फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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का समागम हो, माता की प्रसन्नता की बात हो और जातक को अपनी
स्त्री का सुख हो ॥१२॥
(ii) जब चन्द्रमा की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो
पित्त-प्रकोप, अग्नि-प्रकोप तथा रुधिर की ख़राबी के कारण रोग हो।
शत्रुओं और चोरों से पीड़ा हो। क्लेश और दुःख हो। धन और
मान का नाश हो ॥१३॥
(iii) चन्द्रमा की महादशा में, राहु की अन्तर्दशा में तीव्र
दोष हो अर्थात् जातक के मन को कष्ट पहुंचाने वाली कोई तीव्र घटना
हो या कोई शारीरिक बीमारी हो। शत्रुओं की वृद्धि हो, वन्धु बीमार
पड़े, तूफ़ान और वज्र से भय और कष्ट हो। और खाने-पीने की
गड़बड़ी के कारण शरीर में ज्वर हो ॥१४॥
(iv) चन्द्रमा की महादशा में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा हो
तो जातक की प्रवृत्ति दान और धर्म में होती है। राजा से सम्मान
प्राप्त हो, मित्रों से समागम हो, नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्त हों
और सब प्रकार के सुख का उदय हो ॥१५॥
(v) चन्द्रमा की महादशा में जब शनि का अन्तर हो तो
अनेक प्रकार के रोगों से कष्ट हो। जातक के मित्र, पुत्र और स्त्री
को बीमारी हो, कोई महान् विपत्ति की सम्भावना हो अथवा प्राण
की हानि हो। कहने का तात्पर्य यह है कि चन्द्रमा में शनि की
अन्तर्दशा बहुत पीड़ा कारक होती है ॥१६॥
(vi) जब चन्द्रमा की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो तो
सर्वदा हाथी, घोड़े, गौ और सब प्रकार के धन की प्राप्ति हो।
*श्लोक ५ से ११ तक जो अनिष्ट फल बताये गये हैं वे तभी
घटित होंगे जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ या अन्तर्दशानाथ और
प्रत्यन्तर्दशानाथ दोनों अनिष्ट हों।