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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 684 में से

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पृष्ठ 157

१५६ छठा अध्याय : योग
(२) यदि दूसरे घर का मालिक पाप ग्रह से युत वीक्षित हो या
६,८,१२ इन तीनों स्थानों में से कहीं हो और दूसरे घर में पाप ग्रह
बैठे हों या पाप ग्रह दूसरे भाव को देखते हों तो "निःस्वयोग" होता
है । जिसके पास अपना कुछ नहीं अर्थात् दरिद्री—यह "निःस्व" का
अर्थ है। ऐसे जातक के दांत और नेत्र ख़राब होते हैं। अच्छे वचन
नहीं बोलता । इसका कुटुम्ब भी विफल होता है । जिसके कुटुम्ब में
बहुत से आदमी हों वह सफल कुटुम्ब जिसके घर में स्त्री, पुत्र कन्या
आदि न हों मान लीजिये कि केवल मात्र स्त्री है तो वह विफल कुटुम्ब
हुआ । निःस्व योग वाला मनुष्य अच्छी संगति में नहीं रहता । ऐसा
व्यक्ति बुद्धि, पुत्र, विद्या और वैभव से हीन होता है । उसके धन को
शत्रु लोग हर लेते हैं ।
संक्षेप में जिन-जिन बातों का विचार दूसरे घर से किया जाता
है उन सबकी हानि होती है।
(३) यदि तृतीय स्थान का स्वामी दुःस्थान में स्थित हो और
तृतीय भवन और तृतीयेश अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हो तो 'मृति'
योग होता है। ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य शत्रुओं से पराजित, अनुचित
कर्म करने वाला, परिश्रम से खिन्न (बहुत परिश्रम करना पड़े जिसके
कारण चित्त में खेद हो) और निर्लज्ज हो । उसके बल और धन
का हरण हो जाए । और उसे भाई बहिनों का सुख न हो । ऐसे
व्यक्ति का अपने ऊपर काबू नहीं रहता । इस कारण ऐसे कर्म करता
है जिसके लिये उसे बाद में पश्चात्ताप होता है ।
(४) यदि लग्न से चौथा घर या चतुर्थेश अशुभ ग्रहों से युत या
वीक्षित हो और चतुर्थेश ६,८,१२ इन स्थानों में से किसी में हो, तो
कुहूयोग होता है। जो इस योग में उत्पन्न हो उसे माता, सवारी, मित्र,
आभूषण तथा बन्धुओं का सुख प्राप्त नहीं होता । चौथा घर सुख स्थान
कहलाता है और इस घर के बिगड़ जाने से मनुष्य सुखहीन होता

  • ६, ८, १२ इन भावों को दुःस्थान कहते हैं