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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

२२ प्रासादमण्डने
नदी के तट, सिद्ध पुरुषो के निर्वाण स्थान, तीर्थभूमि, शहर गांव, पर्वत की गुफाओं मे,
बावडी, वाटिका (उपवन) और तालाव आदि पवित्र स्थानों में देवालय बनाना चाहिये ॥३२॥
प्रासाद निर्माण पदार्थ—
स्वशक्त्या काष्ठमृदिष्ट-का शैलधातुरत्नजम् ।
देवतातनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥३३॥
अपनी शक्ति के अनुसार काष्ठ, मिट्टी, ईंट, पाषाण, सुवर्ण आदि धातुओं और रत्न,
इन पदार्थों का देवालय बनाना चाहिये । किसी भी पदार्थ का देवालय बनाने से धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३३॥
देव स्थापन का फल—
देवानां स्थापनं पूजा पापघ्नं दर्शनादिकम् ।
धर्मवृद्धिर्भवेदर्थः कामो मोक्षस्ततो नृणाम् ॥३४॥
देवो की स्थापना, पूजा और दर्शन करने से मनुष्यों के सब पापों का नाश होता है
तथा धर्म की वृद्धि, एवं अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३४॥
देवालय बनाने का फल—
कोटिघ्नं तृणजे पुण्यं मृन्मये दशसङ्गुणम् ।
ऐष्टके शतकोटिघ्नं शैलेऽनन्तं फलं स्मृतम् ॥३५॥
देवालय घास का बनाने से कोटिगुणा, मिट्टी का बनाने से दस कोटिगुणा, ईंटों का
बनाने से सौकोटिगुणा और पाषाण का बनाने से अनन्त गुणा फल होता है ॥३५॥
वास्तु पूजा का सप्त स्थान—
कूर्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां च पौरुषे ।
घटे ध्वजे प्रतिष्ठाया-मेवं पुण्याहसप्तकम् ॥३६॥
कूर्म की स्थापना, द्वार स्थापन, पद्मशिला की स्थापना, प्रासाद पुरुष की स्थापना, कलश
और ध्वजा चढाना, और देव प्रतिष्ठा, ये सात कार्य करते समय वास्तु पूजन अवश्य करना
चाहिये । यह पुण्याहसप्तक कहा जाता है ॥३६॥