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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 278 में से

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पृष्ठ 53

१६ प्रासादमण्डने

कूर्ममान—
अर्धाङ्गुलो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये ।
अर्धाङ्गुला ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधि ॥२५॥
एकत्रिंशत्करान्तं च तदर्धा वृद्धिरिष्यते ।
ततोऽर्धापि शतार्धान्तं कूर्मो मन्वङ्गुलोत्तमः ॥२६॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में आधे अंगुल के नाप का कूर्म ( कच्छूआ ) नींव में
स्थापित करे। दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके,
(दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल, चार हाथ के
प्रासाद मे दो अंगुल, इस प्रकार आधा २ अंगुल बढ़ाने से पंद्रह हाथ के प्रासाद में साढ़े सात
अंगुल के मान का कूर्म होता है)। सोलह से इकतीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके और बत्तीस से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २
सूत बढ़ा करके नींव में स्थापित करें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में
एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है ॥२५-२६॥
अपराजितपृच्छा के मत से कूर्ममान—
"एकहस्ते सुरागारे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधिः ॥
पादवृद्धिः पुनः कार्याद् विंशतिहस्ततः करे ।
ऊर्ध्वं वै त्रिशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥
ततः परं शतार्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम् ।
अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र ५२
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में कूर्म चार अंगुल के मान का, दोसे दस हाथ के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा कर के, ग्यारह से बीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, इक्कीस से तीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत
बढा कर के और इकतीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ १/१२ अंगुल बढ़ा कर के
बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में लगभग चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है।
अपराजितपृच्छाके मत से दूसरा कूर्ममान—
“एकहस्ते तु प्रासादे कूर्मश्चार्धाङ्गुलः स्मृतः ।
अर्द्धवृद्धिः प्रकर्त्तव्या पञ्चदशहस्तावधिः ॥
एकत्रिंशच्च हस्तान्तं पादवृद्धिः प्रकीर्त्तिता ।
तदर्धेन 'पुनर्वृद्धि-र्मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र १५३