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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 684 में से

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पृष्ठ 534

बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५३३
'पणफर' में हो, तब उनकी जो आपोक्लिम में हों। मान लीजिये १ से
अधिक ग्रह केन्द्र में, है किस की दशा सर्वप्रथम आवेगी ? उसकी
जो बली ग्रह से केन्द्र स्थित ग्रहों में सबसे बलवान् हो । यदि
समान बली हों तो जो अधिक आयुकाल (वर्ष आदि) प्रदान कर
रहा हो । यदि प्रदत्त आयुकाल भी बराबर हो तो उस ग्रह
की दशा सर्वप्रथम आवेगी जो सूर्य से अस्त होकर सर्व प्रथम
उदित होगा । यह क्रम प्रायः निम्नलिखित है (i) लग्न, सूर्य, चन्द्र,
मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि । यहाँ ग्रह का बल निम्न
लिखित प्रकार से निकाला जाता है—भावमध्य से जितने अंश कला
विकला पर ग्रह हो—उस अंतर को—भाव मध्य से भाव संधि के अंतर
से भाग दीजिये ।
अंशोद्भवं लग्नबलात्प्रसाध्य-
मायुश्च पिण्डोद्भवमर्कवीर्यात् ।
नैसर्गिकं चन्द्रबलात्प्रसाध्यं
ब्रूमस्त्रयाणामपि वीर्यसाम्ये ॥२८॥
यदि लग्न बली हो तो अंशायुदाय लगाइये, सूर्य बली हो तो
पिंडायु, चन्द्रमा बली हो निसर्गायु । यदि तीनों बली हों तो ? आगे
के श्लोक बताते हैं । ॥२८॥
तेषां त्रयाणामिह संयुतिस्तु
त्रिभिर्हृता सैव दशा प्रकल्प्या ।
वीर्ये द्वयोरेक्यदलं तयोः स्यात्
चेज्जीवशर्मायुरमी बलोनाः ॥२९॥
यदि तीनों बली हों तो तीनों से जो आयु आती है—उनको जोड़