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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 684 में से

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पृष्ठ 167

१६६ फलदीपिका
लग्न तथा चन्द्रमा को पूर्ण दृष्टि से देखता है। उपर्युक्त श्लोक के
अनुसार चार ग्रह तो लग्न को पूर्ण दृष्टि से नहीं देखते किन्तु जितनी
सी मात्रा में यह योग घटित होता है—उससे कहीं अधिक उच्च पदवी
उन्होंने प्राप्त की। सूर्य तथा बृहस्पति का उच्चराशि में होना भी राज
योग में सहायक हुआ। इनका जन्म ७ मई सन् १८६१ को प्रातः ४
बजकर २ मिनट पर हुआ था।
[लग्न कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१): सू., शु., बु. | भाव ३ (वृष/२) | भाव ४ (मिथुन/३): मं., के. | भाव ५ (कर्क/४): बृ. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७) | भाव ९ (वृश्चिक/८): श. | भाव १० (धनु/९): रा. | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११)]
[नवांश कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१) | भाव ३ (वृष/२): के. | भाव ४ (मिथुन/३): बु. | भाव ५ (कर्क/४): श. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७): मं., शु. | भाव ९ (वृश्चिक/८): रा. | भाव १० (धनु/९) | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११): बृ.]
नवांश में बुध और शुक्र स्वनवांश में हैं।
विलग्नेशः केन्द्रे यदि तपसि वर्गोत्तमगतः
स्वतुङ्गे स्वक्षेत्रे वा गुरुपतिरपि स्याद्यदि तथा ।
गजस्कन्धे कार्तस्वरकृतविमानेऽतिसुषमे ।
सुखासीनं भूपं जनयति लसच्चामरयुगम् ॥१६॥
यदि लग्नेश १-४-७-९-१० इन भावों में से किसी में वर्गोत्तम हो
कर पड़ा हो और नवें स्थान का स्वामी अपनी स्वराशि या उच्च-
राशि में वर्गोत्तम होकर केन्द्र या नवम में हो तो अत्यन्त वैभवशाली राजा
होता है, जो हाथी के कन्धे पर रखे हुए सोने के सुन्दर विमान में चलता
है और जिसमें दोनों ओर चंवर हिलते रहते हैं । ॥१६॥