फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ फलदीपिका
सिंह ,, १३-२० से १६-४० ,,
कन्या ,, २६-४० से ३०- ० ,,
तुला ,, ०- ० से ३-२० ,,
वृश्चिक ,, १३-२० से १६-४० ,,
धनु ,, २६-४० से ३०- ० ,,
मकर ,, ०- ० से ३-२० ,,
कुंभ ,, १३-२० से १६-४० ,,
मीन ,, २६-४० से ३०- ० ,,
जिनको ज्योतिष का अभ्यास है उनको तो अपने आप ही वर्गोत्तम
अंश किस राशि में किस अंश किस कला से किस अंश किस कला तक
होता है, यह याद ही रहता है किन्तु जो नवीन ज्योतिष प्रेमी हैं
उनको वर्गोत्तम किन अंशों में रहता है यह याद रखने के लिये यह
सुन्दर नियम है कि चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) का प्रथम
नवांश, स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक तथा कुंभ) का मध्य नवांश
और द्विस्वभाव राशि का अंतिस नवांश वर्गोत्तम होता है।
एक राशि के ९ हिस्से किये जावें तो एक हिस्से का नाम नवांश
(नव — ९, अंश = भाग या हिस्सा) होता है। इसलिये चर राशि का
पहला हिस्सा, स्थिर राशि का बीच का हिस्सा, द्विस्वभाव का आखिरी
हिस्सा वर्गोत्तम हुआ।
एक हिस्से में ३ अंश २० कला होते हैं। ३० अंश कुल एक
राशि में होते हैं। इसको यदि ९ से विभक्त किया जावे (भाग दिया
जावे) तो ३ अंश २० कला होते हैं। इसी कारण एक नवांश ३ अंश
२० कला का होता है।
मूल में 'तद्वत्' शब्द आया है—जिसका अर्थ है—इसी प्रकार।
किस प्रकार ? अर्थात् शत्रु राशि या नीच राशि में भी वर्गोत्तम हो
तो अच्छा फल करेगा। उच्च राशि में वर्गोत्तम सबसे उत्तम फल
करेगा। उसके बाद स्वराशि में वर्गोत्तम। इसके बाद अधिमित्र
राशि, मित्र राशि, सम राशि, शत्रु, अधिशत्रु, नीच राशि में वर्गोत्तम
में क्रमशः शुभ फल कम होता जावेगा।