सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 539

५३८ फलदीपिका
विषय को आधुनिक तरीके से समझावेंगे। कागज पर जन्म कुंडली
बना लीजिये, जन्म लग्न तथा जन्म कुण्डली में जो ग्रह जहाँ हो
ध्यानपूर्वक लिखें। नीचे के श्लोकों में सात ग्रहों के सात चक्र और
एक सातों की सम्मिलित संख्या का चक्र, इस प्रकार कुल आठ चक्र
बनाने बताये गये हैं। मान लीजिये
आप को साथ में दी गई जन्मकुंडली
के अष्टक वर्ग चक्र बनाने हैं।
यहाँ जो अष्टक वर्ग चक्र बनाने
बताये गये हैं, उनमें राहु और
केतु की आवश्यकता नहीं पड़ती
क्योंकि ये दोनों ग्रह अवश्य हैं
परन्तु इनका शरीर पिंड नहीं है।
ये केवल गणित सिद्ध स्थान मात्र हैं। सर्वप्रथम सूर्य का अष्टक वर्ग
साधन लिखते हैं ॥२॥
पुत्रीवसाहिधनिकेऽर्ककुजार्कजेभ्यो
मुक्ताळके सुरगुरोर्भू गुजात्तथाश्रीः ।
ज्ञाद्गोमतीधनपरा रविरिष्टदोन्जात्-
गीतोन्नयेप्युदयभाल्लघुतान्नपात्रे ॥३॥
सूर्य अपने स्थान से १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में शुभ
होता है इस कारण जिस राशि में जन्मकालीन सूर्य है उस राशि
से १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में बिन्दु ० लगाइये । इसी
प्रकार चन्द्रमा से ३-६-१०-११ इन स्थानों पर सूर्य शुभ होता है ।
मंगल से और शनि से भी १-२-४-७-८-९-१०-११ स्थानों में
सूर्य शुभ होता है । बृहस्पति से ५-६-९-११ स्थानों पर जब गोचर-
वश सूर्य भ्रमण करता है तो उत्तम फल देता है । शुक्र से ६-७-१२