फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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एक अन्य स्थान पर यह भी लिखा है कि चन्द्रमा से ३, ६, १०, ११, में
शुभ ग्रह हो तो वसुमान् योग होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में
शुभ ग्रह होने से अतिवसुमान योग होता* है, इसी प्रकार लिखा है
कि यदि चन्द्रमा से ६, ७, ८ में सौम्य ग्रह हों तो बहुत उत्तम योग
होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी-किसी योग में गुण और
अवगुण दोनों होते हैं। साथ की कुण्डली में चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों
ग्रह बलवान् हैं और अपने-अपने घर के हैं। इस कारण शुभ फल करेंगे
ही। ॥ १७ ॥
अब अधम, सय और वरिष्ठ योग का फल बताते हैं:—
(क) यदि अधम योग में उत्पन्न हो तो द्रव्य, सवारी, यश, सुख,
सम्पत्ति, ज्ञान, बुद्धि, विनय, निपुणता, विद्या, उदारता और सुख योग,
इनका बहुत कम फल प्राप्त हो।
स्व० जयनारायण जी व्यास (जो कभी जोधपुर के चीफ मिनिस्टर
रहे और पदच्युत हो गये, कभी राजस्थान के चीफ मिनिस्टर रहे और
पदच्युत हो गये) की जन्मकुण्डली में शकट योग है। इस कारण
जीवन में अनेक चढ़ाव-उतार देखने पड़े।
श्री जयनारायण जी व्यास का जन्म विक्रम संवत् १९५५ में माघ
कृष्ण नवमी शनिवार को सूर्योदय के १२ घड़ी ४८ पल पर हुआ।
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| २ चं. | १२ | ११ | |
| | | सू. | |
+---------------+---------------+---------------+ १० बु. |
| | | |
| मं. के. | १ +---------------+
| ३ | | |
+---------------+ | ९ शु. रा. |
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| ४ | | |
+---------------+ ७ बृ. | श. ८ |
| ५ | ६ | | |
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(कुण्डली विवरण: लग्न १; द्वितीय भाव २ चं.; तृतीय भाव ३ मं. के.; चतुर्थ भाव ४; पञ्चम भाव ५; षष्ठ भाव ६; सप्तम भाव ७ बृ.; अष्टम भाव श. ८; नवम भाव ९ शु. रा.; दशम भाव १० बु.; एकादश भाव ११ सू.; द्वादश भाव १२)
- बृहज्जातक अध्याय १३, श्लोक ९। तथा बृहज्जातक अध्याय
१३, श्लोक २।