सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

छठा अध्याय : योग १२५
जनाधिकारी क्षितिपालशस्तो भोगी प्रदाता परकार्यकर्ता ।
बन्धुप्रियः सत्सुतदारयुक्तो धीरः सुमालाह्वययोगजातः ॥२२॥
कुमार्गयुक्तोऽशुभमालिकाख्ये दुःखी परेषां वधकृत् कृतघ्नः ।
स्यात्कातरो भूसुरभक्तिहीनो लोकाभिशप्तः कलहप्रियः स्यात् ॥२३॥
नित्यं मङ्गलशीलया वनितया क्रीडत्यरोगी धनी
तेजस्वी स्वजनान् सुरक्षति महालक्ष्मीप्रसाहालयः ।
श्रेष्ठान्दोलिकया प्रयाति तुरगस्तम्बेरमध्यासितो
लोकानन्दकरो महोपतिवरो दाता च लक्ष्मीभवः ॥२४॥
सुन्दरगात्रः इलाघितगोत्रः पार्थिवमित्रः सद्गुणपुत्रः ।
पङ्कजवक्त्रः संस्तुतनेत्रो राजति गौरीयोगसमुत्थः ॥ २५ ॥
इन श्लोकों में चार योग बताये हैं । शुभ माला, अशुभ माला,
लक्ष्मी और गौरी । इन चारों योगों को क्रमशः बताते हैं ।
(१) यदि सब ग्रह पंक्ति से पांचवें, छठे, सातवें घरों में हों तो
शुभ माला योग होता है ।
(२) यदि समस्त ग्रह छठे, आठवें, बारहवें इन स्थानों में क्रम से
हों तो अशुभ माला योग होता है ।
(३) यदि नवें स्थान का स्वामी और शुक्र दोनों अपने घर में या
उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो लक्ष्मी
योग होता है ।
(४) यदि चन्द्रमा स्वराशि या उच्चराशि का होकर लग्न से केन्द्र