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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३६१
वृद्ध स्त्री (अर्थात् जवानी जिसकी बीत चुकी है) की प्राप्ति भी हो।
शनि की महादशा तो लाखों व्यक्तियों को हो जाती है किन्तु वृद्ध स्त्री
की प्राप्ति तो सबको नहीं होती। यहाँ पर वृद्ध का अर्थ लेना
चाहिये अधिक अवस्था वाली और जन्मकुण्डली में यदि शनि ऐसा
योग करता है जिसके कारण अन्य स्त्री से संसर्ग होने की संभावना
हो तभी शनि की दशा में यह योग घटित होगा। शनि की महादशा
में पशु, भैंस और बैल की प्राप्ति भी होती है किन्तु जातक की स्त्री
और पुत्र को पीड़ा होती है और जातक स्वयं को वातरोग (गठिया,
बाय आदि), कफ रोग, गुदा रोग (बवासीर आदि) होते हैं तथा हाथ
पैरों में जलन रहती है। ॥२३॥
(vii) बुध की महादशा में सदैव आचार्य सिद्धि प्राप्त हो।
आचार्य सिद्धि के दो अर्थ हैं, जातक को अपने गुरुओं से सिद्धि मिले
या जातक स्वयं अन्य लोगों का गुरु हो, इसप्रकार उसे सिद्धि मिले।
बुध की महादशा में भी, खेत और घोड़ों का लाभ होता है और
ब्राह्मणों से धन की प्राप्ति होती है। जातक को श्रेष्ठ मनुष्यों से
सम्पर्क का अवसर मिले। वह देवताओं का पूजन करे और पूर्ण धन
प्राप्ति हो। बुध वात, पित्त, कफ इन तीनों का ही अधिष्ठाता है,
इसलिये इन त्रिदोषों में से किसी के कुपित होने से या किन्हीं दो के
कारण या तीनों ही के कारण रोग हो। ॥२४॥
(viii) केतु की महादशा में बड़ा अनिष्ट फल होता है। स्त्रियों
के कारण बहुत शोक और मोह हो। हृदय में बहुत दुःख का नाम
शोक है। बुद्धि में विभ्रम होने का नाम मोह है। स्त्रियों तथा धनिकों
के कारण जातक को पीड़ा हो या उसके अफ़सरों या मालिक से उसे
पीड़ा पहुँचे। जातक से अपराध बने और उसके धन का नाश हो।
अपना देश छोड़ना पड़े। कफ जनित रोगों के कारण पीड़ा हो और
पैर तथा दांत में रोग हो। ॥२५॥

३६२ फलदीपिका
(ix) शुक्र की महादशा में स्त्री, रत्न, वस्त्र, कान्ति, निधि (गड़ा
हुआ द्रव्य), धन, भूषा, घोड़ा, शय्या और आसन की प्राप्ति हो । माल
खरीदने से, खेती से या पानी के जहाज से आने जाने वाली चीजों
से धन का आगम हो । शुक्र की महादशा के यह सब शुभ फल बताये
हैं किन्तु शुक्र की महादशा में किसी गुरुजन का (माता-पिता आदि का)
वियोग होता है, मन में चिन्ता रहती है और बन्धुओं को कष्ट होता
है । ॥ २६ ॥
इस उन्नीसवें अध्याय में जो शुभफल या अशुभफल बताये हैं उनसे
यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि शुभफल किस प्रकार का होगा और
अशुभफल किस प्रकार का होगा । केवल यह निर्देश करने के लिये इन
श्लोकों को काम में लेना चाहिये । यदि जन्म कुण्डली में ग्रह शुभ है तो
वह शुभ फल ही अधिक देगा, अशुभ फल सामान्य । और यदि ग्रह अशुभ
है तो वह अशुभ फल ही अधिक देगा, शुभ फल कम देगा । शुभता या
अशुभता निम्नलिखित कारणों से होती है । (१) नैसर्गिक शुभत्व या
पापत्व । (२) किस भवन का स्वामी है। (३) किस भाव में बैठा है।
(४) किन ग्रहों के साथ है। (५) किन ग्रहों से दृष्ट है। (६) जिस
ग्रह का विचार किया जा रहा है वह दशवर्ग में, अष्टकवर्ग में बलवान्
है या नहीं। (७) अस्त तो नहीं है । इन सबका विचार कर यह नतीजा
निकालना चाहिये कि ग्रह शुभफल दिखावेगा वा अशुभफल या मिला
जुला फल । अब भावार्थ रत्नाकर के जन्मकुण्डली विचार से सम्बन्धित
कुछ सिद्धान्त दिये जाते हैं ।
भावार्थ रत्नाकर नामक ग्रन्थ श्री रामानुजाचार्य प्रणीत है । इस
ग्रंथ के प्रारम्भ में जो मंगलाचरण दिया गया है उससे यही प्रकट होता
है कि वैष्णव सम्प्रदाय के महाप्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य और इस
ज्योतिष ग्रंथ भावार्थ रत्नाकर के निर्माता एक ही रामानुजाचार्य हैं ।
यदि कदाचित् यह दो भिन्न रामानुजाचार्य हों, तो भी इस ग्रंथ के
महत्व में कोई अन्तर नहीं आता क्योंकि भावार्थ रत्नाकर में कुछ ऐसी

विशेष बातें हैं जो अन्य ग्रंथों में उपलब्ध नहीं होतीं । यह पाठक स्वयं
देखेंगे । इस पुस्तक का नाम भावार्थ रत्नाकर है; रत्नाकर के दो
अर्थ हैं--रत्नों का आकर और समुद्र ।
इसमें फलित ज्योतिष सम्बन्धी अनेक बहुमूल्य रत्न हैं, इस कारण
इसका 'रत्नाकर' नाम सार्थक है । क्योंकि रत्नाकर का अर्थ 'समुद्र'
भी होता है और समुद्र में तरंगें होती हैं; इस कारण इस ग्रन्थ को
अध्यायों में न बांटकर तरंगो में बांटा है; प्रथम तरंग, द्वितीय तरंग
आदि । इसमें कुल १४ तरंग हैं । यदि संस्कृत का मूल और उसका
हिन्दी में भावार्थ, दोनों दिये जावें तो ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो
जावेगा, इस कारण यहां केवल भावार्थ ही दिया जा रहा है ।

मेषलग्न विचार

१. यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और चतुर्थेश तथा पंचमेश
का सम्बन्ध हो, तो राजयोग होता है । चतुर्थ का स्वामी चन्द्रमा और
पंचम का स्वामी सूर्य होने के कारण-सूर्य और चन्द्रमा का सम्बन्ध
राजयोग कारक होगा । यदि दोनों एक-दूसरे से सप्तम हों तो
पूर्णिमा के आसपास चन्द्रमा होने के कारण विशेष सुन्दर योग
होगा क्योंकि अमावस्या के करीब सूर्य चन्द्रमा एक राशि में रहते
हैं किन्तु क्षीण चन्द्र होने के कारण चन्द्रमा बलवान् नहीं होता ।
एक अन्य ज्योतिष ग्रन्थ का मत है कि चाहे कोई भी लग्न हो
यदि सूर्य चन्द्रमा दोनों सिंह राशि में हों या दोनों कर्क राशि
में हों या सूर्य कर्क में चन्द्रमा सिंह में हो तो मनुष्य का शरीर
कृश होता है । पाप दृष्ट तथा अन्य दुर्योग होने से यक्ष्मा भी हो
जाता है ।
२. मेष लग्न की कुंडली में दूसरे और सातवें घर का मालिक
शुक्र होने के कारण मारक होता है । किन्तु सदैव यह नहीं समझ लेना
चाहिए कि शुक्र मार ही डालेगा । पहले यह निश्चय करना चाहिये
कि जातक की आयु अल्प है या मध्य या दीर्घ । जिस आयु में

३६४ फलदीपिका
मारक की सम्भावना हो उस आयु में शुक्र की महादशा में शनि की
अन्तर्दशा या अन्य पापी ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है ।
जहाँ जहाँ मारक का प्रसंग आवे वहाँ यह अवश्य विचार कर लेना
चाहिये कि जातक की आयु अल्प है, मध्य या दीर्घ ।
३—मेष लग्न वाले व्यक्ति की कुंडली में बृहस्पति नवें और
बारहवें घर का मालिक होता है । यदि ऐसा बृहस्पति दशम स्थान में
हो तो मारक हो सकता है ।
४—मेष लग्न हो और यदि शनि और बृहस्पति का योग हो तो
केवल इस योग मात्र से राजयोग नही होता । यहाँ कहना
यह है कि शनि दशमेश होता है और बृहस्पति नवमेश होता
है—दोनो के स्वामियों का योग प्रबल राजयोग माना गया है तब
शनि और बृहस्पति का योग क्यों नहीं बहुत अच्छा माना गया ?
इसका कारण यह है कि शनि दसवें के साथ-साथ ग्यारहवें का भी
मालिक होता है और बृहस्पति नवें के साथ-साथ बारहवें का भी
मालिक होता है । इस कारण नवमेश दशमेश के योग में एकादशेश
द्वादशेश का योग हो जाने से उत्कृष्टता जाती रही ।
५—जिस व्यक्ति का मेष लग्न में जन्म होता है उसे माता
(शीतला) चेचक, फोड़े, फुन्सी, घाव, चोट, शस्त्र से आघात आदि
का भय रहता है । मेष का स्वामी मंगल है इस कारण उपर्युक्त का
भय रहता है ।
६—यदि मंगल छठे या आठवें घर के मालिक के साथ हो तो
उसकी महादशा या अन्तर्दशा में सिर में चोट लगने से या ब्लड
प्रेशर (जिस रोग में खून सिर में चढ़ जाता है) या सिर के अन्य
रोग से मृत्यु* हो सकती है ।
*जहां मृत्यु शब्द आवे वहाँ मृत्यु हो जावेगी बिलकुल ऐसा ही
नहीं समझना चाहिए । अत्यन्त कष्ट को भी मृत्यु कहते हैं ।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३६५
७—मेष लग्न की ज-मपत्रिका में धन (दूसरे) स्थान का
स्वामी शुक्र यदि बारहवें घर में भी हो तो भी शुभ होता है ।
इसका कारण यह है कि मेष लग्न की कुण्डली में द्वादश में शुक्र
उच्च राशि का हो जाता है । इसके अतिरिक्त बारहवां घर शयन
सुख भोग आदि का है जहाँ स्थित होने से शुक्र को विशेष प्रसन्नता होती
है और विशेष भोग प्रदान करता है । इस कारण मेष लग्न की कुण्डली
में द्वादश में स्थित शुक्र अच्छा माना गया है । किन्तु यह साधारण
नियम का अपवाद है । साधारण नियम यह है कि धन स्थान का
स्वामी यदि व्यय (बारहवें) स्थान में बैठे तो धननाश करता है ।
इसीलिए कहा है ।
मेषे जातस्य धनपो व्ययस्थोपि कविश्शुभः ।
इतरर्क्षेषु जातस्य व्ययस्थः धनपोऽशुभः ॥७॥
८—यदि मेष लग्न हो और मंगल और शुक्र का योग हो अर्थात्
दोनों एक साथ हों तो यह योग अच्छा भी है और खराब भी। अच्छा
इसलिए है कि लग्नेश और धनेश का योग उत्तम माना गया है
इस कारण धन के लिये यह योग उत्तम रहेगा और इसका कारक
प्रभाव होगा किन्तु साथ ही सप्तमेश और अष्टमेश का सम्बन्ध
होने से इसका मारक फल भी होगा ।
९—मेष लग्न हो और यदि मंगल, बृहस्पति तथा शुक्र के साथ
द्वितीय स्थान में हो तो निश्चय ही योग* देने वाला होता है ।
१०—यदि जन्म लग्न मेष हो और लग्न का स्वामी मंगल
तीसरे घर में बृहस्पति और शुक्र के साथ हो तो योगप्रद नहीं होता ।
११—मेष लग्न हो और मंगल और बृहस्पति दोनों एक साथ चौथे
*जो ग्रह पूर्ण शुभ प्रभाव दिखाता है—चाहे अच्छे भवनों का
स्वामी होने के कारण, चाहे अन्य ग्रह से शुभ योग होने के कारण,
वह योग देने वाला होता है।

३६६ फलदीपिका
घर में बैठे हों तो निश्चय योग देने वाला होता है। यहां यह बात
ध्यान में रखनी चाहिये कि चतुर्थ में कर्क राशि होने के कारण यद्यपि
मंगल नीच राशि का हो जावेगा किन्तु उच्च बृहस्पति के साथ बैठने से
नीचत्व का दोष जाता रहेगा। और लग्नेश नवमेश दोनों एक साथ
बैठकर दशम को देखेंगे, इस कारण केन्द्र में दोनो के स्थित होने से
योगकारकता हुई।
१२-यदि जन्म लग्न मेष हो और मंगल पांचवें घर में हो
तो मंगल की महादशा में निश्चय ही योग (राज योग, अभ्युदय आदि)
होता है।
मेषे जातस्यहि कुजः पञ्चमस्थो भवेद्यदि।
कुजदायेचसंप्राप्ते योगदश्चभवेद्ध्रुवम् ॥२॥
१३--यदि मेष लग्न हो और बृहस्पति एकादश भाव में हो
तो बृहस्पति की महादशा में "अवयोग" होता है अर्थात् बृहस्पति
की महादशा में विशेष उन्नति नहीं होती। बल्कि अवनति हो
सकती है।
१४--मेष लग्न हो और मंगल और बुध दोनों छठे घर में पड़े
हों तो उनकी महादशा में फोड़े, फुन्सी, चोट, रक्त विकार आदि
दोष होते हैं। यद्यपि बुध कन्या का उच्च में होगा, किन्तु लग्न
और छठे घर के स्वामी का छठ घर में योग उत्तम नहीं माना
गया है।
१५-यदि मेष लग्न हो और मंगल तथा शुक्र तुला राशि में
सातवें घर में हों तो मनुष्य अपने बाहुबल से अपनी भाग्य वृद्धि
करता है और कुछ धन भी कमाता है। कहने का तात्पर्य यह है

'योग' के विरुद्ध "अवयोग" होता है। योग का अर्थ है अच्छा
फल करने वाला। अवयोग का अर्थ है अच्छा फल नहीं करने वाला।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३६७

कि यह उत्तम योग है परन्तु बहुत अधिक धन दिलाने वाला
योग नहीं।
१६—यदि मेष लग्न हो और मंगल अष्टम में हो तो योग
प्रदान नहीं करता । अष्टम राशि वृश्चिक होगी। यह मंगल की अपनी
राशि है किन्तु लग्नेश दुःस्थान* में होने से योग नहीं होगा । किन्तु
यदि सूर्य और शुक्र भी मंगल के साथ अष्टम में हों तो कुछ धनयोग
बनता है ।
हमारे विचार से ऐसे मनुष्य को--सूर्य, मंगल, शुक्र, अष्टम में
होने से बवासीर, भगंदर आदि गुदा के रोग, नेत्र विकार आदि
अनेक कष्ट होंगे । मृत्यु भी सहसा होगी । यद्यपि भावार्थ रत्नाकर
ने इसे लग्नेश, धनेश, पञ्चमेश, सप्तमेश, का योग मानकर कुछ
धन योग बताया है किन्तु सप्तमेश का अष्टम में होना और तीन-
तीन ग्रहों का दुःस्थान में होना उत्तम नहीं । शुक्र के अष्टम में
होने से वीर्य विकार, प्रमेह आदि की भी सम्भावना रहती है । स्त्री
सुख में भी बाधा होगी ।
१७—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, मंगल एवं बृहस्पति शुक्र
भी एक साथ नवम में हों तथा शनि तुला राशि का सप्तम में हो
तो विशेष योग होता है। लग्नेश, पञ्चमेश, सप्तमेश धनेश, नवमेश
के एक साथ बैठने से -- वह भी भाग्य स्थान में, तथा राज्येश
के उच्च होने से विशेष योग कहा गया है।
१८—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, शुक्र लग्न में हों किन्तु
उनपर बृहस्पति की दृष्टि न हो तो शुक्र योगप्रद होता है ।
१९—(क) मेष लग्न हो और शुक्र पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो
शुक्र योग प्रद नहीं होता ।
*छठे, आठवें, बारहवें, स्थान को 'दुःस्थान' कहते हैं।

३६८ फलदीपिका
(ख) मेष लग्न हो और सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो
निश्चय योगप्रद होता है,
ऊपर जो बृहस्पति की दृष्टि के दो भिन्न-भिन्न फल बताये गये
हैं उसका कारण यह प्रतीत होता है कि बृहस्पति और सूर्य मित्र हैं।
इस कारण सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि का अच्छा फल बताया गया
है किन्तु शुक्र और बृहस्पति शत्रु हैं इस कारण शुक्र पर बृहस्पति
की दृष्टि का उत्तम फल नहीं होता ।
२०--मेष लग्न हो और सूर्य, बुध, शुक्र तीनों ग्यारहवें घर में
बैठे हों तो उनकी दशा भाग्य को बढ़ाने वाली होगी
२१—यदि मेष लग्न हो और मेष राशि का सूर्य लग्न मे हो
तथा कर्क राशि का चन्द्रमा चौथे घर में हो तो निश्चय राजयोग
होता है ।
२२—यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और सूर्य, बृहस्पति,
तथा शुक्र दशम स्थान में हों तो उनकी दशा में गंगास्नान होगा ।
टिप्पणीः—ऊपर जो मेष लग्न के विशेष योगायोग बताये गये हैं वे
प्रायः अन्य ग्रन्थों में प्राप्त नहीं होते । उदाहरण के लिए शुक्र और
बृहस्पति की परस्पर दृष्टि पराशर के मत से केन्द्रेश, त्रिकोणेश का
सम्बन्ध होने के कारण अच्छी मानी जाती है किन्तु ऊपर १९वें
योग में इसका फल अच्छा नहीं बताया गया है । भावार्थ रत्नाकर
में विशेष योग हैं। यही इस ग्रन्थ की विशेषता और उपयोगिता है।
वृषभलग्न विचार
१—यदि वृष लग्न हो तो नवें और दशवें घर के मालिक
होने के बावजूद भी शनि योगकारक नहीं होता । न शनि, सूर्य और
बुध के योग के बिना राजयोग बनाता है । संस्कृत का श्लोक निम्न-
लिखित है ।
वृषभजातस्यच शनिः भाग्यकर्मेश्वरोऽपिवा ।
सूर्यसोमसुताभ्याम् वा न युक्तो नैव योगदः ॥१॥

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३६९
एक टीकाकार ने अर्थ किया है कि यदि वृष लग्न हो तो नवें और
दसवें घर का स्वामी होने पर भी शनि योग-कारक नहीं होता ।
और सूर्य और बुध लग्न में होने पर भी राजयोग उत्पन्न नहीं
करते ।
हमारे विचार से द्वितीय पंक्ति का शुद्ध अर्थ यह है कि शनि
सूर्य और बुध से युक्त न हो तो योगप्रद नहीं होता ।
२. यदि वृष लग्न हो, दशम में राहु हो या मकर में नवम
में मंगल बृहस्पति हों तो गंगा स्नान की प्राप्ति होती है ।
३. यदि वृष लग्न हो, चौथे चन्द्रमा हो और उस चन्द्रमा को
बृहस्पति और बुध पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो ऐसा चन्द्रमा योग देता है
अर्थात् शुभ फल देता है । वृष लग्न वाले को चन्द्रमा तीसरे घर का
स्वामी होगा । साधारण तौर पर तीसरे घर का स्वामी पापी गिना
जाता है । इस लग्न में बृहस्पति ८वें और ११वें का मालिक हुआ इस
कारण बृहस्पति भी पापी हुआ । साधारण तौर पर पापी को पापी देखे तो
विशेष पाप योग होता है परन्तु षड् बल में बुध और बृहस्पति की सदैव
शुभ दृष्टि ही मानी गई है । इसी सिद्धान्त पर बृहस्पति दृष्ट चन्द्रमा को
शुभ माना है । बुध द्वितीय-पंचमेश होने से यद्यपि वृष लग्न वाले को
मारक हुआ किन्तु पंचमेश होने से उसमें शुभता भी आ गई । इस
कारण बुध से दृष्ट चतुर्थ स्थित चन्द्रमा को शुभ माना है । चतुर्थ
में चन्द्रमा होने से उसे एक रूप केन्द्र बल प्राप्त हुआ और एक
रूप दिग्बल भी प्राप्त हुआ । इसी कारण ऐसे चन्द्रमा को शुभ मान
लिया है ।
४. वृष लग्न हो, सप्तम में वृश्चिक राशि में मंगल हो तो ऐसा
मंगल शुभ होता है ।
५. यदि मीन राशि में सूर्य, शनि, पड़े हों तो जातक दीर्घायु और
भाग्यवान् हो । यहाँ शनि नवम और दशम का स्वामी होने से और
सूर्य चतुर्थ का स्वामी होने से चतुर्थेश नवमेश तथा चतुर्थेश दशमेश का

३७० फलदीपिका
सम्बन्ध हुआ। “लाभे सर्वे प्रशस्ताः” इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य शनि
की लाभस्थान में उत्तम स्थिति हुई।
६. यदि वृष लग्न हो और बुध, बृहस्पति किसी भी स्थान में
एक साथ बैठें या एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखें तो धन योग होता
है। मन्त्रेश्वर महाराज ने अष्टमेश का किसी भी भाव के स्वामी से
सम्बन्ध होने से अनिष्ट योग माना है। जातकादेश मार्ग अध्याय १०
श्लोक ३४ में भी यह कहा गया है कि अष्टमेश की दृष्टि या किसी
भावेश की अष्टम स्थान स्थिति उस ग्रह को बिगाड़ती है। यह स्वा-
भाविक शंका होती है कि बृहस्पति आठवें और ग्यारहवें का मालिक होने
से बुध को देख कर या उसके साथ बैठकर धन योग कैसे उत्पन्न करेगा ?
इसका उत्तर यही है कि बृहस्पति लाभेश है और बुध द्वितीयेश है
इस कारण इन दोनों का सम्बन्ध धन योग कारक हुआ। भिन्न-भिन्न
भावों में इन दोनों के बैठने से समान फल नहीं होगा। जितना
उत्तम फल बुध के कन्या में होने से (दूसरे, पाँचवें का मालिक
उच्च राशि में ५वें बैठा हो) और बृहस्पति ११वें घर में मीन राशि का
बलवान् हो तो ऐसे बुध और गुरु की परस्पर पूर्ण दृष्टि से जो धन
योग हो सकता है अथवा बुध दूसरे घर का मालिक होकर दूसरे में
बैठे और बृहस्पति ८वें का मालिक होकर आठवें में बैठे तो जो शुभ
फल करेगा, वह—वे दोनों एक-साथ १२वें घर में बैठे हों तो कैसे कर
सकते हैं ? इसलिए इस योग में इसका भी तारतम्य कर लेना चाहिए
कि दोनों किस राशि में या किन-किन राशियों में बैठे हैं।
७. ऊपर नं० ६ में जो धन योग बताया गया है वह—यदि मंगल,
बुध, बृहस्पति से सम्बन्ध करता हो तो नष्ट हो जाता है। अर्थात् बुध
या बृहस्पति को या दोनों को मंगल चतुर्थ, सप्तम या अष्टम दृष्टि से
देखे या बुध, बृहस्पति के साथ मंगल बैठा हो तो धन योग नहीं होता।
यहाँ कारण यह है कि मंगल १२वें घर का स्वामी है। १२वें घर से
व्यय या धन के खर्च का विचार होता है। इस कारण व्यय भाव का

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७१
स्वामी धनेश (दूसरे के स्वामी) या लाभेश (ग्यारहवें के स्वामी) के
साथ बैठ कर या उनमें से एक या दोनों को देखकर धन एकत्रित होने
के योग को नष्ट कर देता है।
८-९. यदि वृष लग्न हो और मंगल, बुध, बृहस्पति, साथ हों तो
बुध की महादशा में जातक को कर्जा (ऋण) होगा।
उपर्युक्त स्थिति में मंगल की महादशा धन देने वाली होगी ।
बुध यदि केन्द्र में हो तो बुध की दशा में अच्छा योग हो अर्थात् धन
लाभ का योग उत्तम रहे। बृहस्पति की दशा का मिश्र अर्थात्
मिला-जुला फल है कभी धन लाभ कभी धन हानि। यहाँ पर मंगल
की दशा को क्यों अच्छा बताया ? मंगल तो सातवें और बारहवें का
मालिक है ऐसी हालत में, --सप्तम का मालिक होने से मंगल को
अच्छा कहा क्योंकि पराशर के मत से यदि केन्द्र का मालिक पाप
ग्रह हो तो शुभ फल करता है। यहाँ भी यह विचार कर लेना
चाहिए कि मंगल बैठा कहाँ है ? उदाहरण के लिए यदि अपनी उच्च
राशि मकर में मंगल नवम में बैठा हो तो जितना अच्छा फल करेगा
उतना अच्छा फल नीच राशि का नहीं करेगा। अथवा अपनी राशि
का होकर भी यदि १२वें घर में बैठा हो तो वैसा शुभफल नहीं कर
सकता। यदि अष्टम में बैठा होगा तो चाहे पति की (लाइफ़ इन्शयोरन्स)
जीवन बीमा से रुपया दिला दे परन्तु पति के स्वास्थ्य के लिए अच्छा
नहीं होगा। यदि सातवें घर का मालिक होकर छठे में बैठे तो पति से
कलह करावेगा। इन सब बातों का विचार कर लेना चाहिए। यदि
पुरुष की कुण्डली में ७वें घर का मालिक होकर छठे में बैठा हो तो
अपनी स्त्री से कलह हो।
१०. यदि बुध, शुक्र लग्न में हों और सातवें घर में बृहस्पति
हों तो बुध की महादशा प्रबल योग कारक होती है। यहाँ पर हेतु यह
है कि लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश का योग हो गया। शुक्र षष्ठेश भी है।

३७२ फलदीपिका
किन्तु एक ही ग्रह लग्नेश, षष्ठेश हो तो षष्ठेश होने का दोष नहीं
होता ।
११. यदि वृष लग्न में मंगल और शुक्र हों और नवम में मकर का
बृहस्पति हो तो बुध तथा बृहस्पति की दशा में भाग्य उदय होगा ।
१२. यदि मंगल, बुध, शनि नवम में हों और दशम में कुंभ
का राहु हो तो मंगल तथा राहु की दशा में गंगा स्नान हो ।
१३. वृष लग्न वाले को शुक्र दशा अच्छी जाती है यह सामान्य
नियम है । कारण यह है कि शुक्र पहले और छठे घर का मालिक
हुआ । लग्न का स्वामी होने से छठे के स्वामी होने का दोष नहीं
होता । पराशर ने भी लिखा है कि मेष लग्न वाले जातक को
मंगल अष्टम स्थान का स्वामी होने पर भी शुभ फल करता है और
वृष लग्न वाले जातक को शुक्र छठे स्थान का स्वामी होने पर भी
शुभ फल करता है । शुक्र की दशा में धनागम होता है । भाग्योदय
कारक है ।
१४. यदि वृष लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक को विशेष धन
योग नहीं होता । यदि किसी और लग्न में चन्द्रमा प्रथम भाव
से हो तो चन्द्रमा भाग्य उदय करता है ।
मिथुन लग्न
१. यदि मिथुन लग्न हो और सूर्य, बुध सिंह राशि में तीसरे
घर में बैठे हों तो बुध योग फल देने वाला होता है और उसकी
दशा अच्छी जाती है । होरासार अध्याय २३ श्लोक ३ के मतानुसार
सूर्य, बुध का योग उत्तम होता है । इस सम्बन्ध में देखिये इस पुस्तक का
अध्याय १६ श्लोक ७ जहाँ लग्नेश और तृतीयेश का सम्बन्ध अच्छा
बताया गया है ।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७३
२. मिथुन लग्न वाले जातक की कुण्डली में चन्द्र, मंगल और
शुक्र दूसरे घर में बैठे हों तो शुक्र की दशा में धन प्राप्त होता है।
३. यदि मिथुन लग्न हो, कर्क में दूसरे स्थान में मंगल हो और
चन्द्रमा और शनि मकर राशि में अष्टम में हों तो शनि की दशा
में मिश्रफल (मिला जुला) फल होता है अर्थात् इष्टफल भी और
अनिष्ट फल भी। मंगल की दशा में धनागम होता है यह निस्संशय
कहा जा सकता है।
४. मिथुन लग्न हो, मंगल और शनि दूसरे हों, चन्द्रमा अष्टम
में हो तो शनि और मंगल की दशा में धन नाश होता है, जायदाद
नष्ट होती है। किन्तु थोड़ा साधन रह जाता है।
५. मिथुन लग्न वाले जातक को, यद्यपि दूसरे घर का मालिक,
होने के कारण चन्द्रमा मारक होना चाहिये किन्तु मारक नहीं
होता।
६. मिथुन लग्न हो, चन्द्रमा और मंगल लाभ में हों अर्थात्
ग्यारहवें भाव में बैठे हों अथवा नवमेश शनि कुम्भ का नवम में
बैठा हो तो विशेष धन योग होता है।
७. मिथुन लग्न हो, गुरु और शनि नवम स्थान में हों तो
उनकी दशा और अन्तर्दशा में गंगा स्नान हो। गुरु तो धर्मकारक
ग्रह है, इस कारण उसकी दशा और अन्तर्दशा में धार्मिक कार्य होना,
गंगास्नान आदि स्वाभाविक ही है। किन्तु शनि भी ऐसा करता है।
इसका सिद्धान्त यह है कि मिथुन लग्न की कुण्डली में नवें घर
में कुम्भ राशि पड़ेगी और शनि नवम होने से कुम्भ राशि का होगा
अर्थात् स्वगृही। ज्योतिष का सिद्धांत है कि यदि पाप ग्रह किसी स्थान
पर बैठे तो उस स्थान को बिगाड़ता है लेकिन पापी ग्रह यदि अपनी
राशि में बैठे तो उसे—अपने उस भाव को—बिगाड़ता नहीं है बल्कि
उस भाव की वृद्धि करता है।

३७४ फलदीपिका
“पापोऽपि स्वगृहस्थश्चेद् भाववृद्धिं करोत्यलम्' इसी सिद्धान्त के
अनुसार नवम यद्यपि पापी शनि हुआ किन्तु कुम्भ अपना घर होने के
कारण उसे बिगाड़ता नहीं है बल्कि बढ़ाता है। नवम धर्म-स्थान है इस
कारण शनि का गंगा स्नान आदि शुभ धार्मिक फल कहा गया है।
८. यदि मेष का बुध ग्यारहवें हो तो बड़े भाई से विरोध
कराता है।
कर्क लग्न विचार
१. कर्क लग्न वाली कुण्डली में गुरु कोई विशेष योग देने वाला
नहीं होता।
२. कर्क लग्न वाले को मंगल योग कारक होता है। यदि मंगल
मेष राशि का दशम अथवा वृश्चिक राशि का पंचम में बैठा हो तो
निश्चय ही बहुत योग देने वाला होता है अर्थात् विशेष उन्नति कराने
वाला योग है।
३. यदि शुक्र दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो तो योग देने
वाला होता है; और स्थानों में शुक्र योगप्रद नहीं होता।
४. यदि चन्द्र, मंगल और बृहस्पति द्वितीय स्थान में हों और
सूर्य, शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक धनवान् और भाग्यवान् हो।
५. यदि शुक्र और बुध पंचम में हों तो बुध की दशा योग
देने वाली होती है। पिछले पृष्ठों में जहाँ भावार्थ रत्नाकर के योग
दिये हैं और जहाँ योग देने वाला लिखा है—इसका अर्थ समझना
चाहिए कि यह शुभ योग है अर्थात् पदोन्नति, सम्मान-वृद्धि, धनागम
सफलता आदि फल होते हैं।
६. कर्क लग्न हो, चन्द्र, बुध, शुक्र ग्यारहवें हों, लग्न में बृहस्पति,
दशम में सूर्य हों तो ये बहुत उत्तम योग होता है। जातक साहसी
गुणवान् यशस्वी राजा होते हैं।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७५
७. यदि सूर्य और मंगल दशम में हों तो जातक धनी होता
है किन्तु बृहस्पति की दशा मारक होती है ।
८. यदि बुध और शुक्र १२वें भाव में हों तो शुक्र दशा में
राजयोग होता है ।
९. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति लग्न में हों तो जातक भाग्यवान्
और प्रसिद्ध हो; यह विशेष राज योग है ।
१०. यदि कर्क राशि का चन्द्रमा लग्न में हो और सप्तम में
मकर का मंगल हो तो राज योग होता है ।
११. कर्क का चन्द्रमा लग्न में और चतुर्थ में तुला राशि का
शनि हो तो राज योग है ।
१२. कर्क लग्न हो, लग्न में चन्द्रमा और दशम में मेष का
सूर्य हो तो राज योगकारक है ।
१३. यदि बुध और वृहस्पति ग्यारहवें हों, शनि राहु, पंचम में हों
तो राहु की महादशा में गंगा स्नान आदि शुभ फल होते हैं ।
सिंह लग्न
अब नीचे सिंह लग्न वाली जन्म कुंडलियों के योग दिये जाते हैं ।
१. यदि सिंह लग्न हो और सूर्य, मंगल और बुध एक साथ बैठे हों
तो जातक बहुत धनी होता है ।
यहाँ लग्नेश, द्वितीयेश, लग्नेश लाभेश को युति से धनयोग हुआ
और सिंह लग्न वाले जातक को मंगल केन्द्र और त्रिकोण का मालिक
होने के कारण योग कारक हुआ । इस कारण सूर्य, मंगल, बुध के योग को
*कर्क लग्न के जितने योग दिये हैं—उनमें प्रत्येक जगह यह
नहीं लिखा है कि यदि कर्क लग्न हो—परन्तु कर्क लग्न सम्बन्धी यह
योग हैं ऐसा समझना चाहिये ।

३७६ फलदीपिका
बहुत धन कारक योग कहा है। सूर्य, मंगल का योग लग्नेश, चतुर्थेश,
भाग्येश का योग हुआ।
२. यदि सूर्य, बुध, वृहस्पति साथ हों तो भी बहुत धन कारक
होता है। सूर्य, बुध का योग तो धन कारक योग हुआ ही (जिसका हेतु
ऊपर बताया जा चुका है) वृहस्पति पंचमेश होने से लग्नेश, द्वितीयेश,
पंचमेश, लाभेश का योग हो गया। यह योग धन कारक होना ही
चाहिए।
३. यदि केवल सूर्य-बुध एक साथ हों तो स्वल्प (थोड़ा) भाग्य
करते हैं।
४. यदि वृहस्पति और शुक्र एक साथ हों तो योग उत्पन्न नहीं
करते बल्कि योग भंग करते हैं ऐसा ज्योतिषियों का मत है।
५. यदि सिंह लग्न हो और तुला का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो
शुक्र शुभ होता है किन्तु यदि शुक्र दशम में हो तो ऐसा शुक्र पापी होगा
और जातक को योग प्राप्त नहीं होता। ऐसा भावार्थ रत्नाकर ग्रंथकार
ने क्यों लिखा यह समझ में नहीं आता क्योंकि अपने घर में बैठा
हुआ ग्रह तो घर को बिगाड़ता नहीं। यह अवश्य है कि केन्द्र का स्वामी
शुभ ग्रह शुभ फल नहीं करता और केन्द्र का स्वामी क्रूर ग्रह शुभ फल
करता है परन्तु चाहे शुभ, चाहे क्रूर ग्रह केन्द्र में यदि अपनी राशि का
बैठा हो तो उसे अपने भाव की वृद्धि ही करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त
अपने घर का शुक्र दशम में मालव्य योग उत्पन्न करेगा जो बहुत उत्तम
योग है। इस कारण भावार्था रत्नाकर के इस मत से हम पूर्ण सहमत
नहीं हैं। हमारे विचार में ऐसी स्थिति में शुक्र के बल, सम्बन्ध, और
उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि आदि का विचार कर लेना चाहिये।
६. यदि सिंह लग्न हो तो केवल नवमेश और दशमेश अर्थात् मंगल
और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता।
७. यदि सिंह लग्न हो, सूर्य, मंगल और बुध लग्न में हों तो बुध
की दशा के समय धन और भाग्य की वृद्धि होती है।

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३७७
८. सिंह लग्न हो और कर्क के मंगल और शनि बैठे हों तो शनि
की दशा में योग होता है ।
कन्या लग्न
अब कन्या लग्न के जातकों के योग बताये जाते हैं :—
१. यदि कन्या लग्न हो और सूर्य का शुक्र या चन्द्रमा से सम्बन्ध
हो तो सूर्य की दशा में धन प्राप्ति होती है ।
२. यदि सूर्य शुक्र का सम्बन्ध हो तो शुक्र की दशा में जातक
धनहीन हो जाय । सम्भवतः शुक्र धनेश होकर अस्त हो जाने से या
धनेश व्ययेश के सम्बन्ध हो जाने से यह कहा है ।
३. यदि सूर्य, चन्द्र का सम्बन्ध हो तो चन्द्रमा की दशा मिश्र फल
देने वाली होती है अर्थात् मिला-जुला फल; कभी अच्छा, कभी खराब,
कुछ अच्छा, कुछ खराब ।
४. यदि चन्द्रमा और शुक्र सप्तम में हों, बृहस्पति ११वें हो,
सूर्य मेष का हो तो बृहस्पति और शुक्र की दशा में ४ या ५ जीवित
पत्नियां हों । ऐसा व्यक्ति राजा के तुल्य ऐश्वर्य-युक्त और भोगी
होता है । प्राचीन समय में जब अनेक पत्नियां होना सुख और भोग
का लक्षण माना गया था यह योग लिखा गया था परन्तु अब जिन
देशों या जातियों में कानून द्वारा बहु-विवाह प्रथा बन्द हो गई है
यह योग घटित नहीं होगा । परन्तु सप्तम में शुक्र और चन्द्रमा के
मीन राशि में होने से (शुक्र मीन में उच्च का होता है) और
सप्तमेश बृहस्पति के कर्क (लाभ स्थान) में—अपनी उच्च राशि
में बैठ कर सप्तम को पूर्ण दृष्टि से देखने के कारण ऐसी कुण्डली
वाले पुरुष को बहुत सौन्दर्ययुक्त शुभ लक्षणा पत्नी प्राप्त होगी
और वह उच्च कुल की भी होगी (क्योंकि सप्तमेश उच्च राशि का
हुआ) और उसको विवाह के द्वारा एवं विवाह के बाद अच्छा लाभ

३७८ फलदीपिका
होगा। क्योंकि सातवें का स्वामी लाभ में बैठा और लाभ का स्वामी
सातवें में बैठा। इस प्रकार एक दूसरे की राशि में बैठने से सातवें
और ग्यारहवें के मालिक का परस्पर स्थान परिवर्तन हुआ ।
५. कन्या लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र चौथे हों तो
बृहस्पति और शुक्र की दशा में योग होता है।
६. यदि कन्या लग्न हो, लाभ में शनि हों तो शनि की दशा
योग (अर्थात् शुभ फल) देने वाली होती है।
तुला लग्न विचार
अब तुला लग्न के योग दिये जाते हैं :—
१. तुला लग्न वाले जातक को शनि योग कारक होता है।
२. तुला लग्न होने पर बृहस्पति तीसरे और छठे घर का मालिक
होने पर भी योग उत्पन्न करता है।
३. मंगल दूसरे, सातवें घर का मालिक हुआ, इसलिए मंगल पापी
हुआ परन्तु मारता नहीं है। हमारे विचार से अन्य योगों को देखने
पर ही यह कहा जा सकता है कि मंगल की दशा मारक होगी
अथवा नहीं।
४. तुला लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र (१) एक साथ हों
(२) या एक-दूसरे को देखते हों या (३) मंगल और शनि से
दृष्ट हों अथवा (४) मंगल और शनि की राशियों में हों तो
गुरु की दशा में जब शुक्र की अन्तर्दशा होगी अथवा शुक्र की महादशा
में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा होगी तो शीतला, व्रण, स्फोट आदि का
रोग होवेगा ।
५. तुला लग्न हो, सूर्य, बुध, शुक्र लग्न में हों तो जातक धनवान्
और भाग्यवान् होता है । साधारण तौर पर तुला का सूर्य बहुत निकृष्ट
फलदाता समझा जाता है । पृथुयशस् ने अपनी पुस्तक होरा सार

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७९
में लिखा है कि यदि तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो सहस्त्र
राज योगों को नष्ट कर देता है। यहां भावार्थ रत्नाकर में यह बताया
है कि यदि शुक्र और बुध का योग सूर्य के साथ लग्न में हो तो
अच्छा योग है।
६. यदि तुला जन्म लग्न हो और बारहवें घर में सूर्य और बुध
हों और उन पर शनि की दृष्टि हो तो जातक का पिता भाग्यवान्
किन्तु मध्यायु होगा।
७. तुला लग्न हो और सूर्य, बुध तथा शनि का मंगल से सम्बन्ध
हो तो जातक बहुत भाग्यशाली हो।
८. तुला लग्न हो और सूय, बुध, शनि का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो
तो जातक भाग्यशाली है।
९. तुला लग्न हो बुध, शुक्र, शनि, लग्न में हों और चन्द्रमा और
मंगल सातवें घर में हों तो बुध की दशा में जातक धनवान् होता है।
१०. तुला लग्न वाली कुण्डली, में यदि बृहस्पति अष्टम, शनि
नवम, और मंगल तथा बुध लाभ स्थान में हों तो विशेष राज
योग है।
११. यदि चन्द्रमा लग्न में हो, बृहस्पति छठे या बारहवें हों तो
शनि की दशा में भाग्यवान् होता है।
१२. तुला लग्न हो, लग्न में शुक्र हो तो मारक होता है।
१३. यद्यपि मंगल दूसरे और सातवें का मालिक हुआ लेकिन
मारक नहीं होता।
ऊपर जो नं० ३ तथा ५ के योग बताये गये हैं उसमें नं० ५ के
योग पर हम अपने विचार उस प्रकरण में व्यक्त कर चुके हैं। जहाँ
तक लग्नेश शुक्र के मारक होने का प्रश्न है पाराशरी में लिखा हुआ
है लग्नाधीश भी मारक हो जाता है। साधारण तौर पर शुक्र को
अष्टमेश का दोष नहीं होना चाहिए क्योंकि वह लग्न का स्वामी
भी है परन्तु ज्योतिष के सर्व सिद्धान्त तर्कगम्य नहीं है।

३८० फलदीपिका
१४. यदि शनि लग्न में हो और दशम में चन्द्रमा हो तो राज योग
होता है।
१५. यदि मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि तुला में और राहु
दशम में हों तो राहु की दशा में तीर्थ-स्नान आदि शुभ फल
होता है।*
वृश्चिक लग्न
अब वृश्चिक लग्न के कुछ योग दिये जाते हैं :—
१. वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध और बृहस्पति का योग हो
तो विशेष धन कारक कहा गया है।
२. वृश्चिक लग्न हो, बृहस्पति तृतीय हो तो जातक विशेष
उदार होता है।
३. यदि सूर्य, बुध शुक्र सप्तम में हों तो बुध की महादशा में
राज योग होता है और जातक का बहुत यश विस्तार होता है।
४. यदि बृहस्पति और बुध पाचवें घर में हो (मीन राशि में)
और कन्या राशि का चन्द्रमा लाभ स्थान में हो तो मनुष्य बहुत
धनिक और भाग्यशाली होता है।
५. यदि कर्क राशि के चन्द्र, बृहस्पति केतु नवम में हों तो
केतु दशा साधारण होती है किन्तु बृहस्पति की दशा बहुत योग देने
वाली होती है।
*संस्कृत में 'घट' छपा है। इसका अर्थ हुआ कुंभ में मंगल, बुध,
बृहस्पति तथा शनि हों और राहु दशम में हो तो तीर्थ स्नानादि
शुभ फल होता है। अगर इसे 'घट' न मान कर 'धट' अर्थात् तुला
मानें तो ऊपर जो अर्थ दिया है वह ठीक है।