फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
११६ फलदीपिका
से द्वितीय में कोई शुभ ग्रह नहीं हो और लग्न से द्वादश में हो तो
कोई योग नहीं होता। इसका कारण यह है कि द्वादश अनिष्ट स्थान
माना गया है। ॥ ८ ॥
जातः स्यात् सुभगः सुखी गुणनिधिर्धीरो नृपो धार्मिको
विख्यातः सकलप्रियोऽतिसुभगो दाता महीशप्रियः ।
चार्वङ्गः प्रियवाक्प्रपञ्चरसिको वाग्मी यशस्वी धनी
विद्यादत्र सुवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥ ९ ॥
जो व्यक्ति शुभवेसि योग में उत्पन्न हो वह देखने में सुन्दर, सुखी,
गुणनिधि, धीर, धार्मिक और अनेक व्यक्तियों पर हुकूमत करने वाला
होता है। जो व्यक्ति सुवासि योग में उत्पन्न हो वह अति सुन्दर, दाता,
राजा का प्रिय (अच्छे ओहदे वाला) और विख्यात हो; उसको सब लोग
चाहें। जो व्यक्ति शुभ उभयचरी योग में उत्पन्न हो वह वाग्मी (अच्छा
बोलने वाला-वक्ता) प्रिय वचन बोलने वाला यशस्वी और धनी होता
है। उसके सब अंग मनोहर होते हैं और सबको प्रसन्न करने वाला होता
है ॥ ९ ॥
अन्यायाज्जननिन्दको हतरुचिर्हीनप्रियो दुर्जनो
मायावी परनिन्दकः खलयुतो दुर्वृत्तशास्त्राधिकः ।
लोके स्यादपकीर्तिदुःखितमना विद्यार्थभाग्यैश्च्युतो
जातश्चाशुभवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥१०॥
जो व्यक्ति पापवेसि में पैदा हो वह अन्याय से दूसरों की निन्दा
करे। कान्तिहीन हो, छोटे आदमी की सोहबत करे और स्वयं दुर्जन हो
पापवेसि या अशुभवेसि एक ही बात है।
छठा अध्याय : योग ११७
जो* अशुभवासि में उत्पन्न होता है वह भी दूसरों की निन्दा करने
वाला, मायावी, दुष्टों का मित्र, स्वयं दुराचरण करने वाला लेकिन
शास्त्रों की दुहाई देने वाला हो । जो अशुभ उभयचरी योग में उत्पन्न
होते हैं वे विद्याहीन, भाग्यहीन, धनहीन रहते हैं। उनका चित्त सदैव
दुःखित रहता है और उन्हें अपकीर्ति (निन्दा) प्राप्त होती है।
जैवातृको विभयरोगरिपुः सुखी स्या-
दाढ्यः श्रिया च शुभकर्तरियोगजातः ।
निःस्वोऽशुचिर्विसुखदारसुतोऽङ्गहीनः
स्यात्पापकर्तरिभवोऽचिरमायुरेति ॥ ११ ॥
जो व्यक्ति शुभ कर्त्री योग में उत्पन्न होता है वह दीर्घायु, सुखी
लक्ष्मीवान् और वैभव से युक्त होता है। उसे शत्रुओं तथा रोगों से
भय नहीं होता अर्थात् न तो उसके शत्रु होते हैं न रोग होते हैं। किन्तु
जो पाप कर्त्री में पैदा होते हैं वह दरिद्र, अपवित्र, दुःखी अंगहीन,
अल्पायु, भार्यारहित, पुत्ररहित होते हैं; संक्षेप में यह है कि शुभ कर्त्री
का शुभ फल है और पाप कर्त्री का पापफल है। यह आवश्यक नहीं
कि सब लक्षण अक्षरशः मिलें, भावार्थ लेना चाहिये ॥ १ ॥
आचारवान् धर्ममतिः प्रसन्नः
सौभाग्यवान् पार्थिवमाननीयः ।
मृदुस्वभावः स्मितभाषणश्च
धनी भवेच्चामलयोगजातः ॥ १२ ॥
- अशुभवासि और पापवासि एक ही बात है।
११८ फलदीपिका
जो अमला योग में पैदा होता है, वह आचारवान् धर्म में मति
रखने वाला, प्रसन्न, सौभाग्यवान्, राजा द्वारा सम्मानित, मृदु स्वभाव
का, मुस्कराकर बोलने वाला और धनी होता है। ॥ १२ ॥
सुशुभे शुभकर्तर्यां वेस्यादौ सुनभादिवत् ।
शुभैः क्रमात्फलं ज्ञेयं विपरीतमसद्ग्रहैः ॥ १३ ॥
सुशुभ, शुभकर्त्री और शुभवेसि का फल, सुनफा आदि योगों के
ही समान समझना चाहिये अर्थात् सुवेसि और सुशुभ का वही फल
समझे जो सुनफा का और शुभवासि का वही फल समझना
चाहिये जो अनफा का। शुभ उभयचरी का फल दुरुधरा के समान
समझना चाहिये। सूर्य के (१) आगे की राशि में (२) पीछे की
राशि में (३) तथा दोनो ओर की राशियों में शुभ ग्रह होने से ही
शुभ फल बताया है। यदि पाप ग्रह यह योग करें तो अशुभ फल समझना
चाहिये। अर्थात् शुभवेसि आदि का जो फल बताया है उससे
बिल्कुल उलटा । ॥ १३ ॥
ओजेष्वर्केन्दुलग्नान्यजनि दिवि पुमांश्चेन्महाभाग्ययोगः
स्त्रीणान्तद्व्यत्ययेस्याच्छशिनि सुरगुरोः केन्द्रगे केसरीति ।
जीवान्त्याष्टारिसंस्थे शशिनि तु शकटः केन्द्रगे नास्ति लग्ना-
च्चन्द्रे केन्द्रादिगेऽर्कादधमसमवरिष्ठाख्ययोगाः प्रसिद्धाः ॥१४॥
- ऊपर सुनफा, अनफा, दुरुधरा, केमद्रुम, सुवेसि, सुवासि, शुभ
उभयचरी, पापवेसि, पापवासि, शुभ कर्त्री, पापकर्त्री और सुशुभ केवल
इन योगों के लक्षण बताये गये हैं, अमला योग का लक्षण अभी तक
मूल में नहीं आया है ।
छठा अध्याय : योग १११
(क) यदि पुरुष की कुंडली हो और निम्नलिखित चारों योग
उस कुण्डली में हों तो महाभाग्य योग होता है । (१) दिन में जन्म
हो अर्थात् सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त के पहले । (२) लग्न
ऊनी*—विषम राशि का हो (३) सूर्य विषम राशि का हो (४)
चन्द्रमा भी विषम राशि में हो । स्मरण रहे पुरुष की कुण्डली में चारों
योग होंगे तभी महाभाग्य होगा । यदि एक भी बात की कमी हुई
तो योग नहीं होगा ।
अब यह बताते हैं कि स्त्री की कुण्डली में महाभाग्य योग के लिये
क्या-क्या बातें जरूरी हैं:—
(१) रात्रि में जन्म हो अर्थात् सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय के
पहले । (२) सम लग्न हो (३) सम राशि में चन्द्रमा हो (४) सम
राशि में सूर्य हो । इन चारों बातों का रहना आवश्यक है तभी कन्या
की कुण्डली महाभाग्य योगवाली कहलावेगी ।
(ख) अब दूसरे योग बताते हैं चाहे स्त्री की कुण्डली हो चाहे
पुरुष की कुण्डली हो निम्नलिखित योग दोनो में एक ही प्रकार से लागू
होंगे । यदि चन्द्रमा बृहस्पति से केन्द्र में हो तो इसको केसरी योग
कहते हैं । बहुत से ज्योतिष ग्रन्थों में इस योग का नाम गज केसरी योग
भी है ।
(ग) यदि चन्द्रमा से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में बृहस्पति
हो तो शकट योग होता है किन्तु यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो तो
शकट योग नहीं होता ।
(घ) यदि सूर्य से केन्द्र में चन्द्रमा हो तो अधम योग होता है ।
- १, ३, ५, ७, ९, ११, यह ऊनी राशियां हैं, २, ४, ६, ८, १०,
१२ यह पूरी (सम) राशियां हैं ।
१ से मेष, २ से वृष, ३ से मिथुन, ४ से कर्क इसी प्रकार समझना
चाहिये ।
१२० फलदीपिका
(ङ) यदि सूर्य से पणफर स्थान में चन्द्रमा हो तो सम योग
होता है।
(च) यदि सूर्य से तृतीय, षष्ठ, नवम या द्वादश स्थान में चन्द्रमा
हो तो वरिष्ठ योग होता है।
अब आगे के श्लोकों में उपर्युक्त छः योगों का पृथक्-पृथक्
फल बताते हैं।
महाभाग्ये जातः सकलनयनानन्दजनको
वदान्यो विख्यातः क्षितिपतिरशीत्यायुरमलः।
वधूनां योगेऽस्मिन् सति धनसुमाङ्गल्यसहिता
चिरं पुत्रैः पौत्रैः शुभमुपगता सा सुचरिता ॥ १५ ॥
जो व्यक्ति महाभाग्य योग में उत्पन्न होता है वह सबके नेत्रों को
आनन्द देने वाला, उदार, विख्यात, निर्मल चरित्र का, भूमि का स्वामी,
राजा के समान ऐश्वर्य शाली होता है। जिन स्त्रियों की कुण्डलियों में
यह योग हो वह उत्तम चरित्र की, सौभाग्य शालिनी, धनवती होती हैं।
पति, पुत्र, पौत्रों का सुख उन्हें चिरकाल तक प्राप्त होता है और
सदैव सौभाग्यवती रहती हैं। ॥ १५ ॥
केसरीव रिपुवर्गनिहन्ता प्रौढवाक् सदसि राजसवृत्तिः ।
दीर्घजीव्यतियशाः पटुबुद्धिस्तेजसा जयति केसरियोगे ॥ १६ ॥
अब केसरी योग का फल बताते हैं। जो व्यक्ति केसरी योग में
उत्पन्न होता है वह केसरी (शेर) की तरह अपने शत्रुवर्गों को
नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति सभाओं में प्रौढ़ (जिसका वाणी पर
आधिपत्य हो, किसी विषय पर गम्भीरतापूर्वक और अधिकार से बोलना
छठा अध्याय : योग १२१
प्रौढ़ भाषण कहलाता है) भाषण करने वाला, राजसवृत्ति* का होता
है। ऐसा व्यक्ति दीर्घायु हो। बहुत उसकी तीव्र बुद्धि हो, महान्
यश प्राप्त करे और अपने स्वाभाविक तेज से ही ओरों को जीत
ले । ।। १६ ।।
क्वचित्क्वचिद्भाग्यपरिच्युतः सन् पुनः पुनः सर्वमुपैति भाग्यम्।
लोकेऽप्रसिद्धोऽपरिहार्यमन्तः शल्यं प्रपन्नः शकटेऽतिःदुखी ॥१७॥
अब शकट योग का फल बताते हैं। शकट योग में उत्पन्न व्यक्ति
अत्यन्त दुःखी होता है, इसके हृदय मे ऐसा दुःख का काँटा लगा हुआ
होता है कि उससे छुटकारा पाना कठिन है। ऐसा व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त
नहीं कर सकता और साधारण जीवन व्यतीत करेगा। कभी-कभी ऐसे
व्यक्ति का सितारा बहुत तेज हो जाता है और कभी सितारा बिलकुल
गिर जाता है। इसी कारण कहा है कि कभी-कभी भाग्य से हीन हो
जाय और फिर भाग्य को प्राप्त हो।
साथ ही कुण्डली में चन्द्रमा से छठे बृहस्पति होने के कारण शकट
योग होना चाहिये था परन्तु केन्द्र में चन्द्र होने से नहीं हुआ।
माननीय स्वर्गवासी पंडित
जवाहरलाल जी की जन्म कुण्डली।
प्रयाग में १४ नवम्बर सन् १८८९
को सूर्योदय से ४१ घड़ी ३८ पल
पर जन्म हुआ।
जन्म कुण्डली विवरण:
-
लग्न (प्रथम भाव - ४ कर्क): चं. (चन्द्र)
-
द्वितीय भाव (५ सिंह): श. (शनि)
-
तृतीय भाव (६ कन्या): मं. (मंगल)
-
चतुर्थ भाव (७ तुला): शु. बु. (शुक्र, बुध)
-
पंचम भाव (८ वृश्चिक): सू. (सूर्य)
-
षष्ठ भाव (९ धनु): बृ. के. ह. (बृहस्पति, केतु, हर्षल)
-
सप्तम भाव (१० मकर): रिक्त
-
अष्टम भाव (११ कुम्भ): रिक्त
-
नवम भाव (१२ मीन): रिक्त
-
दशम भाव (१ मेष): रिक्त
-
एकादश भाव (२ वृष): रिक्त
-
द्वादश भाव (३ मिथुन): रा. (राहु)
-
रजोगुण प्रधान कार्य, शान, शौकत आदि।
१२२ फलदीपिका
एक अन्य स्थान पर यह भी लिखा है कि चन्द्रमा से ३, ६, १०, ११, में
शुभ ग्रह हो तो वसुमान् योग होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में
शुभ ग्रह होने से अतिवसुमान योग होता* है, इसी प्रकार लिखा है
कि यदि चन्द्रमा से ६, ७, ८ में सौम्य ग्रह हों तो बहुत उत्तम योग
होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी-किसी योग में गुण और
अवगुण दोनों होते हैं। साथ की कुण्डली में चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों
ग्रह बलवान् हैं और अपने-अपने घर के हैं। इस कारण शुभ फल करेंगे
ही। ॥ १७ ॥
अब अधम, सय और वरिष्ठ योग का फल बताते हैं:—
(क) यदि अधम योग में उत्पन्न हो तो द्रव्य, सवारी, यश, सुख,
सम्पत्ति, ज्ञान, बुद्धि, विनय, निपुणता, विद्या, उदारता और सुख योग,
इनका बहुत कम फल प्राप्त हो।
स्व० जयनारायण जी व्यास (जो कभी जोधपुर के चीफ मिनिस्टर
रहे और पदच्युत हो गये, कभी राजस्थान के चीफ मिनिस्टर रहे और
पदच्युत हो गये) की जन्मकुण्डली में शकट योग है। इस कारण
जीवन में अनेक चढ़ाव-उतार देखने पड़े।
श्री जयनारायण जी व्यास का जन्म विक्रम संवत् १९५५ में माघ
कृष्ण नवमी शनिवार को सूर्योदय के १२ घड़ी ४८ पल पर हुआ।
+---------------+---------------+---------------+---------------+
| २ चं. | १२ | ११ | |
| | | सू. | |
+---------------+---------------+---------------+ १० बु. |
| | | |
| मं. के. | १ +---------------+
| ३ | | |
+---------------+ | ९ शु. रा. |
| +---------------+---------------+ |
| ४ | | |
+---------------+ ७ बृ. | श. ८ |
| ५ | ६ | | |
+-------+-------+---------------+---------------+---------------+
(कुण्डली विवरण: लग्न १; द्वितीय भाव २ चं.; तृतीय भाव ३ मं. के.; चतुर्थ भाव ४; पञ्चम भाव ५; षष्ठ भाव ६; सप्तम भाव ७ बृ.; अष्टम भाव श. ८; नवम भाव ९ शु. रा.; दशम भाव १० बु.; एकादश भाव ११ सू.; द्वादश भाव १२)
- बृहज्जातक अध्याय १३, श्लोक ९। तथा बृहज्जातक अध्याय
१३, श्लोक २।
छठा अध्याय : योग १२३
कष्टमध्यमवराह्वययोगे द्रव्यवाहनयशः सुखसंपत् ।
ज्ञानधीविनयनैपुणविद्यात्यागभोगजफलान्यपि तद्वत् ॥ १८ ॥
(ख) यदि सम योग में जन्म हो तो ऊपर जो बातें बतायी
गई हैं उनका मध्यम सुख प्राप्त हो।
(ग) यदि वरिष्ठ योग में जन्म हो तो ऊपर बतायी गई सब बातों
का श्रेष्ठ फल प्राप्त हो अर्थात् द्रव्य, सुख आदि प्रचुर मात्रा में मिलें।
चन्द्राद्वा वसुमांस्तथोपचयगैर्लग्नात्समस्तैः शुभै-
श्चन्द्राद्व्योम्यमलाह्वयः शुभखगैर्योगो विलग्नादपि ।
जन्मेशे सहिते विलग्नपतिना केन्द्रेऽधिमित्रर्क्षगे
लग्नं पश्यति कश्चिदत्र बलवान्योगो भवेत्पुष्कलः ॥ १९ ॥
तिष्ठेयुः स्वगृहे सदा वसुमति द्रव्याण्यनल्पान्यपि
क्ष्मेशः स्यादा मले धनी सुतयशः संपद्युतो नीतिमान् ।
श्रीमान् पुष्कलयोगजो नृपवरैः सम्मानितो विश्रुतः
स्वाकल्पाम्बरभूषितः शुभवचाः सर्वोत्तमः स्यात्प्रभुः ॥२०॥
इस श्लोक में चार योग बताये गये हैं, वसुमान्, अमला और
पुष्कल। इन्हीं की क्रमशः व्याख्या करते हैं—
(१) यदि समस्त शुभग्रह लग्न से गिनने पर ३, ६, १०, ११ इन
स्थानों में हों (यह लाज़मी नहीं कि एक तीसरे में, एक छठे, एक
दसवें में एक ग्यारहवें में हो—सब ग्रह उपचय* स्थान में हों यह
आवश्यक है) तो वसुमान् योग होता है।
- लग्न से ३, ६, १०, ११—इन स्थानों को उपचय स्थान
कहते हैं ।
१२४ फलदीपिका
(२) यदि, चन्द्रमा जिस राशि में है, उस राशि से उपचय राशि
में—(अर्थात् तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें इन राशियों में सब शुभग्रह
हों—चाहें किसी राशि में एक या अधिक शुभग्रह हों—परन्तु ३, ६,
१०, ११ इन्हीं चारों राशियों में सब शुभग्रह—बुध, बृहस्पति, शुक्र
हों तो भी वसुमान् योग होता है।
(३) यदि लग्न या चन्द्रमा से दशम में शुभ ग्रह हो तो अमला
योग होता है।
(४) यदि लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हैं उनके
स्वामी एक साथ केन्द्र में हों और किसी अधिमित्र के घर में हों और
कोई बलवान् ग्रह लग्न को देखे तो पुष्कल योग होता है।
ऊपर जो चार योग बताये हैं उनका क्रमशः फल बताते हैं।
(१) जो वसुमान् योग में पैदा होता है वह सदैव अपने घर में
रहेगा और उसके पास बहुत द्रव्य होगा। पहले समय में परदेश में
रहना कष्ट का लक्षण और अपने घर में रहना सुख का लक्षण समझा
जाता था।
(२) जो अमला योग में उत्पन्न हो वह भूमि का स्वामी, धनी,
नीतिज्ञ, पुत्र और सम्पत्ति से युक्त, यशस्वी हो।
(३) जो पुष्कल योग में उत्पन्न हो वह राजाओं द्वारा सम्मानित
किया जावे, धनी और प्रसिद्ध हो, उत्तम वस्त्र और आभूषण धारण
करे। शुभ वाणी बोले, बहुतों का मालिक हो और श्रेष्ठ पदवी को
प्राप्त हो।
सर्वे पञ्चसु षट्सु सप्तसु शुभा मालाश्च पङ्क्त्या स्थिता
यद्येवं मृतिषड्व्ययादिषु गृहेष्वत्राशुभाख्याः स्मृताः।
स्वक्षोच्चे यदि कोणकण्टकयुतौ भाग्येशशुक्रावुभौ
लक्ष्म्याख्योऽथ तथाविधे हिमकरे गौरीति जीवेक्षिते ॥२१॥
छठा अध्याय : योग १२५
जनाधिकारी क्षितिपालशस्तो भोगी प्रदाता परकार्यकर्ता ।
बन्धुप्रियः सत्सुतदारयुक्तो धीरः सुमालाह्वययोगजातः ॥२२॥
कुमार्गयुक्तोऽशुभमालिकाख्ये दुःखी परेषां वधकृत् कृतघ्नः ।
स्यात्कातरो भूसुरभक्तिहीनो लोकाभिशप्तः कलहप्रियः स्यात् ॥२३॥
नित्यं मङ्गलशीलया वनितया क्रीडत्यरोगी धनी
तेजस्वी स्वजनान् सुरक्षति महालक्ष्मीप्रसाहालयः ।
श्रेष्ठान्दोलिकया प्रयाति तुरगस्तम्बेरमध्यासितो
लोकानन्दकरो महोपतिवरो दाता च लक्ष्मीभवः ॥२४॥
सुन्दरगात्रः इलाघितगोत्रः पार्थिवमित्रः सद्गुणपुत्रः ।
पङ्कजवक्त्रः संस्तुतनेत्रो राजति गौरीयोगसमुत्थः ॥ २५ ॥
इन श्लोकों में चार योग बताये हैं । शुभ माला, अशुभ माला,
लक्ष्मी और गौरी । इन चारों योगों को क्रमशः बताते हैं ।
(१) यदि सब ग्रह पंक्ति से पांचवें, छठे, सातवें घरों में हों तो
शुभ माला योग होता है ।
(२) यदि समस्त ग्रह छठे, आठवें, बारहवें इन स्थानों में क्रम से
हों तो अशुभ माला योग होता है ।
(३) यदि नवें स्थान का स्वामी और शुक्र दोनों अपने घर में या
उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो लक्ष्मी
योग होता है ।
(४) यदि चन्द्रमा स्वराशि या उच्चराशि का होकर लग्न से केन्द्र
१२६ फलदीपिका
या त्रिकोण में हो और बृहस्पति उसे देखता हो तो गौरी योग
होता है।
जो व्यक्ति सुमाला या शुभमाला योग में उत्पन्न होता है वह अनेक
व्यक्तियों पर अधिकार रखने वाला भोगी, दाता, बन्धुप्रिय, उत्तम स्त्री
पुत्रों से युक्त और धीर हो। और राजा द्वारा प्रशंसित या सम्मानित
हो। ऐसा व्यक्ति 'परकार्यकर्ता' हो। 'परकार्यकर्ता' शब्द के दो अर्थ
हैं। दूसरे का कार्य करने वाला अर्थात् नौकरी पेशा हो। इस शब्द का
दूसरा अर्थ हो सकता है दूसरे का उपकार करने वाला।
जो अशुभ मालिका योग में उत्पन्न होते हैं वे दूसरों का वध करने
वाले, कृतघ्न, कलहप्रिय (झगड़ालू) और कुमार्गगामी होते हैं। ऐसे
लोग कायर होते हैं और लोग उनकी निन्दा करते हैं। ऐसे व्यक्ति
ब्राह्मणों का (या बड़ों का) सम्मान नहीं करते और दुःख उठाते हैं।
जो लक्ष्मी योग में उत्पन्न होता है वह अच्छे स्वभाव वाली स्त्री
के साथ नित्य क्रीड़ा करता है। ऐसा व्यक्ति तेजस्वी होता है। अपने
आदमियों की अच्छी प्रकार रक्षा करने में समर्थ होता है और लक्ष्मी
का कृपा पात्र बनता है। लक्ष्मी की कृपा पात्र होने का अर्थ है धनी
होना। ऐसा व्यक्ति नीरोग रहे। घोड़ा, हाथी, पालकी की सवारी उसे
प्राप्त हो। सब लोगों के लिये आनन्द कारक हो। उसकी दानवीरता की
प्रशंसा हो और पृथ्वी का श्रेष्ठ स्वामी हो। संक्षेप में लक्ष्मी योग
उत्तम राज योग माना गया है।
जो गौरी योग में उत्पन्न हो वह सुन्दर शरीर वाला, राजा का
मित्र, सद्गुणों और पुत्रों से युक्त, शत्रुओं को जीतने वाला, प्रशंसित
हो। उसकी वंश की सब लोग प्रशंसा करें और उसका मुख कमल
के समान हो। संक्षेप में, इसे भी बहुत शुभ योग माना गया है।
शुक्रवाक्पतिसुधाकरात्मजैः केन्द्रकोणसहितैर्द्वितीयगैः ।
स्वोच्चमित्रभवनेषु वाक्पतौ वीर्यगे सति सरस्वतीरिता ॥ २६ ॥
छठा अध्याय : योग १२७
धीमन्नाटकगद्यपद्यगणनालङ्कारशास्त्रेष्वयं
निष्णातः कविताप्रबन्धरचनाशास्त्रार्थपारंगतः ।
कीर्त्याक्रान्तजगत्तत्रयोऽतिधनिको दारात्मजैरन्वितः
स्यात् सारस्वतयोगजो नृपवरैः संपूजितो भाग्यवान् ॥२७॥
इन श्लोकों में "सरस्वती" योग तथा उसका फल बताते हैं ।
यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) कोण (५,
९) या द्वितीय स्थान में हों और बृहस्पति स्वराशि मित्र राशि या
उच्च राशि में बलवान् हो तो 'सरस्वती' योग होता है । साथ में पूज्य
स्वामी करपात्री जी महाराज की
जन्मकुण्डली दी जाती है। इनका
जन्म उत्तरप्रदेश में प्रतापगढ़ में ११
अगस्त सन् १९०७ को हुआ । इसमें
बुध, वृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र में
हैं और वृहस्पति उच्च राशि का
बलवान् है। बृहस्पति के ५ अंश हैं
और वह परमोच्च है उसे केन्द्र
[कुण्डली विवरण]:
- भाव १ (मेष): लग्न
- भाव २ (वृष)
- भाव ३ (मिथुन): रा.
- भाव ४ (कर्क): शु, सू. ४, बु, बृ.
- भाव ५ (सिंह): ५ चं.
- भाव ६ (कन्या): ६
- भाव ७ (तुला): ७
- भाव ८ (वृश्चिक): ८
- भाव ९ (धनु): ९ मं के
- भाव १० (मकर): १०
- भाव ११ (कुम्भ): ११
- भाव १२ (मीन): श १२
बल प्राप्त है तथा पूर्ण दिक्बल भी प्राप्त है। इस प्रकार बृहस्पति के
पूर्ण बलवान् होने से बहुत उत्तम रूप से 'सरस्वती' योग घटित
होता है ।
अब सरस्वती योग का फल बताते हैं । जिस व्यक्ति की जन्म-
कुण्डली में सरस्वती योग हो वह बहुत बुद्धिमान्, नाटक, गद्य, पद्य
(काव्य) अलंकार शास्त्र तथा गणित शास्त्र में महान् पटु और विद्वान्
होता है। काव्य रचना, प्रबन्ध (सुन्दर लेख या सुन्दर पुस्तक लेखन)
तथा शास्त्रार्थ में भी ऐसा व्यक्ति पारंगत (पूर्ण पंडित) होता है।
तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। अति धनी होता है । स्त्री
=भार्गव! And before भार्गवis:तद्वद्! So it is: तद्वद्+भार्गव! Wait, look at how तद्वद्is written:त द्व द्ThenभाThenर्गThenव! Wait, but let's count the syllables: त(1)द्वद्(2) - 'द्' is a consonant coda of 'द्वद्'! It is NOT a syllable!भा(3)र्ग(4)व(5) YES!तद्वद्is TWO syllables:त(short, but followed by conjunct so heavy),द्वद्(heavy)! Thenभार्(heavy),ग(short),व` (short)!
Let's check the meter:
Shardulavikridita begins with Ma-gana: - - -
तद्(-)वद्(-)भार्(-)
Three heavy syllables! That is EXACTLY Ma-gana (-- -)!
Then Sa-gana: . . -ग(.)व(.)भाग्(-)
Two light, one heavy! That is EXACTLY Sa-gana (. . -)!
Then Ja-gana: . -
छठा अध्याय : योग १२९
हैं। श्रीकंठ शिव को और विरञ्चि ब्रह्मा को। इन्हीं तीनों के नाम से
यह तीन योग लिखे गये हैं।
(१) यदि लग्न का स्वामी, सूर्य और चन्द्रमा अपनी स्वराशि
मित्रराशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में
स्थित हों तो श्रीकंठ योग होता है।
(२) यदि बुध, शुक्र और भाग्यस्थान का स्वामी यह तीनों
उच्चराशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर, लग्न से केन्द्र या
त्रिकोण में हों तो श्रीनाथ योग होता है ।
(३) यदि पञ्चम का स्वामी, बृहस्पति और शनि ये तीनों उच्च-
राशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण
में हों तो विरञ्चि योग होता है ।
(१) जो व्यक्ति श्रीकंठ योग में पैदा होता है वह रुद्राक्ष धारण
करने वाला, विभूति लगाने से शरीर की धवल कान्ति वाला महात्मा,
सदैव भगवान् शंकर का ध्यान करने वाला, धार्मिक और सदाचार के
नियमों को अच्छी तरह पालन करने वाला, भगवान् शिव के सम्प्रदाय
में दीक्षित होता है। ऐसा व्यक्ति साधु लोगों का उपकार करता है।
और दूसरे धार्मिक सम्प्रदायों से न द्वेष करता है न ईर्षा करता है। ऐसा
व्यक्ति सतत शिवाराधन से सुप्रसन्न और तेजस्वी होता है। यह समस्त
लक्षण श्रीकंठ योग वाले व्यक्ति में पाये जायेंगे
टिप्पणी:—यदि तीनों योग कारक ग्रह उच्च हों तो पूर्ण फल
होगा। यदि स्वराशि के हों तो उससे न्यून फल और यदि मित्र राशि
के हों तो उससे भी न्यून फल समझना चाहिये। चतुर्थ अध्याय में जो
- मूल श्लोक में आत्मप शब्द आया है। इसका अर्थ है आत्म-
स्थान का स्वामी, अध्याय १ श्लोक १२ में यह लिखा है कि आत्मा का
विचार पंचम स्थान से करे, इस कारण आत्मप शब्द का अर्थ पञ्चमेश
किया है।
१३० फलदीपिका
ग्रहों का बल निकालना बताया गया है उसके अनुसार सूर्य, चन्द्र और
लग्नेश जितने अधिक बली होंगे उतना ही अधिक विशिष्ट फल होगा ॥२९॥
(२) जो व्यक्ति श्रीनाथ योग में उत्पन्न होगा वह लक्ष्मीवान्
(धनी), सरस* वचन बोलने वाला (अर्थात् जिसके वचन, वाणी, लेख
या उक्ति में सरसता हो) अपने वचनों से दूसरों को प्रसन्न करने में
निपुण, भगवान् नारायण के चिह्नों से (शंख, चक्र आदि) से चिह्नित
होता है । ऐसे व्यक्ति अन्य सज्जनों के साथ सदैव भगवान् नारायण
सम्बन्धी हृद्य (हृदय को आनन्द देने वाले) स्तोत्रों या नामावली,
का संकीर्तन करते रहते हैं । जो लोग विष्णु भक्त होते हैं उनका ये
लोग बहुत प्रसन्न हृदय से आदर करते हैं । जो लोग श्रीनाथ योग में
उत्पन्न होते हैं वे स्वयं बड़े सुन्दर होते हैं और उनके दर्शन कर अन्य
लोगों के, नेत्रों को भी बहुत आनन्द प्राप्त होता है । ऐसे व्यक्तियों को
अच्छे पुत्रों का और स्त्री का पूर्ण सुख प्राप्त होता है । ॥ ३० ॥
(३) अब विरञ्चि योग में उत्पन्न जातक का फल बताते हैं ।
जिसकी कुंडली में विरञ्चि योग हो वह बहुत बुद्धिमान् हो;
वैदिक धर्माचार्य हो; ब्रह्मज्ञान परायण हो और गुणी हो । ऐसा व्यक्ति
सदैव ही प्रसन्नचित्त रहेगा और वेदोक्त मार्ग से कभी विचलित
नहीं होगा । उसके अनेक प्रख्यात शिष्य होंगे । सौम्य वचन वाला,
बहुत धन, पुत्र स्त्री आदि के सुख से युक्त । ऐसे व्यक्ति के मुख-
मण्डल पर सात्विक ब्रह्म तेज की उज्ज्वलता रहती है । ऐसे व्यक्ति
दीर्घायु और जितेन्द्रिय होते हैं, और राजा लोग भी उन्हें नमस्कार
करते हैं । ॥३१॥
अन्योन्यं भवनस्थयोर्विहगयोर्लग्नाद्रिःफान्तकं
भावाधीश्वरयोः क्रमेण कथिताः षट्षष्टियोगा जनैः ।
- सरस की परिभाषा काव्य ग्रन्थों में देखिये ।
छठा अध्याय : योग १३१
त्रिंशद्वैन्यमुदीरितं व्ययरिपुच्छिद्रादिनाथोत्थिता-
स्त्वष्टौ शौर्यपतेः खला निगदिताः शेषा महाख्याः
स्मृताः ।।३२।।
मूर्खः स्यादपवादको दुरितकृन्नित्यं सपत्नादितः
क्रूरोक्तिः किलदैन्यजश्चलमतिर्विच्छिन्नकार्योद्यमः ।
उद्धृत्तश्च खले कदाचिदखिलं भाग्यं लभेताखिलं
सौम्योक्तिश्च कदाचिदेवमशुभं दारिद्र्यदुःखादिकम् ।।३३।।
श्रौकटाक्षनिलयः प्रभुराढ्यश्चित्रवस्त्रकनकाभरणश्च ।
पार्थिवाप्तबहुमानसमान्जो यानवृत्तसुतवांश्च महाख्ये ।।३४।।
इन तीन श्लोकों में ६६ योग बताये हैं। यदि दो स्थानों
(भाव) के स्वामी परस्पर स्थान परिवर्तन कर लें तो ये योग बनते
हैं। (१) लग्नेश द्वितीय में, द्वितीयेश लग्न में, (२) लग्नेश चतुर्थ में,
चतुर्थेश लग्न में ‘(३) लग्नेश पञ्चम में, पञ्चमेश लग्न में ‘(४)
लग्नेश सप्तम में, सप्तमेश लग्न में (५) लग्नेश नवम में; नवमेश
लग्न में (६) लग्नेश दशम में दशमेश लग्न में, (७) लग्नेश* लाभ
में, लाभेश लग्न में (८) ४धनेश७ चतुर्थ में और चतुर्थेश धन
में (९) धनेश पञ्चम में; पञ्चमेश धन में (१०) धनेश सप्तम
में और सप्तमेश धन में (११) धनेश भाग्य में और भाग्येश
धन में (१२) धनेश दशम में और दशमेश धन में (१३) धनेश
- लाभ ग्यारहवें स्थान को कहते हैं।
४ धनेश दूसरे घर के मालिक को कहते हैं।
७ भाग्य स्थान नवम स्थान को कहते हैं।
१३२ फलदीपिका
लाभ में, लाभेश धन में (१४)* सुखेश पञ्चम में और पञ्चमेश
सुख में (१५) सुखेश सप्तम में और सप्तमेश सुख में (१६) सुखेश
भाग्य में और भाग्येश सुख में (१७) सुखेश दशम में, दशमेश सुख में
(१८) सुखेश लाभ में, लाभेश सुख में (१९) पञ्चमेश सप्तम में, सप्त-
मेश पंचम में (२०) पंचमेश भाग्य में और भाग्येश पंचम में (२१)
पंचमेश दशम में और दशमेश पंचम में (२२) पंचमेश लाभ में तथा
लाभेश पंचम में (२३) सप्तमेश भाग्य में और भाग्येश सप्तम में (२४)
सप्तमेश दशम में और दशमेश सप्तम में (२५) सप्तमेश लाभ में और
लाभेश सप्तम में (२६) भाग्येश राज्य f में और राज्येश भाग्य में (२७)
भाग्येश लाभ में और लाभेश भाग्य में (२८) राज्येश लाभ में और लाभेश
राज्य में ।
ऊपर जो २८ योग बताये गये हैं उन सबको 'महायोग' कहते हैं।
अब इनका फल बताते हैं। जो व्यक्ति महायोग में पैदा होता है उस पर
लक्ष्मी का कृपा कटाक्ष होता है अर्थात् वह धनी होता है। ऐसा जातक
अनेक व्यक्तियों का स्वामी, धनिक, सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण
करने वाला, राजा (या सरकार) से सम्मानित और पुरस्कृत होगा।
उच्च पदवी पर काम करे और उसे राजा से अधिकार मिले। ऐसे व्यक्ति
को धन, पुत्र और सवारी का सुख प्राप्त हो।
अब बाकी ३८ ऐसे योग बताते हैं जो अच्छे नहीं समझे जाते। इन
३८ योगों को दो भागों में बाँटा गया है। इनमें ८ तो खल योग कहलाते
हैं और बाकी के ३० योग, दैन्य योग।
- चौथे स्थान को सुख स्थान कहते हैं और चौथे घर के स्वामी
को सुखेश कहते हैं।
f दशम स्थान को राज्य स्थान कहते हैं और दशमेश को
राज्येश ।
छठा अध्याय : योग १३३
(१) यदि व्ययेश* लग्न में हो और लग्नेश व्यय में (२) यदि
व्ययेश द्वितीय में हों और द्वितीयेश व्यय में (३) यदि व्ययेश तृतीय
में हो और तृतीयेश व्यय में (४) यदि व्ययेश सुख में हो और सुखेश
व्यय में (५) यदि व्ययेश पंचम में हो और पंचमेश व्यय में (६) यदि
व्ययेश षष्ठ में हो और षष्ठेश व्यय में (७) यदि व्ययेश सप्तम में
हो और सप्तमेश व्यय में(८)यदि व्ययेश अष्टम में हो और अष्टमेश
व्यय में (९) यदि व्ययेश भाग्य में हो और भाग्येश व्यय में (१०) यदि
व्ययेश राज्य में हो और राज्येश व्यय में (११) यदि व्ययेश लाभ में
हो और लाभेश व्यय में ।
(१२) यदि अष्टमेश लग्न में हो और लग्नेश अष्टम में (१३) यदि
अष्टमेश धन में हो और धनेश अष्टम में (१४) यदि अष्टमेश तृतीय
में हो और तृतीयेश अष्टम में (१५) यदि अष्टमेश सुख में हो और
सुखेश अष्टम में (१६) यदि अष्टमेश पंचम में हो और पंचमेश
अष्टम में (१७) यदि अष्टमेश छठे में हो और षष्ठेश अष्टम में (१८)
यदि अष्टमेश सप्तम में हो और सप्तमेश अष्टम में (१९) यदि
अष्टमेश भाग्य में हो और भाग्येश अष्टम में (२०) यदि अष्टमेश
राज्य में और राज्येश अष्टम में (२१) यदि अष्टमेश लाभ में हो और
लाभेश अष्टम में ।
(२२) यदि षष्ठेश लग्न में हो और लग्नेश षष्ठ में (२३) यदि
षष्ठेश धन में और धनेश षष्ठ में (२४) यदि षष्ठेश तृतीय में और
तृतीयेश षष्ठ में (२५)यदि षष्ठेश सुख में और सुखेश षष्ठ में(२६)
यदि षष्ठेश पंचम में और पंचमेश षष्ठ में (२७) यदि षष्ठेश सप्तम
में और सप्तमेश षष्ठ में (२८) यदि षष्ठश भाग्य में और भाग्येश
- बारहवें घर को व्ययस्थान और इस स्थान के स्वामी को
व्ययेश कहते हैं ।
१३४ फलदीपिका
षष्ठ में (२९) यदि षष्ठेश राज्य में और राज्येश षष्ठ में (३०) यदि
षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में हो तो दैन्य योग होता है ।
यह तीसों योग दैन्य योग कहलाते हैं। जो व्यक्ति दैन्य योग में
उत्पन्न होता है वह स्वयं मूर्ख परन्तु दूसरों की निन्दा करने वाला, दुष्ट-
कर्मा और सदैव शत्रुओं से पीड़ित रहता है। ऐसा व्यक्ति कूर वचन
बोलता है और स्थिर मति का नहीं होता । वह जिस भी कार्य को
प्रारम्भ करेगा उसमें विघ्न और विच्छेद उत्पन्न हो जावेंगे ।
अब आठ खल योग बताये जाते हैं।
(१) लग्नेश तृतीय में-तृतीयेश लग्न में (२) धनेश तृतीय
में-तृतीयेश धन में (३) तृतीयेश चतुर्थ में-चतुर्थेश तृतीय में (४) तृतीयेश
पंचम में-पंचमेश तृतीय में (५) तृतीयेश सप्तम में सप्तमेश तृतीय में
(६) तृतीयेश भाग्य में - भाग्येश तृतीय में (७) तृतीयेश राज्य में -
राज्येश तृतीय में (८) तृतीयेश लाभ में - लाभेश तृतीय में ।
यह ८ योग खलयौग कहलाते हैं । यह आठों दुष्ट प्रभाव उत्पन्न
करने वाले हैं इस कारण इन्हें 'खल' कहा है। जो व्यक्ति खल योग
में उत्पन्न होता है वह कभी अनाचार के मार्ग पर चलने वाला कभी
सदाचार के मार्ग पर आरूढ़ - कभी अखिल सौभाग्यशाली कभी पूर्ण
दरिद्रता और दुःख प्राप्त करने वाला, कभी शुभवाणी बोलने वाला और
कभी दुष्ट - इस प्रकार शुभ तथा अशुभ दोनों प्रभावों से युक्त होता है।
शेष में इसका फल उत्तम नहीं माना है - शुभ प्रभाव कम और अशुभ
प्रभाव अधिक है - इसीलिये 'खल' संज्ञा दी गई है । ३२-३४ ॥
यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयं मन्त्रेश्वर महाराज ने इसी
अध्याय में आगे श्लोक ५७-७० में छठे घर का स्वामी यदि दुः
'स्थान में पड़े तो हर्षयोग, आठवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े
तो 'सरल योग' और बारहवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े तो
'विमल योग' बतलाया है । फिर इन श्लोकों में जो छठे स्थान का
स्वामी आठवें या बारहवें के स्वामी से स्थान परिवर्तन करे, या आठवें
छठा अध्याय : योग १३५
का स्वामी बारहवें के मालिक से स्थान परिवर्तन करे तो दैन्य योग-
जिसका फल अच्छा नहीं है, क्यों कहा ? इसमें हेतु यह है कि आगे के
५७ श्लोक से ७० श्लोक तक जो योग बताये गये हैं उनमें स्थान परिवर्तन
वाली बात नहीं कही गई है और इन ३२ से ३४ श्लोकों में स्थान
परिवर्तन की शर्त लगाई गई है।
किन्तु उत्तर कालामृत खंड ४ श्लोक २२ में छठे, आठवें, बारहवें
घर के मालिकों के परस्पर स्थान परिवर्तन का जो उत्तम फल बताया
गया है वह फलदीपिका के मत से बिल्कुल उलटा पड़ता है। उत्तर
कालामृत का श्लोक है।
रन्ध्रेशो व्ययषष्ठगो रिपुपतौ रन्ध्रे व्यये वा स्थिते
रिःफेशोऽपि तथैव रन्ध्ररिपुभे यस्यास्ति तस्मिन्वदेत् ।
अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चान्यैरयुक्तेक्षिता
जातोऽसौ नृपतिः प्रशस्तविभवो राजाधिराजेश्वरः ॥
अर्थात् (१) यदि आठवें घर का स्वामी बारहवें या छठे घर में
हो (२) यदि छठे घर का स्वामी आठवें या बारहव घर में हो (३)
यदि बारहवें घर का स्वामी आठवें या छठे घर में हो और (४) यह
तीनों स्वामी एक दूसरे की राशि में हों या एक दूसरे से देखे जाते हों
और (५) अन्य भावों के स्वामियों से युत (सहित) या वीक्षित न
हों (अर्थात् अन्यभवनों के स्वामियों से सम्बन्ध न करते हों तो) ऐसे
योग में उत्पन्न मनुष्य बहुत वैभव वाला राजाधिराज नृपति होता है।
इसे विपरीत राजयोग कहते हैं। अर्थात् जो ग्रह सामान्यतः अनिष्ट
फल उत्पन्न करने वाले हैं, उनसे शुभफल उत्पन्न हो । यह उनके
साधारण फल से जो उलटा फल हुआ इस कारण (विपरीत उलटे को
कहते हैं) इसे विपरीत राजयोग की संज्ञा दी है।
इसमें और फलदीपिका के योगों में कुछ विभिन्नता है। वह यह
कि फलदीपिका में दो ग्रहों का (षष्ठेश, अष्टमेश, या द्वादशेश में से