फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 529, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें५२८ फलदीपिका
अंशदशा
लिप्तीकृत्य भजेद् ग्रहं खखजिनैस्तच्छिष्टमायुष्कला
आशाखाशिवहृताब्दमासदिवसाः सत्योदितेऽंशायुषि ।
वक्रिण्युच्चगते त्रिसङ्गुणमिदं स्वांशत्रिभागोत्तमे
द्विघ्नं नीचगतेऽर्धमप्यथ दलं मौढ्ये सितार्कौ विना ॥१८॥
प्रत्येक ग्रह की राशि, अंश, कला के कला बनाकर २४०० से
भाग दीजिये । जो शेष रहे उतनी आयुष्कला वह ग्रह प्रदान करता
है । इन आयुष्कलाओं को २०० से भाग दीजिये । लब्धि = वर्ष । शेष
को १२ से गुणा कर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = मास । शेष
को ३० से गुणाकर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = दिन । यह
सत्याचार्य का मत है । यदि ग्रह उच्च राशि में हो या वक्री हो तो उसके
प्रदत्त जो वर्ष, मास, दिन आवें उनको तिगुना कर लेना चाहिये ।
यदि ग्रह स्वनवांश, स्वद्रेष्काण या वर्गोत्तम हो तो उसके प्रदत्त जितने
वर्ष, मास, दिन आवें उनको दुगुना करना चाहिये । यदि ग्रह नीच
राशि में हो या अस्त हो तो उसके दिये हुए वर्ष, मास, दिन को
आधा कर दीजिये । लेकिन यह अस्तंगत ग्रह की दशा को आधी करने
की प्रक्रिया शुक्र और शनि को लागू नहीं होती ॥१८॥
सर्वाद्धं त्रिकृतेषुषण्मितलवह्लासोऽसतामुत्क्रमा-
द्विःफात्सत्सु दलं तदा हरति बल्येको बहुष्वेकभे ।
त्र्यंशोनं रिपुभे विना क्षितिसुतं सत्योपदेशे दशा
लग्नस्यांशसमा बलिन्युदयभेऽस्यात्रापि तुल्यापि च ॥१९॥
यदि पापग्रह बारहवें घर में हो तो उसकी प्रदत्त आयु पूरी
कम कर दी जाती है; यदि ग्यारहवें घर में हो तो १/२ कम कीजिये;