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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 684 में से

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पृष्ठ 164

सातवां अध्याय
राजयोग
त्र्याद्यैः खेटैः स्वोच्चगैः केन्द्रसंस्थैः स्वक्षैस्थैर्वा भूपतिः स्यात्प्रसिद्धः।
पञ्चाद्यैस्तैरन्यवंशप्रसूतोऽप्युर्वीनाथो वारणाश्वौघयुक्तः ॥१॥
यदि किसी की जन्मकुण्डली में तीन या अधिक ग्रह उच्च राशि
या स्वराशि में स्थित होते हुए केन्द्र में हों तो वह प्रसिद्ध राजा होता
है, यदि पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्वराशि या उच्चराशि में • स्थित
होकर केन्द्र में हों तो चाहे वह किसी भी वंश में पैदा हुआ हो, वह
पृथ्वी पति होता है और उसके पास हाथी और घोड़ों के झुंड रहते हैं
अर्थात् वहत वैभवशाली राजा होता है । ॥१॥
भूपाः स्युर्नृपवंशजास्तु यदि दुर्योगे न जातास्तथा
ह्यन्तर्धिर्नहि चेत्कराद्दिनकराज्जाताः स्फुरन्त्येव ते ।
त्र्याद्यैः केन्द्रगतैः स्वभोच्चसहितैर्भू पोद्भवाः पार्थिवाः
मर्त्यास्त्वन्यकुलोद्भवाः क्षितिपतेस्तुल्याः कदाचिन्नृपाः ॥२॥
यदि कोई राजा के वंश में पैदा हो और उसकी कुण्डली में कोई
दुर्योग न हो और न उसके ग्रह सूर्य के सान्निध्य के कारण अस्त हों
तो वह राजा होता है । यदि तीन या तीन से अधिक ग्रह स्वराशि या
उच्चराशि में स्थित होकर केन्द्र में हों और ऐसा जन्मकुण्डली वाला
राज वंश में उत्पन्न हो तो वह राजा होता है । किन्तु यदि किसी
साधारण वंश में उत्पन्न व्यक्ति की कुण्डली में यह योग हो तो वे राजा