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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 684 में से

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पृष्ठ 221

२२० फलदीपिका।
सातवें भाव सम्बन्धी सिद्धि (उत्तम फल प्राप्ति) होती है। यदि ऐसा
न हो तो विपरीत फल समझना।
(क) शुक्र यदि पाप ग्रहों के बीच में हो या (ख) शुक्र से
चतुर्थ, अष्टम, द्वादश पापग्रह हों या (ग) शुक्र यदि पाप ग्रहों से युत
या दृष्ट हो—इन तीनों योगों का फल यह है कि जिस पुरुष की
कुँडली में यह योग हो उसकी स्त्री की मृत्यु हो जाती है। जितने ही
दुर्योग अधिक होंगे उतना ही दुष्प्रभाव अधिक होगा। ॥ १ ॥
सप्तम भाव का स्वामी पंचम में हो तो उसकी स्त्री की मृत्यु हो
जावे या अपुत्र हो। यदि पंचमेश या अष्टमेश सप्तम में हो तो भी
पत्नी का विनाश हो जाता है। यदि क्षीण चन्द्रमा पांचवें घर में हो
और पाप ग्रह लग्न, सप्तम और बारहवें घरों में हो तो जातक पत्नी
हीन, पुत्रहीन होता है। यदि सूर्य और राहु सप्तम में हों तो स्त्री
संग से धन नाश होता है। ॥ २ ॥
(क) यदि वृश्चिक राशि का शुक्र सप्तम में हो या (ख) वृष
राशि का बुध सप्तम में हो या (ग) मकर राशि का बृहस्पति सप्तम
में हो या (घ) मीन राशि का शनि सप्तम में हो या (ङ) मीन राशि
का मंगल सप्तम में हो; इन योगों में से कोई भी योग हो तो पत्नी की
मृत्यु हो जाती है। यदि कर्क राशि सप्तम में हो और उसमें मंगल
तथा शनि हों तो उस मनुष्य की सुन्दर और सच्चरित्र पत्नी
होगी। ॥ ३ ॥
यदि सातवें घर का स्वामी या सातवाँ घर, पाप ग्रह से युत या
दृष्ट हो या पाप ग्रहों के बीच में हो या सप्तमेश नीच राशि या शत्रु
राशि में हो या अस्त हो (सूर्य के समीप होने के कारण) तो स्त्री
नष्ट हो जाती है। ये सब स्त्रीनाशक योग है। यदि शुक्र पापग्रह के
साथ पांचवे या सातवें या नवम भाव में हो तो उसकी स्त्री रोगिणी
(जिसके शरीर का कोई अवयव ठीक काम न करता हो) होती है
या स्त्री सुख के अभाव के कारण विकल रहता है। शुक्र, मंगल या