फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५५
लगे या शरीर में फोड़े हों। हमारे विचार से सूर्य, मंगल दोनों
अच्छे पड़े हों—परस्पर इष्ट राशि में तो मंगल का अच्छा फल ही
होगा ॥५॥
(iv) सूर्य की महादशा में राहु का अन्तर बताते हैं। शत्रुओं
का उदय हो, वैर बढ़े, धन का नाश हो या चोरी हो। आपत्तियाँ
आवें। जातक को विष से भय हो। जातक के शिर में पीड़ा हो।
नेत्र में रोग हो किन्तु उसका मन सांसारिक विषयों के भोग की ओर
अधिक आकृष्ट हो ॥६॥
(v) जब सूर्य की महादशा में बृहस्पति का अन्तर हो तो
शत्रुओं का नाश हो, नाना प्रकार से धन की आमदनी हो। नित्य
देवताओं की अर्चना हो, ब्राह्मण, गुरु और बन्धुओं का सत्कार हो।
किन्तु कान में पीड़ा हो और यक्ष्मा सम्बन्धी रोग हो। हमारे विचार
से बृहस्पति की अन्तर्दशा में अनिष्ट फल तब ही होगा जब बृहस्पति
प्रबल मारक हो या दुःस्थान में पड़ा हो ॥७॥
(vi) सूर्य की महादशा में जब शनि की अन्तर्दशा होती है
तो धन का नाश हो, पुत्र से वियोग हो, स्त्री को रोग हो, किसी गुरु
जन (गुरु, पिता, चाचा आदि) की मृत्यु हो। बहुत अधिक व्यय हो।
वस्त्र तथा घर की अन्य वस्तुओं का नाश हो। गन्दगी रहे (जातक का
मकान, कपड़े, शरीर आदि स्वच्छ न रहें) और जातक को कफ-
रोगों से पीड़ा हो। यद्यपि उपर्युक्त श्लोक में कफ पीड़ा कही गयी
है किन्तु हमारे विचार से सूर्य पित्त का स्वामी है और शनि वात का
इस कारण शनि की अन्तर्दशा में वात पीड़ा होनी चाहिये ॥८॥
(vii) सूर्य की महादशा में जब बुध की अन्तर्दशा हो तो
फोड़े, फुंसी, चर्म रोग, कुष्ठ, पीलिया आदि हो। कमर में, पेट में दर्द
हो और वात, पित्त, कफ इन तीनों के विकार से शरीर में रोग
हो। बुध वात, पित्त, कफ तीनों का स्वामी है। इस कारण तीनों
दोषों से रोग होना कहा है। ॥९॥