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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

का फल उस से मिलता जुलता फल मेष राशि (मेष में चन्द्रमा हो) का
भी कहना चाहिये । इसी कारण ऊपर के बारहों श्लोकों का भावार्थ
देते हुए हमने लग्न और राशि दोनों का एक साथ फल दे दिया
है। ॥१३॥
अब ग्रहों का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी उच्चराशि में
हो तो जातक रत्नगर्भा* (पृथ्वी) का स्वामी होता है; राजा लोग
उसकी प्रशंसा करते हैं और उसके पास बहुत सी कीमती सम्पत्ति
रहती है। जातक में बहुत से विशिष्ट गुण होंगे और नीति, यश,
विक्रम, दानशीलता, धैर्य तथा चतुरता में वह महाराज विक्रमादित्य
की तरह तेजस्वी होगा।**
अब स्वराशि गत ग्रह का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी
राशि में हो तो उसकी दशा में प्रभु (विशिष्ट पुरुष) के अनुग्रह से
शक्ति, उच्च स्थिति और गृह का दृढ़ सुख होता है अर्थात् ऐसा जातक
आराम से अपने घर में बैठा रहता है। पहले के समय में घर में
आराम से बैठना सबसे बड़ा सुख समझा जाता था। इसके अतिरिक्त
स्वगृही ग्रह का फल यही होना चाहिए कि स्वगृह में बैठावे अर्थात्
अपने घर में आराम से रक्खे, परदेश में न घुमावे । नवीन मकान प्राप्त
हो और ऐसी नवीन भूमि प्राप्त हो जिसमें सब प्रकार की फसलें पैदा
होती हों। स्वगृही ग्रह की दशा में मनुष्य लोकसम्मान प्राप्त करता
है और यदि पहले की अनिष्ट महादशा में कोई वस्तु नष्ट हो गई हो तो
वह भी उसे पुनः प्राप्त हो जाती है। ॥ १५ ॥

  • रत्नगर्भा का यह भी अर्थ हो सकता है कि जिसके गर्भ में
    अर्थात् तहखानों में रत्न भरे हों और उच्चराशि का ग्रह मनुष्य को
    धनिक बनाता है।
    ** उच्चग्रह की जो इतनी प्रशंसा लिखी है वह वास्तव में तभी
    फलीभूत होती है जब वह उत्तम घर का स्वामी हो और उत्तम स्थान
    पर बैठा भी हो, साथ ही नवांश आदि वर्गों में भी बलवान् हो ।

२१४ फलदीपिका
अब मित्र राशि में स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह अपने
मित्र की राशि में हो तो मित्रों द्वारा कार्य सिद्धि होती है और नवीन
मित्र भी पैदा होते हैं। इसके कारण उत्तम पुत्र, स्त्री सुख, धन सुख,
धान्य सुख तथा भाग्योदय होता है और सब जनों की अनुकूलता
रहती है। ।। १६ ।।
अब शत्रु राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह शत्रु राशि
में हो तो मनुष्य दूसरे के अन्न पर (दूसरे की सेवा पर) निर्भर रहता
है; उसे दूसरे के मकान में पड़ा रहना पड़े। अकिंचनता(दरिद्रता)
हो और ऐसा जातक शत्रुओं से पीड़ा पाता रहे। जो उसके प्रिय मित्र
भी हों वह भी शत्रु हो जायें अर्थात् मित्रों से लाभ कुछ न हो बल्कि
उनके व्यवहार से कष्ट हो। शत्रुओं से पीड़ा हो। ।। १७ ।।
*अब नीच राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं।
यदि ग्रह नीच हो तो उसकी दशा में अधःपतन होता है अर्थात्
स्थिति में गिरावट होती है। इसका फल दीनता, दुराचार और
कर्जदारी भी है। अर्थात् नीच ग्रह की दशा में बुद्धिविपर्यय होने के
कारण मनुष्य कुत्सित आचरण करता है, धन की कमी के कारण ऋण
भार से दबना पड़ता है। नीच ग्रह की दशा में नीच जनों की मातहती
करनी पड़ती है। कुत्सित देश में रहना पड़ता है। कष्टपूर्ण यात्रायें
करनी पड़ती है; दूसरे का भृत्यत्व (नौकरी का कष्ट—प्रायः मातहती)
उठानी पड़ती है और अनर्थ परम्परा उपस्थित होती है। ।।१८ ।।

  • यहां जो मित्र राशि शब्द आया है उससे नैसर्गिक मित्र राशि
    समझना चाहिए। यदि तात्कालिक मित्र भी हो तो और भी उत्तम,
    यदि मित्र की राशि में होकर नीच राशि में हो जैसे शुक्र कन्या में।
    बुध शुक्र का मित्र है और बुध की राशि कन्या में शुक्र मित्र गृही
    किन्तु नीच हुए तो श्लोक १६ में वर्णित फल नहीं होगा। नीच
    राशि स्थित ग्रह के लिए देखिये श्लोक १८।

नवाँ अध्याय : राशिफल २१५
अब मूढ़* ग्रह और समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं।
(क) यदि कोई ग्रह अस्त हो तो उस ग्रह की दशा लगते ही
शीघ्र ही मृत्यु (या मृत्यु समान कष्ट) हो। स्त्री, सुत, धन तीनों से
हीनता हो अर्थात् इन सबके कारण भी दुःख उठाना पड़े। व्यर्थ कलह
हो, अपवाद लगे और जातक की हार या अपमान हो।
(ख) अब समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। जो ग्रह न
मित्र हो न शत्रु हो वह सम कहलाता है। समराशि स्थित ग्रह की दशा
में कोई विशेष भला या विशेष बुरा फल नहीं होता। न वह विशेष सुख
उत्पन्न करने में समर्थ होता और न विशेष दुःख ही उत्पन्न करता
है। जैसी स्थिति ग्रह की दशा लगने के पहले रहती है वैसी ही कायम
रहती है। ॥ १९ ॥
अब वक्रीग्रह तथा वर्गोत्तम ग्रह का फल बताते हैं।
(क) चाहे ग्रह शत्रु राशि में हो, चाहे ग्रह नीच राशि में हो,
चाहे ग्रह शत्रु राशि, नीच राशि दोनों में हो यदि वह वक्री है तो उच्च
ग्रह (उच्चराशि स्थित ग्रह) के समान उत्तम फल करेगा।
(ख) यदि ग्रह वर्गोत्तम* में हो—अर्थात् जिस राशि में हो उसी
नवांश में भी हो तो वह स्वगृही ग्रह के समान जोरदार शुभ फल
करता है। ॥ २० ॥
नीचे लिखे अंशों में ग्रह वर्गोत्तम होता है।
अंश कला अंश कला
मेष राशि ०- ० से ३-२० तक
वृषभ ,, १३-२० से १६-४०
मिथुन ,, २६-४० से ३०- ०
कर्क ,, ०- ० से ३-२०

  • जो ग्रह सूर्य के इतने समीप होता है कि २४ घंटे में कभी भी
    दिखाई न दे वह अस्त कहलाता है। अस्त ग्रह का प्रभाव प्रायः अच्छा
    नहीं होता। इसी अस्त ग्रह को कोई मूढ़, कोई विकल कहते हैं।
  • मेषराशि, मेष नवांश; वृष राशि वृष नवांश; मिथुन राशि मिथुन
    नवांश; कर्क राशि कर्क नवांश; इस प्रकार ग्रह जिस राशि में हो उसी
    नवांश में भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है।

२१६ फलदीपिका
सिंह ,, १३-२० से १६-४० ,,
कन्या ,, २६-४० से ३०- ० ,,
तुला ,, ०- ० से ३-२० ,,
वृश्चिक ,, १३-२० से १६-४० ,,
धनु ,, २६-४० से ३०- ० ,,
मकर ,, ०- ० से ३-२० ,,
कुंभ ,, १३-२० से १६-४० ,,
मीन ,, २६-४० से ३०- ० ,,
जिनको ज्योतिष का अभ्यास है उनको तो अपने आप ही वर्गोत्तम
अंश किस राशि में किस अंश किस कला से किस अंश किस कला तक
होता है, यह याद ही रहता है किन्तु जो नवीन ज्योतिष प्रेमी हैं
उनको वर्गोत्तम किन अंशों में रहता है यह याद रखने के लिये यह
सुन्दर नियम है कि चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) का प्रथम
नवांश, स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक तथा कुंभ) का मध्य नवांश
और द्विस्वभाव राशि का अंतिस नवांश वर्गोत्तम होता है।
एक राशि के ९ हिस्से किये जावें तो एक हिस्से का नाम नवांश
(नव — ९, अंश = भाग या हिस्सा) होता है। इसलिये चर राशि का
पहला हिस्सा, स्थिर राशि का बीच का हिस्सा, द्विस्वभाव का आखिरी
हिस्सा वर्गोत्तम हुआ।
एक हिस्से में ३ अंश २० कला होते हैं। ३० अंश कुल एक
राशि में होते हैं। इसको यदि ९ से विभक्त किया जावे (भाग दिया
जावे) तो ३ अंश २० कला होते हैं। इसी कारण एक नवांश ३ अंश
२० कला का होता है।
मूल में 'तद्वत्' शब्द आया है—जिसका अर्थ है—इसी प्रकार।
किस प्रकार ? अर्थात् शत्रु राशि या नीच राशि में भी वर्गोत्तम हो
तो अच्छा फल करेगा। उच्च राशि में वर्गोत्तम सबसे उत्तम फल
करेगा। उसके बाद स्वराशि में वर्गोत्तम। इसके बाद अधिमित्र
राशि, मित्र राशि, सम राशि, शत्रु, अधिशत्रु, नीच राशि में वर्गोत्तम
में क्रमशः शुभ फल कम होता जावेगा।

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और शुद्ध देवनागरी लिप्यन्तरण (लाइन-दर-लाइन) प्रस्तुत है:

दसवाँ अध्याय
कलत्र भाव
शुभाधिपयुतेक्षिते सुतकलत्रभे लग्नतो
विधोरपि तयोः शुभं त्वितरथा न सिद्धिस्तयोः।
सिताद्व्ययसुखाष्टगैः खरखगैरसन्मध्यगे
सितेऽप्यथ शुभेतरेक्षितयुते च जायावधः ॥१॥
दारेशे सुतगे प्रणष्टवनितोऽपुत्रोऽथवा धीश्वरो
द्यूने वा निधनेश्वरोऽपि कुरुते पत्नीविनाशं ध्रुवम्।
क्षीणेन्दौ सुतगे व्ययास्ततनुगैः पापैर्दारात्मजः
स्त्रीसङ्गाद्धननाशनं मदगयाः स्वर्भानुभान्वोर्वदेत् ॥२॥
शुक्रे वृश्चिकगे मदे मृतवधूः कामे वृषस्थे बुधे
स्त्रीनाशस्त्वथ नीचगे सुरगुरौ द्यूनाधिरूढे तथा।
जामित्रे झषगे शनौ सति तथा भौमेऽथवा स्त्रीमृति-

२१८ फलदीपिका
द्वन्द्वर्क्षांशे मदपतिसितौ तस्य जायाद्वयं स्यात्
ताभ्यां युक्तैर्गगननिलयैर्दारसंख्यां वदन्तु ॥५॥
स्त्रीसंख्यां मदगैर्ग्रहैमृतिमसत्खेटैश्च सद्भिः स्थितिं
द्यूनेशे सबले शुभे सति वधूः साध्वी सुपुत्रान्विता ।
पापोऽपि स्वगृहं गतः शुभकरः पत्न्याश्च कामस्थिता
हित्वा षड्व्ययरन्ध्रपान्मदनगाः सौम्यास्तु सौख्यावहाः ॥६॥
भार्यानाशस्त्वशुभसहितौ वीक्षितौ वार्थकामौ
तत्र प्राहुस्त्वशुभफलदां क्रूरदृष्टिं विशेषात् ।
एवं पत्न्या अपि सति मदे चाष्टमे वास्ति दोषः

  • सौम्यैर्दृष्टे सति शुभयुते दंपती भाग्यवन्तौ ॥७॥
    चन्द्रे समन्दे मदगे पुनर्भूः
    पतिर्भवेद्वाप्यसुतो विदारः ।
    नीचारिभस्थैरशुभैर्मदे स्त्री-
    पुंसोर्मृतिः स्यान्निधने धने वा ॥८॥
    लग्नात्कलत्रभवने समराशिसंज्ञे
    भावाधिपेऽपि च तथैव गतेऽसुरेज्ये ।
    सूर्याभितप्तरहते सुतदारनाथे
    वीर्यान्विते तु जननं ससुतं कलत्रम् ॥६॥
    कुटुम्बदारव्ययराशिनाथा
    जीवेक्षिताः कोणचतुष्टयस्थाः ।
    दारेश्वराद्वित्तकलत्रलाभे
    सौम्याः कलत्रं ससुतं सुखाढ्यम् ॥१०॥

दसवां अध्याय : कलत्र भाव २१९
लग्नास्तनाथस्थितभांशकोणे
नीचोच्चभे स्त्रीजननं च पत्युः ।
चन्द्राष्टवर्गेधिकबिन्दुराशौ
कलत्रजन्मेति तथा धवस्य ॥११॥
कामस्थकामाधिपभार्गवानां
मृक्षं दिशं शंसति तस्य पत्न्याः ।
शुक्रोऽस्तपो वा तनुनाथभांश-
त्रिकोणमायाति तदा विवाहः ॥१२॥
कलत्रसंस्थस्य कलत्रदृष्टे
र्दशागमेवाथ कलत्रपस्य ।
यदा विलग्नाधिपतिः प्रयाति
कलत्रभं तत्र कलत्रलाभः ॥१३॥
कलत्रनाथस्थितभांशकेशयोः
सितक्षपानायकयोर्बलीयसः ।
दशागमे द्यूनपयुक्तभांशक-
त्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः ॥१४॥
कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे
मूढेऽथवा पापनिरोक्षिते वा
कलत्रभे पापयुतेऽथ दृष्टे
कलत्रहानिं प्रवदन्ति सन्तः ॥१५॥
यदि लग्न से पांचवां और सातवां स्थान शुभ ग्रह या अपने स्वामी
से युत या दृष्ट हो और चन्द्रमा से पंचम तथा सप्तम स्थान अपने स्वामी
या शुभ ग्रह से युत या वीक्षित (देखा जाता) हो तो पांचवें तथा

२२० फलदीपिका।
सातवें भाव सम्बन्धी सिद्धि (उत्तम फल प्राप्ति) होती है। यदि ऐसा
न हो तो विपरीत फल समझना।
(क) शुक्र यदि पाप ग्रहों के बीच में हो या (ख) शुक्र से
चतुर्थ, अष्टम, द्वादश पापग्रह हों या (ग) शुक्र यदि पाप ग्रहों से युत
या दृष्ट हो—इन तीनों योगों का फल यह है कि जिस पुरुष की
कुँडली में यह योग हो उसकी स्त्री की मृत्यु हो जाती है। जितने ही
दुर्योग अधिक होंगे उतना ही दुष्प्रभाव अधिक होगा। ॥ १ ॥
सप्तम भाव का स्वामी पंचम में हो तो उसकी स्त्री की मृत्यु हो
जावे या अपुत्र हो। यदि पंचमेश या अष्टमेश सप्तम में हो तो भी
पत्नी का विनाश हो जाता है। यदि क्षीण चन्द्रमा पांचवें घर में हो
और पाप ग्रह लग्न, सप्तम और बारहवें घरों में हो तो जातक पत्नी
हीन, पुत्रहीन होता है। यदि सूर्य और राहु सप्तम में हों तो स्त्री
संग से धन नाश होता है। ॥ २ ॥
(क) यदि वृश्चिक राशि का शुक्र सप्तम में हो या (ख) वृष
राशि का बुध सप्तम में हो या (ग) मकर राशि का बृहस्पति सप्तम
में हो या (घ) मीन राशि का शनि सप्तम में हो या (ङ) मीन राशि
का मंगल सप्तम में हो; इन योगों में से कोई भी योग हो तो पत्नी की
मृत्यु हो जाती है। यदि कर्क राशि सप्तम में हो और उसमें मंगल
तथा शनि हों तो उस मनुष्य की सुन्दर और सच्चरित्र पत्नी
होगी। ॥ ३ ॥
यदि सातवें घर का स्वामी या सातवाँ घर, पाप ग्रह से युत या
दृष्ट हो या पाप ग्रहों के बीच में हो या सप्तमेश नीच राशि या शत्रु
राशि में हो या अस्त हो (सूर्य के समीप होने के कारण) तो स्त्री
नष्ट हो जाती है। ये सब स्त्रीनाशक योग है। यदि शुक्र पापग्रह के
साथ पांचवे या सातवें या नवम भाव में हो तो उसकी स्त्री रोगिणी
(जिसके शरीर का कोई अवयव ठीक काम न करता हो) होती है
या स्त्री सुख के अभाव के कारण विकल रहता है। शुक्र, मंगल या

दसवाँ अध्याय : कलत्र भाव २२१
शनि के वर्ग में हो या इनसे देखा जाता हो तो अपनी पत्नी के
अतिरिक्त—अन्य स्त्री में रत होता है। ॥ ४ ॥
यदि शुक्र और चन्द्रमा से सप्तम मंगल और शनि हों तो स्त्री
हीन हो। यदि सप्तम में नपुंसक ग्रह हो और ग्यारहवें घर में दो
ग्रह हों तो जातक के दो स्त्री हों। यदि शुक्र और सप्तमेश दोनों द्वंद्व
राशि और अंश में हों तो जातक के दो स्त्री हों। सप्तमेश और शुक्र
जितने ग्रहों से युक्त हो उतनी ही स्त्रियों की प्राप्ति कहना।* ॥ ५ ॥
जितने ग्रह सप्तम में हों उतनी स्त्रियां होंगी यह समझना। इन
ग्रहों में जितने पापग्रह हों उतनी स्त्रियाँ नष्ट होंगी और जितने
शुभग्रह हों उतनी कायम रहेंगी। अब कानून द्वारा हिन्दुओं में बहु-
विवाह प्रथा समाप्त हो चुकी है। अतः बहुविवाह वाला ज्योतिष
का नियम लागू नहीं होगा क्योंकि ज्योतिष के सिद्धान्त देश, काल, पात्र
के अनुसार लागू किये जाते हैं। यदि सप्तम भाव का स्वामी शुभग्रह
हो, बलवान् हो तो उसे साध्वी और पुत्रवती स्त्री प्राप्त हो। पाप
ग्रह भी सप्तम में यदि स्वगृही हो तो शुभ फल ही करता है। शुभ
ग्रह (यदि वह छठे, आठवें या बारहवें का स्वामी न हो) सप्तम
भाव में हो तो सुख बढ़ाता है, अर्थात् स्त्री सुख प्रदान करता
है। ॥६॥
यदि द्वितीय और सप्तम स्थान अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हों
तो भार्या (स्त्री) का नाश होता है। इन में भी (युत या वीक्षित में)
क्रूर दृष्टि खास तौर पर अशुभ फल देने वाली होती है। इसी प्रकार
पत्नी की कुण्डली में सप्तम या अष्टम अथवा दोनों भाव अशुभग्रहों से युत
या वीक्षित हो तो पति के लिये अनिष्ट कहना अर्थात् दोषकारक होता
*यदि अधिक ग्रहों से युत हो और उतने विवाह की संभावना
न हो तो विवाह के अतिरिक्त स्त्री समागम समझना चाहिये।

२२२ फलदीपिका
है। किन्तु यदि दोनों भाव¹ शुभग्रहों से युत या दृष्ट हों तो पति पत्नी
भाग्यवान् होते हैं ॥७॥
यदि स्त्री की जन्मकुंडली में चन्द्रमा और शनि दोनों सप्तम में
हों तो वह पुनर्विवाह करती है। पुरुष की कुंडली में यह योग हो तो
वह स्त्रीहीन या पुत्रहीन होता है । यदि अशुभ ग्रह अपनी नीच या
शत्रु राशि में द्वितीय, सप्तम और अष्टम में हों तो—यह योग स्त्री की
जन्म कुंडली में हो तो पति का मरण हो और पुरुष की कुंडली में हो तो
पत्नी का मरण हो ॥८॥
यदि लग्न से सप्तम भाव में सम² राशि हो, सप्तमेश और शुक्र
भी सम राशि में हों और पंचमेश तथा सप्तमेश बली हों और सूर्य से
अस्त न हों तो स्त्री और पुत्र का सुख होता है ॥९॥
यदि द्वितीय, सप्तम और द्वादश ( २,७,१२ घरों ) के स्वामी
त्रिकोण या केन्द्र में हों और बृहस्पति से देखे जाते हों; सप्तमेश जहां
बैठा है उससे दूसरे, सातवें और ग्यारहवें स्थान में सौम्य ग्रह हों तो
जातक सुखी, पुत्रवान्, कलत्रवान् होता है ॥१०॥
पुरुष की कुंडली में यह देखिये कि लग्नेश और सप्तमेश किस राशि
और किस नवांश में हैं। ऐसी राशि या नवांश की त्रिकोण राशि स्त्री की
जन्म राशि होगी या पति की कुंडली में लग्नेश या सप्तमेश की उच्च-
राशि या नीच राशि स्त्री की जन्म राशि होगी । या पति के
चन्द्राष्टक वर्ग में जिस राशि में सबसे अधिक शुभ बिन्दु होंगे-वह
स्त्री की जन्म राशि होगी ॥११॥
१. दोनों भाव का अर्थ है स्त्री की कुंडली में सप्तम और अष्टम-
पुरुष की कुंडली में द्वितीय और सप्तम ।
२. वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन सम राशि हैं।
कलत्र = पत्नी ।

दसवां अध्याय : कलत्रभाव २२३
पुरुष की कुंडली में यह देखिये कि (१) सप्तम भाव में कौन
सी राशि है (२) सप्तमेश किस राशि में है (३) शुक्र किस राशि में
है। इन तीनों राशियों में से किसी राशि की दिशा में विवाह होगा।
अर्थात् उस दिशा में रहने वाली लड़की से विवाह होगा। लग्नेश जिस
राशि या नवांश में हो-उससे त्रिकोणराशि में जब गोचर वश शुक्र वा
सप्तमेश आता है तब विवाह होता है ॥१२॥
(१) जो ग्रह लग्न से सप्तम हो (२) जो ग्रह सप्तम भाव को
देखता हो (३) सप्तमेश-इन तीनों की जब दशा* हो और लग्नेश
गोचर वश सप्तम स्थान में आवे तब विवाह का योग होता है ॥१३॥
जिस राशि में सप्तमेश हो उस राशि का स्वामी तथा जिस नवांश
में सप्तमेश हो उसका स्वामी-इन दोनों में तथा शुक्र और चन्द्र इन दोनों
में कौन बलवान् है? जब इस बलवान् ग्रह को दशा (या अन्तर्दशा हो)
और सप्तमेश जिस राशि या नवांश में है-उससे त्रिकोण राशि में गोचर
वश बृहस्पति आवे तो विवाह का योग होता है ॥१४॥
यदि सातवें घर का स्वामी नीच राशि में, शत्रु राशि में, अस्त या
पाप ग्रह से दृष्ट हो और सप्तम भाव में पाप ग्रह हो या सप्तम
भाव को पाप ग्रह देखते हों तो कलत्र (स्त्री) हानि होती है, ऐसा
विद्वानों का मत है । ॥ १५ ॥
दशा से महादशा तथा अन्तर्दशा दोनों समझना।

ग्यारहवाँ अध्याय
स्त्री जातक
यद्यत्पुंप्रसवे क्षमं तदखिलं स्त्रीणां प्रिये वा वदे-
न्माङ्गल्यं निधनात् सुतांश्च नवमाल्लग्नात्तनोश्चारुताम् ।
भर्तारं सुभगत्वमस्तभवनात्सङ्गं सतीत्वं सुखात्
सन्तस्तेषु शुभप्रदास्त्वशुभदाः क्रूरास्तदीशं विना ॥१॥
‘ उदयहिमकरौ द्वौ युग्मगौ सौम्यदृष्टौ
सुतनयपतिभूषासंपदुत्कृष्टशीला ।
अशुभसहितदृष्टौ चोजगौ पुंस्वभावा
कुटिलमतिरवश्या भर्तु रुग्रा दरिद्रा ॥२॥
सद्राश्यंशयुते मदे द्युतियशोविद्यार्थवांस्तत्पति-
र्व्यत्यस्ते कुतनुर्जडश्च कितवो निःस्वो वियोगस्तयोः ।
आग्नेयैर्मदनस्थितैश्च विधवा मिश्रैः पुनर्भू र्भवेत्
क्रूरेष्वायुषि भर्तृ हन्त्र्यपि धने सन्तः स्वयं स्त्रीमृतिः ॥३॥
सुतस्थेऽलिस्त्रीगोहरिषु हिमगौ चाल्पतनया ।
यमाराकार्क्षांशे मदनसदने साम्यभगा ।
सुखे पापैर्युक्ते भवति कुलटा मन्दकुजयो-
र्गृहेऽंशे लग्नेन्दू भृगुरपि च पुंश्चल्यभिहिता ॥४॥
शुभक्षेत्रांशेऽस्ते सुभगजघना मङ्गलवती
विधाः सत्संबन्धेऽप्युदयसुखयोः साध्व्यतिगुणा ।

ग्यारहवाँ अध्याय : स्त्री जातक २२५
त्रिकोणे सौम्याश्चेत्सुखसुतसंपद्गुणवती
बलोनाः क्रूराश्चेद्यदि भवति वन्ध्या मृतसुता ॥५॥
चन्द्रे भौमगृहे कुजादिकथितत्रिंशांशकेषु क्रमात्
दुष्टा दास्यसती सुशीलविभवा मायाविनी दूषणी ।
शुक्रर्क्षे बहुदूषणान्यपतिगा पूज्या सुधीर्विश्रुता
ज्ञर्क्षे च्छद्मवती नपुंसकसमा साध्वी गुणाढ्योत्सुका ॥६॥
स्वच्छन्दा भर्तृघातिन्यतिमहितगुणा शिल्पिनो साधुवृत्ता
चान्द्रे जैवे गुणाढ्या विरतिरतिगुणा ज्ञातशिल्पातिसाध्वी ।
मान्दे दास्यन्यसक्ताश्रितपतिरसती निष्प्रजार्थार्कभे स्याद्
दुर्भार्या हीनवृत्ता धरणिरतिवधूः पुंविचेष्टान्यसक्ता ॥७॥
शशिलग्नसमायुक्तैः फलं त्रिंशांशकैरिदम् ।
बलाबलविकल्पेन तयोरेवं विचिन्तयेत् ॥८॥
ज्येष्ठभ्रातरमम्बिकां च पितरं भर्तुः कनिष्ठं क्रमात्
ज्येष्ठा ह्यासुरशूर्पजाश्च वनिता घ्नन्तीति तज्ज्ञा विदुः ।
चित्रार्द्राभुजगस्वराट्च्छतभिषङ् मूलाग्नितिष्योद्भवा
वन्ध्या वा विधवाथवा मृतसुता त्यक्ता प्रियेणाधना ॥९॥
चन्द्रास्तोदयभाग्यपाः सह शुभैः सुस्थानगा भास्वराः
पूज्या बन्धुषु पुण्यकर्मकुशला सौन्दर्यभाग्यान्विता ।
भर्तुः प्रीतिकरी सुपुत्रसहिता कल्याणशीला सती
तावद्भाति सुमङ्गली च सुतनुर्यावच्छुभाख्येऽष्टमे ॥१०॥
शीतज्योतिषि योषितोऽनुपचयस्थाने कुजेनेक्षिते
जातं गर्भफलप्रदं खलु रजः स्यादन्यथा निष्फलम् ।

२२६ फलदीपिका
दृष्टेऽस्मिन् गुरुणा निजोपचयगे कुर्यान्निषेकं पुमान्
अत्याज्ये समये शुभाधिकयुते पर्वादिकालोद्भिते ॥११॥
जिन योगों का फल पुरुषों की कुंडली में बताया गया है उनके फल
स्त्रियों की कुंडली में भी बताने चाहियें। जहां राजयोग आदि का फल
स्त्री की कुंडली में भी घटित होने की संभावना न हो (क्योंकि जो
स्त्रियाँ स्वयं नौकरी या व्यापार नहीं करतीं वे उच्चाधिकारिणी कैसे हो
सकती हैं ?) वहां वे योग उन स्त्रियों के पति में घटित होंगे। इसी प्रकार
जहां एक पुरुष के अनेक विवाह का योग हो—वैसा ही योग स्त्री की
कुंडली में हो किन्तु स्त्री ऐसे समाज की हो जहां अनेक विवाह की
संभावना न हो तो वे योग भी स्त्रियों की कुंडली में घटित नहीं होंगे।
स्त्री की कुंडली में अष्टम स्थान से मांगल्य (सधवापन) नवम से पुत्र
(सन्तान) और लग्न से शरीर सौन्दर्य का विचार करे। पति तथा
सुभगत्व का विचार सातवें घर से और संग (अन्य लोगों से समागम) तथा
सतीत्व का विचार चतुर्थ से। यदि शुभ ग्रह इन गृहों में होंगे तो शुभ फल
करेंगे-अशुभ ग्रह बैठे होंगे तो अशुभ फल करेंगे—किन्तु अशुभ (क्रूर)
ग्रह भी यदि वहां स्वराशि का होगा तो अच्छा ही फल करेगा—अनिष्ट
फल नहीं करेगा ॥१॥
यदि स्त्री की कुंडली में लग्न और चन्द्रमा दोनों सम राशि में
हों और सौम्य ग्रहों से दृष्ट हों तो वह अच्छे पुत्र, पति वाली, सुशीला
आभूषण सम्पत्ति से युक्त होती है। किन्तु लग्न और चन्द्रमा दोनों
विषम राशि में, अशुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो कुटिल बुद्धि की,
पति से उग्र (क्रोध पूर्ण) व्यवहार करने वाली, मर्दाना, काबू में न रहने
वाली दरिद्र होती है ॥२॥
यदि सप्तम* में सत् (उत्तम-शुभग्रहों की, शुभयुत, शुभ दृष्टि)

  • सप्तम भाव मध्य पर कौनसी राशि कौन सा नवांश है, यह
    देखना चाहिये।

ग्यारहवां अध्याय : स्त्री जातक २२७
गशि और सत् (अच्छा, शुभग्रह का, शुभयुक्त शुभदृष्ट) नवांश
हो तो उस स्त्री को सौन्दर्य, यश, विद्या, तथा धन से युक्त पति
मिलेगा। यदि इसका उलटा हो अर्थात् सप्तम भाव मध्य पर अशुभ
राशि, अशुभ नवांश हो तो कुतनु (कुत्सित शरीर वाला) मूर्ख, चालाक,
निर्धन पति होगा और उनका (पति पत्नी) का वियोग भी होगा
(एक साथ न रहें या मृत्यु के कारण)। यदि सप्तम में मंगल हो
तो विधवा हो, यदि शुभ और पाप दोनों प्रकार के ग्रह सप्तम में हों
तो पुनर्विवाह करे। यदि अष्टम में क्रूर ग्रह हों तो पति की आयु का
हरण करती हैं अर्थात् पति अल्पायु होता है किन्तु यदि द्वितीय भाव में
(लग्न से दूसरे) अशुभ ग्रह हों तो स्त्री की स्वयं की मृत्यु हो जाती है।
हमारा अनुभव है कि वर और कन्या यदि दोनों की कुंडली में
मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य का दोष बराबर हो तो दोनों कुंडलियों एक
दूसरे के दोष को काट देती हैं ॥३॥
यदि पंचम भाव में वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक राशि हो और
उसमें चन्द्रमा हो तो उस स्त्री के थोड़ी संतान हों। सप्तम भाव मध्य
मंगल या शनि की राशि या मंगल या शनि के नवांश में हो तो उसकी
योनि में रोग हो। यदि चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हों तो कुलटा हो,
यदि लग्न, चन्द्र और शुक्र मंगल या शनि के राशि और अंश में हों तो
पुंश्चली (व्यभिचारिणी) हो ॥४॥
यदि सप्तम भाव मध्य शुभ ग्रह की राशि और नवांश में हो तो
सुन्दर जघन (कमर के नीचे जांघों के बीच का भाग जघन कहलाता है)
वाली, मंगल वती (पति सुख सम्पन्न) होती है। यदि लग्न चतुर्थ
और चन्द्रमा का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो सच्चरित्रा, अनेक गुणों
से युक्त हो, यदि त्रिकोणों में (पांचवे तथा नवम घर में) सौम्यग्रह
हों, तो सुखी, पुत्रवती, गुणवती, सम्पत्ति-शालिनी हो । यदि उपर्युक्त
घरों में निर्बल क्रूर ग्रह हों तो बाँझ हो या उसकी सन्तति अल्पायु
हो ॥ ५ ॥

२२८ फलदीपिका
यह देखिये कि लग्न और चन्द्रमा दोनों में कौन बलवान् है ।
जो बलवान् हो वह यदि ।
(१) मेष या वृश्चिक राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
दुष्टा, यदि शनि के त्रिंशांश में हो तो दासी, गुरु के त्रिंशांश में हो तो
सुशीला और धनी, बुध के त्रिंशांश में हो तो मायाविनी और शुक्र
के त्रिंशांश में हो तो चरित्र दोष से युक्त होता है।
(२) वृष या तुला राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो बहुत दूषण (चरित्र दोष) से युक्त, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य
पति से समागम करने वाली (अन्य के पति से या स्वयं दूसरा विवाह
करें), गुरु के त्रिंशांश में हो तो पूज्या (आदरणीया), बुध के त्रिंशांश
में हो तो विदुषी ओर शुक्र के त्रिंशांश में हो प्रसिद्ध-ख्याति वाली हो ।
(३) यदि मिथुन या कन्या की राशि में हो और मंगल के
त्रिंशांश में हो तो कपटिनी, शुक्र के त्रिंशांश में हो तो नपुंसक के
समान, गुरु के त्रिंशांश में हो तो साध्वी, बुध के त्रिंशांश में हो तो
गुणवती और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो विलास के लिये उत्सुक रहे ।
(४) यदि कर्क राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो तो
स्वच्छन्दा, शनि के त्रिंशांश में पति घातिनी, गुरु के त्रिंशांश में विशिष्ट
गुणों से युक्त, बुध के त्रिंशांश में शिल्पकला में कुशल और शुक्र के
त्रिंशांश में उत्तम आचरण वाली होती है ।
(५) यदि धनु या मीन राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो गुणवती, शनि के त्रिंशांश में हो तो संभोग की कम इच्छा
रखने वाली, गुरु के त्रिंशांश में हो तो गुणशालिनी, बुध के त्रिंशांश में
हो तो कला कुशल और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो सच्चरित्रा होती है ।
(६) यदि मकर या कुंभ राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में
हो तो दासी, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य पुरुष में आसक्त, गुरु के
त्रिंशांश में हो तो पति को अपने अधीन रखने वाली, बुध के त्रिंशांश

ग्यारहवां अध्याय : स्त्रीजातक २२९
में हो तो असती और शुक्र के त्रिंशांश में हो निस्सन्तान ओर दरिद्रा
होती है ।
(७) यदि सिंह राशि में हो ओर मंगल के त्रिंशांश में हो तो
दुष्ट भार्या, शनि के त्रिंशांश में हो तो आचरण हीन, गुह के त्रिंशांश
में हो तो राजा या जमींदार की पत्नी, यदि बुध के त्रिंशांश में हो
तो मर्दाना (स्त्रियोचित चेष्टा के विरुद्ध) और शुक्र के त्रिंशांश में
हो तो अन्य पुरुष में आसक्त होती है । ॥ ६-८ ॥
नीचे कुछ नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या किन-किन के लिए अनिष्ट
होती हैं यह बताया जाता है : ज्येष्ठा में उत्पन्न कन्या पति के बड़े
भाई की मृत्यु करे, आश्लेषा में उत्पन्न सास के लिये घातक, मूल में
उत्पन्न ससुर के लिये अनिष्ट और विशाखा में उत्पन्न देवर के लिये
घातक ।
जो कन्याएँ चित्रा, आर्द्रा, आश्लेषा, शतभिषा ज्येष्ठा, मूल, कृत्तिका
या पुष्य नक्षत्र में उत्पन्न होती हैं वे वंध्या, विधवा, मृतसुता (जिसके बच्चे
मर जावें), स्वामी से परित्यक्ता (पति छोड़ दे) या निर्धना होती
हैं ॥ ९ ॥*
यदि लग्नेश, सप्तमेश, नवमेश और जिस राशि में चन्द्रमा है
उस का स्वामी शुभग्रहों के उत्तम स्थानों में स्थित हों ओर अस्त न हों
तो स्त्री भाग्यशालिनी, सुन्दरी, बंधुओं में पूज्य और पुण्य कर्म करने
में कुशल होती है । वह अपने पति का प्रिय करने वाली, कल्याण-
शीला, सच्चरित्रा, सत्पुत्रवती होती है । अष्टम भाव पर जितने अधिक
शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी उतने ही अधिक काल तक वह सुमंगली
(सधवा) रहेगी ॥ १० ॥
*हमारे विचार से नक्षत्र में उत्पन्न होने का, फल का, जन्म कुंडली
के अन्य ग्रहों के फल से तारतम्य कर किसी परिणाम पर पहुँचना
उचित है।

२३० फलदीपिका।
स्त्री का मासिक धर्म जब प्रारंभ हो (प्रथम बार ही नहीं-कभी-
भी, तब यदि चन्द्रमा गोचर वश जन्म कुंडली में अनुपचय (पहले,
दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, आठवे, नवें बारहवें स्थान में हो और
मंगल से देखा जाता हो तो उस महीने उसको गर्भ रह सकता है ।
यदि चन्द्रमा ऐसे स्थान में नहीं है तो उसे उस महीने में गर्भ नहीं
रहेगा ।
यदि चन्द्रमा पुरुष की जन्म कुंडली में उपचय स्थान (३, ६,
१०, ११) में हो और उसे गुरु देखता ही उस समय गर्भाधान करे ।
गर्भाधान त्याज्य समय बचाकर करना चाहिये । धर्मशास्त्र में यह
बताया गया है कि कौन-कौन से समय त्याज्य है—यथा एकादशी,
अमावास्या पूर्णिमा, माता, पिता का श्राद्ध दिन आदि । ऐसे लग्न में
—जिस पर शुभ दृष्टि अधिक हो और जब चन्द्रमा पर भी शुभग्रहों
की दृष्टि अधिक हो गर्भाधान करना श्रेयस्कर है ॥ ११ ॥

बारहवां अध्याय
पुत्रभाव फल
सुस्था विलग्नशशिनोः सुतभेशजीवाः
सुस्थाननाथशुभदृष्टियुते सुतर्क्षे ।
लग्नात्मपौ यदि युतौ च मिथः सुदृष्टौ
क्षेत्रे परस्परगतौ यदि पुत्रसिद्धिः ॥१॥
यदि लग्न से पांचवे भाव का स्वामी, चन्द्रमा से पांचवे स्थान का
स्वामी और बृहस्पति अच्छे स्थानों में बैठे हों और पंचम भाव पर
पंचमेश की तथा शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तथा चतुर्थ, नवम, आदि के
शुभ ग्रह स्वामियों की दृष्टि हो और छठे, आठवे, बारहवे घर के
स्वामी की दृष्टि पाँचवे घर पर न हो और लग्नेश, पंचमेश एक साथ
बैठे हों या एक दूसरे के घर में बैठ हों या लग्नेश, पंचमेश में परस्पर
मित्र दृष्टि हो तो पुत्रसिद्धि होती है । अर्थात् यह सब योग पुत्रकारक
हैं । ।। १ ।।
लग्नामरेड्यशशिनां सुतभेषु पापै
र्युक्तेक्षितेष्वथ शुभैरयुतेक्षितेषु ।
पापोभयेषु सुतभेषु सुतेश्वरेषु
दुस्थानगेषु न भवन्ति सुताः कथंचित् ॥२॥
अब नीचे वह योग दिये जाते हैं जिनके कारण सन्तान नहीं होती
या होकर नष्ट हो जाती है । अर्थात् निम्नलिखित योग सन्तान के
बाधाकारक हैं ।

२३२ फलदीपिका
(i) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पंचम स्थान पाप-ग्रहों से
युक्त या दृष्ट हों और उन स्थानों में न शुभ-ग्रह बैठे हों न उनको
शुभ-ग्रह देखते हों ।
(ii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थानों के स्वामी
दुःस्थान में पड़े हो । छठा, आठवाँ और बारहवाँ घर दुःस्थान
कहलाता है ।
(iii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थान पाप-ग्रहों के
बीच में पड़े हों ।* ॥ २ ॥
पापे स्वर्शगते सुते तनयभाक् तस्मिन् सपापे पुनः
पुत्राः स्युर्बहुलाः शुभस्वभवने सोग्रे सुते पुत्रहा ।
संज्ञां चाल्पसुतर्क्षमित्यलिवृषस्त्रीसिंहभानां विदुः
तद्राशौ सुतभावगेऽल्पसुतवान् कालान्तरेऽसाविति ॥३॥
यदि कोई पाप-ग्रह पंचम स्थान का स्वामी होकर उसी स्थान में
हो तो पुत्र हो लेकिन यदि कोई शुभ-ग्रह स्वराशि का स्वामी होकर
पंचम में हो और साथ ही पंचम में पाप-ग्रह हो तो सन्तान नष्ट
करेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि पाप-ग्रह यदि स्वराशि का हो
तो अपने स्थान को नहीं बिगाड़ता, किन्तु यदि दूसरे घर में बैठा हो
तो जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है ।
वृष, सिंह, कन्या और वृश्चिक अल्प सुत (कम सन्तान वाली) राशि
कहलाती है । यदि यह राशियाँ पंचम में हों तो थोड़ी सन्तति होगी
और वह भी बहुत समय के बाद ॥३॥
*नोट—जिस राशि के दूसरे और बारहवें घर में पाप-ग्रह हों वह
राशि पाप-ग्रहों के बीच में समझी जाती है ।