फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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हो तो जातक के मामा की मृत्यु हो ।¹
यदि लग्न का शुभ-ग्रहों से सम्बन्ध न हो और मूल या आश्लेषा
नक्षत्र में जन्म हो तो निम्नलिखित फल होता है :
मूल प्रथम चरण आश्लेषा चतुर्थ चरण पिता की मृत्यु
मूल द्वितीय चरण आश्लेषा तृतीय चरण माता की मृत्यु
मूल तृतीय चरण आश्लेषा द्वितीय चरण वश नाश
मल चतुर्थ चरण आश्लेषा प्रथम चरण लक्ष्मी और समृद्धि
॥ ८ ॥
पापास्तेक्षितराशिसन्धिजनने सद्यो विनाशं ध्रुवं
गण्डान्ते पितृमातृहा शिशुसृतिर्जीवेद्यदि क्ष्मापतिः ।
जातः 'सन्धिचतुष्टयेऽप्यशुभसंयुक्तेक्षिते स्यान्मृति-
र्मृत्योर्भागगते च सा सति विधौ केन्द्रऽष्टमे वा मृतिः ॥६॥
दो राशियों की सन्धि में यदि जन्म हो और यदि राशि² पाप-ग्रहों
से युत या दृष्ट हो तो बालक की मृत्यु शीघ्र हो जाती है । यदि
गण्डान्त में जन्म में तो उसके माता पिता या बच्चे का स्वयं का नाश
हो जाता है किन्तु यदि बच्चा जी जाये तो राजा के समान वैभवशाली
होता है । मीन और मेष की सन्धि, कर्क और सिंह की सन्धि, वृश्चिक
और धनु की सन्धि गण्डान्त कहलाती है । जो बालक पाप-ग्रहों से युत
या दृष्ट, सन्धियों में पैदा होते हैं उनकी अल्पायु हो जाती है ।
१ इस सम्बन्ध में हमारे विचार देखिये हमारी लिखी सुगम
ज्योतिष प्रवेशिका में ।
२ राशि—मूल श्लोक में यह स्पष्ट नहीं है कि लग्न राशि से
तात्पर्य है या चन्द्र राशि से । हमारे विचार से यहाँ लग्न से तात्पर्य
है।