फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(i) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पंचम स्थान पाप-ग्रहों से
युक्त या दृष्ट हों और उन स्थानों में न शुभ-ग्रह बैठे हों न उनको
शुभ-ग्रह देखते हों ।
(ii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थानों के स्वामी
दुःस्थान में पड़े हो । छठा, आठवाँ और बारहवाँ घर दुःस्थान
कहलाता है ।
(iii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थान पाप-ग्रहों के
बीच में पड़े हों ।* ॥ २ ॥
पापे स्वर्शगते सुते तनयभाक् तस्मिन् सपापे पुनः
पुत्राः स्युर्बहुलाः शुभस्वभवने सोग्रे सुते पुत्रहा ।
संज्ञां चाल्पसुतर्क्षमित्यलिवृषस्त्रीसिंहभानां विदुः
तद्राशौ सुतभावगेऽल्पसुतवान् कालान्तरेऽसाविति ॥३॥
यदि कोई पाप-ग्रह पंचम स्थान का स्वामी होकर उसी स्थान में
हो तो पुत्र हो लेकिन यदि कोई शुभ-ग्रह स्वराशि का स्वामी होकर
पंचम में हो और साथ ही पंचम में पाप-ग्रह हो तो सन्तान नष्ट
करेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि पाप-ग्रह यदि स्वराशि का हो
तो अपने स्थान को नहीं बिगाड़ता, किन्तु यदि दूसरे घर में बैठा हो
तो जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है ।
वृष, सिंह, कन्या और वृश्चिक अल्प सुत (कम सन्तान वाली) राशि
कहलाती है । यदि यह राशियाँ पंचम में हों तो थोड़ी सन्तति होगी
और वह भी बहुत समय के बाद ॥३॥
*नोट—जिस राशि के दूसरे और बारहवें घर में पाप-ग्रह हों वह
राशि पाप-ग्रहों के बीच में समझी जाती है ।