सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 60

प्रथमोऽध्यायः २३
शान्तिपूजा का चौदह स्थान—
भूम्यारम्भे तथा कूर्मे शिलायां सूत्रपातने ।
खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥३७॥
शुक्रनासे च पुरुषे घण्टायां कलशे तथा ।
ध्वजोच्छ्रये च कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दश ॥३८॥
भूमिका आरंभ, कूर्म न्यास, शिला न्यास और सूत्रपात (तलनिर्माण), खुर शिला
स्थापन, द्वार और स्तंभ स्थापन, पाट चढाते समय, पद्मशिला, शुकनास और प्रासाद पुरुष के
रखते समय, आमलसार, कलश चढाना, और ध्वजा चढाना, ये चौदह कार्य करते समय
शान्तिपूजा अवश्य करनी चाहिये ॥३७-३८॥
प्रासाद का प्रमाण—
एक हस्तादिप्रासादाद् यावद्धस्तशतार्धकम् ।
प्रमाणं कुम्भके मूल-नासिके भित्तिबाह्यतः ॥३९॥
एक हाथ से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का प्रमाण दीवार के बाहर
कुंभा के मूलनासक (कोणा) तक गिना जाता है ॥३९॥
मण्डोवर के थरों का निर्गम—
कुम्भादिस्थावराणां च निर्गमः समसूत्रतः ।
पीठस्य निर्गमो बाह्ये तथैव छाद्यकस्य च ॥४०॥
कुम्भा से लेकर छज्जा के तल भाग तक जितने थर बनाये जायं, ये सब थरो के निर्गम
समसूत्र मे रखने चाहिये। तथा पीठ और छज्जा का निर्गम थरो के आगे निकलता हुआ रखना
चाहिये ॥४०॥
प्रासाद के अंगों की संख्या—
त्रिपञ्चसप्तनवभिः फालनाभिर्विभाजिते ।
प्रासादस्याङ्गसंख्या च वारिमार्गान्तरस्थितिः ॥४१॥
कर्ण, प्रतिकर्ण और नन्दी आदि फालनाये तीन, पाच, सात अथवा नव संख्या तक
की जाती है, ये प्रासाद की अंग संख्या है। उन्हे वारिमार्ग के अंतराल मे (प्रासाद की दीवार
से बाहर निकलती) रखना चाहिये ॥४१॥