फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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दृष्टेऽस्मिन् गुरुणा निजोपचयगे कुर्यान्निषेकं पुमान्
अत्याज्ये समये शुभाधिकयुते पर्वादिकालोद्भिते ॥११॥
जिन योगों का फल पुरुषों की कुंडली में बताया गया है उनके फल
स्त्रियों की कुंडली में भी बताने चाहियें। जहां राजयोग आदि का फल
स्त्री की कुंडली में भी घटित होने की संभावना न हो (क्योंकि जो
स्त्रियाँ स्वयं नौकरी या व्यापार नहीं करतीं वे उच्चाधिकारिणी कैसे हो
सकती हैं ?) वहां वे योग उन स्त्रियों के पति में घटित होंगे। इसी प्रकार
जहां एक पुरुष के अनेक विवाह का योग हो—वैसा ही योग स्त्री की
कुंडली में हो किन्तु स्त्री ऐसे समाज की हो जहां अनेक विवाह की
संभावना न हो तो वे योग भी स्त्रियों की कुंडली में घटित नहीं होंगे।
स्त्री की कुंडली में अष्टम स्थान से मांगल्य (सधवापन) नवम से पुत्र
(सन्तान) और लग्न से शरीर सौन्दर्य का विचार करे। पति तथा
सुभगत्व का विचार सातवें घर से और संग (अन्य लोगों से समागम) तथा
सतीत्व का विचार चतुर्थ से। यदि शुभ ग्रह इन गृहों में होंगे तो शुभ फल
करेंगे-अशुभ ग्रह बैठे होंगे तो अशुभ फल करेंगे—किन्तु अशुभ (क्रूर)
ग्रह भी यदि वहां स्वराशि का होगा तो अच्छा ही फल करेगा—अनिष्ट
फल नहीं करेगा ॥१॥
यदि स्त्री की कुंडली में लग्न और चन्द्रमा दोनों सम राशि में
हों और सौम्य ग्रहों से दृष्ट हों तो वह अच्छे पुत्र, पति वाली, सुशीला
आभूषण सम्पत्ति से युक्त होती है। किन्तु लग्न और चन्द्रमा दोनों
विषम राशि में, अशुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो कुटिल बुद्धि की,
पति से उग्र (क्रोध पूर्ण) व्यवहार करने वाली, मर्दाना, काबू में न रहने
वाली दरिद्र होती है ॥२॥
यदि सप्तम* में सत् (उत्तम-शुभग्रहों की, शुभयुत, शुभ दृष्टि)
- सप्तम भाव मध्य पर कौनसी राशि कौन सा नवांश है, यह
देखना चाहिये।