फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
२४२ फलदीपिका
यदि जन्मकुण्डली में पांचवें घर का स्वामी शत्रु राशि का हो,
नीच राशि का हो या अस्त हो और लग्न से छठे, आठवें या बारहवें
पड़ा हो तो सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है। इसी प्रकार कोई ग्रह
नीचराशि का, शत्रुराशि का या अस्त होकर पंचम में बैठा हो या छठे
आठवें, बारहवें घर का मालिक होकर पांचवें घर में बैठ जावे तो भी
पुत्र का अभाव या पुत्र कष्ट करता है।
ऊपर कहे हुए जितने योग अधिक हों उतनी ही अधिक बाधा
समझनी चाहिये। बाधाकारक ग्रह जिस राशि में बैठा हो उसके
अनुसार यह निर्णय करना चाहिये कि किस देवता, वृक्ष या जीव के
कारण बाधा हो रही है और उसकी शान्ति का उपाय करना
चाहिये।
द्रोहाच्छंभुसुपर्णयोर्नहि सुतः शापात्पितॄणांरवे
रिन्दोर्मातृसुवासिनीभगवतीकोपान्मनोदोषतः ।
स्वग्रामस्थितदेवतागुहरिपुज्यात्युत्थदोषात्कुजे
शापाद्बालकृताद्विलालवधतः श्रीविष्णु कोपाद्बुधे ॥२०॥
पारंपर्यसुरप्रियद्विजगुरुद्रोहात्फलाढ्यद्रुम-
च्छेदाद्देवगुरौ तथा सति भृगौ पुष्पद्रुमच्छेदनात् ।
साध्वीगोकुलजातदोषवशतो यक्ष्यादिकामेन वा
मन्देऽश्वत्थवधाद्रुषा पितृपतेः प्रेतैः पिशाचादिभिः ॥२१॥
स्वर्भानौ सुतगे सुतेशसहिते सर्पस्य शापात्तथा
केतौ ब्राह्मणशापतश्च गुलिके प्रेतोत्थशापं वदेत् ।
शुक्रेन्दू गुलिकान्वितौ यदि वधूगोहत्तिमाहुः सुते
जीवो वाथ शिखी समान्दिरिह चेद्भू देवहत्याऽसुतः ॥२२॥
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४३
यदि सन्तान बाधाकारक ग्रह सूर्य है तो समझना चाहिये कि
भगवान् शम्भु और गरुड़ से द्रोह करने के कारण या पितरों के शाप का
फल है। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह चन्द्रमा है तो माता या किसी
अन्य सधवा स्त्री के चित्त को दुःख पहुँचाने के कारण या भगवती का
शाप सन्तान में बाधा हैं। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह मंगल हो तो
ग्रामदेवता, भगवान् कार्तिक स्वामी के प्रति अवज्ञा से या शत्रुओं
अथवा भाईबन्धुओं के शाप से सन्तान कष्ट है। यदि बुध सन्तान में
बाधा डाल रहा है तो समझिये कि बिल्ली को मारने के कारण या
मछलियों के या अन्य प्राणियों के अण्डों को नष्ट करने के कारण या
कम उम्र के बालक-बालिकाओं के शाप से या भगवान् विष्णु के कोप से
सन्तान नहीं हो रही है।
यदि जन्म कुण्डली में बृहस्पति बिगड़ा हुआ है और उसके कारण
सन्तान नहीं हो रही है तो इस व्यक्ति ने इस जन्म में या पूर्व जन्म
में फलदार वृक्षों को कटाया है या अपने कुलगुरु या कुल पुरोहित से
द्रोह किया है। यदि शुक्र के कारण सन्तान नहीं हो रही है तो
समझिये कि इस व्यक्ति ने पुष्प के वृक्षों को कटवाया है या गौ के
प्रति कोई पाप किया है अथवा किसी साध्वी स्त्री के शाप से ऐसा
हुआ है। प्रायः ऐसी स्थिति में यक्षिणी का शाप समझना चाहिये।
यदि जन्म-कुण्डली में शनि बिगड़ा हुआ है तो समझिये कि इसने
पीपल के पेड़ कटवाये और पिशाच, प्रेत तथा यमराज के शाप से
ऐसा हुआ है। मृतआत्मा को प्रेत कहते हैं।
यदि राहु पंचम में हो या पंचमेश को दूषित करता हो और उसके
कारण सन्तान में बाधा हो रही हो तो समझिये कि सर्प के शाप से
ऐसा हुआ है। यदि केतु के कारण यह दोष हो तो उसमें हेतु ब्राह्मण
का शाप समझना चाहिये। यदि मान्दि पंचम में हो या पंचमेश के
साथ हो और इस कारण अपुत्रता हो तो समझिये कि किसी प्रेत के
२४४ फलदीपिका
शाप के कारण ऐसा है । यदि शुक्र और चन्द्रमा दोनों मान्दि के साथ
हों तो यह समझना चाहिये कि इस व्यक्ति ने किसी गाय या युवती
स्त्री की पूर्वजन्म में हत्या की है । किन्तु यदि केतु या बृहस्पति,
मान्दि के साथ पंचम में हों तो समझिये कि इसने पूर्व जन्म में किसी
ब्राह्मण की हत्या की है ॥२०, २१, २२॥
एवं हि जन्मसमये बहुपूर्वजन्म-
कर्मार्जितं दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः ।
तत्तद्ग्रहोक्तजपदानशुभक्रिया-
भिस्तद्दोषशान्तिमिह शंसतु पुत्रसिद्ध्यै ॥२३॥
' इस प्रकार जन्म-कुण्डली के ग्रहों से यह पता चलता है कि
पिछले अनेक जन्मों में इसने क्या-क्या पाप किये जिसके कारण सन्तान
हीनता है। पुत्रोत्पत्ति के लिये यह आवश्यक है कि जो-जो ग्रह
बाधाकारक हो उस-उस ग्रह के लिए जो-जो जप, दान और शुभ-क्रिया
बतायी है वह-वह करे । दोष शान्ति होने से पुत्रोत्पत्ति हो सकती
है ॥२३॥
सेतुस्नानं कीर्तनं सत्कथायाः
पूजां शंभोः श्रीपतेः सद्व्रतानि ।
दानं श्राद्धं कर्जनागप्रतिष्ठां
कुर्यादेतैः प्राप्नुयात्सन्ततिं सः ॥२४॥
ऊपर के श्लोक में उल्लेख आया है कि विविध शुभ क्रिया करे ।
इस श्लोक में यह बताते हैं कि कौन-कौन सी शुभ-क्रिया करने से
सन्तान प्रतिबन्धक दोष की शान्ति होकर पुत्र प्राप्ति हो सकती है :
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४५
सेतुस्नान (समुद्र-स्नान), सत्कथाओं का कीर्तन, शम्भु पूजा,
भगवान् विष्णु के व्रत, दान, श्राद्ध, नाग-प्रतिष्ठा (सर्प देवता की
मूर्ति की प्रतिष्ठा) आदि को करने से सन्तान प्राप्ति हो सकती
है ॥२४॥
लग्नास्तपुत्रपतिजीवदशापहारे
पुत्रेशकस्य सुतगस्य च पुत्रसिद्धिः ।
पुत्रेशराशिमथवा यमकण्टकक्षं
जीवेगते तनयसिद्धिरथांशभे वा ॥२५॥
निम्नलिखित ग्रहों में से किसी एक की महादशा, या, अन्तर्दशा
हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है : (क) लग्नेश (ख) सप्तमेश (ग) पंचमेश
(घ) बृहस्पति (ण) जो ग्रह पांचवे घर को देखता है ।
पंचमेश या यम-कंटक जिस राशि या नवांश में है उससे त्रिकोण
में जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब भी पुत्रोत्पत्ति हो सकती
है ॥२५॥
लग्नाधीशः पुत्रनाथेन योगं
स्वोच्चे स्वर्क्षे चारगत्या समेति ।
पुत्रप्राप्तिः स्यात्तदा लग्ननाथः
पुत्रक्षं वायाति धीशाप्तभं वा ॥२६॥
लग्नेश जब गोचरवश (i) पंचमेश से योग करे (ii) अपनी
उच्चराशि में आवे (iii) अपनी स्वराशि में आवे तब पुत्रप्राप्ति हो
सकती है । यदि लग्नेश गोचरवश पंचम में आवे था पंचमेश जहां
स्थित है उस राशि में आवे तो भी सन्तान प्राप्ति के लिये अनुकूल
अवसर होता है । ॥ २६ ॥
२४६ फलदीपिका
विलग्नकामात्मजनायकानां योगात्समानाय्य दशां महाख्याम् ।
सुतस्थतद्वीक्षकतत्पतीनां दशापहारेषु सुतोद्भवः स्यात् ॥२७॥
पुत्र प्राप्ति कब होगी यह समय निकालने के लिये एक अन्य
प्रकार और बताते हैं । नीचे लिखे तीनों को जोड़िये--
(क) लग्नेश की राशि, अंश, कला, विकला ।
(ख) सप्तमेश की राशि, अंश, कला, बिकला ।
(ग) पंचमेश की राशि, अंश, कला, विकला ।
इनको जोड़ने से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे वह किस
नक्षत्र के अन्तर्गत पड़ती है यह निकालिये । * इस नक्षत्र के स्वामी
को जब महादशा हो और निम्नलिखित में से किमी की अन्तर्दशा
हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है ।
(i) पंचम भाव में जो ग्रह हो ।
(ii) जो ग्रह पंचम को देखता हो ।
(iii) पंचमेश ।
सुतपतिगुर्वोरथवा तद्युक्तराश्यंशकाधिपानां वा ।
बलसहितस्य दशायामपहारे वा सु
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४७
उपर्युक्त में जो बलवान् हो उसकी दशा-अन्तर्दशा में पुत्रोत्पत्ति
होती है ।॥२८॥
जीवे तु जीवात्मजनाथभांशक-
त्रिकोणगे पुत्रजनिर्भवेन्नृणाम् ।
अथान्यशास्त्रेण च जन्मकालतो
निरूपयेत्सन्ततिलक्षणं बुधः ॥२९॥
पुत्रोत्पत्ति का समय जानने के लिये एक दूसरा प्रकार निम्नलिखित है ।
यह देखिये कि बृहस्पति से पंचम कौन सा स्थान है । बृहस्पति से
पंचम जो राशि हो उसका स्वामी किस राशि और नवांश में है ?
उस राशि या नवांश से जब त्रिकोण में गोचरवश बृहस्पति आवे
तब पुत्र होगा। यह गोचरवश विचार है। कुछ अन्य शास्त्रों का
कथन है कि जन्म कालीन ग्रहों से सन्तान लक्षण बताना
चाहिये ।॥२९॥
जन्मनक्षत्रनाथस्य प्रत्ययर्क्षाधिपस्य च ।
स्फुटयोगं गते जीवे त्रिकोणे वा सुतोद्भवः ॥३०॥
यह देखिये कि चन्द्रमा किस नक्षत्र में है । इस नक्षत्र का स्वामी
और इस नक्षत्र से पाँचवें नक्षत्र का स्वामी जो ग्रह हो उनकी राशि
अंश, कला, विकला जोड़ लीजिये । जो योग आवे उस राशि,
अंश, कला, विकला पर या उससे नवम, पंचम गोचरवश बृहस्पति आवे
तब पुत्रोत्पत्ति होगी ।॥३०॥
निषेकलग्नाद्दिनपस्तृतीये
राशौ यदा चारवशादुपैति ।
२४८ फलदीपिका
आधानलग्नादथवा त्रिकोणे
रवौ यदा जन्म वदेन्नराणाम् ॥३१॥
बच्चा किस समय पैदा होगा?
(क) जिस राशि में गर्भाधान हुआ है उस राशि से तृतीय में
जब गोचर वश सूर्य आवे ।
(ख) गर्भाधान जिस लग्न से हुआ है उससे पांचवीं या नवीं
राशि में जब गोचर वश सूर्य आवे । ॥३१॥
आधानलग्नात्सुतभेशजन्म
भाग्येऽपि वा पुण्यवशाच्च वाच्यम्
आधानलग्ने शुभदृष्टियोगे
दीर्घायुरैश्वर्ययुतो नरः स्यात् ॥३२॥
जिस लग्न में गर्भाधान हुआ है उस लग्न से नवम या पंचम
लग्न में यदि जन्म हो तो यह समझना चाहिये कि यह पुण्य कर्म
का फल है ।
यदि आधान लग्न में शुभ-ग्रह बैठे हों या आधान लग्न को
शुभ-ग्रह देखते हों तो जो बच्चा पैदा होता है वह दीर्घायु और ऐश्वर्य-
शाली होता है । जिस लग्न में गर्भ रहे उसको आधान लग्न कहते
हैं । ॥३२॥
तत्कालेन्दुद्वादशांशे मेषात्तावति भेऽपि वा ।
तस्मात्तावति भे वापि जन्मचन्द्रं वदेद्बुधः ॥३३॥
यह गणित कीजिये कि जब गर्भाधान हुआ है उस समय चन्द्रमा
किस राशि और किस द्वादशांश में था । मेष से उतने ही द्वाद-
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४९
शांश गिनने पर जो राशि आवे वह बालक की जन्म राशि होगी।
अथवा मेष से गिनने की बजाय गर्भाधान चन्द्र की राशि से गिनिये और
इस गिनती से जो राशि आवे वह बालक की जन्म राशि
होगी ।॥३३॥
प्रश्नात्मजस्वीकरणोपनोतिकन्याप्रदानाभिनवार्तवेषु ।
आधानकालेऽपि च जन्मतुल्यं फलं वदेज्जन्मविलग्नतश्च ॥३४॥
जैसे जन्म कुण्डली से सन्तान विचार करना बताया गया है वैसे
ही निम्नलिखित समयों में से किसी भी समय की कुण्डली बनाकर यह
निर्णय कर सकते हैं कि सन्तान सम्बन्धी क्या भविष्य है। कहने का
तात्पर्य यह है कि इस अध्याय में ग्रहों की शुभाशुभता के जो सिद्धान्त
बताये गये हैं उन्हें केवल जन्म कुण्डली में ही नहीं अपितु निम्नलिखित
कुण्डलियों में भी लागू करना चाहिये :—
(i) प्रश्न कुण्डली अर्थात् प्रश्न करने के समय की कुण्डली।
(ii) बच्चे को दत्तक पुत्र लेने के समय की कुण्डली ।
(iii) उपनयन के समय की कुण्डली ।
(iv) कन्यादान के समय की कुण्डली ।
(v) जब कन्या को पहली बार रजोदर्शन हो उस समय की
कुण्डली ।
(vi) गर्भाधान के समय की कुण्डली ।
इन सब कुण्डलियों में लग्न तथा चन्द्र लग्न (चन्द्रमा जिस राशि
में हो) दोनों से उसी प्रकार ग्रह स्थिति का विचार करना जैसे जन्म
कुण्डली में किया जाता है।
तेरहवां अध्याय
आयुर्भाव
जाते कुमारे सति पूर्वमार्यै
रायुर्विचिन्त्यं हि ततः फलानि ।
विचारणीया गुणिनि स्थितेतद्
गुणाः समस्ताः खलु लक्षणज्ञैः ॥१॥
केचिद्यथाधानविलग्नमन्ये शीर्षोदयं भूपतनं हि केचित् ।
होराविदश्चेतनकाययोर्न्योर्वियोगकालं कथयन्ति लग्नम् ॥२॥
आद्वादशाब्दान्नरयोनिजन्मना-
मायुष्कला निश्चयितुं न शक्यते ।
मात्रा च पित्रा कृतपापकर्मणा
बालग्रहैर्नाशमुपैति बालकः ॥३॥
आद्ये चतुष्के जननीकृताद्यै
र्मध्ये च पित्रार्जितपापसङ्घैः ।
बालस्तदन्त्यासु चतुःशरत्सु
स्वकीयदोषैः समुपैति नाशम् ॥४॥
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तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५१
जन्म का समय कौन-सा लिया जाय ? कोई तो गर्भाधान के लग्न
को ही मुख्य मानते हैं और कुछ लोगों के मत से जब बच्चे का सिर
माँ के शरीर से बाहर निकल आवे उस समय को मुख्य मानना
चाहिये। कुछ अन्य लोगों का मत है कि जब बालक का पूरा शरीर
पृथ्वी पर आ जाय वह समय लेना चाहिये और कुछ अन्य ज्योतिषियों
का मत है कि जब नाल काटी जाय तब का समय लेना चाहिये क्योंकि
जब तक नाल नहीं कटती तब तक बालक का पृथक् अस्तित्व नहीं
होता ॥ २ ॥
बारह वर्ष की अवस्था तक आयु का विचार निश्चय पूर्वक नहीं
किया जा सकता। बालक की कुण्डली में आयु योग होने पर भी
माता-पिता के किये हुए पाप कर्म से या बालग्रहों के कारण बच्चे की
मृत्यु हो जाती है ॥३ ॥
प्रथम चार वर्ष की आयु तक माता के पापों के कारण अपमृत्यु
हो जाती है। चार वर्ष से आठ वर्ष तक पिता के पापों के कारण
और आठ वर्ष से बारह वर्ष तक बच्चे के अपने पूर्व जन्म के पापों
के कारण अपमृत्यु होती है ॥ ४ ॥
तद्दोषशान्त्यै प्रतिजन्मतार-
माद्वादशाब्दं जपहोमपूर्वम् ।
आयुष्यकरं कर्म विधाय ताता
बालं चिकित्सादिभिरेव रक्षेत् ॥५॥
अष्टौ बालारिष्टमादौ नराणां
योगारिष्टं प्राहुराविंशति स्यात् ।
अल्पं चाद्वात्रिंशतं मध्यमायु-
श्चासप्तत्याः पूर्णमायुः शतान्तम् ॥६॥
२५२ फलदीपिका
नॄणां वर्षशतं ह्यायुस्तस्मिंस्त्रेधा विभज्यते ।
अल्पं मध्यं दीर्घमायुरित्येतत्सर्वसम्मतम् ॥७॥
ऊपर जो दोष बताये गये हैं उनकी शान्ति के लिये प्रतिवर्ष बालक
की जन्म तिथि (नक्षत्र) के दिन (चान्द्र मास के हिसाब से) जप होम आदि
से शान्ति करे । ऐसा १२ वर्ष की अवस्था तक करना चाहिये । बच्चे
के पिता को यह भी उचित है कि चिकित्सा तथा अन्य आयु वृद्धि के
साधनों द्वारा बालक की पूरी तौर से रक्षा करे ॥ ५ ॥
जन्म से आठ वर्ष तक बालारिष्ट कहलाता है । आठ वर्ष से
बीस वर्ष की अवस्था तक योगारिष्ट । बीस वर्ष से ३२ वर्ष तक
अल्पायु कहलाती है । ३२ से ७० तक मध्यायु और ७० से १०० वर्ष
तक पूर्णायु ।* ॥ ६ ॥
साधारणतः १०० वर्ष मनुष्य की पूर्णायु मानी गयी है । इसे तीन
भागों में विभाजित किया गया है । अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु ॥ ७ ॥
मृत्युः स्याद्दिनमृत्युरुग्विषघटीकालेऽथ तिष्येऽम्बुभे
ताताम्बासुतमातुलान्पदवशात्त्वाष्ट्रे च हन्यात्तथा
मूलर्क्षे पितृमातृवंशविलयं तस्यान्त्यपादे श्रियं
सार्पे व्यस्तमिदं फलं न शुभसम्बन्धं विलग्नं यदि ॥८॥
यदि जन्म "दिनमृत्यु", "दिनरोग" या 'विषघटी काल' में हो तो
बच्चा बहुत शीघ्र मर जावेगा ।
- ग्रहों की ऐसी स्थिति जिससे बच्चे बीमार पड़ते हैं या बच्चों
की मृत्यु हो जाती है बालारिष्ट कहलाता है । उदाहरण के लिये क्षीण
चन्द्रमा का छठे, आठवें होना । तिथि, वार नक्षत्र, ग्रह आदि के कारण
जो योगों से अरिष्ट होते हैं वे योगारिष्ट कहलाते हैं ।
तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५३
दिन मृत्यु—दिन मृत्यु किसे कहते हैं?—धनिष्ठा और हस्त का
प्रथम चरण; विशाखा और आर्द्रा का द्वितीय चरण; उत्तराभाद्रपद
और आश्लेषा का तृतीयचरण तथा भरणी और मूल का चतुर्थ चरण
हो और दिन का समय हो तो दिन मृत्यु योग होता है। यदि रात्रि में
जन्म हो तो दोष नहीं होता।
दिनरोग—आश्लेषा और उत्तराभाद्रपद का प्रथम चरण, भरणी
और मूल का द्वितीय चरण; उत्तरा फाल्गुनी और श्रवण का तृतीय
चरण, तथा स्वाती और मृगशिर् का चतुर्थ चरण यदि दिन के
समय हो तो 'दिनरोग' कहलाता है। यदि रात्रि में जन्म हो तो दोष
नहीं होता।
"विष घटी"—प्रत्येक नक्षत्र में चार घड़ी का समय विषघटी काल
होता है। यह नीचे दिया जाता है। अश्विनी ५०-५४; भरणी २४-२८;
कृत्तिका ३०-३४; रोहिणी ४०-४४; मृगशिर् १४-१८, आर्द्रा २१-२५
पुनर्वसु ३०-३४; पुष्य २०-२४; आश्लेषा ३२-३६; मघा ३०-३४;
पूर्वाफाल्गुनी २०-२४; उत्तरा फाल्गुनी १८-२२; हस्त २१-२५; चित्रा
२०-२४; स्वाती १४-१८; विशाखा १४-१८ अनुराधा १०-१४ ज्येष्ठा
१४-१८ मूल ५६-६०; पूर्वाषाढ़ २४-२८; उत्तराषाढ़ २०-२४; श्रवण
१०-१४; धनिष्ठा १०-१४; शतभिषा १८-२२; पूर्वाभाद्र १६-२०;
उत्तराभाद्र २४-२८; रेवती ३०-३४।
अश्विनी नक्षत्र के ५० घड़ी बीत जाने पर ४ घड़ी काल—अर्थात्
५४वीं घड़ी समाप्त होने तक विषघटी काल समझा जाता है। इसी
प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये।
यदि पुष्य, पूर्वाषाढ़ और चित्रा के प्रथम चरण में जन्म हो तो
बालक के पिता की मृत्यु हो; यदि द्वितीय चरण में जन्म हो तो माता
की; यदि तृतीय चरण में हो तो बच्चे की स्वयं की और यदि चतुर्थ में
२५४ फलदीपिका
हो तो जातक के मामा की मृत्यु हो ।¹
यदि लग्न का शुभ-ग्रहों से सम्बन्ध न हो और मूल या आश्लेषा
नक्षत्र में जन्म हो तो निम्नलिखित फल होता है :
मूल प्रथम चरण आश्लेषा चतुर्थ चरण पिता की मृत्यु
मूल द्वितीय चरण आश्लेषा तृतीय चरण माता की मृत्यु
मूल तृतीय चरण आश्लेषा द्वितीय चरण वश नाश
मल चतुर्थ चरण आश्लेषा प्रथम चरण लक्ष्मी और समृद्धि
॥ ८ ॥
पापास्तेक्षितराशिसन्धिजनने सद्यो विनाशं ध्रुवं
गण्डान्ते पितृमातृहा शिशुसृतिर्जीवेद्यदि क्ष्मापतिः ।
जातः 'सन्धिचतुष्टयेऽप्यशुभसंयुक्तेक्षिते स्यान्मृति-
र्मृत्योर्भागगते च सा सति विधौ केन्द्रऽष्टमे वा मृतिः ॥६॥
दो राशियों की सन्धि में यदि जन्म हो और यदि राशि² पाप-ग्रहों
से युत या दृष्ट हो तो बालक की मृत्यु शीघ्र हो जाती है । यदि
गण्डान्त में जन्म में तो उसके माता पिता या बच्चे का स्वयं का नाश
हो जाता है किन्तु यदि बच्चा जी जाये तो राजा के समान वैभवशाली
होता है । मीन और मेष की सन्धि, कर्क और सिंह की सन्धि, वृश्चिक
और धनु की सन्धि गण्डान्त कहलाती है । जो बालक पाप-ग्रहों से युत
या दृष्ट, सन्धियों में पैदा होते हैं उनकी अल्पायु हो जाती है ।
१ इस सम्बन्ध में हमारे विचार देखिये हमारी लिखी सुगम
ज्योतिष प्रवेशिका में ।
२ राशि—मूल श्लोक में यह स्पष्ट नहीं है कि लग्न राशि से
तात्पर्य है या चन्द्र राशि से । हमारे विचार से यहाँ लग्न से तात्पर्य
है।
तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५५
चन्द्रमा यदि केन्द्र या अष्टम में हो और मृत्यु भाग में हो तो भी
बालक की शीघ्र मृत्यु होती है। किस राशि में किस अंश में चन्द्रमा
और लग्न मृत्यु भाग में होता है यह आगे के दो श्लोकों में बताया
गया है।
चान्द्रं रूपं लोकशूरो वरज्ञः
कुड्यं चित्रं भाग्यलोके मुखानाम्।
मेने राज्यं मृत्युभागाः प्रदिष्टा
मेषादीनां वर्णसंख्यैर्हिमांशोः ॥१०॥
दानं धेनो रुद्र रौद्री मुखेन
भाग्या भानुर्गोत्र जाया नखेन।
पुत्री नित्यं मृत्युभागाः क्रमेण
मेषादीनां तेषु जातो गतायुः ॥११॥
किस राशि में किन-किन अंशों पर रहने से चन्द्रमा या लग्न मृत्यु
भाग में कहलाता हैं यह नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा।
चन्द्रमा का लग्न :
अंश अंश
मेष २६ ८
वृष १२ ९
मिथुन १३ २२
कर्क २५ २२
सिंह २४ २५
कन्या ११ १४
तुला २६ ४
वृश्चिक १४ २३
(belly), then the tail loops into ृ!
Wait! That IS द with ृ! That IS दृ!
Why did I think it was हृ?
Because above it, there is a repha र्!
र् + दृ = र्दृ!
And because the repha र् is above it, the typesetter placed र् on top of दृ!
Wait, look at दृ in line 19: दृष्टि:
In line 19: द with ृ. Look at it: stem, curves right, comes around, and the tail is a c shape (ृ).
Now look at line 23:
It is EXACTLY the same shape as दृ in line 19, except it has a र् (repha) on top!
Wait, let's look at दृष्टि in line 19:
It has: stem, curves right, loops around into ृ.
In line 23:
Stem, curves right, loops around into ृ, with र् above the top bar!
It IS दृ! It is र्दृ!
Wow, what a relief! It is indeed तन्मासैर्दृगाणाधिपः!
Let's double check the word:
त न् मा सै र् दृ `
तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५७
अंशेशो दिवसैस्तथा यदि मृतिर्द्वित्र्यादियोगान्बहू-
नालोच्य प्रवदेत्सुताष्टमगतैः पापैरिष्टं शिशोः ॥१३॥
(१) यदि लग्नेश या चन्द्रराशि का स्वामी दुर्बल होकर दुःस्थान
में हो तो जिस राशि में ऐसा लग्नेश या चन्द्र राशीश पड़ा है उस
राशि की संख्या के समान वर्ष तक जीता है। मेष की १, वृष की २,
मिथुन की ३ इस प्रकार संख्या गिननी चाहिये।
(२) यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी या चन्द्र द्रेष्काण का स्वामी
दुर्बल होकर दुःस्थान में पड़ा हो तो जिस राशि में पड़ा है उस राशि
की संख्या के समान महीने तक बालक जीवेगा।
(३) यदि लग्न नवांश का स्वामी या चन्द्र नवांश का
स्वामी दुर्बल होकर दुःस्थान में पड़ा हो तो लग्न नवांश राशि
या चन्द्र नवांश राशि की जो संख्या है उतने दिन तक बालक जीता है।
उपर्युक्त तीनों योगों में कौन सबसे प्रबल है यह विचार कर
और यह देख कर कि लग्न से पाँचवें और आठवें कौन-कौन पाप-ग्रह
बैठे हुए हैं, बालक की आयु का विचार करना चाहिये । ॥ १३ ॥
लग्नेन्द्वोस्तदधीशयोरपि मिथो लग्नेशरन्ध्रेशयो-
र्द्रेष्काणात्स्वनवांशकादपि मिथस्तद्द्वादशांशात्क्रमात् ।
आयुर्दीर्घसमाल्पतां चरनगद्व्यङ्गैश्चरेऽथ स्थिरे
ब्रूयाद्द्वन्द्वचरस्थिरैरुभयभैः स्थास्नुद्विदेहाटनैः ॥१४॥
यह देखिये कि निम्न लिखित चर है या स्थिर या द्विस्वभाव ?
(क) लग्न द्रेष्काण राशि और चन्द्र द्रेष्काण राशि । यदि दोनों
चर में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो दीर्घायु ? यदि
दोनों स्थिर या एक चर एक द्विस्वभाव राशि में हो तो अल्पायु ।
२५८ फलदीपिका
यदि दोनों द्विस्वभाव या एक चर एक स्थिर राशि में हो तो
मध्यायु होता है।
(ख) लग्नेश नवांश राशि और चन्द्रेश नवांश राशि । यदि दोनो चर
में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर
या एक चर एक द्विस्वभाव में हो तो अल्पायु । यदि दोनों
द्विस्वभाव में या एक चर एक स्थिर में हों तो मध्यायु होती है।
(ग) लग्नेश द्वादशांश राशि और रन्ध्रेश द्वादशांश राशि। यदि
दोनों चर राशि में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो
दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर में या एक चर एक द्विस्वभाव में तो
अल्पायु । यदि दोनों द्विस्वभाव में वा एक चर एक स्थिर में हो तो
मध्यायु होती है ।
तीनों मत से विचार करने पर बहुमत से जो निर्णय आये वह
निर्णय मानना चाहिये ।॥ १४॥
लग्नाधीशशुभाः क्रमाद्बहुसमाल्पायूंषि केन्द्रादिगाः
रन्ध्रेशोग्रखगास्तथा यदि गता व्यस्तं विदध्युः फलम् ।
जन्मेशाष्टमनाथयोरुदयपच्छिद्रे शयोर्मन्त्रतो
भास्वल्लग्नपयाश्चिरायुरहितेऽल्पायुः समे मध्यमः ॥१५॥
यदि लग्न का स्वामी और सब शुभ-ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घायु
(२) पणफर में हो तो मध्यायु (३) और आपोक्लिम में हों तो
नोट—रन्ध्रेश अष्टमेश को कहते हैं।
टिप्पणी : यदि तीनों से विभिन्न मत आवे तो जैमिनि के मतानुसार विचार
करें । जैमिनि के मत के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका
पृ० १२६
तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २५९
अल्पायु। यदि आठवें घर का स्वामी और सब क्रूर-ग्रह (१) केन्द्र
में हो तो अल्पायु (२) पणफर में हो तो मध्यायु और (३)
आपोक्लिम में हों तो दीर्घायु होता है ।
यह देखिये कि निम्नलिखित परस्पर मित्र हैं या सम या शत्रु ;
(क) चन्द्र जिस राशि में है उसका स्वामी और चन्द्रमा जिस
राशि में है उससे अष्टम का स्वामी आपस में ।
(ख) लग्नेश और अष्टमेश आपस में ।
(ग) लग्नेश और सूर्य आपस में ।
यदि ये परस्पर मित्र हों तो दीर्घायु; सम हों तो मध्यायु;
शत्रु हों तो अल्पायु ॥ १५ ॥
लग्नाधिपो लग्ननवांशनायको
जन्मेश्वरो जन्मनवांशनायकः ।
स्वस्वाष्टमेशाद्यदि चेद्बलान्विता
दीर्घायुषः स्युर्विपरीतमन्यथा ॥१६॥
यदि लग्न का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि
लग्न नवांश का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि
जन्म राशि का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो और
चन्द्रमा जिस नवांश में है उसका स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक
बली हो तो दीर्घायु होती है किन्तु यदि लग्नेश आदि अपने अपने
अष्टमेश की अपेक्षा दुर्बल हों तो अल्पायु होती है ।
ऊपर जो विचार दिया गया है उसमें लग्न कुण्डली के साथ
साथ नवांश कुण्डली की भी आवश्यकता पड़ेगी । निम्नलिखित
चारों का अपने अपने अष्टमेशों से बलवान् होना आवश्यक है ।
(१) लग्न का स्वामी (२) लग्न नवांश का स्वामी (३) चन्द्र राशि
का स्वामी (४) चन्द्र नवांश का स्वामी-तभी दीर्घायु होगी । ॥ १६ ॥
२६० फलदीपिका
लग्नेश्वरादतिबली निधनेश्वरोऽसौ
केन्द्रस्थितो निधनरिः फगतैश्च पापैः ।
तस्यायुरल्पमथवा यदि मध्यमायु-
रुत्साहसंकटवशात्परमायुरेति ॥१७॥
यदि लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अत्यन्त बलवान् हो और केन्द्र
में हो तथा पाप-ग्रह अष्टम और द्वादश में हों तो जातक अल्पायु
होता है या मध्यम आयु ; यदि दीर्घायु प्राप्त भी करे तो जीवन संकट
की दशा में बीतेगा। ॥ १७॥
नरोऽल्पायुर्योगे प्रथमभगणे नश्यति शने-
र्द्वितीये मध्यायुर्यदि भवति दीर्घायुषि सति ।
तृतीये निर्याणं स्फुटशनिगुर्वर्कहिमगून्
दशां भुक्तिं कष्टामपि वदति निश्चित्य सुमतिः ॥१८॥
नीचे लिखे चारों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़
लीजिये :
सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा शनि
उदाहरण के लिये जिसकी जन्मकुंडली का विचार कर रहे हैं
उसके यह चारों ग्रह स्पष्ट जोड़े ।
सूर्य ७—२६
चन्द्र ११—२०
गुरु ६—१४
शनि ०—७
योग २६—७ या २—७
अर्थात् मिथुन के सात अंश ।
यदि इस जातक की अल्पायु है तो गोचर वश जब शनि प्रथम बार
तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २६१
मिथुन राशि के सात अंश पर आवेगा तब इसकी मृत्यु होगी । यदि
मध्यायु है तो जब शनि द्वितीय बार मिथुन के सात अंश पर आवेगा
तब मृत्यु होगी और यदि दीर्घायु है तो शनि जब गोचरवश तृतीय
बार मिथुन के ७ अंश पर आवेगा तब मृत्यु होगी । यह विचार
करते समय दशा और अन्तर्दशा का भी विचार कर लेना
चाहिए । ॥१८॥
सपापो लग्नेशो रविहतरुचिर्नीचरिपुगो
यदा दुःस्थानेषु स्थितमुपगतो गोचरवशात् ।
तनौ वा तद्योगो यदि निधनमाहुस्तनुभृतां
नवांशाद्द्रेष्काणाच्छिशिरकरलग्नादपि वदेत् ॥१९॥
यदि लग्नेश किसी क्रूर ग्रह के साथ हो और नीच या शत्रु राशि
में रहकर अस्त हो तो जब वह गोचरवश दुस्थान में जावे या लग्न में
आवे या लग्न से सम्बन्ध करे तो जातक की मृत्यु होगी । जो विचार
ऊपर लग्नेश द्वारा बताया गया है उसी प्रकार नवांश लग्न के स्वामी,
द्रेष्काण लग्न के स्वामी तथा चन्द्र राशि के स्वामी से भी करना
चाहिए ॥१९॥*
शशी तदारूढगृहाधिपश्च
लग्नाधिनाथश्च यदा त्रयोऽमी
नोट : ऊपर के श्लोक १९ में कई बातें बता दीं । गोचरवश जब
६, ८, १२ वें या लग्न में ग्रह आवे — किन्तु प्रायः गोचरवश ग्रह इन
स्थानों में घूमते ही रहते हैं । इसलिये हमारे विचार से यदि कोई व्यक्ति
बीमार हो और सूक्ष्म काल निर्णय करना हो तभी इस श्लोक में दिया
गया विचार काम में लाया जा सकता है ।