दिक् साधन—
सप्तर्षि और ध्रुव के बीच मे एक गज के अन्तर वाले दो तारा है जो ध्रुव के चारो
तरफ घूमते है उनको मर्कटिका कहते है। यह मर्कटिका और ध्रुव जब बराबर समसूत्र मे आवे,
तब एक अवलम्ब लटकावे और उसके सामने दक्षिण की तरफ एक दीपक रखें । यदि दीपक का
अग्र भाग, अवलंब और ध्रुव ये तीनो बराबर समसूत्र में दिखाई पड़े तो उसे उत्तर दिशा आने ।
अवलंब और दीपक के समसूत्र एक रेखा खींची जाय तो वह उत्तर दक्षिण रेखा होगी * ।
दिन मे दिक्साधन करना हो तो समतल भूमि के ऊपर बत्तीस अंगुल का एक गोल चक्र
बनावें, उसके मध्य बिन्दु पर एक बारह अंगुल के नाप का शंकु रखें । पश्चात् दिन के पूर्वार्ध
मे देखे कि शंकुकी छाया गोल मे जिस जगह प्रवेश करे, वहां एक चिह्न करे वह पश्चिम दिशा
होगी और दिन के उत्तरार्ध में जहां बाहर निकले वहा एक बिन्दु करे यह पूर्व दिशा होगी ।
पीछे पूर्व और पश्चिम की इन दोनो बिन्दुओ तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व
पश्चिम रेखा होगी, इसको व्यासार्ध मान करके दो गोल बनावें, जिसे एक मत्स्य के जैसी आकृति
होगी, उसके ऊपर और नीचे के योग बिन्दु से एक सरल रेखा खीची जाय तो यह उत्तर
दक्षिण रेखा होगी । देखो नीचे का दिक्साधन चक्र—
चक्र परिचय—
बत्तीस अंगुल का 'इ उ ए' एक गोल है, उसका मध्य बिन्दु 'अ' है । उसके ऊपर बारह
अंगुल का एक शंकु रखकर दिन के पूर्वार्द्ध में देखा गया तो शंकुकी छाया गोल के 'क' बिन्दु
के पास प्रवेश करती है, यह पश्चिम दिशा जाने और दिनार्द्ध के बाद 'च' बिन्दु के पास बाहर
निकलती है, यह पूर्व दिशा जाने । इन 'क' और 'च' दोनों बिन्दु तक एक सरल रेखा खीची
जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होती है । इसको व्यासार्द्ध मान कर 'क' बिन्दु से 'च छ ज' और
दूसरा 'च' बिन्दु से 'क ख ग' ऐसे दो गोल बनावे तो पूर्व पश्चिम रेखा के ऊपर एक मछली
के जैसी आकृति हो जाती है। उसके मध्य बिन्दु 'अ' से एक सरल रेखा खीची जाय जो गोलके
दोनो स्पर्श बिन्दु से बाहर निकल जाय, यह उत्तर दक्षिण रेखा होती है ।

  • उपरोक्त प्रकार से भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होता, क्योकि अयनाश के कारण ध्रुव का
    तारा एव कृत्तिकादि नक्षत्र ठीक दिशा मे उदय नहीं होता । जिसे आजकल नवीन आविष्कार दिक् साधन यन्त्र
    (कुतुबनुमा) से करना चाहिये ।

१४ प्रासादमण्डने
खात विधि—
नागवास्तुं समालोक्य कुर्यात् खातविधिं¹ सुधीः ।
पाषाणान्तं जलान्तं वा ततः कूर्मं निवेशयेत् ॥२४॥
प्रथम शेषनाग चक्र का विचार करके विद्वान् शिल्पी खात विधि करें। नींव को खोदने से
भूमि में पाषाण अथवा पानी निकल जाय, उसके ऊपर कूर्म (कच्छुआ) की स्थापना करें ॥२४॥
नागवास्तु—
“कन्यादौ रवितस्त्रये फणीमुखं पूर्वादि सृष्टिकमात्”
ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २२ मे कहा है कि—
कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे; धन, मकर कुम्भ
राशि का सूर्य हो तब दक्षिण दिशा मे; मीन, मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब पश्चिम दिशा
मे, मिथुन कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब उत्तर मे शेषनाग का मुख रहता है।
“पूर्वास्येऽनिलखातनं यममुखे खातं शिवे कारये-
च्छीर्षे पश्चिमगे च वह्नि खननं सौम्ये खनेन्नैर्ऋते।।”
ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २४ में कहा है कि-शेषनाग का मुख
पूर्व दिशा मे हो तो वायुकोण में, दक्षिण दिशा मे हो तो ईशानकोण मे, पश्चिम दिशा मे हो तो
अग्निकोण में और उत्तर दिशा मे हो तो नैर्ऋत्य कोण मे खात करना चाहिये।
(१) वास्तुविधि

प्रथमोऽध्याय १५
ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त्त ग्रन्थों मे अन्य प्रकार से कहा है। मुहूर्त्त चिन्तामणि के वास्तु
प्रकरण श्लोक १६ की टीका मे विश्वकर्मा का प्रमाण देकर लिखा है कि—
"ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु ।
शेषस्य वास्तोर्मुखमध्यपुच्छं, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ॥"
शेषनाग प्रथम ईशानकोण से चलता है, उसका मुख, नाभि और पूंछ सृष्टिमार्ग को
छोड़कर विपरीत विदिशा में रहता है । अर्थात् ईशान मे मुख, वायुकोण में नाभि और नैर्ऋत्य
कोण मे पूंछ रहता है। इसलिये इन तीनों विदिशाओ को छोड़कर चौथा अग्निकोण खाली
रहता है, उसमें प्रथम खात करना चाहिये ।
राहु (नाग) मुख—
'देवालये गेहविधौ जलाश्रये, राहोर्मुखं शम्भुदिशो विलोमतः ।
मीनार्क सिंहार्कमृगार्कतस्त्रिभे, खाते मुखात् पृष्ठविदिकूशुभाभवेत् ॥'
देवालय का खात मुहूर्त्त करते समय राहु का मुख यदि मीन, मेष और वृषभ राशि का
सूर्य हो तब ईशान कोण में, मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वायुकोण मे, कन्या
तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब नैर्ऋत्यकोण मे, धन, मकर और कुम्भ राशि का
सूर्य हो तब अग्निकोण मे, राहु का मुख रहता है।
घरके खात मुहूर्त्त के समय नाग का मुख सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान
कोण मे, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कुम्भ मीन और मेषराशि के
सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य मे अग्निकोण मे राहु का मुख
रहता है।
कुंआ, बावडी, तालाब आदि जलाशयको आरंभ करते समय राहु का मुख मकर कुम्भ
और मीन राशि के सूर्य मे ईशान कोण मे, मेष वृष और मिथुन राशि के सूर्य मे वायुकोण मे,
कर्क सिंह और कन्या राशि के सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, तुला वृश्चिक और धन राशी के सूर्य मे
अग्निकोण में राहु का मुख रहता है।
जिस विदिशा में राहु का मुख हो, उसके पीछे की विदिशा मे खात करना शुभ है।
जैसे-ईशान कोण मे मुख है, तो अग्निकोण मे, वायुकोण में मुख हो तो ईशानकोण में,
नैर्ऋत्य कोण में मुख हो तो वायुकोण मे और अग्निकोण मे मुख हो तो नैर्ऋत्य कोण मे
खात करना शुभ है।*

  • राहु मुख याने नागमुख या वास्तुमुख इसमे बहुत मतान्तर है। कोई सृष्टि क्रम से और कोई
    विलोम क्रम से मानते है। विशेष जानने के लिये देखे स्वयं द्वारा अनुवादित 'राजवल्लभ मंडन ग्रंथ'।

१६ प्रासादमण्डने

कूर्ममान—
अर्धाङ्गुलो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये ।
अर्धाङ्गुला ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधि ॥२५॥
एकत्रिंशत्करान्तं च तदर्धा वृद्धिरिष्यते ।
ततोऽर्धापि शतार्धान्तं कूर्मो मन्वङ्गुलोत्तमः ॥२६॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में आधे अंगुल के नाप का कूर्म ( कच्छूआ ) नींव में
स्थापित करे। दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके,
(दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल, चार हाथ के
प्रासाद मे दो अंगुल, इस प्रकार आधा २ अंगुल बढ़ाने से पंद्रह हाथ के प्रासाद में साढ़े सात
अंगुल के मान का कूर्म होता है)। सोलह से इकतीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके और बत्तीस से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २
सूत बढ़ा करके नींव में स्थापित करें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में
एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है ॥२५-२६॥
अपराजितपृच्छा के मत से कूर्ममान—
"एकहस्ते सुरागारे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधिः ॥
पादवृद्धिः पुनः कार्याद् विंशतिहस्ततः करे ।
ऊर्ध्वं वै त्रिशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥
ततः परं शतार्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम् ।
अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र ५२
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में कूर्म चार अंगुल के मान का, दोसे दस हाथ के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा कर के, ग्यारह से बीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, इक्कीस से तीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत
बढा कर के और इकतीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ १/१२ अंगुल बढ़ा कर के
बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में लगभग चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है।
अपराजितपृच्छाके मत से दूसरा कूर्ममान—
“एकहस्ते तु प्रासादे कूर्मश्चार्धाङ्गुलः स्मृतः ।
अर्द्धवृद्धिः प्रकर्त्तव्या पञ्चदशहस्तावधिः ॥
एकत्रिंशच्च हस्तान्तं पादवृद्धिः प्रकीर्त्तिता ।
तदर्धेन 'पुनर्वृद्धि-र्मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र १५३

प्रथमोऽध्यायः १७
एक हाथ के प्रासाद मे कूर्म आधा अंगुल का, दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ आधा २ अगुल बढा करके, सोलह से एकतीस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल
बढ़ा करके, और बत्तीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा करके बनावे।
इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है।
क्षीरार्णव के मत से कूर्ममान--
“शिलायाः पञ्चमांशेन कर्तव्यं कूर्ममुत्तमम् ।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं दिव्यपुष्पैश्च पूजितम् ॥” अध्याय १०१
धारणी शिला के पाचवे भाग का कूर्म बनावे, यह उत्तम मान है। उसको सब प्रकार के
अलंकारों से युक्त करे और सुगंधित पुष्पो से पूजित करे ।
कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान—
चतुर्थांशाधिको ज्येष्ठः कनिष्ठो हीनयोगतः ।
सौवर्णो रूप्यजो वापि स्नाप्यः पञ्चामृतेन स ॥२७॥
तिलैर्यवैस्तथा होम-पूर्णां चैव प्रदापयेत् ।
कूर्मका जो मान आया हो, वह मध्यम मान है, उसमे इस मान का चौथा भाग बढ़ावे
तो ज्येष्ठ मानका और चौथा भाग कम करे तो कनिष्ठ मानका कूर्म होता है। यह कूर्म सुवर्ण
अथवा चांदी का बनाना चाहिये । उसको पञ्चामृत से स्नान कराके, तथा तिल और जवो का
पूर्णा आहुति पूर्वक होम करके स्थापित करे ॥२७॥
शिला और कूर्म का स्थापन क्रम—
ईशानादग्निकोणाद्वा शिलाः स्थाप्याः प्रदक्षिणाः ॥२८॥
मध्ये कूर्मशीला पश्चाद् गीतवादित्रमङ्गलैः ।
बलिदानं च नैवेद्यं विविधाम्नं घृतप्लुतम् ॥
देवताभ्यः सुधीर्दद्यात् कूर्मन्यासे शिलासु च ॥२६॥
इति कूर्म स्थापनम् ।
प्रथम ईशान अथवा अग्नि कोने मे नंदा शिला की स्थापना करके पीछे प्रदक्षिण क्रम से
अन्य शिलाओ को स्थापित करे। पीछे मध्य मे कूर्म शिला (धारणी शिला) को स्थापित करे ।
शिला स्थापन करते समय मांगलिक गीत और वाजींत्रों का नाद करावे। वास्तु के देवों को
बलि बाकुले, नैवेद्य और अनेक प्रकार के धान्य के घृत से पूर्ण मालपूवे आदि चढावें ॥२८-२९॥
प्रा० ३

१८ प्रासादमण्डने
पुनः शिला स्थापन क्रम—
“नन्दां पुरः प्रदातव्यां शिलाः शेषाः प्रदक्षिणो ।
मध्ये च धरणी स्थाप्या यथाक्रमं प्रयत्नतः ॥” क्षीरार्णवे अध्य० १०१
प्रथम नन्दा नाम की शिला को स्थापित करे, पीछे अनुक्रम से भद्रा आदि शिलाओं को
प्रदक्षिण क्रम से स्थापित करे और मध्य मे धरणी शिला को स्थापन करे। ऐसा क्षीरार्णव
ग्रंथ मे कहा है।
शिला के नाम—
‘'नन्दा भद्रा जया रिक्ता अजिता चापराजिता ।
शुक्ला सौभाग्यिनी चैव धरणी नवमी शिला ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१
नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, अजिता, अपराजिता, शुक्ला और सौभाग्यिनी ये अनुक्रम से
दिशाओं की आठ शिलाओ के नाम है। नवमी धरणी नाम की शिला मध्य भाग की है।
अपराजित मत से शिला के नाम—
“नन्दा भद्रा जया पूर्णा विजया पञ्चमी शिला
मङ्गला ह्यजितापरा-जिता च धरणीभवाः ॥”
नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, विजया, मंगला, अजिता, अपराजिता, ये अनुक्रम से दिशाओं
को शिला के नाम है और मध्य भाग की नववी धरणी नाम की शिला है।
धरणी शिला का मान—
“एक हस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
द्वयङ्गुला च भवेद् वृद्धिर्य्यावच्च दशहस्तकम् ॥
दशोर्ध्वं विंशपर्यन्तं हस्ते हस्ते चैकाङ्गुला ।
अर्द्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिर्य्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥
तृतीयांशे कृते पिण्डे तदर्धं रूपपातकम् ।
पुष्पाणि च यथाकारं शिलामध्ये ह्यलंकृतम् ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१
एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की शिला, दोसे दस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ दो २ अगुल वढा करके, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद में एक एक अंगुल बढ़ा करके,
और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मे आधा २ अंगुल बढा करके स्थापित करे । इस
प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे ४७ अंगुल के मान की समचोरस धरणी शिला होती है।

प्रथमोऽध्याय १६
शिला का जो समचोरस मान आवे, उसके तीसरे भाग का पिंड (मोटाई) रक्खे। पिंड के आधे
भाग मे शिला के ऊपर रूपो बनावे। तथा पुष्पकी आकृति बनावे।
ज्ञान प्रकाश दीपार्णव के मत से धरणी शिला का मान—
“एकहस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
षडंगुला द्विहस्ते तु त्रिहस्ते ग्रहसंख्यया ॥
द्वादशाङ्गुलं शिलामानं प्रासादे चतुर्हस्तके।
तृतीयांशोदयः कार्यो हस्ताद्याद् वेदहस्तकम् ॥
चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ।
पादोनाङ्गुला च वृद्धि-र्हस्ते हस्ते च दापयेत् ॥
सूर्यहस्तादितः कृत्वा यावच्च जिनहस्तकम् ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-रुच्छ्रये तु नवाङ्गुल। ॥
चतुर्विंशादितः कृत्वा यावत् षट्त्रिंशहस्तकम् ।
पादोनाङ्गुला च वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाङ्गुलम् ॥
षट्त्रिंशादितश्च कृत्वा यावत् पञ्चाशद्धस्तकम् ।
एकाङ्गुला भवेद् वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाङ्गुलम् ॥” ग्र० ११
एक हाथ के प्रासाद मे शिला का मान चार अंगुल, दो हाथ मे छः अंगुल, तीन हाथ मे
नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद मे बारह अंगुल शिला का मान है। एक से चार हाथ
तक के प्रासाद मे शिला का जो
मान आवे, उसके तीसरे भाग
शिला की मोटाई रक्खे। पाच से
बारह हाथ तक के प्रासाद मे
प्रत्येक हाथ पौन २ अंगुल बढ़ाकर
के, तेरह से चोबीस हाथ तक के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २
अंगुल बढ़ा करके बनावे। पाच से
चौबीस हाथ तक के प्रासाद मे
शिला का जो मान आवे उसकी
मोटाई नव अंगुल की रक्खे ।
पचीस से छत्तीस हाथ तक पौन २


[चित्रगत विवरण / यन्त्र-मण्डल]:

  • बाह्य आयुध/प्रतीक:
    • ऊपर: ध्वजा, गदा, त्रिशूल
    • दाएँ: वज्र, शक्ति
    • नीचे: दंड, तलवार
    • बाएँ: नागपाश
  • आन्तरिक नवकोष्ठक (३×३) मण्डल:
    • प्रथम पंक्ति: कुम्भ, सर्प, शंख
    • द्वितीय पंक्ति: सिंह, कूर्म, तरङ्ग
    • तृतीय पंक्ति: मकर, मण्डूक, मत्स्य

२० प्रासादमण्डने
अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ एक अंगुल बढ़ा करके बनावें । उसकी
मोटाई बारह अंगुल की रक्खे। इस प्रकार समचोरस शिला का कुल मान ४७ अंगुल का
होता है।
अपराजित मत से धारणी शिला का मान—
“नवत्यङ्गुल दैर्घ्यं च पृथुत्वे चतुर्विंशतिः ।
द्वादशाङ्गुलपिण्डं च शिलामानप्रमाणतः ॥” सूत्र ४७ श्लो० १६
नव्वें अंगुल लंबी, चौवीस अंगुल चौड़ी और बारह अंगुल मोटी, यह धरणी शिला का
मान जानें।
दूसरा मत—
“एकहस्ते च प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
षडंगुला द्विहस्ते च त्रिहस्ते च ग्रहाङ्गुला ॥
चतुर्हस्ते च प्रासादे शिला स्याद् द्वादशाङ्गुला ।
तृतीयांशोदयः कार्यो हस्तादौ च युगान्ततः ॥
ततोऽपरेऽष्टहस्तान्तं वृद्धिस्त्र्यङ्गलतो भवेत् ।
पुनद्व्र्यंङ्गुलतो वृद्धिः पञ्चाशद्धस्तकावधि ॥
पादेन चोच्छ्रिता शस्ता तां कुर्यात् पङ्कजान्विताम् ॥” सूत्र १५३
एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की, दो हाथ के प्रासाद मे छह अंगुल की, तीन हाथ के
प्रासाद मे नव अगुल की और चार हाथ के प्रासाद मे बारह अंगुल की समचोरस धरणी शिला
स्थापन करना चाहिए। चार हाथ तक के प्रासाद के लिये धरणी शिला का' जो मान आया हो,
उसके तीसरे भाग शिला की मोटाई रखना चाहिये। पांच से आठ हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक
हाथ तीन तीन अंगुल और नव से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा
करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद के लिये १०८ अंगुल के
मान की धरणी शिला होती है। वह चौथे भाग मोटो रक्खें और कमल की आकृतियों से
शोभायमान बनावें।
धरणी शिला ऊपर के रूप—
“लहरं मत्स्यं मण्डूकं मकरी ग्रासमेव च ।
जलं सर्प शंखयुक्तं शिलामध्ये ह्यलङ्कृतम् ॥” क्षीरा० अ० १०१

प्रथमोऽध्याय २१
पानी की लहर, मछली, मेढक, मगर, ग्रास, जल (कलश) सर्प शंख इत्यादि रूप
बना करके शिला को सुशोभित करना चाहिये ।
कूर्मशिला के रूपो के संबंध में सूत्रधार वीरपाल विरचित बेडाया प्रासाद तिलक ग्रंथ
का अध्याय दूसरे मे लीखा है कि—
"कूर्ममानमिदं च गर्भरचनाथाग्नो शिलायां जलम्,
याम्ये मीनमुखं च नैऋर्तिदिशि स्थाप्यं तथा दर्दुरम् ।
वारुण्या मकरश्च वायुदिशि वै ग्रासश्च सौम्ये ध्वनिः,
नागं शङ्करदिक्षु पूर्वविषये कुम्भः शिलावह्नितः ॥”
कूर्म के मान की गर्भ रचना कहता है कि-अग्निकोण मे पाणी की लहर, दक्षिण मे
माछली, नैर्ऋत्य में मेढक, पश्चिम मे मगर, वायुकोण मे ग्रास, उत्तर मे शंख, ईशान मे सर्प
और पूर्व दिशा मे कुम्भ की आकृतिया बनानी चाहिये ।
शिल्पियो की मान्यता वंश परंपरा से लहर को आकृति पूर्व दिशा मे बनाने की है।
सूत्रारंभ नक्षत्र-
सूत्रारम्भो गृहादीना-मुत्तरायां करत्रये ।
ब्राह्मे पुष्ये मृगे मैत्र्ये पौष्ण्ये वासचवारुणे ॥३०॥
प्रासाद और गृह आदि का सूत्रारम तीनो उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और
उत्तराभाद्रपद), हस्त, चित्रा, स्वाति, रोहिणी, पुष्य, मृगशीर्ष, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा और
शतभिषा इन नक्षत्रो मे करना चाहिये ॥३०
शिला स्थापन नक्षत्र-
शिलान्यासस्तु रोहिण्यां श्रवणे हस्तपुष्ययोः ।
मृगशीर्षे च रेवत्या-मुत्तरात्रितये शुभः ॥३१॥
रोहिणी, श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशीर, रेवती और तीनो उत्तरा इन नक्षत्रो मे शिलाकी
स्थापना करना शुभ है ॥३१॥
देवालय का निर्माणस्थान-
नद्यां सिद्धाश्रमे तीर्थे पुरे ग्रामे च गह्वरे ।
वापी-वाटी-तडागादि-स्थाने कार्यं सुरालयम् ॥३२॥

२२ प्रासादमण्डने
नदी के तट, सिद्ध पुरुषो के निर्वाण स्थान, तीर्थभूमि, शहर गांव, पर्वत की गुफाओं मे,
बावडी, वाटिका (उपवन) और तालाव आदि पवित्र स्थानों में देवालय बनाना चाहिये ॥३२॥
प्रासाद निर्माण पदार्थ—
स्वशक्त्या काष्ठमृदिष्ट-का शैलधातुरत्नजम् ।
देवतातनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥३३॥
अपनी शक्ति के अनुसार काष्ठ, मिट्टी, ईंट, पाषाण, सुवर्ण आदि धातुओं और रत्न,
इन पदार्थों का देवालय बनाना चाहिये । किसी भी पदार्थ का देवालय बनाने से धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३३॥
देव स्थापन का फल—
देवानां स्थापनं पूजा पापघ्नं दर्शनादिकम् ।
धर्मवृद्धिर्भवेदर्थः कामो मोक्षस्ततो नृणाम् ॥३४॥
देवो की स्थापना, पूजा और दर्शन करने से मनुष्यों के सब पापों का नाश होता है
तथा धर्म की वृद्धि, एवं अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३४॥
देवालय बनाने का फल—
कोटिघ्नं तृणजे पुण्यं मृन्मये दशसङ्गुणम् ।
ऐष्टके शतकोटिघ्नं शैलेऽनन्तं फलं स्मृतम् ॥३५॥
देवालय घास का बनाने से कोटिगुणा, मिट्टी का बनाने से दस कोटिगुणा, ईंटों का
बनाने से सौकोटिगुणा और पाषाण का बनाने से अनन्त गुणा फल होता है ॥३५॥
वास्तु पूजा का सप्त स्थान—
कूर्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां च पौरुषे ।
घटे ध्वजे प्रतिष्ठाया-मेवं पुण्याहसप्तकम् ॥३६॥
कूर्म की स्थापना, द्वार स्थापन, पद्मशिला की स्थापना, प्रासाद पुरुष की स्थापना, कलश
और ध्वजा चढाना, और देव प्रतिष्ठा, ये सात कार्य करते समय वास्तु पूजन अवश्य करना
चाहिये । यह पुण्याहसप्तक कहा जाता है ॥३६॥

प्रथमोऽध्यायः २३
शान्तिपूजा का चौदह स्थान—
भूम्यारम्भे तथा कूर्मे शिलायां सूत्रपातने ।
खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥३७॥
शुक्रनासे च पुरुषे घण्टायां कलशे तथा ।
ध्वजोच्छ्रये च कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दश ॥३८॥
भूमिका आरंभ, कूर्म न्यास, शिला न्यास और सूत्रपात (तलनिर्माण), खुर शिला
स्थापन, द्वार और स्तंभ स्थापन, पाट चढाते समय, पद्मशिला, शुकनास और प्रासाद पुरुष के
रखते समय, आमलसार, कलश चढाना, और ध्वजा चढाना, ये चौदह कार्य करते समय
शान्तिपूजा अवश्य करनी चाहिये ॥३७-३८॥
प्रासाद का प्रमाण—
एक हस्तादिप्रासादाद् यावद्धस्तशतार्धकम् ।
प्रमाणं कुम्भके मूल-नासिके भित्तिबाह्यतः ॥३९॥
एक हाथ से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का प्रमाण दीवार के बाहर
कुंभा के मूलनासक (कोणा) तक गिना जाता है ॥३९॥
मण्डोवर के थरों का निर्गम—
कुम्भादिस्थावराणां च निर्गमः समसूत्रतः ।
पीठस्य निर्गमो बाह्ये तथैव छाद्यकस्य च ॥४०॥
कुम्भा से लेकर छज्जा के तल भाग तक जितने थर बनाये जायं, ये सब थरो के निर्गम
समसूत्र मे रखने चाहिये। तथा पीठ और छज्जा का निर्गम थरो के आगे निकलता हुआ रखना
चाहिये ॥४०॥
प्रासाद के अंगों की संख्या—
त्रिपञ्चसप्तनवभिः फालनाभिर्विभाजिते ।
प्रासादस्याङ्गसंख्या च वारिमार्गान्तरस्थितिः ॥४१॥
कर्ण, प्रतिकर्ण और नन्दी आदि फालनाये तीन, पाच, सात अथवा नव संख्या तक
की जाती है, ये प्रासाद की अंग संख्या है। उन्हे वारिमार्ग के अंतराल मे (प्रासाद की दीवार
से बाहर निकलती) रखना चाहिये ॥४१॥

२४ प्रासादमण्डने
फलनाओं का सामान्य मान—
फालना कर्णतुल्या स्याद् भद्रं तु द्विगुणं मतम् ।
सामान्योऽयं विधिस्तुल्यो हस्ताङगुलविनिर्गमः ॥४२॥
इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे
मिश्रलक्षणो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
सब फालनायें कोने के मान के बराबर रखनी चाहिये और भद्र कोने से दुगुना रखना
चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है। ये सब फालनाये प्रासाद का जितने हाथ का बिस्तार हो उतने
अंगुल निकलती रखनी चाहिये ॥४२॥
इति श्रीपंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन के मिश्र-
लक्षण नाम के प्रथमाध्याय की सुबोधिनी नाम की भाषाटीका समाप्त ॥१॥

अथ प्रासादमण्डने द्वितीयोऽध्यायः
जगती—
विश्वकर्मोवाच—
प्रासादानामधिष्ठानं जगती सा निगद्यते ।
यथा सिंहासनं राज्ञः प्रासादस्य तथैव सा ॥१॥
प्रासाद की मर्यादित भूमि को जगती कहते है। जैसे—राजा का सिंहासन रखने के लिये
अमुक स्थान मर्यादित रखा जाता है, वैसे प्रासाद बनाने के लिये अमुक भूमि मर्यादित रक्खी
जाती है ॥१॥
अपराजितपृच्छा के सूत्र ११५ मे श्लोक ५ मे लिखा है कि—
"प्रासादो लिङ्गमृत्युक्तो जगती पीठमेव च ॥”
प्रासाद शिवलिङ्गका स्वरूप है। जैसे शिवलिङ्ग के चारों तरफ पीठिका है, वैसे ही
प्रासाद के जगतीरूप पीठिका है ।
जगती का आकार—
चतुरस्रायताष्टास्रा वृत्ता वृत्तायता तथा ।
जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥२॥
समचोरसं, लंब चौरस, आठ कोने वाली, गोल और लंब गोल, ऐसे पांच आकार वाली
जगती है । उनमे से प्रासाद का जैसा आकार हो, वैसी जगती बनानी चाहिये ॥२॥
जगती का विस्तार मान—
प्रासादपृथुमानाच्च त्रिगुणा च चतुर्गुणा ।
क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका ॥३॥
प्रासाद के विस्तार के मान से तीन गुणी, चार गुणी अथवा पांच गुणी जगती बनानी
चाहिये । उनमें तीनगुणी ज्येष्ठमान की, चार गुणी मध्यममान की और पांच गुणी कनिष्ठ-
मान की जगती समझनी चाहिये ॥३॥
प्रा० ४