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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 684 में से

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छठा अध्याय : योग १६१

थोड़ा करता है। उसके धन की अधिक वृद्धि होती है। ऐसा मनुष्य
सुखी, स्वतन्त्र, अपने सद्गुणों के लिये विख्यात, उत्तम कार्य करने वाला
होता है और सब व्यक्तियों के अनुकूल आचरण करता है।
ऊपर योगों मे दो बात बताई गई हैं।
(१) भावेश दुःस्थान में हों।
(२) भाव अशुभग्रह से युत वीक्षित हो।
यदि भावेश अशुभग्रह युत वीक्षित हो तो और भी दुष्ट फल
होगा।
इस फलदीपिका के टीकाकार श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने ५७वें
इलोक की टीका करते हुए लिखा है कि यदि भावेश दुःस्थान में हो
और भाव अशुभ युत वीक्षित हो। संस्कृत के मूल इलोक में जो
'अशुभ संयुक्तेक्षितैर्वा क्रमात्' यह पद आये हैं वह देहली दीपक न्याय
(अर्थात् देहली पर रक्खा हुआ दीपक—जिन दो कमरों के बीच की
देहली पर रक्खा होता है उन दोनों में प्रकाश करता है) से भावेश,
और भाव दोनों में लग सकता है अर्थात्
(i) यदि भावेश दुःस्थान में हो और अशुभग्रहों से युत वीक्षित
हो तथा भाव अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो।
(ii) यदि भावेश दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रहों से युत
वीक्षित हो।
वास्तव में सिद्धान्ततः
(१) भावेश का खराब जगह बैठना।
(२) भावेश का दुष्ट ग्रहों से युत होना।
(३) भावेश का पापग्रहों से वीक्षित होना।
(४) भाव में अशुभग्रहों का बैठना।
(५) भाव का अशुभग्रहों से देखा जाना।
यह पाँच बातें भाव को खराब करतीं हैं। जितनी अधिक खराब
ग्रह स्थिति होगी उतना ही उस भाव सम्बन्धी कष्ट होगा।