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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६७
मित्रों पर विपत्ति पड़े । जल से भय हो । कृषि, धन, पशु और
सन्तान की हानि हो ॥३७॥
(ix) राहु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल :
राजा, अग्नि, चोर और अस्त्र से भय हो या तो जातक का शरीर
नाश हो जाये या मानस रोग हो । नेत्रों को पीड़ा हो, हृदय रोग
(Heart trouble) हो और जातक अपने पद से भ्रष्ट हो जाये ।
अर्थात् स्थान हानि का भय हो ॥ ३८ ॥
बृहस्पति की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
सौभाग्यकान्तिबहुमानगुणोदयः
स्यात्सत्पुत्रसिद्धिरवनीपतिपूजनं च ।
आचार्यसाधुजनसंयुतिरिष्टसिद्धिः
संवत्सरं हरति देवगुरौ स्वकीयम् ॥३६॥
वेश्याङ्गनामदकृदासवदोषसङ्गः
उत्कर्षसौख्यसकुटुम्बपशुप्रपीडा ।
अर्थव्ययोरुभयमक्षिजरुक्सुतार्ति
जौवीं दशां विशति दैनकरे नराणाम् ॥४०॥
स्त्रीद्यूतमद्यजमहाव्यसनं त्रिदोषैः
केचिद्वदन्त्यपि च केवलमङ्गलाप्तिः ।
देवद्विजार्चनसुतार्थसुखप्रयोगै-
र्गीर्वाणपूजितदशां हरतीन्दुसूनौ ॥४१॥
शस्त्रव्रणं भवति भृत्यजनैर्विरोध-
श्चित्तव्यथा तनययोषिदुपद्रवश्च ।