फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंआभूषण और सम्पत्ति मिले। जातक सुखी रहे और उसका मन ज्ञान
और बुद्धि में लगा रहे ॥१७॥
(vii) जब चन्द्रमा में केतु की अन्तर्दशा होती है तो तबीयत
को परेशान करने वाली घटनायें होती हैं; जल से भय हो। धन हानि
हो और बन्धुओं की भी हानि हो अर्थात् किसी बन्धु को कष्ट हो
या जातक की उससे अन-बन हो जाये। जातक को दास और भृत्यों
से भी हानि हो। संक्षेप में यह है कि चन्द्रमा में केतु कष्ट कारक होता
है ॥१८॥
(viii) चन्द्रमा में शुक्र का शुभ फल है। जल, यान (सवारी),
धन, भूषण, स्त्री सम्बन्धी कार्य में सुख हो। जातक की खेती के
काम में भी वृद्धि हो। यदि जातक व्यापारी है तो माल खरीदने-बेचने
में भी लाभ होगा। इस अन्तर्दशा में पुत्र, मित्र, पशु तथा अन्न की
प्राप्ति हो और उनसे हर्ष हो ॥१९॥
(ix) जब चन्द्रमा की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा आती है
तो राजा से सम्मान प्राप्त होता है। जातक शूरता के कार्य करता है।
यदि किसी रोग से पीड़ा पा रहा हो तो उस रोग की शान्ति हो
जाती है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है किन्तु पित्त और वात से
नवीन रोग होने की सम्भावना रहती है। इस अन्तर्दशा में जातक
विजयी होता है और उसके शत्रु पक्ष को नीचा देखना पड़ता है।
॥२०॥
मंगल की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
पित्तोष्णरुग्व्रणभयं सहजैर्वियोगः
क्षेत्रप्रवादजनितार्थविभूतिसिद्धिः ।
ज्ञात्यग्निशत्रु नृपचोरजनैर्विरोधो
धात्रीसुतो हरति चेच्छरवं स्वकीयम् ॥२१॥