प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ प्रासादमण्डने
नक्षत्रे वसुभिर्व्ययोऽपि भजिते हीनस्तु लक्ष्मीप्रदः,
तुल्यायश्च पिशाचको ध्वजमृते संवर्द्धितो राक्षसः ॥” राज व० अ० ३
प्रासाद अथवा गृह बनाने की भूमि की लंबाई और चौड़ाई के नाप का गुणाकार करने
से जो गुणनफल हो, वह क्षेत्रफल कहा जाता है । इसको आठ से भाग देने से जो शेष बचे,
वह ध्वज आदि आय कहलाती है । क्षेत्रफल को आठ से गुणा करके, गुणनफल को सत्ताईस से
भाग दे जो शेष बचे वह अश्विनी आदि नक्षत्र होता है । नक्षत्र की जो संख्या आवे, उसमे आठ
का भाग देने से जो शेष बचे वह व्यय कहलाता है । आय से व्यय कम हो तो लक्ष्मी को प्राप्त
करने वाला है । आय और व्यय दोनों बराबर हो तो पिशाच नाम का व्यय और ध्वज आय
को छोड़कर दूसरी आयों से व्यय अधिक हो तो वह राक्षस नाम का व्यय कहलाता है ।
आयों की संज्ञा और दिशा—
“ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरो गजः ।
ध्वांक्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राचादिषु प्रदक्षिणाः ॥” अप० सू० ६४
ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज और ध्वांक्ष, ये आठ आयों के नाम है। वे
अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी हैं ।
प्रासाद के प्रशस्त आय—
ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यते सुरवेश्मनि ।
अधमानां खरध्वांक्ष-धूम्रश्वानाः सुखावहाः ॥” अप० सू० ६४
ध्वज, सिंह, वृष और गज ये चार आय देवालय में शुभ हैं । तथा खर, ध्वांक्ष, धूम
और श्वान ये चार आय अधम जातिवालों के घरों मे सुखकारक है¹ ।
व्यय संज्ञा—
“शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः ।
श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥
· समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसास्तु व्ययोऽधिकः ।
व्ययो यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥” अप० सू० ६६
शान्त, पौर, प्रद्योत, श्रियानन्द, मनोहर, श्रीवत्स, विभव और चिन्तात्मा, ये व्ययों के
आठ नाम हैं । आय और व्यय समान हो तो पिशाच नाम का व्यय, आय से व्यय अधिक
हो तो राक्षस नाम का व्यय और आय से व्यय कम हो तो यक्ष नाम का व्यय होता है । यह,
धन धान्य की वृद्धि करने वाला है ।
(१) विशेष जानने के लिये देखो मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ