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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 684 में से

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पृष्ठ 223

२२२ फलदीपिका
है। किन्तु यदि दोनों भाव¹ शुभग्रहों से युत या दृष्ट हों तो पति पत्नी
भाग्यवान् होते हैं ॥७॥
यदि स्त्री की जन्मकुंडली में चन्द्रमा और शनि दोनों सप्तम में
हों तो वह पुनर्विवाह करती है। पुरुष की कुंडली में यह योग हो तो
वह स्त्रीहीन या पुत्रहीन होता है । यदि अशुभ ग्रह अपनी नीच या
शत्रु राशि में द्वितीय, सप्तम और अष्टम में हों तो—यह योग स्त्री की
जन्म कुंडली में हो तो पति का मरण हो और पुरुष की कुंडली में हो तो
पत्नी का मरण हो ॥८॥
यदि लग्न से सप्तम भाव में सम² राशि हो, सप्तमेश और शुक्र
भी सम राशि में हों और पंचमेश तथा सप्तमेश बली हों और सूर्य से
अस्त न हों तो स्त्री और पुत्र का सुख होता है ॥९॥
यदि द्वितीय, सप्तम और द्वादश ( २,७,१२ घरों ) के स्वामी
त्रिकोण या केन्द्र में हों और बृहस्पति से देखे जाते हों; सप्तमेश जहां
बैठा है उससे दूसरे, सातवें और ग्यारहवें स्थान में सौम्य ग्रह हों तो
जातक सुखी, पुत्रवान्, कलत्रवान् होता है ॥१०॥
पुरुष की कुंडली में यह देखिये कि लग्नेश और सप्तमेश किस राशि
और किस नवांश में हैं। ऐसी राशि या नवांश की त्रिकोण राशि स्त्री की
जन्म राशि होगी या पति की कुंडली में लग्नेश या सप्तमेश की उच्च-
राशि या नीच राशि स्त्री की जन्म राशि होगी । या पति के
चन्द्राष्टक वर्ग में जिस राशि में सबसे अधिक शुभ बिन्दु होंगे-वह
स्त्री की जन्म राशि होगी ॥११॥
१. दोनों भाव का अर्थ है स्त्री की कुंडली में सप्तम और अष्टम-
पुरुष की कुंडली में द्वितीय और सप्तम ।
२. वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन सम राशि हैं।
कलत्र = पत्नी ।