फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५२३
में यदि भिन्न-भिन्न ग्रह हों तो, क्या फल उन देहराशियों की दशा
का, या जीव राशियों की दशा का होगा यह बतलाते हैं :—
(१) यदि मंगल, सूर्य, शनि, राहु देह और जीव राशियों में
हों तो एक-एक क्रूर ग्रह के योग से भी, उनकी दशा में मरण हो
सकता है—यदि कई पाप ग्रह देह या जीव राशि में हों तो मरण में
क्या सन्देह है ।
(२) यदि केवल देह राशि पापाक्रान्त (अर्थात् उसमें पाप ग्रह
हों) हो तो महारोग (भयंकर व्याधि) । यदि जीव राशि पापाक्रान्त हो
तो उसकी दशा में महान् भय । यदि दोनों में हो तो मृत्यु ।
(३) यदि दो क्रूर ग्रह ऊपर लिखे योग १ या २ में हों तो
बहुत बढ़ता हुआ भयंकर रोग, यदि ३ ग्रह उपर्युक्त प्रकार से पीड़ा
कारक हों तो अपमृत्यु । यदि चारों क्रूर ग्रहों ने देह तथा जीव
राशियों को आक्रान्त कर रखा हो तो मृत्यु ।
(४) यदि एक साथ जीव राशि और देह राशि पापग्रहों से
आक्रान्त हों तो राजभय, चोर भय आदि महाभय हों । सूर्य यदि अनिष्ट
कारक ग्रह हो तो अग्नि से पीड़ा, चन्द्रमा पीड़ा कारक हो तो जल
से क्लेश, भौम हो तो शस्त्र से चोट, बुध हो तो वायु से बाधा,
बृहस्पति हो तो पेट का रोग, शुक्र हो तो अग्नि बाधा,
शनि से गुल्म, रोग, राहु से विष से उत्पन्न रोग होते हैं ।
यह चारों योग जन्म कुंडली के हैं—किन्तु यदि जीव देह राशियों
में गोचर से शुभ ग्रह जा रहे हों तो शुभ फल, पापग्रह जा रहे हों तो
पाप फल होता है । अर्थात् गोचर भी देखना चाहिये ।
(५) यदि तृतीय बृहस्पति, सप्तम स्थान स्थित मंगल, जन्म स्थान
में शनि, नवम में राहु, आठवें घर में चन्द्रमा, बारहवें घर में
सूर्य, सप्तम में बुध, छठे शुक्र यदि पापग्रह के साथ हों या दुर्बल हों
नीच या शत्रु राशि में हों और उन पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो
जातक दुःख प्राप्त करता है ।