फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२७
जन्म नक्षत्र से पांचवां नक्षत्र कौन सा हुआ ? इस नक्षत्र से गिनने
पर जो महादशा चले उसे “उत्पन्न” महादशा कहते हैं । जन्म
नक्षत्र से आठवां नक्षत्र गिनिये । इस आठवें नक्षत्र से प्रारंभ कर जो
महादशा लगाई जाती हैं वे “आधान” दशा कहलाती हैं । इसी
प्रकार जन्म नक्षत्र से चौथे नक्षत्र से जो महादशा लगाई जाती है उसे
क्षेम दशा कहते हैं
यदि तीनों प्रकार की दशा किसी एक समय ही (वर्ष तथा मास
विशेष में) समाप्त होवें तो वह मारक का समय होता है । अल्पायु
योग वाले को तृतीय दशा, मध्यायु वाले को पंचम दशा और दीर्घायु
व्यक्ति को सातवीं दशा मारक होती है ॥१६॥
निसर्गदशा
एकं द्वे नव विंशतिर्धृतिकृतिः पञ्चाशदेषां क्रमात्
चन्द्रारेन्दुजशुक्रजीवदिनकृद्दैवाकरीणां समाः ।
स्वै स्वैः पुष्टफला निसर्गजनितैः पक्तिर्दशाया क्रमा-
दन्ते लग्नदशा शुभेति यवना नेच्छन्ति केचित्तथा ॥१७॥
चन्द्रमा का १ वर्ष, मंगल के २ वर्ष, बुध के ९ वर्ष, शुक्र के
२० वर्ष, बृहस्पति के १८ वर्ष, सूर्य के २० वर्ष, शनि के ५० वर्ष
नैसर्गिक दशा में होते हैं । यवनों के मत से कि शनि के ५० वर्ष
में लग्न दशा भी सम्मिलित है, अन्य लोगों को मान्य नहीं है ।
जो ग्रह जन्म कुंडली में अच्छा पड़ा हो वह शुभ, जो अनिष्ट पड़ा हो
वह पाप फल करता है । ग्रहों का बल (षड्बल) निकाल कर जो
नैसर्गिक दशा लगाई जाती है उसके लिये केशवीय जातक पद्धति
तथा श्रीपति पद्धति देखनी चाहिये ॥१७॥