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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 684 में से

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पृष्ठ 252

तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५१
जन्म का समय कौन-सा लिया जाय ? कोई तो गर्भाधान के लग्न
को ही मुख्य मानते हैं और कुछ लोगों के मत से जब बच्चे का सिर
माँ के शरीर से बाहर निकल आवे उस समय को मुख्य मानना
चाहिये। कुछ अन्य लोगों का मत है कि जब बालक का पूरा शरीर
पृथ्वी पर आ जाय वह समय लेना चाहिये और कुछ अन्य ज्योतिषियों
का मत है कि जब नाल काटी जाय तब का समय लेना चाहिये क्योंकि
जब तक नाल नहीं कटती तब तक बालक का पृथक् अस्तित्व नहीं
होता ॥ २ ॥
बारह वर्ष की अवस्था तक आयु का विचार निश्चय पूर्वक नहीं
किया जा सकता। बालक की कुण्डली में आयु योग होने पर भी
माता-पिता के किये हुए पाप कर्म से या बालग्रहों के कारण बच्चे की
मृत्यु हो जाती है ॥३ ॥
प्रथम चार वर्ष की आयु तक माता के पापों के कारण अपमृत्यु
हो जाती है। चार वर्ष से आठ वर्ष तक पिता के पापों के कारण
और आठ वर्ष से बारह वर्ष तक बच्चे के अपने पूर्व जन्म के पापों
के कारण अपमृत्यु होती है ॥ ४ ॥
तद्दोषशान्त्यै प्रतिजन्मतार-
माद्वादशाब्दं जपहोमपूर्वम् ।
आयुष्यकरं कर्म विधाय ताता
बालं चिकित्सादिभिरेव रक्षेत् ॥५॥
अष्टौ बालारिष्टमादौ नराणां
योगारिष्टं प्राहुराविंशति स्यात् ।
अल्पं चाद्वात्रिंशतं मध्यमायु-
श्चासप्तत्याः पूर्णमायुः शतान्तम् ॥६॥