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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 278 में से

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पृष्ठ 52

प्रथमोऽध्याय १५
ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त्त ग्रन्थों मे अन्य प्रकार से कहा है। मुहूर्त्त चिन्तामणि के वास्तु
प्रकरण श्लोक १६ की टीका मे विश्वकर्मा का प्रमाण देकर लिखा है कि—
"ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु ।
शेषस्य वास्तोर्मुखमध्यपुच्छं, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ॥"
शेषनाग प्रथम ईशानकोण से चलता है, उसका मुख, नाभि और पूंछ सृष्टिमार्ग को
छोड़कर विपरीत विदिशा में रहता है । अर्थात् ईशान मे मुख, वायुकोण में नाभि और नैर्ऋत्य
कोण मे पूंछ रहता है। इसलिये इन तीनों विदिशाओ को छोड़कर चौथा अग्निकोण खाली
रहता है, उसमें प्रथम खात करना चाहिये ।
राहु (नाग) मुख—
'देवालये गेहविधौ जलाश्रये, राहोर्मुखं शम्भुदिशो विलोमतः ।
मीनार्क सिंहार्कमृगार्कतस्त्रिभे, खाते मुखात् पृष्ठविदिकूशुभाभवेत् ॥'
देवालय का खात मुहूर्त्त करते समय राहु का मुख यदि मीन, मेष और वृषभ राशि का
सूर्य हो तब ईशान कोण में, मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वायुकोण मे, कन्या
तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब नैर्ऋत्यकोण मे, धन, मकर और कुम्भ राशि का
सूर्य हो तब अग्निकोण मे, राहु का मुख रहता है।
घरके खात मुहूर्त्त के समय नाग का मुख सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान
कोण मे, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कुम्भ मीन और मेषराशि के
सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य मे अग्निकोण मे राहु का मुख
रहता है।
कुंआ, बावडी, तालाब आदि जलाशयको आरंभ करते समय राहु का मुख मकर कुम्भ
और मीन राशि के सूर्य मे ईशान कोण मे, मेष वृष और मिथुन राशि के सूर्य मे वायुकोण मे,
कर्क सिंह और कन्या राशि के सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, तुला वृश्चिक और धन राशी के सूर्य मे
अग्निकोण में राहु का मुख रहता है।
जिस विदिशा में राहु का मुख हो, उसके पीछे की विदिशा मे खात करना शुभ है।
जैसे-ईशान कोण मे मुख है, तो अग्निकोण मे, वायुकोण में मुख हो तो ईशानकोण में,
नैर्ऋत्य कोण में मुख हो तो वायुकोण मे और अग्निकोण मे मुख हो तो नैर्ऋत्य कोण मे
खात करना शुभ है।*

  • राहु मुख याने नागमुख या वास्तुमुख इसमे बहुत मतान्तर है। कोई सृष्टि क्रम से और कोई
    विलोम क्रम से मानते है। विशेष जानने के लिये देखे स्वयं द्वारा अनुवादित 'राजवल्लभ मंडन ग्रंथ'।