फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
छठा अध्याय : योग १४९
योग में उत्पन्न मनुष्य को गो सम्पत्ति (गाय, बैल आदि) धन-धान्य,
आदि पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होते हैं। इसका मकान बहुत सुन्दर होता
है। बन्धुओं की बहुतायत रहती है। अर्थात् बन्धुओं से सुख प्राप्त होता
है। उत्तम स्त्री, रत्न, वस्त्र, भूषण आदि के साथ-साथ आदरणीय
उत्तम स्थान प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्य का सुख स्थिर होता है अर्थात्
दीर्घ काल तक वह सुखी रहता है। उसे हाथी, घोड़े, पालकी आदि का
पूर्ण सुख प्राप्त हो और राजा भी उसका सम्मान करे। ऐसे मनुष्य
देवताओं और ब्राह्मणों के भक्त अर्थात् धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त रहते हैं और
कुएँ खुदवाना, प्याऊ लगवाना आदि कार्य करते रहते हैं। संक्षेप में चतुर्थ
सुख स्थान है इससे बन्धु, सुख, मकान, सवारी, जलकार्य, आदि जितनी
बातों का विचार किया जाता है उन सबका सुख जातक को प्राप्त होता है।
(५) यदि पंचम भाव में शुभ ग्रह हों या इसे देखते हों और पांचवें
घर का मालिक अस्त न हो और अपनी राशि का या अपनी उच्चराशि में
स्थित होकर उत्तम स्थान में बैठा हो तो छत्र योग होता है। ऐसा
जातक संसार के सब सौभाग्यों से युक्त, सन्तान सुख वाला, धनी, यशस्वी
बुद्धिमान्, उत्तम भाषण करने वाला, तीक्ष्ण बुद्धि, जिसको बहुत स्फूर्ति हो
(जिसके विचार में उत्तम बुद्धि की नवीन बातें जागृत हों) राजा का
मन्त्री होता है। ऐसे व्यक्ति को राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त होता
है। संक्षेप में पंचम भाव और पंचम भावेश के सुधर जाने से पंचम
भाव सम्बन्धी सब सुख प्राप्त होता है।
(६) यदि छठे भाव का स्वामी अस्त न होकर स्वराशि या उच्चराशि
में स्थित होकर उत्तम स्थान में बैठा हो और छठा भाव शुभ ग्रह
युत या शुभग्रहों से वीक्षित हो तो अस्त्र योग होता है। साधारणतः छठा
स्थान दुःस्थान या निकृष्ट स्थान समझा जाता है किन्तु छठे का स्वामी
छठे में हो तो इसे खराब नही कहेंगे क्योंकि वह स्वगृही हुआ। प्रायः
ज्योतिषी कहा करते हैं कि छठे ग्रह में पाप ग्रह का होना अच्छा है 'षष्ठे
पापाः वित्तलाभं प्रकुर्युः' उनके कथन का आधार यह होता है कि छठा
१५० फलदीपिका
शत्रु स्थान है। पाप ग्रह शत्रुओं का नाश करेगा इसलिये उत्तम है। यह
भी प्रसिद्ध उक्ति है कि ३, ६, ११ इन स्थानों में मंगल, शनि, राहु हो
तो उत्तम हैं। इसका भी आशय यही है कि पाप ग्रह छठे में रहकर शत्रु
और रोग को नष्ट करेगा। अब मन्त्रेश्वर महाराज का मत लीजिये।
वे इस सिद्धान्त को पकड़ते हैं कि किसी भाव का सुख तभी प्राप्त
होता है जब भावेश बलवान् हो—पहली बात। इसमें तो किसी को
आपत्ति हो ही नहीं सकती। किन्तु दुःस्थान का स्वामी किसी दुःस्थान
में बैठे तो भी अच्छा ही माना जाता है यह बात फलदीपिका में भी
आगे इसी अध्याय के ५७वें श्लोक में बताई गई है। वह देखिये। दूसरी
बात यह है कि शुभ ग्रह जहाँ बैठे हों उस भाव के सुख को बढ़ावेंगे।
इसी प्रकार शुभ ग्रह जिस भाव को देखते हों उस भाव सम्बन्धी फल
में भलाई पैदा करेंगे। पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्म कुण्डली में
(देखिये पृष्ठ १२१) छठे स्थान में बृहस्पति और केतु हैं; शनि इस भाव
को आधी दृष्टि से देखता है मंगल पूर्ण दृष्टि से और शुक्र व बुध चौथाई
दृष्टि से देखते हैं इसलिये शुभाशुभ दोनों दृष्टियों के होने के कारण
तथा शुभ ग्रह बृहस्पति एवं पाप ग्रह केतु दोनों के छठे घर में बैठने
के कारण पूर्ण रूप से अस्त्र योग घटित नहीं होता किन्तु षष्ठेश का
मालिक बलवान् होकर अपने घर में बैठा है इस कारण हम तो 'अस्त्र'
योग मानेंगे। अब पाठक स्वयं देखे कि यह योग उनमें कहां तक घटित
होता है। मन्त्रेश्वर महाराज ने अस्त्र योग का निम्नलिखित फल कहा
है:—
जो अस्त्र योग में पैदा होता है वह बड़े बड़े बलवान् शत्रुओं को
अपनी जबर्दस्त ताकत से दबा देता है। बहुत क्रूर प्रवृत्ति वाला अभि-
मानी होता है। ऐसे व्यक्ति के शरीर के अवयव दृढ़ (मजबूत) होते हैं;
किन्तु शरीर में व्रण के चिह्न भी होते हैं। अस्त्र योग में उत्पन्न व्यक्ति
विवादकारी होता है। पंडित जी बहस मुबाहिसा में कितने बढे हुए थे
और उनकी तकरीर कैसी होती थी यह पाठक स्वयं विचार कर लें।
छठा अध्याय : योग १५१
(७) यदि सप्तम स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और सप्तम
स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों एवं सप्तम स्थान का स्वामी स्वराशि या
उच्चराशि का होकर उत्तम स्थान पर बैठा हो तो “काम” योग होता
है। सप्तमेश अस्त नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति काम योग में उत्पन्न
होते हैं वे लोग परदार पराङ्मुख होते हैं अर्थात् व्यभिचारी नहीं
होते। ऐसे व्यक्ति को उत्तम स्त्री, सन्तान और बन्धुओं का सुख प्राप्त
होता है। ऐसा आदमी अपने शुभ गुणों से बहुत लक्ष्मी प्राप्त करता
है और अपने पिता से अधिक उच्च पदवी प्राप्त करता है।
(८) यदि अष्टम स्थान में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह इस स्थान
को देखते हों और अष्टमेश स्वराशि, उच्चराशि का अस्तंगत न होकर
उत्तम स्थान में बैठा हो तो आसुर योग होता है। इसका फल निकृष्ट
है। ऐसा आदमी स्वार्थी कुकर्मी, दरिद्री, दुराग्रही (बुरी तरह ज़िद
करने वाला) चुगलखोर और दूसरों का काम बिगाड़ने वाला होता
है। अपने किये हुये दुष्ट कार्यों के परिणाम स्वरूप ऐसा मनुष्य स्वयं
हानि और दुःख उठाता है।
(९) यदि नवम भाव में शुभ ग्रह बैठे हों, नवम भाव को शुभ ग्रह
देखते हों, नवम भाव का स्वामी सूर्य किरणों के सान्निध्य से अस्तंगत
न होकर अपनी राशि या अपनी उच्चराशि में स्थित होता हुआ उत्तम
स्थान में बलवान् बैठा हो तो 'भाग्य' योग होता है। ऐसा व्यक्ति जब
पालकी में जाता है तो उसके दोनों ओर चंवर रहते हैं और उसके
साथ-साथ आगे पीछे बाजे बजते हुये चलते हैं। प्राचीन समय में इस
- श्लोक ४४ से ५६ तक जो योग बनाये गये हैं उनमें यह स्मरण
रखना चाहिये कि जिस भावेश का विचार कर रहे हों वह अस्त नहीं
होना चाहिये । अस्त होने से उस ग्रह की किरणें—सूर्य की किरणों
से मिश्रण हो जाने से जल जाती हैं, इस कारण उसका सब प्रभाव नष्ट
हो जाता है, कमजोर ग्रह पूर्ण शुभ प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकता ।
१५२ फलदीपिका
प्रकार की सवारी प्राप्त होना—चंवर पालकी और बाजों के साथ,
परम ऐश्वर्य समझा जाता था। ऐसे आदमी को सदैव रहने वाली लक्ष्मी
प्राप्त होती है अर्थात् सदैव पूर्ण धनी रहता है । बड़े बड़े आदमी
ऐसे व्यक्ति को नमस्कार करते हैं । यह अपने माता पिता का, पितरों,
ब्राह्मणों, और देवताओं का पूजन कर सदैव उनको प्रसन्न रखता है।
भाग्य योग में उत्पन्न व्यक्ति अपने कुल की कीर्ति को बढ़ाने वाला,
आचारनिष्ठ, सहृदय होता है। नवम में शुभ ग्रह होने से शुभ हृदय
वाला और पाप ग्रह होने से कुकर्म वृत्ति वाला मनुष्य होता है। नवम
पर शुभाशुभ दृष्टि का भी यही अर्थ समझना चाहिये ।
(१०) यदि दशम भाव में शुभ ग्रह बैठे हों और दशम भाव को
शुभ ग्रह देखते हों तथा दशम का मालिक अस्त न होकर उत्तम स्थान
में बैठकर अपनी उच्चराशि या स्वराशि में स्थित हो तो ख्याति योग
होता है। जो इस योग में उत्पन्न हो वह उत्तम कर्म करता है और
उसके कार्य की सब प्रशंसा करते हैं। ऐसा व्यक्ति नृप होकर अपनी
प्रजा की अच्छी रक्षा करता है; और लोक में ख्याति प्राप्त करता है।
ऐसे जातक को स्त्री, पुत्र, मित्र और धन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है
और भाग्यवान् होता है ।
(११) यदि लाभेश अस्त न होकर अपनी स्वयं की राशि या
उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से उत्तम स्थान बैठा हो और लाभ
- ऊपर के बारहवों योगों में भाव विवेचन करते समय बारंबार
यह आया है:—शुभ ग्रहों की भाव पर दृष्टि हो और भाव शुभ ग्रहों
से युत हो । शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा मिलाकर और शुभ ग्रहों सहित
बुध को भी लेते हुये कुल चार शुभ ग्रह हुये और यह साधारणतः
सम्भव नहीं कि दो बैठे हों और दो देखते हों इसलिये अर्थ यह
समझना चाहिये कि पाप ग्रह बैठा न हो, शुभ ग्रह बैठा हो । पाप ग्रह
देखता न हो, शुभ ग्रह देखता हो ।
छठा अध्याय : योग १५३
स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों या इस स्थान (एकादश) को शुभ ग्रह
देखते हों तो सुपारिजात योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न होता
है वह अच्छे कुटुम्ब वाला, अर्थ संग्रह करने से धनी, नित्य मंगल
(शुभ) कार्यों में भाग लेने वाला, पुण्य कथाओं के सुनने में तथा भक्ति
में समय लगाने वाला, विद्वान् और सत्कर्म करने वाला होता है।
(१२) यदि बारहवें घर में शुभ ग्रह बैठे हों या इस घर को शुभ
ग्रह देखते हों और इस घर का मालिक स्वराशि या उच्चराशि में
स्थित होकर लग्न से उत्तम स्थान में बैठा हो तो मुसल योग होता है
जो मुसल योग में उत्पन्न होता है उसको बड़ी कठिनता से धन
प्राप्ति होती है। उसकी सम्पत्ति चंचल होती है अर्थात् कभी धन रहता
है और कभी नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति बहुत व्यय करने वाला होता है
परन्तु वाजिब काम में ही खर्च करता है। ऐसे व्यक्ति को अन्य लोग
(शत्रु) दबा लेते हैं । मुसलयोग में उत्पन्न व्यक्ति चपल और मूर्ख
होता है किन्तु उसे जीवन के अन्त में स्वर्ग प्राप्ति होती है।
लग्न से १२ भाव पर्यन्त यदि प्रत्येक शुभ ग्रह से युत वेक्षित हो
और भावेश उच्चराशि या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से उत्तम
स्थान में बैठा हो तो क्रमशः १२ योग होते हैं और उनके पृथक्-पृथक्
क्या-क्या फल होते हैं यह ऊपर बताया गया है। अब अन्य १२ योग
बताते हैं ।
दुःस्थैर्भावगृहेश्वरैरशुभसंयुक्तेक्षितैर्वा क्रमा-
द्भा वैः स्युस्त्ववयोगनिःस्वमृतयः प्रोक्ताः कुहूः पामरः ।
हर्षो दुष्कृतिरित्यथापि सरलो निर्भाग्यदुर्यौगकौ
योगा द्वादश ते दरिद्रविमले प्रोक्ता विपश्चिज्जनैः ॥५७॥
अप्रसिद्धिरतिदुःसहदैन्यं स्वल्पमायुरवमानमसद्भिः ।
संयुतः कुचरितः कुतनुः स्याच्चञ्चलस्थितिरिहाप्यवयोगे ॥५८॥
१५४ फलदीपिका
सुवचनशून्यो विफलकुटुम्बः कुजनसमाजः कुदशनचक्षुः ।
मतिसुतविद्याविभवविहीनो रिपुहृतवित्तः प्रभवति निःस्वे ॥५९॥
अरिपरिभूतः सहजविहीनो
मनसि विलज्जो हतबलवित्तः ।
अनुचितकर्मश्रमपरिखिन्नो
विकृतिगुणः स्यादिति मृतियोगे ॥६०॥
मातृवाहनसुहृत्सुखभूषाबन्धुभिर्विरहितः स्थितिशून्यः ।
स्थानमाश्रितमनेन हृतं स्यात् कुस्त्रियामभिरतः कुहूयोगे ॥६१॥
दुःखजीव्यनृतवागविवेकी वञ्चको मृतसुतोऽप्यनपत्यः ।
नास्तिकोऽल्पकुजनं भजतेऽसौ घस्मरो भवति पामरयोगे ॥६२॥
सुखभोगभाग्यदृढगात्रसंयुतो
निहताहितो भवति पापभीरुकः ।
प्रथितप्रधानजनवल्लभो धन-
द्युतिमित्रकीर्तिसुतवांश्च हर्षजः ॥६३॥
स्वपत्नीवियोगं परस्त्रीरतीच्छा
दुरालोकमध्वानसंचारवृत्तिः ।
प्रमेहादिगुह्यार्तिमुर्वीशपीडां
वदेद्दुष्कृतौ बन्धुधिक्कारशोकम् ॥६४॥
दीर्घायुष्मान् दृढमतिरभयः श्रीमान्विद्यासुतधनसहितः ।
सिद्धारम्भो जितरिपुरमलो विख्याताख्यः प्रभवति सरले ॥६५॥
पित्रार्जितक्षेत्रगृहादिनाशकृत्
साधून् गुरून्निन्दति धर्मवर्जितः ।
प्रत्नातिजीर्णाम्बरधृच्च दुर्गतो
निर्भाग्ययोगे बहुदुःखभाजनम् ॥६६॥
१५५
शरीरप्रयासैः कृतं कर्म यत्तत्
व्रजेन्निष्फलत्वं लघुत्वं जनेषु ।
जनद्रोहकारी स्वकुक्षिभरिः स्यात्
अजस्रं प्रवासी च दुर्योगजातः ॥६७॥
ऋणग्रस्त उग्रो दरिद्राग्रगण्यो
भवेत्कर्णरोगी च सौभ्रात्रहीनः ।
अकार्यप्रवृत्तो रसाभासवादी
परप्रेष्यकः स्याद्दरिद्राख्ययोगे ॥६८॥
किञ्चिद्व्ययो भूरिधनाभिवृद्धि
प्रयात्ययं सर्वजनानुकूल्यम् ।
सुखी स्वतन्त्रो महनीयवृत्ति
र्गुणैः प्रतीतो विमलोद्भवः स्यात् ॥६९॥
(१) यदि लग्न या लग्नेश अशुभ ग्रह से युत* या वीक्षित हो
और लग्नेश दुःस्थान में हो तो "अवयोग" होता है। जो अवयोग में
पैदा होता है उसकी स्थिति बहुत चंचल होती है। ऐसा व्यक्ति
असज्जनों के साथ रहता है; न उसका शरीर अच्छा रहता है
(शरीर में कोई न कोई रोग लगा रहे); न उसका चरित्र ही अच्छा
होता है । जातक स्वल्पायु और अप्रसिद्ध रहता है; और घोर
दरिद्रता, तथा अपमान को प्राप्त होता है।
मन्त्रेश्वर महाराज ने बहुत सुन्दर लिखा है। लग्न और लग्नेश के
बलवान् होने से सारी कुण्डली सुधर जाती है और लग्न तथा लग्नेश
के दुर्बल होने से सारी कुंडली बिगड़ जाती है, ऐसा हमारा विचार है।
- साथ रहने को युत कहते हैं । वीक्षित का अर्थ है - "देखा
जाता हो"
१५६ छठा अध्याय : योग
(२) यदि दूसरे घर का मालिक पाप ग्रह से युत वीक्षित हो या
६,८,१२ इन तीनों स्थानों में से कहीं हो और दूसरे घर में पाप ग्रह
बैठे हों या पाप ग्रह दूसरे भाव को देखते हों तो "निःस्वयोग" होता
है । जिसके पास अपना कुछ नहीं अर्थात् दरिद्री—यह "निःस्व" का
अर्थ है। ऐसे जातक के दांत और नेत्र ख़राब होते हैं। अच्छे वचन
नहीं बोलता । इसका कुटुम्ब भी विफल होता है । जिसके कुटुम्ब में
बहुत से आदमी हों वह सफल कुटुम्ब जिसके घर में स्त्री, पुत्र कन्या
आदि न हों मान लीजिये कि केवल मात्र स्त्री है तो वह विफल कुटुम्ब
हुआ । निःस्व योग वाला मनुष्य अच्छी संगति में नहीं रहता । ऐसा
व्यक्ति बुद्धि, पुत्र, विद्या और वैभव से हीन होता है । उसके धन को
शत्रु लोग हर लेते हैं ।
संक्षेप में जिन-जिन बातों का विचार दूसरे घर से किया जाता
है उन सबकी हानि होती है।
(३) यदि तृतीय स्थान का स्वामी दुःस्थान में स्थित हो और
तृतीय भवन और तृतीयेश अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हो तो 'मृति'
योग होता है। ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य शत्रुओं से पराजित, अनुचित
कर्म करने वाला, परिश्रम से खिन्न (बहुत परिश्रम करना पड़े जिसके
कारण चित्त में खेद हो) और निर्लज्ज हो । उसके बल और धन
का हरण हो जाए । और उसे भाई बहिनों का सुख न हो । ऐसे
व्यक्ति का अपने ऊपर काबू नहीं रहता । इस कारण ऐसे कर्म करता
है जिसके लिये उसे बाद में पश्चात्ताप होता है ।
(४) यदि लग्न से चौथा घर या चतुर्थेश अशुभ ग्रहों से युत या
वीक्षित हो और चतुर्थेश ६,८,१२ इन स्थानों में से किसी में हो, तो
कुहूयोग होता है। जो इस योग में उत्पन्न हो उसे माता, सवारी, मित्र,
आभूषण तथा बन्धुओं का सुख प्राप्त नहीं होता । चौथा घर सुख स्थान
कहलाता है और इस घर के बिगड़ जाने से मनुष्य सुखहीन होता
- ६, ८, १२ इन भावों को दुःस्थान कहते हैं
फलदीपिका १५७
ह । ऐसे व्यक्ति को कहीं आश्रय नही मिलता—कोई न कोई संकट
ऐसा उपस्थित हो जाता है कि अपना स्थान छोड़ना पड़ता है । ऐसा
व्यक्ति कुस्त्री (खराब औरत) में अभिरत होता है ।
संक्षेप में चौथे घर से जिन बातों का विचार किया जाता है उन
सबके कारण क्लेश उठाना पड़ता है । चौथे घर से स्त्री का विचार नहीं
किया जाता । सुख का विचार किया जाता है । कुस्त्री में रत होना
सबसे बड़े क्लेश की जड़ है ।
यद्यपि मन्त्रेश्वर महाराज ने यह
नहीं लिखा है, परन्तु हमारा अनुभव
है कि शनि यदि चौथे घर में हो और
चौथे घर का मालिक भी बिगड़ा हो
तो बुढ़ापा बहुत दरिद्रता में बीतता है ।
साथ वाली कुंडली एक ऐसे सज्जन की
है जिन्होंने विलायत की यात्रा की और
लन्दन के सुप्रसिद्ध सैवोय होटल में
ठहरे । जवानी में बड़े-बड़े बाग वाली आलीशान कोठियों में रहे परन्तु
बुढ़ापा घोर दरिद्रता में बिता रहे हैं ।
(५) यदि पंचमेश या पंचम स्थान अशुभ ग्रह
१५८ छठा अध्याय : योग
(६) यदि छठा घर अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हो और
छठे घर का मालिक दुःस्थान स्थित हो तो हर्ष योग होता है। ऐसा
व्यक्ति भाग्यवान्, दृढ़ शरीर वाला, सुखी, भोगी, शत्रुओं को पराजित
करने वाला और पाप भीरु होता है । (जो व्यक्ति पाप से डरे और
पुण्य कर्म करे उसे पाप भीरु कहते हैं। यह गुण है) ऐसा व्यक्ति
विख्यात और प्रधान व्यक्तियों का प्यारा होता है। और उसे धन, पुत्र,
मित्र का पूर्ण सुख मिलता है। हर्ष योग वाले व्यक्ति यशस्वी होते हैं
और उनके चेहरे पर शोभा रहती है ।*
(७) यदि सप्तमेश या सातवाँ घर अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित
हो और सातवें घर का मालिक दुःस्थान में पड़ा हो तो दुष्कृति योग
होता है। ऐसे व्यक्ति को सप्तम स्थान सम्बन्धी सभी कष्ट प्राप्त
होते हैं- अपनी पत्नी का वियोग (चाहे वह मर जाय चाहे उससे अलग
रहना पड़े या रोगिणी हो), दूसरे की स्त्री से रति हो, इसकी इच्छा रहे
(हृदय जलता रहे सुख की प्राप्ति न हो) कष्टमय मंज़िल (सफ़र) करनी
पड़े। जातक के बन्धु लोग उसे धिक्कारें, इस कारण उसे शोक प्राप्त
हो। राजा या सरकार से पीड़ा मिले। सप्तम स्थान से जननेन्द्रिय का
विचार किया जाता है। सप्तम भाव और सप्तमेश दोनो बिगड़े हों
तो प्रमेह (सुजाक, आतशक आदि) इन्द्रिय सम्बन्धी एक या अधिक
रोग हों ।
(८) यदि अष्टम भाव का स्वामी छठें, आठवें बारहवें घर में बैठा
हो सरल योग होता है। जो सरल योग में पैदा होता है वह दीर्घायु,
दृढ़ मति (मुस्तकिल मिज़ाज) निर्भय, लक्ष्मीवान्, विद्या, पुत्र और धन
से युत, अपने उद्योग में सफलता प्राप्त करने वाला निर्मल और शत्रुओं
- षष्ठेश दुःस्थान में हो तो भी अच्छा फल बताया और सुस्थान
में हो तो भी अच्छा फल । देखिये पृष्ठ १४९-१५० । छठे स्थान में शुभ
ग्रह हो तो भी अच्छा फल और पाप ग्रह हो तो भी अच्छा फल ।
फलदीपिका १५९
को जीतने वाला, विख्यात पुरुष होता है। मन्त्रेश्वर महाराज के विचार
से अष्टम दुःस्थान होने के कारण इसका मालिक भी यदि दुःस्थान में जावे
तो उसी प्रकार उत्तम गिना जाता है जैसे यदि अपना दुश्मन गड्ढे में
में पड़ा हुआ हो तो इसे उत्तम कहेंगे। वी० सुब्रह्मण्य शास्त्री ने टीका
करते हुए लिखा है, कि अष्टम भाव पाप ग्रह युतवीक्षित हो तो भी
'सरल' योग होता है। परन्तु हमारे विचार से अष्टम ग्रह को यदि
पाप ग्रह देखें या अष्टम में पाप ग्रह बैठें तो जिस भाव के वे स्वामी
हैं उनको तो बिगाड़ेंगे ही साथ में अष्टम भाव को भी बिगाड़ेंगे—
केवल मात्र शनि के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि अष्टम में शनि
आयु को बढ़ाता है। अष्टम में मंगल तो बहुत ही खराब है; गुदा रोग
करता है और मनुष्य को प्रायः कर्जदार रखता है। अष्टम में केतु भी
गुदा सम्बन्धी रोग देता है जैसे कांच निकलना। इन सब उदाहरणों
द्वारा हमारा अभिप्राय यह है कि अष्टमेश दुःस्थान में बैठे अर्थात् छठे
या बारह में बैठे तो सरल योग होगा किन्तु अष्टम भाव में पाप ग्रह
का बैठना उत्तम नहीं।
(९) यदि नवें भवन का स्वामी लग्न से ६, ८, या १२वें भाव में
हो और नवमेश तथा नवम गृह पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो या वहां
अशुभ ग्रह बैठे हों (या नवमेश पाप ग्रह युत वीक्षित हो) तो
“निर्भाग्य” योग होता है। जो व्यक्ति निर्भाग्य योग में पैदा
होता है वह बहुत दुःख उठाने वाला, पुराने कपड़े पहनने वाला
दुर्गति को प्राप्त होता है। नवम भाव धर्म भाव है यह बिगड़ने से
मनुष्य साधुओं की और गुरुओं की निन्दा करता है। ऐसे व्यक्ति को
जो कुछ पैत्रिक सम्पति प्राप्त होती है (घर, खेत, ज़मीन, जायदाद) वह
सब नष्ट हो जाती है।
(१०) यदि दशम में क्रूर ग्रह बैठे हों और दशमेश अशुभ ग्रहों से
वीक्षित या युत हो और वह (दशम ग्रह का मालिक) ६, ८, या बारहवें
स्थान में पड़ा हो तो “दुर्योग” होता है। जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह
१६० छठा अध्याय : योग
योग हो उस मनुष्य के द्वारा पूर्ण परिश्रम से किए हुये कार्यों में भी
सफलता प्राप्त नहीं होती। उसके प्रयास निष्फल होते हैं। ऐसा मनुष्य
प्रायः प्रवासी (घर से बाहर परदेश में) रहता है। दुर्योग में उत्पन्न
मनुष्य का आदर नहीं होता। वह और लोगों से द्रोह करता रहता
है और अपने पेट पालने की ही फिक्र में रहता है।
(११) यदि ११वें भाव का स्वामी दुःस्थान में हो तो दरिद्रयोग
होता है। हमने ऊपर अनेक स्थानों पर यह लिखा है कि भावपति
दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रह से युत वीक्षित हो तो योग
होगा। वास्तव में यह एक टीकाकार का मत है। मन्त्रेश्वर महाराज
ने ५७वें श्लोक की प्रारम्भिक दो पंक्तियों में जो शब्द उपयोग किये
हैं उनका यह अर्थ करना विशेष उपयुक्त होगा कि भावेश दुःस्थान
में हो और भावेश अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो और भाव भी
अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विविध योग होते हैं। किन्तु
इसके अपवाद हैं यदि भाव में सर्वत्र अशुभ ग्रह होने से खराब योग
बने तो एकादश भाव में पाप ग्रह के बैठने से दरिद्रयोग बनना
चाहिये ? किन्तु ज्योतिषियों का आप्त वाक्य है कि "लाभे सर्वे
प्रशस्ताः" सारावली में भी लिखा है कि
लग्नस्थाः सुखसंस्थाः दशमस्थापि कारकाः सर्वे ।
एकादशमपि केचित् वाञ्छन्ति न तन्मतं मुनीन्द्राणाम् ॥
अतः हम यही अर्थ करेंगे कि यदि एकादशेश त्रिक में हो या अशुभ
ग्रहों से युत वीक्षित हो तो दरिद्रयोग होता है। जिसकी जन्मकुण्डली
में यह योग हो वह कर्जदार, अत्यन्त दरिद्री कान की बीमारी से
तकलीफ़ पाने वाला, अच्छे भाइयों से हीन, दुष्कार्य करने वाला,
अप्रशस्त वचन बोलने वाला, दूसरे का नौकर और दुःख उठाने वाला
होता है।
(१२) यदि १२वें घर का मालिक दुःस्थान में हो और अशुभ
ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विमल योग होता है। ऐसा व्यक्ति व्यय
छठा अध्याय : योग १६१
थोड़ा करता है। उसके धन की अधिक वृद्धि होती है। ऐसा मनुष्य
सुखी, स्वतन्त्र, अपने सद्गुणों के लिये विख्यात, उत्तम कार्य करने वाला
होता है और सब व्यक्तियों के अनुकूल आचरण करता है।
ऊपर योगों मे दो बात बताई गई हैं।
(१) भावेश दुःस्थान में हों।
(२) भाव अशुभग्रह से युत वीक्षित हो।
यदि भावेश अशुभग्रह युत वीक्षित हो तो और भी दुष्ट फल
होगा।
इस फलदीपिका के टीकाकार श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने ५७वें
इलोक की टीका करते हुए लिखा है कि यदि भावेश दुःस्थान में हो
और भाव अशुभ युत वीक्षित हो। संस्कृत के मूल इलोक में जो
'अशुभ संयुक्तेक्षितैर्वा क्रमात्' यह पद आये हैं वह देहली दीपक न्याय
(अर्थात् देहली पर रक्खा हुआ दीपक—जिन दो कमरों के बीच की
देहली पर रक्खा होता है उन दोनों में प्रकाश करता है) से भावेश,
और भाव दोनों में लग सकता है अर्थात्
(i) यदि भावेश दुःस्थान में हो और अशुभग्रहों से युत वीक्षित
हो तथा भाव अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो।
(ii) यदि भावेश दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रहों से युत
वीक्षित हो।
वास्तव में सिद्धान्ततः
(१) भावेश का खराब जगह बैठना।
(२) भावेश का दुष्ट ग्रहों से युत होना।
(३) भावेश का पापग्रहों से वीक्षित होना।
(४) भाव में अशुभग्रहों का बैठना।
(५) भाव का अशुभग्रहों से देखा जाना।
यह पाँच बातें भाव को खराब करतीं हैं। जितनी अधिक खराब
ग्रह स्थिति होगी उतना ही उस भाव सम्बन्धी कष्ट होगा।
१६२ फलदीपिका
छिद्रारिव्ययनायकाः प्रबलगाः केन्द्रत्रिकोणाश्रिताः
लग्नव्योमचतुर्थभाग्यपतयः षड्रन्ध्ररिःफस्थिताः
निर्वीर्या विगतप्रभा यदि तदा दुर्योग एव स्मृत-
स्तद्व्यस्ते सति योगवान्धनपतिर्भू'पः सुखी धार्मिकः ॥७०॥
यदि षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश के स्वामी प्रबल (बलवान्) होकर
केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में हों और लग्न, चतुर्थ,
नवम तथा दशम इन चारों भवनों के स्वामी निर्वीय (बलहीन) और
अस्त (सूर्य के समीप रहने के कारण) होकर ६, ८, १२ स्थान
या स्थानों में हो तो 'दुर्योग ही होता है । अर्थात् यह खराब योग है।
यदि इससे उलटा हो अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक बलहीन हो
कर दुःस्थान में पड़ें और लग्न चतुर्थ नवम दशम के स्वामी बलवान्
पूर्ण प्रभा से युक्त (अस्त नहीं) सुस्थान में पड़ें तो ऐसा योगवाला
धनपति (लक्ष्मीवान्) राजा (अर्थात् ऐश्वर्यशाली) सुखी और
धार्मिक होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि ६,८,१२ दुःस्थान हैं। इनके स्वामी
निर्बल होने चाहियें। १,४,९,१० विशिष्ट स्थान हैं इनके स्वामी बलवान्
होने चाहियें । विष जितना थोड़ा और कमजोर हो उतना अच्छा ।
अमृत जितना अधिक और बलशाली हो उतना अच्छा । ॥७०॥
- हमारे विचार से ५७-७० स्लोकों में जो योग गनाए गए हैं।
वे प्रधानतः भावेशों से विचार करना चाहिए, भाव से भी। परन्तु
तारतम्य कर लेना चाहिए, जैसे द्वादश का स्वामी दुःस्थान में हो तो
विमल योग होगा । बारहवें भाव में अशुभ ग्रह होने से योग नहीं
होगा । हमने अपने विचार से 'तारतम्य करते हुए ग्रंथकार का अभिप्राय
वर्णन किया है।
सातवां अध्याय
राजयोग
त्र्याद्यैः खेटैः स्वोच्चगैः केन्द्रसंस्थैः स्वक्षैस्थैर्वा भूपतिः स्यात्प्रसिद्धः।
पञ्चाद्यैस्तैरन्यवंशप्रसूतोऽप्युर्वीनाथो वारणाश्वौघयुक्तः ॥१॥
यदि किसी की जन्मकुण्डली में तीन या अधिक ग्रह उच्च राशि
या स्वराशि में स्थित होते हुए केन्द्र में हों तो वह प्रसिद्ध राजा होता
है, यदि पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्वराशि या उच्चराशि में • स्थित
होकर केन्द्र में हों तो चाहे वह किसी भी वंश में पैदा हुआ हो, वह
पृथ्वी पति होता है और उसके पास हाथी और घोड़ों के झुंड रहते हैं
अर्थात् वहत वैभवशाली राजा होता है । ॥१॥
भूपाः स्युर्नृपवंशजास्तु यदि दुर्योगे न जातास्तथा
ह्यन्तर्धिर्नहि चेत्कराद्दिनकराज्जाताः स्फुरन्त्येव ते ।
त्र्याद्यैः केन्द्रगतैः स्वभोच्चसहितैर्भू पोद्भवाः पार्थिवाः
मर्त्यास्त्वन्यकुलोद्भवाः क्षितिपतेस्तुल्याः कदाचिन्नृपाः ॥२॥
यदि कोई राजा के वंश में पैदा हो और उसकी कुण्डली में कोई
दुर्योग न हो और न उसके ग्रह सूर्य के सान्निध्य के कारण अस्त हों
तो वह राजा होता है । यदि तीन या तीन से अधिक ग्रह स्वराशि या
उच्चराशि में स्थित होकर केन्द्र में हों और ऐसा जन्मकुण्डली वाला
राज वंश में उत्पन्न हो तो वह राजा होता है । किन्तु यदि किसी
साधारण वंश में उत्पन्न व्यक्ति की कुण्डली में यह योग हो तो वे राजा
१६४ फलदीपिका
के समान वैभवशाली हो जाते हैं । या कदाचित् राजा भी हो
जाँय । ॥ २ ॥
यद्येकोऽपि विराजितांशुनिकरः सुस्थानगो वक्रगो
नीचस्थोऽपि करोति भूपसदृशं द्वौ वा त्रयो वा ग्रहाः ।
एवं चेज्जनयन्ति भूपतिममी शस्तांशराशिस्थिता
स्तद्वच्चेद्बहवो नृपं समकुटच्छत्रोल्लसच्चामरम् ॥३॥
एक भी ग्रह यदि सुस्थान में हो (६,८ या १२वें भाग में न हो)
और वक्री हो (चाहे, नीच भी हो), किन्तु यदि अस्त न हो और
उज्ज्वल प्रभा से *युक्त हो तो वह राजा के सदृश वैभवशाली बना
देता है। यदि ऐसे दो या तीन ग्रह हों तो जातक राजा हो जाता है।
यदि ऐसे बहुत से ग्रह हों और वे उत्तम राशि और उत्तम नवांश में
स्थित हों तो मुकुट, छत्र और चाँवर से शोभायमान अत्यन्त वैभव-
शाली राजा होता है। हमारे विचार से राजवंश प्रसूत नरों में ही यह
योग विशेष लागू करना चाहिये । ॥३॥
द्वौ वा त्र्याद्या दिग्बलयुक्ता यदि जातः
क्ष्माभृद्वंशे भूमिपतिः स्याज्जयशीलः ।
हित्वा मन्दं पञ्चखगा दिग्बलयुक्ता-
श्चत्वारो वा भूपतिरन्यन्वयजोऽपि ॥४॥
*सूर्य के सान्निध्य के कारण ग्रहों की किरणें सूर्य प्रकाश में लय होने
से नहीं दिखाई देती उस दशा में ग्रह को अस्त कहते हैं किन्तु जब ग्रह
सूर्य से दूर होता है तो वह खूब उज्ज्वल भा पूर्ण दिखाई देता है। ऐसा
ग्रह बलवान् होता है ।
सातवाँ अध्याय : राजयोग १६५
यदि जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और उसकी कुण्डली में
दो या अधिक ग्रह दिग्बली हों जो वह राजा होता है और सर्वत्र विजय
प्राप्त करता है । सूर्य और मंगल दशम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते
हैं । बुध और बृहस्पति प्रथम भाव मध्ध में पूर्ण दिग्बली होते हैं,
चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते हैं तथा शनि
सप्तम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होता है ।
यदि शनि को छोड़कर बाकी ६ ग्रहों में से कोई से पांच दिग्बली
हों या ४ भी दिग्बली हों तो चाहे किसी भी वंश में पैदा हो (यह
ज़रुरी नहीं कि राजा के ही वंश में पैदा हो) तो राजा
होता है ॥ ४ ॥
गणोत्तमे लग्ननवांशकोद्गमे निशाकरश्चापि गणोत्तमेऽपि वा ।
चतुर्ग्रहैश्चन्द्रविवर्जितैस्तदा निरीक्षितः स्यादधमोद्भवो नृपः ॥५॥
यदि लग्न में वर्गोत्तम* नवांश हो और चन्द्रका भी वर्गोत्तम नवांश
हो और लग्न को चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य चार ग्रह देखते
हों तो ऐसा जातक चाहे अधम वंश में भी पैदा हुआ हो राजा हो
जाता है ।॥५॥
श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर की कुंडली नीचे दी जाती है। इनका जन्म
लग्नमीन है और नवांश लग्न भी मीन ही है इस कारण वर्गोत्तमलग्न
हुआ । रेवती नक्षत्र में जन्म होने के कारण मीन राशि का चन्द्रमा
था। और रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म होने के कारण चन्द्रमा
मीन नवांश में था । अतः चन्द्रमा भी वर्गोत्तम हुआ । लग्नेश बृहस्पति
*जो राशि हो वही नवांश भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है । जैसे
मेष राशि मेष नवांश वर्गोत्तम । वृषभ राशि, वृषभ नवांश वर्गोत्तम, मिथुन
राशि, मिथुन नवांश वर्गोत्तम इत्यादि ।
१६६ फलदीपिका
लग्न तथा चन्द्रमा को पूर्ण दृष्टि से देखता है। उपर्युक्त श्लोक के
अनुसार चार ग्रह तो लग्न को पूर्ण दृष्टि से नहीं देखते किन्तु जितनी
सी मात्रा में यह योग घटित होता है—उससे कहीं अधिक उच्च पदवी
उन्होंने प्राप्त की। सूर्य तथा बृहस्पति का उच्चराशि में होना भी राज
योग में सहायक हुआ। इनका जन्म ७ मई सन् १८६१ को प्रातः ४
बजकर २ मिनट पर हुआ था।
[लग्न कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१): सू., शु., बु. | भाव ३ (वृष/२) | भाव ४ (मिथुन/३): मं., के. | भाव ५ (कर्क/४): बृ. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७) | भाव ९ (वृश्चिक/८): श. | भाव १० (धनु/९): रा. | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११)]
[नवांश कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१) | भाव ३ (वृष/२): के. | भाव ४ (मिथुन/३): बु. | भाव ५ (कर्क/४): श. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७): मं., शु. | भाव ९ (वृश्चिक/८): रा. | भाव १० (धनु/९) | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११): बृ.]
नवांश में बुध और शुक्र स्वनवांश में हैं।
विलग्नेशः केन्द्रे यदि तपसि वर्गोत्तमगतः
स्वतुङ्गे स्वक्षेत्रे वा गुरुपतिरपि स्याद्यदि तथा ।
गजस्कन्धे कार्तस्वरकृतविमानेऽतिसुषमे ।
सुखासीनं भूपं जनयति लसच्चामरयुगम् ॥१६॥
यदि लग्नेश १-४-७-९-१० इन भावों में से किसी में वर्गोत्तम हो
कर पड़ा हो और नवें स्थान का स्वामी अपनी स्वराशि या उच्च-
राशि में वर्गोत्तम होकर केन्द्र या नवम में हो तो अत्यन्त वैभवशाली राजा
होता है, जो हाथी के कन्धे पर रखे हुए सोने के सुन्दर विमान में चलता
है और जिसमें दोनों ओर चंवर हिलते रहते हैं । ॥१६॥
or ्र? In the image, under ग, there is a distinct loop curling to the left: ृ. But wait, is there a repha? Yes, र्गृ. Wait, could it be भृगुर्ग्रहेन्द्रै-? If a font has र्ग्र, the ्र is a diagonal stroke, not a loop. Here it has a loop. However, whether it's भृगुर्गृहेन्द्रै- or भृगुर्ग्रहेन्द्रै-, let's look closely at गृहेन्द्रै. In line 16, look at नीचार्योर्गृहमपहाय vs नीचार्योर्गुहमपहाय.
- Wait! In line 16, look at
नीचार्योर्गृहमपहाय:
Does the letter afterर्योhave a repha?
Look at the top horizontal bar: there is a repha hook above the bar:र्!
Wait, what's onर्यो? Just the matraो. No dot! The speck is just noise or the top ofो.
Under the bar:ग.
Belowग: there is a ृ loop!
Wait, why doesनीचार्योर्गृlook so similar toभृगुर्गृ?
Because both haveर्गृ!
In line 14:भृगुर्गृहेन्द्रै-->
१६८ फलदीपिका
या नीच राशि नहीं होनी चाहिये) तो ऐसा व्यक्ति राजा
होता है । ॥८॥
भौमश्चेदजहरिचापलग्नसंस्थः
पृथ्वीशं कलयति मित्रखेटदृष्टः ।
कर्मेशो नवमगतश्च भाग्यनाथो
मध्यस्थो भवति नृपो जनैः प्रशस्तः ॥९॥
(क) यदि मंगल, मेष, सिंह या धनु राशि में स्थित होकर लग्न
में हो और उसको मित्र ग्रह देखता हो तो मनुष्य राजा होता है ।
(ख) यदि दशम स्थान का स्वामी नवम भाव में स्थित हो और
नवम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है
और सब उसकी प्रशंसा करते हैं। तात्पर्य यह है कि यह योग प्रबल-
राजयोग कारक है । ॥९॥
चापार्द्धे भगवान् सहस्रकिरणस्तत्रैव ताराधिपो
लग्ने भानुसुतेऽतिवीर्यसहितः स्वोच्चे च भूनन्दनः ।
यद्येवं भवति क्षितेरधिपतिः संश्रुत्य दूरं भयात्
त्रस्ता एव नमन्ति तस्य रिपवो दग्धाः प्रतापाग्निना ॥१०॥
यदि धनु राशि के आधे में (पन्द्रह अंश तक) सूर्य हो और वहीं
चन्द्रमा हो और लग्न में शनि* हो तथा अति बलवान् मंगल उच्च
- मन्मेश्वर महाराज ने यहां नहीं लिखा है किन्तु अन्य आचार्यों
के मत से तुला धनु मकर कुम्भ और मीन इन पांच राशियों में लग्नस्थ
शनिश्चर को प्रशस्त माना गया है ।