फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२१
सुख (उत्तम स्वास्थ्य) अच्छी गोष्ठी (सोसाइटी) में समय व्यतीत
होना, ऐश्वर्य, अच्छे और बड़े कामों में सफलता आदि शुभ फल
होते हैं ।
(११) यदि राशि लग्न से ग्यारहवें घर में हो तो धन प्राप्ति,
आरोग्य, नवीन और विचित्र वस्तुओं का लाभ, फ़र्नीचर, कालीन,
सोफा आदि, स्त्री, पुत्र, बन्धुओं से प्रसन्नता, जो रुपया उधार दिया
गया हो उसकी प्राप्ति, राजा से प्रेम, महान् आदमियों का सम्पर्क आदि
(शुभ राशि हो तो) शुभ फल होते हैं ।
(१२) यदि लग्न से बारहवें घर में राशि हो तो शरीर पीड़ा,
अपने पद से अलग हो जाना (नौकरी छूटनी), चोर, अग्नि का भय,
राजा का प्रकोप, राजा से पीड़ा, स्त्री कष्ट, पुत्र सम्बन्धी चिन्ता,
आलस्य, जो उद्योग किया जाय उसमें असफलता, कर्म विकलता
(अर्थात् जो कार्य हाथ में लिया हो उसमें परेशानी या काम न
मिलने से परेशानी) आदि (यदि पाप राशि या पाप ग्रह से युत राशि
हो तो) अशुभ फल होते हैं ।
(१३) ऊपर जो लग्न से गिनने पर—जिस भाव में राशि हो
उसके अनुसार जो फल बतलाया गया है उसमें यह अवश्य ध्यान में
रखना चाहिये कि उस राशि का स्वामी कितना बलवान् है । यदि
राशि का स्वामी बलवान् हो अपनी उच्च राशि, मित्र राशि,
अपने नवांश आदि वर्गों में हो, मित्र के साथ बैठा हो, उस पर
शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभ फल होता है । यदि राशि का स्वामी
बलहीन हो, नीच या शत्रु की राशि में हो, अस्त हो, पापग्रह या अशुभ
ग्रहों से देखा जाता हो, छठे, आठवें या बारहवें घर में बैठा हो तो
कष्ट फल होता है अर्थात् जिस राशि का स्वामी ऐसी दुःस्थिति में
जन्म कुंडली में है—उस राशि का अनिष्ट फल होता है ।
यदि राशि का फल अनिष्ट है किन्तु उसका स्वामी विशेष
बलवान है तो परिणामतः शुभ फल ही होता है । दोनों (राशि
५२२ फलदीपिका
और राशीश) शुभ और बलवान् हों तो बहुत अधिक शुभ फल होगा।
दोनों पाप युक्त, निर्बल हों तो परिणाम बहुत अनिष्ट होगा।
राशि शुभ भी हो किन्तु उसका स्वामी निर्बल हो तो परिणामतः
निकृष्ट फल ही होगा। अर्थात् राशि और स्वामी दोनों के विचार में
स्वामी की ही प्रधानता है। किन्तु मान लीजिये मिथुन पापाक्रान्त
पापदृष्ट है और कन्या राशि शुभाक्रान्त शुभ दृष्ट है—दोनों का
स्वामी बुध ही है। तो मिथुन-बुध की दशा निकृष्ट फल करेगी।
कन्या-बुध की दशा उत्तम जावेगी।
(१४) जिस राशि का विचार किया जा रहा है वह यदि चर
राशि हो, उसका स्वामी चर राशि, चर नवांश में है तो जातक विदेश
जावेगा। यदि ऊपर जो ३ चर लक्षण बताये गये हैं (चर राशि,
राशीश चर में, राशीश चर नवांश में) इनमें कोई चर और कोई
स्थिर में हों तो तारतम्य से फल कहना चाहिये।
(१५) संज्ञाध्याय में या कर्माजीवाध्याय में (देखिये बृहज्जातक)
या ग्रहों के भिन्न-भिन्न राशियों या भावों में रहने के जो फल
बताये गये हैं, राजयोग के या चन्द्रमा से गिनने पर (चन्द्रराशि से)
कौन सा ग्रह कहाँ बैठ कर क्या योग बनाता है—उसका क्या फल है;
दो ग्रहों या तीन ग्रहों के योग से क्या फल होते हैं आदि का विचार
काल चक्रदशा फल बताते समय ध्यान में रखना चाहिये क्योंकि जब
किसी का फल कह रहे हों तो उन सब योगों का फल भी (यदि
राशि या राशीश उन योगों से सम्बद्ध हैं) उस राशि की दशा में
होगा।
देह-जीव फल
ऊपर लग्न से विचारणीय राशि कहाँ है—इस आधार से उस
राशि की दशा कैसी होगी यह बताया है। अब देह और जीव राशियों
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५२३
में यदि भिन्न-भिन्न ग्रह हों तो, क्या फल उन देहराशियों की दशा
का, या जीव राशियों की दशा का होगा यह बतलाते हैं :—
(१) यदि मंगल, सूर्य, शनि, राहु देह और जीव राशियों में
हों तो एक-एक क्रूर ग्रह के योग से भी, उनकी दशा में मरण हो
सकता है—यदि कई पाप ग्रह देह या जीव राशि में हों तो मरण में
क्या सन्देह है ।
(२) यदि केवल देह राशि पापाक्रान्त (अर्थात् उसमें पाप ग्रह
हों) हो तो महारोग (भयंकर व्याधि) । यदि जीव राशि पापाक्रान्त हो
तो उसकी दशा में महान् भय । यदि दोनों में हो तो मृत्यु ।
(३) यदि दो क्रूर ग्रह ऊपर लिखे योग १ या २ में हों तो
बहुत बढ़ता हुआ भयंकर रोग, यदि ३ ग्रह उपर्युक्त प्रकार से पीड़ा
कारक हों तो अपमृत्यु । यदि चारों क्रूर ग्रहों ने देह तथा जीव
राशियों को आक्रान्त कर रखा हो तो मृत्यु ।
(४) यदि एक साथ जीव राशि और देह राशि पापग्रहों से
आक्रान्त हों तो राजभय, चोर भय आदि महाभय हों । सूर्य यदि अनिष्ट
कारक ग्रह हो तो अग्नि से पीड़ा, चन्द्रमा पीड़ा कारक हो तो जल
से क्लेश, भौम हो तो शस्त्र से चोट, बुध हो तो वायु से बाधा,
बृहस्पति हो तो पेट का रोग, शुक्र हो तो अग्नि बाधा,
शनि से गुल्म, रोग, राहु से विष से उत्पन्न रोग होते हैं ।
यह चारों योग जन्म कुंडली के हैं—किन्तु यदि जीव देह राशियों
में गोचर से शुभ ग्रह जा रहे हों तो शुभ फल, पापग्रह जा रहे हों तो
पाप फल होता है । अर्थात् गोचर भी देखना चाहिये ।
(५) यदि तृतीय बृहस्पति, सप्तम स्थान स्थित मंगल, जन्म स्थान
में शनि, नवम में राहु, आठवें घर में चन्द्रमा, बारहवें घर में
सूर्य, सप्तम में बुध, छठे शुक्र यदि पापग्रह के साथ हों या दुर्बल हों
नीच या शत्रु राशि में हों और उन पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो
जातक दुःख प्राप्त करता है ।
५२४ फलदीपिका
देह या जीवराशियों में स्थित
ग्रहों के स्वभाव, गुण के अनुसार दशाफल
सौम्य ग्रह शुभ फल करता है। क्रूर ग्रह या पापग्रह दुष्ट फल
करता है ।
(१) सूर्य धननाश, आपत्ति, पीड़ा, ज्वर, शत्रुओं से भय, पद-
च्युति (स्थान छूट जाना), पित्त के रोग, गुल्म, संग्रहणी, क्षय, कान
के रोग, पशु या बन्धुओं का मरण, भाई बहिनों का नाश करता है ।
(२) चन्द्रमा अपने बन्धुओं से समागम, कन्या का जन्म, आरोग्य,
(उत्तम स्वास्थ्य) भूषण, सुख, वस्त्र, राजा से सम्मान, दान, देवताओं
का पूजन, ब्राह्मणों का सत्कार, पुण्य स्थानों की यात्रा (तीर्थ, मंदिरों
की यात्रा) तीर्थ स्नान, उत्तम भोजन आदि शुभ फल करता है ।
(३) मंगल, ज्वर, बीमारी, अग्नि, भय, चोर भय अपने बन्धुओं से
कलह, भाई बहिनों का नाश, खेती और खेत का नुकसान, लड़ाई-झगड़ा
(युद्ध) पदच्युति, गुल्म, बवासीर, कुष्ठ, विष और शत्रु से बाधा
करता है। ज्वर फुंसी-फोड़े, पित्तरोग, ग्रंथि स्फोट, विष से पीड़ा
अग्नि भय, शस्त्र या चोर से हानि, राजा से भय—यह सब मंगल
की दशा का फल है ।
(४) बुध अपने मित्रों और बन्धुओं से समागम, बड़े आदमियों
की कृपा, विद्या और बुद्धि का प्रसार, अध्ययन, ज्ञान में वृद्धि,
शास्त्र पठन, स्त्री, पुत्र तथा राजा से सुख, भूषण गौ, घोड़े, बकरी
आदि का लाभ, विवेक, धन, बुद्धि और यश में विस्तार करता है ।
(५) बृहस्पति महत्व को बढ़ाता है । नाना प्रकार के सुख,
राजा से अभिषेक (अर्थात् राज सम्मान) स्त्री, पुत्र, से सुख, इनकी
प्राप्ति, धन-लाभ, सुख, भूषण, उत्तम भोजन, आरोग्य, यश, परोपकार
आदि शुभ फल प्रदान करता है।
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२५
(६) शुक्र रति, लाभ, सुख, विविध प्रकार के सुन्दर, वस्त्र,
आभूषण, पशु, सवारी रत्न, स्त्रियों का सुख, भोग, गायन, दोस्तों
की गोष्ठी (सोसाइटी), प्रताप वृद्धि, उत्तम यश आदि शुभ फल
देता है ।
(७) शनि कलह, बीमारी (शारीरक पीड़ा) मृत्यु, बन्धुओं को
कष्ट, बन्धुओं से पीड़ा, अग्नि, शत्रु, भूत, पिशाच आदि का भय,
विष से कष्ट, मानहानि, धननाश, स्त्री कष्ट, पुत्र कष्ट, घर, खेती, व्यापार
गौ आदि पशुओं का विनाश उत्पन्न करता है ओर अभिमान के कारण
मनुष्य दुःखी रहता है ।
(८) राहु शरीर में पीड़ा, व्यर्थ घूमना, बन्धु कष्ट, लकवे आदि
की बीमारी, राजा से भय उत्पन्न करता है ।
(९) केतु चोर, अग्नि से पीड़ा, खून बहना, दरिद्रता, बन्धुनाश
स्थान नाश आदि दुष्ट फल करता है ।
यह ग्रहों के नैसर्गिक गुण हैं । जन्म कुंडली जितनी बलवान् होगी
और विचारणीय राशि जितनी बलवान् होगी तथा विचारणीय राशि
का स्वामी शुभग्रह जितना बलवान् होगा उतना अधिक शुभ फल
उसका होगा । जन्म कुंडली जितनी कमज़ोर होगी—उसमें जितने
अधिक दुर्योंग पड़े होंगे—विचारणीय राशि जितनी कमज़ोर, पापक्रान्त,
पाप दृष्ट होगी, उसका स्वामी जितना कमज़ोर होगा, उतना ही कष्ट
फल, पापग्रह की दशा का अधिक होगा ।
विविध गतियाँ
अब केवल एक विषय और समझाकर यह कालचक्र दशा का
प्रकरण समाप्त किया जाता है । इसमें सब राशियों की दशा क्रम
से नहीं है—(i) मीन से वृश्चिक (ii) कन्या से कर्क (iii) सिंह से
मिथुन (iv) धनु से मेष (v) वृश्चिक से मीन (vi) मेष से धनु
५२६ फलदीपिका
छः गतियाँ ऐसी हैं जो क्रम का उल्लंघन करती हैं। मेष, वृष, मिथुन
....इस प्रकार क्रम से राशियों की दशा हो या उत्क्रम उलटा (उलटी
गति) मीन, कुंभ, मकर आदि हो तो उसमें कोई विशेष बात नहीं।
किन्तु मेष से उछलकर धनु में या धनु से उछलकर मेष में जाना या
वृश्चिक से छलांग मार का मीन में जाना या मीन से छलांग मारकर
वृश्चिक में आना या एक राशि कूदकर मिथुन से बुध या कर्क से
कन्या में जाना या एक राशि कूदकर सिंह से मिथुन में जाना,
ऐसी दशाओं के प्रारम्भ में प्रायः कष्ट होता है।
कालचक्रदशा की काफी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। अब
१४ श्लोकों के आगे के श्लोक अन्य प्रकार की दशा, कितने वर्ष
की होती है आदि वर्णन करते हैं। इसलिये अब १५वें श्लोक की
व्याख्या की जाती है।
उत्पन्न आधान और क्षेम महादशाएँ
महादशासु यत्फलं प्रकीर्तितं मया पुरा।
तदेव योजयेद् बुधो दशासु चैवमादिषु ॥१५॥
महादशाओं के विचार जो अन्य महादशाओं के लिये बताये गये
हैं वह "उत्पन्न" महादशा, 'क्षेम' महादशा और "आधान महादशा"
में भी लागू करने चाहियें ॥१५॥
जन्मर्क्षात्परतस्तु पञ्चमभवाऽथोत्पन्नसंज्ञा दशा
स्यादाधानदशाऽप्यतोऽष्टमभवात् क्षेमान्महाख्या दशा।
आसांमेव दशावसानसमये मृत्युप्रदा स्यान्नृणां
स्वल्पानल्पसमायुषां त्रिवधपञ्चैकर्शदायान्तिमे ॥१६॥
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२७
जन्म नक्षत्र से पांचवां नक्षत्र कौन सा हुआ ? इस नक्षत्र से गिनने
पर जो महादशा चले उसे “उत्पन्न” महादशा कहते हैं । जन्म
नक्षत्र से आठवां नक्षत्र गिनिये । इस आठवें नक्षत्र से प्रारंभ कर जो
महादशा लगाई जाती हैं वे “आधान” दशा कहलाती हैं । इसी
प्रकार जन्म नक्षत्र से चौथे नक्षत्र से जो महादशा लगाई जाती है उसे
क्षेम दशा कहते हैं
यदि तीनों प्रकार की दशा किसी एक समय ही (वर्ष तथा मास
विशेष में) समाप्त होवें तो वह मारक का समय होता है । अल्पायु
योग वाले को तृतीय दशा, मध्यायु वाले को पंचम दशा और दीर्घायु
व्यक्ति को सातवीं दशा मारक होती है ॥१६॥
निसर्गदशा
एकं द्वे नव विंशतिर्धृतिकृतिः पञ्चाशदेषां क्रमात्
चन्द्रारेन्दुजशुक्रजीवदिनकृद्दैवाकरीणां समाः ।
स्वै स्वैः पुष्टफला निसर्गजनितैः पक्तिर्दशाया क्रमा-
दन्ते लग्नदशा शुभेति यवना नेच्छन्ति केचित्तथा ॥१७॥
चन्द्रमा का १ वर्ष, मंगल के २ वर्ष, बुध के ९ वर्ष, शुक्र के
२० वर्ष, बृहस्पति के १८ वर्ष, सूर्य के २० वर्ष, शनि के ५० वर्ष
नैसर्गिक दशा में होते हैं । यवनों के मत से कि शनि के ५० वर्ष
में लग्न दशा भी सम्मिलित है, अन्य लोगों को मान्य नहीं है ।
जो ग्रह जन्म कुंडली में अच्छा पड़ा हो वह शुभ, जो अनिष्ट पड़ा हो
वह पाप फल करता है । ग्रहों का बल (षड्बल) निकाल कर जो
नैसर्गिक दशा लगाई जाती है उसके लिये केशवीय जातक पद्धति
तथा श्रीपति पद्धति देखनी चाहिये ॥१७॥
५२८ फलदीपिका
अंशदशा
लिप्तीकृत्य भजेद् ग्रहं खखजिनैस्तच्छिष्टमायुष्कला
आशाखाशिवहृताब्दमासदिवसाः सत्योदितेऽंशायुषि ।
वक्रिण्युच्चगते त्रिसङ्गुणमिदं स्वांशत्रिभागोत्तमे
द्विघ्नं नीचगतेऽर्धमप्यथ दलं मौढ्ये सितार्कौ विना ॥१८॥
प्रत्येक ग्रह की राशि, अंश, कला के कला बनाकर २४०० से
भाग दीजिये । जो शेष रहे उतनी आयुष्कला वह ग्रह प्रदान करता
है । इन आयुष्कलाओं को २०० से भाग दीजिये । लब्धि = वर्ष । शेष
को १२ से गुणा कर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = मास । शेष
को ३० से गुणाकर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = दिन । यह
सत्याचार्य का मत है । यदि ग्रह उच्च राशि में हो या वक्री हो तो उसके
प्रदत्त जो वर्ष, मास, दिन आवें उनको तिगुना कर लेना चाहिये ।
यदि ग्रह स्वनवांश, स्वद्रेष्काण या वर्गोत्तम हो तो उसके प्रदत्त जितने
वर्ष, मास, दिन आवें उनको दुगुना करना चाहिये । यदि ग्रह नीच
राशि में हो या अस्त हो तो उसके दिये हुए वर्ष, मास, दिन को
आधा कर दीजिये । लेकिन यह अस्तंगत ग्रह की दशा को आधी करने
की प्रक्रिया शुक्र और शनि को लागू नहीं होती ॥१८॥
सर्वाद्धं त्रिकृतेषुषण्मितलवह्लासोऽसतामुत्क्रमा-
द्विःफात्सत्सु दलं तदा हरति बल्येको बहुष्वेकभे ।
त्र्यंशोनं रिपुभे विना क्षितिसुतं सत्योपदेशे दशा
लग्नस्यांशसमा बलिन्युदयभेऽस्यात्रापि तुल्यापि च ॥१९॥
यदि पापग्रह बारहवें घर में हो तो उसकी प्रदत्त आयु पूरी
कम कर दी जाती है; यदि ग्यारहवें घर में हो तो १/२ कम कीजिये;
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२९
दसवें घर में हो तो १/३ कम करें; नवें घर में हो तो १/४ कम
करें; आठवें घर में हो तो १/५ कम करे, सातवें घर में हो तो १/६
कम करें ।
यदि शुभग्रह इसी प्रकार १२वें, ११वें, १०वें, ९वें, ८वें, या ७वें घर
में हो तो पापग्रह होता तो जितनी आयु कम करते उसका आधा
भाग कम कीजिये । यदि एक से अधिक ग्रह सातवें से १२वें-इन
छः भावों में से किसी में हो तो केवल जो सबसे अधिक बली हो
उसी की प्रदत्त आयु में कमी करते हैं—अन्य ग्रहों की प्रदत्त आयु में
कमी नहीं करते । मंगल को छोड़कर अन्य ग्रह यदि शत्रु राशि में
हों तो उनकी प्रदत्त आयु में तिहाई (१/३) कम कर देते हैं ।
सत्याचार्य का मत है कि—जितने नवांश लग्न में उदित हों
उतनी आयु लग्न की होती है । चाहे लग्न बलवान् हो या निर्बल यही
नियम लागू होता है ।
सत्योपदेशो वरमत्र किन्तु
कुर्वन्त्ययोग्यं बहुवर्गणाभिः ।
आचार्यकं त्वत्र बहुघ्नतायाम्
एके तु यद्भू रि तदेव कार्यम् ॥२०॥
मय या जीव शर्मा के बताये गये नियमों की अपेक्षा सत्याचार्य
का क्रम श्रेष्ठ है । किन्तु अनेक प्रकार के ह्रास (कम करने या
घटाने) के नियम ऊपर बताये गये हैं । जब कई प्रकार के ह्रास
प्राप्त हों तो क्या सब प्रकार के ह्रास करने ? इस विषय में
कहते हैं :—
(१) जब कई प्रकार के ह्रास प्राप्त हों (जैसे १२ से ७वें
स्थान तक १२, ११, १०, ९, ८, ७ इन स्थानों में स्थित, नीच
राशि गत स्थिति, शत्रु राशि स्थिति, अस्तंगत होना—इन प्रत्येक में
५३० फलदीपिका
कम करना बताया गया तो जिस परिस्थिति (नियम) में सबसे
अधिक कम करना बताया गया है केवल वही नियम लागू करना।
(२) इसी प्रकार उच्च या वक्र आदि में 'वृद्धि' की जाती है।
इसलिये ऐसी स्थिति में भी केवल एक 'वृद्धि' करना—वही एक
नियम लागू करना जिसमें सबसे अधिक 'वृद्धि' लागू होती
हो ॥ २० ॥
पिण्डायुर्दशा
धेयं शूर शके श्रियं स्मय परे निद्राः समा भास्करात्
पिण्डाख्यायुषि पूर्ववच्च हरणं सर्वं विदध्यादिह ।
लग्ने पापिनि भं विनोदयलवैर्निघ्नं नताङ्गैर्हतं
त्याज्यं सौम्यनिरीक्षितेऽर्धमृणमत्रायुष्यभिज्ञा विदुः ॥२१॥
सूर्य आदि ग्रह यदि अपनी उच्च राशि में परमोच्च अंश पर हों
तो प्रत्येक ग्रह के निम्नलिखित वर्ष होते हैं :
सूर्य १९, चन्द्रमा २५, मंगल १५, बुध १२, बृहस्पति १५, शुक्र
२१ तथा शनि २० वर्ष । यदि नीच राशि—परम नीच अंश में हो
तो ० (कुछ नहीं) । मध्य में अनुपात से लगाना । जो ह्रास तथा
वृद्धि के नियम अंशायु के लिये बताये गये हैं, वे इस पिंडायु में भी
लागू करना । यदि कोई क्रूर ग्रह लग्न में हो तो जितने अंश कला
लग्न के हों उनकी कला बना लीजिये (राशि के अंश कला नहीं
बनाये जाते—केवल अंश, कला की कला बनायी जाती हैं) । इनका,
जो आयु ग्रह प्रदत्त आयुओं का जोड़ आवे—उससे गुणा कर ३६० का
भाग दीजिये । जो भजनफल आवे उसको पूर्ण आयु में घटा दीजिये ।
यदि लग्न में शुभ ग्रह हो तो पापग्रह होने से जितना घटाते उससे
आधा घटाइये । ऐसा विद्वानों का मत है ॥२१॥
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५३१
लग्नदशांशसमां बलवत्यंशे वदन्ति पैण्डारुये ।
बलयुक्तं यदि लग्नं राशिसमैवात्र नांशोत्या ॥२२॥
पिण्डायुर्दाय में—यदि लग्न नवांश बली हो तो (i) लग्न प्रदत्त
आयु उतनी होती है जितने लग्न नवांश उदित हों । यदि लग्न
राशि बलवान् हो तो लग्न दत्त आयु उतने लग्न संख्या के हिसाब
से होती है—मेष लग्न १ वर्ष, वृष लग्न २ वर्ष इत्यादि ।
हरणं नीचेऽर्द्धमृणं स्यात्पूर्णां प्रोक्तवर्षमुच्चगृहे ।
पैण्डादौ व्यन्तरगे प्राज्ञै स्त्रैराशिकं चिन्त्यम् ॥२३॥
पैण्डारुयमायुर्ब्रू ॓वते प्रधानं
मणित्थचाणक्यमयादयश्च ।
एतन्न साध्वित्यवदद्भदन्तो •
वराहसूर्यस्य तथैव वाक्यम् ॥२४॥
मणित्थ, चाणक्य, मय तथा अन्य आचार्यों ने "पिंडायु" को
आयुर्दाय निश्चित करने का सर्वोत्तम प्रकार बताया है । परन्तु सत्या-
चार्य के मत से यह प्रकार साधु (उत्तम) नहीं है । वराहमिहिर के
मत से भी यह उत्तम प्रकार नहीं है ॥२४॥
सूर्यादिकानां स्वमतेन जीव-
शर्मा स्वरांशं परमायुषोऽत्र ।
अस्यापि सर्वं हरणं विधेयं
पूर्वोक्तवल्लग्नदशामपीह ॥२५॥
जीवशर्मा का मत है कि १२० वर्ष ५ दिन को ७ से भाग दीजियेः
५३२ फलदीपिका
१७ वर्ष ७३ दिन आये। प्रत्येक ग्रह १७ वर्ष ५ दिन प्रदान करता
है। इस प्रत्येक ग्रह प्रदत्त १७ वर्ष २ मास १३ दिन में भी उन
सब 'हरण' (ह्रास-घटाना, आदि) करना चाहिये जो पहिले बता
चुके हैं। जैसे पहिले बता चुके हैं—वैसे लग्न प्रदत्त आयु भी जोड़नी
चाहिये ॥२५॥
नृणां द्वादशवत्सरा दशहता ह्यायुःप्रमाणं परै-
राख्यातं परमं शनेस्त्रिभगणं यावत्परैरीरितम् ।
कैश्चिच्चन्द्रसहस्रदर्शनमिह प्रोक्तं कलौ किन्तु यत्
वेदोक्तं शरदः शतं हि परमायुर्दायमाचक्ष्महे ॥२६॥
कुछ लोगों ने मनुष्य की पूर्ण आयु १२० वर्ष कही है । कुछ
अन्य की राय है कि शनि को ३ भ्रमण करने में जितना समय लगे
उतनी मनुष्य की परमायु होती है । तीसरा मत यह है कि चन्द्रमा
को १००० (एक हज़ार) परिभ्रमण में जितना समय लगता है—
उतनी परमायु होती है । लेकिन हमारा विचार है कि कलियुग में
वेदोक्त १०० वर्ष पूर्ण आयु होती है । श्रुति का वाक्य है “शतायुर्वै
पुरुषः” ।
लग्नादित्येन्दुकानामधिकबलवतः स्याद्दशादौ ततोऽन्या
तत्केन्द्रादिस्थितानामिह बहुषु पुनर्वीर्यतो वीर्यसाम्ये ।
बह्वायुर्वर्षदातुः प्रथममिनवशाच्चोदितस्याब्दसाम्ये
वीर्यं किन्त्वत्र सन्धिग्रहविवरहतं भावसन्ध्यन्तराप्तम् ॥२७॥
लग्न, सूर्य और चन्द्र—इनमें जो बली होगा । उसकी दशा
प्रथम आवेगी । तब उन ग्रहों की दशा आवेगी जो इस 'बली' (सूर्य,
चन्द्र या लग्न) से केन्द्र में हों । तब उनकी जो इस बली से
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५३३
'पणफर' में हो, तब उनकी जो आपोक्लिम में हों। मान लीजिये १ से
अधिक ग्रह केन्द्र में, है किस की दशा सर्वप्रथम आवेगी ? उसकी
जो बली ग्रह से केन्द्र स्थित ग्रहों में सबसे बलवान् हो । यदि
समान बली हों तो जो अधिक आयुकाल (वर्ष आदि) प्रदान कर
रहा हो । यदि प्रदत्त आयुकाल भी बराबर हो तो उस ग्रह
की दशा सर्वप्रथम आवेगी जो सूर्य से अस्त होकर सर्व प्रथम
उदित होगा । यह क्रम प्रायः निम्नलिखित है (i) लग्न, सूर्य, चन्द्र,
मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि । यहाँ ग्रह का बल निम्न
लिखित प्रकार से निकाला जाता है—भावमध्य से जितने अंश कला
विकला पर ग्रह हो—उस अंतर को—भाव मध्य से भाव संधि के अंतर
से भाग दीजिये ।
अंशोद्भवं लग्नबलात्प्रसाध्य-
मायुश्च पिण्डोद्भवमर्कवीर्यात् ।
नैसर्गिकं चन्द्रबलात्प्रसाध्यं
ब्रूमस्त्रयाणामपि वीर्यसाम्ये ॥२८॥
यदि लग्न बली हो तो अंशायुदाय लगाइये, सूर्य बली हो तो
पिंडायु, चन्द्रमा बली हो निसर्गायु । यदि तीनों बली हों तो ? आगे
के श्लोक बताते हैं । ॥२८॥
तेषां त्रयाणामिह संयुतिस्तु
त्रिभिर्हृता सैव दशा प्रकल्प्या ।
वीर्ये द्वयोरेक्यदलं तयोः स्यात्
चेज्जीवशर्मायुरमी बलोनाः ॥२९॥
यदि तीनों बली हों तो तीनों से जो आयु आती है—उनको जोड़
५३४ फलदीपिका
कर ३ से भाग दीजिये । यदि दो बली हों तो जो आयु आवे
उनको जोड़कर २ का भाग दीजिये । यदि तीनों निर्बल हों तो जीव
शर्मा ने जो प्रकार बताया है, उस प्रकार से आयु निकालिये । ॥२९॥
कालचक्रदशा ज्ञेया चन्द्रांशेशे बलान्विते ।
सदा नक्षत्रमार्गेण दशा बलवती स्मृता ॥३०॥
चन्द्रमा जिस नवांश में हो उसका स्वामी बलवान् हो तो काल
चक्र दशा से विचार करना चाहिये । नक्षत्र दशा (विंशोत्तरी दशा)
सदा बलवती होती है । ॥३० ॥
समाः षष्ठिर्द्विघ्ना मनुजकरिणां पञ्च च निशा
हयानां द्वात्रिंशत्खरकरभयोः पञ्चककृतिः ।
विरूपा साप्य्यायुर्वृ षमहिषयोर्द्वादश शुनां
स्मृतं छागादीनां दशकसहिताः षट् च परमम् ॥३१॥
मनुष्य (स्त्री या पुरुष) तथा हाथी की परमायु १२० वर्ष की,
घोड़ों की ३२ वर्ष, ऊँट और गधों की परमायु २५ वर्ष की, बैल और
भैंस की आयु २४ वर्ष, कुत्ते की १२ वर्ष तथा भेड़ वगैरह की १६
वर्ष । ॥ ३१ ॥
ये धर्मकर्मनिरता विजितेन्द्रिया ये
ये पथ्यभोजनजुषो द्विजदेवभक्ताः ।
लोके नरा दधति ये कुलशीललीलां
तेषामिदं कथितमायुरुदारधीभिः ॥३२॥
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५३५
जो धर्म कर्म में निरत है (शास्त्रों में बताये गये धर्म और कर्म
करते हैं) जितेन्द्रिय, पथ्य भोजन (स्वास्थ्य के अनुकूल पदार्थ जितनी
मात्रा में जितनी बार खाना चाहिये उतना ही भोजन) करते हैं, ब्राह्मण
और देवताओं के जो भक्त हैं जो अपने कुल, शील की मर्यादानुसार
आचार-विचार का पालन करते हैं--उनकी आयुर्दाय ऊपर विद्वानों ने
बताई हैं । ॥ ३२॥
तेईसवाँ अध्याय
अष्टकवर्ग
ग्रहों के विभिन्न राशियों में भ्रमण करने से व्यक्ति विशेष पर
क्या शुभाशुभ प्रभाव होता है इसे गोचर फल कहते हैं। साधारणतः
जन्म राशि (जिस राशि में जन्म के समय चन्द्रमा हो) से गोचर
विचार किया जाता है। उदाहरण के लिये जन्मकालीन चन्द्र राशि से
जब चतुर्थ राशि में बृहस्पति भ्रमण करे तो अनिष्ट फल—जब साल
भर के बाद जन्म राशि से पाँचवीं राशि में बृहस्पति आ जावे तो उत्तम
फल—जब फिर बृहस्पति छठी राशि में आ जावे, तो जन्म चन्द्रमा
से षष्ठ होने के कारण अनिष्ट फल आदि विचार गोचर विचार
कहलाता है।
गोचर विचार में जन्म के ग्रह जहाँ हों वहीं माने जाते हैं और
जिस समय का गोचर विचार करना हो उस समय विचारणीय ग्रह
कहाँ हैं यह पंचांग में देखा जाता है। गोचर विचार केवल जन्मकालीन
चन्द्रमा से करना, यह साधारण प्रथा है। किन्तु जो विशेष सूक्ष्म
विचार करते हैं उनका कहना है कि मान लीजिये जन्मकालीन चन्द्रमा
से तो आजकल बृहस्पति अनिष्ट स्थान पर है परन्तु जन्मकालीन अन्य
ग्रहों से यदि बृहस्पति अच्छे स्थान पर हो तो क्या आप गोचरस्थ
बृहस्पति को निकृष्ट कहेंगे ? या इसका उलटा दृष्टांत लीजिये। जन्म-
कालीन चन्द्रमा से तो बृहस्पति इष्ट स्थान पर है किन्तु सूर्य, मंगल,
बुध, जन्मकालीन बृहस्पति, शुक्र, शनि और जन्म लग्न से आजकल
बृहस्पति अनिष्ट स्थान पर हो तो क्या आप गोचरस्थ (जहाँ आजकल
बृहस्पति जा रहा हो उसे) शुभ कहेंगे ? कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे
चन्द्रमा से गोचर विचार किया जाता है वैसे ही अन्य ग्रहों और लग्न से
तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५३७
गोचर विचार को अष्टक वर्ग विचार कहते हैं। अष्टक का अर्थ है
आठ । यह आठ कौन-कौन हैं—सात ग्रह और जन्म लग्न । आठों से
विचार करने पर कोई भी ग्रह अधिक के दृष्टिकोण से शुभ हो तो शुभ
और अशुभ हो तो अशुभ । यह अष्टक वर्ग विचार कहलाता है।
गोचरग्रहवशान्मनुजानां यच्छुभाशुभफलाभ्युपलब्धये ।
अष्टवर्ग इति यो महदुक्तस्तत्प्रसाधनमिहाभिदधेऽहम् ॥१॥
ग्रहों के गोचरवश (विभिन्न राशियों में भ्रमणवश) क्या शुभ
या अशुभ फल होता है। यह जानने के लिये अष्टक वर्ग की बहुत
प्रशंसा की गई है । इसलिये अब मैं अष्टक वर्ग बनाना बताता हूँ ॥१॥
आलिख्य सम्यग्भुवि राशिचक्रं ग्रहस्थितिं तज्जननप्रवृत्ताम् ।
तत्तद्ग्रहक्षात्क्रमशोऽष्टवर्गं प्रोक्तं करोत्यक्षविधानमत्र ॥२॥
पहले भूमि पर राशि चक्र आदि बनाने की प्रथा थी और जहाँ
पर बिन्दी लगानी होती वहाँ रुद्राक्ष का दाना या अन्य कोई गोली के
आकार का फल रखकर गणना किया करते थे किन्तु अब हम लोग
सब कार्य कागज़ पर करते हैं और जहाँ पर गोली का निशान बनाना
हो वहाँ ० (शून्य) का चिह्न लगा देते हैं। इसलिये श्लोकों में यद्यपि
अक्ष (गोली) रखना आदि लिखा है तथापि हम अपनी व्याख्या में इस
दक्षिण भारत में शुभ स्थानों पर बिन्दु रक्खे जाते हैं अशुभ स्थानों
पर रेखा ।
उत्तर भारत में शुभ स्थानों पर रेखा रखी जाती है अशुभ स्थानों
पर बिन्दु । बात एक ही है । तात्पर्य शुभ या अशुभ से है—चाहे उसे
रेखा कहिये या बिन्दु ।
५३८ फलदीपिका
विषय को आधुनिक तरीके से समझावेंगे। कागज पर जन्म कुंडली
बना लीजिये, जन्म लग्न तथा जन्म कुण्डली में जो ग्रह जहाँ हो
ध्यानपूर्वक लिखें। नीचे के श्लोकों में सात ग्रहों के सात चक्र और
एक सातों की सम्मिलित संख्या का चक्र, इस प्रकार कुल आठ चक्र
बनाने बताये गये हैं। मान लीजिये
आप को साथ में दी गई जन्मकुंडली
के अष्टक वर्ग चक्र बनाने हैं।
यहाँ जो अष्टक वर्ग चक्र बनाने
बताये गये हैं, उनमें राहु और
केतु की आवश्यकता नहीं पड़ती
क्योंकि ये दोनों ग्रह अवश्य हैं
परन्तु इनका शरीर पिंड नहीं है।
ये केवल गणित सिद्ध स्थान मात्र हैं। सर्वप्रथम सूर्य का अष्टक वर्ग
साधन लिखते हैं ॥२॥
पुत्रीवसाहिधनिकेऽर्ककुजार्कजेभ्यो
मुक्ताळके सुरगुरोर्भू गुजात्तथाश्रीः ।
ज्ञाद्गोमतीधनपरा रविरिष्टदोन्जात्-
गीतोन्नयेप्युदयभाल्लघुतान्नपात्रे ॥३॥
सूर्य अपने स्थान से १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में शुभ
होता है इस कारण जिस राशि में जन्मकालीन सूर्य है उस राशि
से १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में बिन्दु ० लगाइये । इसी
प्रकार चन्द्रमा से ३-६-१०-११ इन स्थानों पर सूर्य शुभ होता है ।
मंगल से और शनि से भी १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में
सूर्य शुभ होता है । बृहस्पति से ५-६-९-११ स्थानों पर जब गोचर-
वश सूर्य भ्रमण करता है तो उत्तम फल देता है । शुक्र से ६-७-१२
तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५३९.
स्थानों पर सूर्य गोचरवश शुभ होता है। जन्मकालीन बुध से ३-५-
६-९-१०-११ और १२वें स्थान में जब सूर्य आता है तो शुभ फल
देता है। जो-जो स्थान शुभ बताये सूर्य का अष्टक वर्ग
गये हैं उनसे अन्यत्र अशुभ फल
समझना चाहिये। लग्न से ३-४-
६-१०-११-१२ स्थानों में शुभ
बिन्दु लगाइये। शुभ स्थानों में
बिन्दु लगाइये। सातों ग्रहों से
शुभ स्थानों में बिन्दु लगाने से
साथ का चक्र बनेगा। यह सूर्य
का अष्टक वर्ग तैयार हुआ। इस
में कुल ४८ बिन्दु हुए जिनका विवरण निम्नलिखित है :
सूर्य से ८, चन्द्रमा से ४, मंगल से ८, बुध से ७, बृहस्पति से ४,
शुक्र से ३, शनि से ८ और लग्न से ६ ॥१३॥
गीतासौ जनके रवेः कलितसान्निष्के तुषारद्युतेः
भौमाच्छ्रीगुणिते धनस्य युगवन्मासान्दनित्ये बुधात् ।
जीवात्कौरवसज्जनस्य भृगुजाद्गूढात्मसिद्धाज्ञया
मन्दाद्वाणचये तनीर्गतिनये चन्द्रः शुभो गोचरे ॥१४॥
इस श्लोक में चन्द्रमा का अष्टक वर्ग बनाना बताया जाता है :—
सूर्य से चन्द्रमा ३-६-७-८-१०-११ स्थानों में शुभ होता है।
जन्मकालीन चन्द्र राशि से जब चन्द्रमा स्वयं १-३-६-७-१०-११
स्थानों पर आता है तो शुभ होता है। मंगल से २-३-५-६-९-
१०-११ स्थान शुभ हैं। बुध से १-३-४-५-७-८-१०-११
शुभ स्थान हैं। बृहस्पति से गोचरवश चन्द्रमा निम्नलिखित स्थानों पर
५४० फलदीपिका
शुभ होता है: १-२-४-७-८-१०-११* शुक्र से ३-४-५-७-९-१०-११
स्थानों में चन्द्रमा शुभ प्रभाव दिखाता है। शनि से ३-५-६-११ शुभ
स्थान हैं और लग्न से ३-६-१०-११। इन स्थानों पर शुभ बिन्दु लगाने
चाहियें। पृष्ठ ५३८ पर जो जन्म चन्द्रमा का अष्टक वर्ग
कुण्डली दी गई है उसका चन्द्रमा का
अष्टक वर्ग साथ में दिया गया है।
इसमें कुल ४९ शुभ बिन्दु हैं जिनका
विवरण निम्नलिखित है। ६ बिन्दु
सूर्य से, ६ जन्मकालीन चन्द्रमा से, ७
मंगल से, ८ बुध से, ७ बृहस्पति से,
७ शुक्र से, ४ शनि से और ४ ही
लग्न से शुभ स्थानों में डाले गये हैं।
तीक्ष्णांशोर्गणितानके शिशिरगोर्लाक्षाय भूमेः सुतात्
पुत्रीवासजनाय चन्द्रतनयाद्गोमेतके गीष्पतेः ।
तन्नाकारि सितात्तदा कुरुशनेः कोवासदाधेनुको
लग्नात्स्वात्कलितं नयेत् क्षितिसुतः क्षेमप्रदो गोचरे ॥५॥
अब मंगल का अष्टक वर्ग बनाना बताया जाता मंगल के
अष्टक वर्ग में निम्नलिखित शुभ स्थान हैं।
*वराहमिहिर और मन्त्रेश्वर का इस विषय में मतभेद है।
वराहमिहिर के मत से जन्मकालीन बृहस्पति से १-४-७-८-१०-११-१२
इन स्थानों में चन्द्रमा शुभ होता है।