फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १११
(क) यदि पुरुष की कुंडली हो और निम्नलिखित चारों योग
उस कुण्डली में हों तो महाभाग्य योग होता है । (१) दिन में जन्म
हो अर्थात् सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त के पहले । (२) लग्न
ऊनी*—विषम राशि का हो (३) सूर्य विषम राशि का हो (४)
चन्द्रमा भी विषम राशि में हो । स्मरण रहे पुरुष की कुण्डली में चारों
योग होंगे तभी महाभाग्य होगा । यदि एक भी बात की कमी हुई
तो योग नहीं होगा ।
अब यह बताते हैं कि स्त्री की कुण्डली में महाभाग्य योग के लिये
क्या-क्या बातें जरूरी हैं:—
(१) रात्रि में जन्म हो अर्थात् सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय के
पहले । (२) सम लग्न हो (३) सम राशि में चन्द्रमा हो (४) सम
राशि में सूर्य हो । इन चारों बातों का रहना आवश्यक है तभी कन्या
की कुण्डली महाभाग्य योगवाली कहलावेगी ।
(ख) अब दूसरे योग बताते हैं चाहे स्त्री की कुण्डली हो चाहे
पुरुष की कुण्डली हो निम्नलिखित योग दोनो में एक ही प्रकार से लागू
होंगे । यदि चन्द्रमा बृहस्पति से केन्द्र में हो तो इसको केसरी योग
कहते हैं । बहुत से ज्योतिष ग्रन्थों में इस योग का नाम गज केसरी योग
भी है ।
(ग) यदि चन्द्रमा से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में बृहस्पति
हो तो शकट योग होता है किन्तु यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो तो
शकट योग नहीं होता ।
(घ) यदि सूर्य से केन्द्र में चन्द्रमा हो तो अधम योग होता है ।
- १, ३, ५, ७, ९, ११, यह ऊनी राशियां हैं, २, ४, ६, ८, १०,
१२ यह पूरी (सम) राशियां हैं ।
१ से मेष, २ से वृष, ३ से मिथुन, ४ से कर्क इसी प्रकार समझना
चाहिये ।